आनंदीबाई जोशी के पत्र

आनंदीबाई जोशी (31 मार्च, 1865 – 26 फरवरी, 1887) पहली हिंदुस्तानी महिला थीं जिन्होंने अमेरिका में डॉक्टरी की पढ़ाई की। नौ साल की उम्र में उनका विवाह गोपाल राव जोशी से हुआ जो उम्र में उनसे 20 साल बड़े थे और विधुर थे। गोपाल राव महिला शिक्षा के समर्थक थे और प्रगतिशील विचारों से प्रभावित थे। इसके तहत उन्होंने आनंदीबाई को पढ़ने और अंग्रेजी सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। नीचे आनंदीबाई जोशी द्वारा अपने पति को लिखे गए पत्रों के कुछ अंश दिए गए हैं। ये उनके रिश्ते पर रोशनी डालते हैं।

“पुरानी यादों को कुरेद कर आपके हृदय को वेदना पहुँचाना या हमारे प्रेम में किसी तरह की दरार पैदा करना मेरा उद्देश्य नहीं है…। यह तय करना बहुत कठिन है कि मेरे प्रति आपका बर्ताव अच्छा था या बुरा। अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूँगी कि इसमें दोनों बातें थीं। अंतिम उद्देश्य की दृष्टि से आपका बर्ताव सही माना जा सकता है; लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि एक बच्चे के मस्तिष्क पर ऐसे बर्ताव के संभावित प्रभावों के लिहाज से यह बर्ताव गलत था। मुझे 10 साल की छोटी सी उम्र में टूटी हुई छड़ी से पीटना, जब मैं 12 साल की थी उस वक्त मुझ पर कुर्सी और किताबें फेंकना और मुझे छोड़कर चले जाने की धमकी देना तथा जब मैं 14 साल की थी तब इसी तरह की दूसरी अजीबोगरीब सज़ाएँ देना – यह मेरी उस उम्र, मेरे शरीर और मस्तिष्क के लिए बहुत गंभीर चीजें थीं। बचपन में दिमाग अपरिपक्व व शरीर अविकसित होता है। और आप जानते हैं कि मैंने ऐसे मौकों पर किस तरह का बर्ताव किया। अगर उस कच्ची उम्र में मैं आपको छोड़कर चली जाती जिसका आप लगातार संकेत करते रहे तो क्या होता? मैं कहीं गुम हो जाती (और न जाने कितनी ही लड़कियाँ अपनी सास और पतियों के हाथों इसी तरह के उत्पीड़न के कारण अपने घर-बार छोड़कर जाती रही हैं।) मैं ऐसा नहीं कर पाई क्योंकि मैं इस बात से भयभीत थी कि इस तरह का बिना आगा-पीछा सोचे उठाया गया कदम मेरे पिता की इज्जत को मिट्टी में मिला देगा…। और मैं आपके विनती करती रही कि मुझ पर रहम न करो, मुझे मार डालो। हमारे समाज में सदियों से पत्नियों और पतियों के बीच कोई कानूनी पाबंदी नहीं रही है, और अगर कोई है भी तो वह औरतों के खिलाफ ही जाती है! ऐसी सूरत में मेरे पास इसके अलावा कोई और चारा न था कि मैं आपको कुर्सियों से अपने को मारने दूँ और चुपचाप इस सब को बर्दाश्त करती रहूँ। एक हिंदू स्त्री के पास अपने पति के सामने मुँह खोलने या उसको सलाह देने का कोई हक नहीं होता। उसे केवल इस बात का अधिकार होता है कि वह चुपचाप अपने पति को वे सारी चीजें करने दे जो वह करना चाहता है। प्रत्येक हिंदू पति अपनी पत्नी से धैर्य का सबक सीख सकता है जिससे उसका बड़ा भला होगा। (मैं भली-भाँति जानती हूँ कि आपके बिना मैं कभी वो नहीं बन पाती जो आज मैं बनी हूँ और इसके लिए मैं सदा आपकी ऋणी रहूँगी; लेकिन आप इस बात को नकार नहीं सकते कि मैं हमेशा शांत रही।) मैं यही सब बर्दाश्त करने के लिए पैदा हुई थी। लेकिन अब मैं संतुष्ट हूँ।“

… जब मैं पुरुष और स्त्री के संबंधों के विषय पर विचार करती हूँ तो मैं तथाकथित रूढ़िवादी विचारों की तरफ खड़ी दिखाई देती हूँ। जब तक औरत पुरुष के बराबर हैसियत में नहीं आ जाएगी तब तक उसके लिए यही बेहतर है कि वह कुछ खास सामाजिक बंदिशों में रहे, जैसे कि ‘पुनर्विवाह न करना’, ‘पुरुष के अधीन रहना’, ‘अपने पति को परमेश्वर मानना।’ शास्त्रों में यही निर्देश दिए गए हैं। लेकिन जब मैं इस बात पर विचार करती हूँ कि तमाम युगों और कालों में स्त्रिायों को कैसी-कैसी पीड़ाओं का शिकार बनाया गया है तो मैं यह देखने के लिए अधीर हो जाती हूँ कि पश्चिमी प्रकाश कब हमारे जीवन में मुक्ति और कल्याण के पथप्रदर्शक के रूप में अवतरित होगा। यहाँ मैं अपने आप को पूरी तरह अभिव्यक्त कर पाने में अक्षम महसूस करती हूँ। मुझे यह विश्वास दिलाया जाता रहा है कि पुरुष और स्त्री आत्मरक्षक करने वाले हों और अपना गुजारा चलाने व जीवन की अन्य जरूरतों के लिए एक-दूसरे पर निर्भर न रहें। केवल ऐसी स्थिति में ही सारे पारिवारिक तनावों और सामाजिक अपमानों पर विराम लग सकता है। मुझे यह देखकर घोर दुख होता है कि भारत में यूरोपियनों के बीच बहुत सारी स्त्रियों को केवल विवाह के लिए शिक्षित और योग्य बनाया गया है। आह! किसी स्त्री के लिए यह कितनी वाहियात बात है कि वह कुँवारों को लुभाने के लिए घड़ी-घड़ी पोशाकें बदलती रहे और गहनों से सजती रहे।

… हमारे यहाँ बहुविवाह की प्रथा नहीं है…। हमारे लोग अगर एक से ज्यादा पत्नी रखते भी हैं तो इसलिए कि उन्हें अपनी पहली पत्नी या दूसरी पत्नी से कोई बेटा नहीं हो पाया है। यानी आप यह देख सकते हैं कि सामाजिक और धार्मिक रूप से हम बेटों की चाह में कितने लिप्त हैं। स्वर्ग का द्वार सिर्फ ऐसे पुरुष के लिए ही खुला है जिसका कोई बेटा है। औरों के लिए यह रास्ता बंद है।

हमारे पास सभी मौसमों के लिए एक-सी पोशाक होती है। हम कभी गर्म कपड़े नहीं पहनतीं क्योंकि इसे भद्दा माना जाता है और न ही हम कभी जूते या बूट पहनती हैं क्योंकि हमें विरले ही कभी घर की चहारदीवारी से बाहर जाने का मौका मिलता है। कहने का मतलब यह कि सारे ऐश्वर्य सिर्फ मर्दों के लिए हैं। जाड़ा, गर्मी और वसंत, सब उन्हीं को महसूस होता है – औरतों को ये सब महसूस नहीं होता। उनसे उम्मीद की जाती है कि मौसमों में आने वाले इन सारे बदलावों से बेपरवाह रहें। ऐसे में क्या हमें आपसे ईष्र्या न होनी चाहिए?

… हाल में मैं किसी न किसी वजह से बीमार रही हूँ। भारत में उँचे वर्गों की महिलाएँ आमतौर पर काफी दुर्बल होती हैं। मेरे ख़याल में इसके पीछे कम उम्र में विवाह की प्रथा का काफी हाथ है जो पूरे भारत में फैली हुई है, लेकिन क्योंकि आप भी कुछ ऐसी ही शिकायत कर रहे हैं इसलिए मुझे लगता है कि विवाह की व्यवस्था में ही कुछ खोट है।

पंडिता रमाबाई के जीवन पर आधारित निरंतर प्रकाशन ‘भय नाहीं, खेद नाहीं’ से एक अंश

संघर्ष जारी है

समानता…….औरत और आदमी के बीच समानता…… औरत और आदमी के बीच समानता होनी चाहिए ऐसा सभी मानते हैं पर क्या हकीकत में हमारे और आपके परिवारों में ऐसा है। कुछ लोग ये दावा कर सकते हैं कि उनके यहां आदमी और औरत बराबर हैं और शायद हों भी, पर ये कितने परिवारों और महिला पुरूषों के बीच की हकीकत है? अपने काम के दौरान अक्सर जो हकीकत सामने आती है वो यह कि गांव की महिलाओं से जब औरत और आदमी के बीच की समानता के बारे में बात करती हैं तो उन्हें बहुत अजीब लगता है। वो तो पहले से ही यह मानकर बैठी हैं कि आदमी सर्वोपरी हैं और महिलाओं का स्थान उनके बाद आता है। जो ऐसा नहीं भी मानतीं, वे ये मानती हैं कि उनके परिवार में पति उनको महत्त्व देते हैं और जहां ज़रूरी हो उनकी बात सुन भी ली जाती है। पर सवाल ये है कि जहां ज़रूरी हो का क्या मतलब है? क्या यही समानता है?

हाल ही के एक प्रशिक्षण में महिलाओं और पुरूषों के द्वारा किए जाने वाले काम और विभिन्न संसाधनों पर किसका हक होता है, इनपर चर्चा के द्वारा हम समानता की बात करने का प्रयास कर रही थीं। बात की शुरूआत हुई कहानी सुनाने से।

इस कहानी में सोहन अपनी पत्नी रामप्यारी को रोज़ाना ये ताना देता है कि घर का थोड़ा सा काम करके खाना बनाकर खेत लाने में वह देर कर देती है। जब रामप्यारी कहती है कि घर के काम बहुत हैं तो सोहन दावा करता है कि वह रामप्यारी की तुलना में कम समय में घर का काम पूरा करके दिखा सकता है। फिर क्या अगले दिन रामप्यारी तो जाती है खेत और सोहन अपने दावे को सच करने में जुट जाता है… मगर घर का काम इतना अधिक होता है कि उससे संभल नहीं पाता। हडबडाहट में किसी तरह खाना लेकर खेत पर पहुंचता है, मगर जल्दी में धोती पहनना ही भूल जाता है।

इस कहानी से शुरूआत हुई महिलाओं और पुरूषों के काम पर चर्चा की और उनके द्वारा किए जाने वाले कामों की सूची बनाने की। जब हम महिलाओं और पुरूषों के द्वारा किए जाने वाले कामों की सूची बना रही थीं तो प्रतिभागियों को ये देख हैरानी हुयी कि आदमियों के कामों की सूची में उनका सुबह उठकर हग कर आना और शाम में काम से आकर आराम करना भी दर्ज हो गया। वहीं दूसरी ओर इसके विपरीत दिखाई दिया कि महिलाओं को दिनभर में घर-खेत के कामों के बीच आराम करने का समय ही बहुत कम मिलता है। मगर इसके बावजूद वे अपने काम को आदमियों से हर तरह से कम मानती हैं और अक्सर उन्हें घर पर बैठने का और कुछ न करने का ताना झेलना पड़ता है।

इसके साथ ही चर्चा हुई संसाधनो पर हक की। चर्चा में पहले तो प्रतिभागियों ने कहा कि उनके घर पर उनका हक है पर जब उदाहरण देकर उनसे पूछा गया कि मान लें कि उन्होंने पति की मर्ज़ी के खिलाफ नौकरी करने का फैसला लिया होता तो उन्हें सबसे पहले क्या सुनने को मिला होता? सभी प्रतिभागियों से एकमत निकलकर आया कि उन्हें उसी घर से निकल जाने का फरमान जारी हो जाता। तो फिर वह घर उनका कैसे हुआ? चर्चा को और आगे बढ़ाते हुए जब उनसे पूछा कि उनकी नौकरी से मिले वेतन पर हक किसका होगा तो दस में से सात प्रतिभागियों का कहना था कि  उस पैसे पर उन्हीं का हक होगा। वे उस पैसे को अपनी मर्ज़ी से खर्च कर सकती हैं। मगर फिर निकल कर आया कि इस मर्ज़ी में पति या घर के मुखिया पुरूष की सहमति होना आवश्यक है। इस चर्चा के दौरान मुझे झारखंड़ में काम करने वाली टीचर के साथ हुई एक घटना याद आ गई।

दरअसल झारखण्ड में प्रौढ़ केन्द्र पर पढ़ाने वाली इस टीचर ने अपने पति से कहा कि उसने अपनी नौकरी से जो पैसे इकट्ठे किए हैं उनसे वह स्कूटी खरीदना चाहती है। इससे उसे सेन्टर जाने में सहुलियत होगी। पति ने मना किया पर वह ज़िद करने लगी। इसपर पति ने उसे बहुत मारा। बावजूद इसके उसने स्कूटी खरीद ली। पति को यह बात इतनी नागवार गुज़री कि उसने दोबारा न केवल पत्नी की पिटाई की बल्कि स्कूटी भी तोड़ दी। प्रतिभागियों के साथ जब इस घटना को सांझा किया तो संसाधनों पर हक की चर्चा में उन्होंने यह बात कही कि दीदी आप सही कह रही हैं। महिलाओं का हक केवल नाम के लिए ही होता है। सभी संसाधनों पर मालिकाना हक/नियंत्रण तो पुरूषों का ही होता है। हालांकि चर्चा के अन्त में यह भी जुड़ा कि आजकल महिलाओं के नाम पर ज़मीन या घर लिखवाया जाता है और वह इसलिए कि ऐसा करने पर रजिस्ट्री में कुछ प्रतिशत की छूट मिलती है, पर इससे भी उस ज़मीन या घर को बेचने का फैसला महिला नहीं कर सकती है, क्योंकि असल नियंत्रण तो पुरूष का ही होता है।

जब शाम में चर्चा में शामिल एक प्रतिभागी ने अपने पति को सत्रों के दौरान हुई चर्चा के बारे में बताया तो सुनते ही पति ने कहा – ‘ये दीदी क्या घर तुड़वाने आई हैं?’ यह सुनना मेरे लिए नया नहीं था। इस तरह के प्रशिक्षणों में, जहां पर महिला और पुरूषों के बीच गहरी असमानता पर बात की जाती है, प्रशिक्षक की छवि घर तुडवाने वाले की ही बनाई जाती है। मैं अक्सर ये सवाल करती हूं कि आखिर ऐसा क्यों? क्यों समानता की बात करना घर तोड़ने जैसा लगता है? जब तक औरत चुप है तब तक घर परिवार बना हुआ है। क्या इसलिए कि औरत को बराबरी और अपने हक की बात करनी ही नहीं चाहिए। यदि औरत अपने हक को समझेगी और बराबरी की बात करेगी तो पुरूष को ये नागवार गुज़रेगा और यदि वह नहीं मानेगी तो दोनो साथ न रह पाएंगे। तो क्या आंखें मूंद कर चुपचाप रहना और ऊपर से ये चोला ओढ़ लेना कि घर में बराबरी है, सब ठीक है, सही है?

एक बात और जो इस तरह की चर्चाओं में होती है वह यह कि अक्सर प्रतिभागी प्रशिक्षक को एक रोल मॉडल के रूप में देखने लगती हैं और उसके निजी जीवन में झांकने की कोशिश करती हैं। वे ये जानना चाहती हैं कि जो इतनी बराबरी की बात कर रही हैं, वे अपने घर में कितनी बराबरी से जीती हैं? इसलिए अधिकतर ये सवाल किये जाते हैं कि क्या आपकी शादी हो गई है? आपके पति आपके साथ ही रहते हैं? ऐसे में मुझे लगता है कि प्रतिभागियों से यह सांझा करना बहुत ज़रूरी है कि प्रशिक्षकों की जिंदगी भी इतनी सुलझी और साफ-सुथरी नहीं है। हम सभी अपने-अपने स्तर पर संघर्ष कर रही हैं। ज़रूरत है तो इस गैर बराबरी को पहचानने की और जब भी जहां भी मौका मिले इसपर चोट करने की, आवाज़ उठाने की।

सावित्रीबाई फुले: ज़माने को बदला अपने विचारों से

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हम अंदाज़ा लगा ही सकते हैं कि जब दलितों का आज भी इतना शोषण होता है तो आज से 150 साल पहले क्या हाल रहा होगा। ऐसे में ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले ने इनके हकों की बात उठाई। पति-पत्नी की इस जोड़ी ने मांगा और महार जातियों के बीच काम किया। महाराष्ट्र में ये जातियां सबसे निचली मानी जाती थीं। उन्होंनें इन जातियों में भी सबसे दबे हुए वर्ग की लड़कियों और औरतों के साथ काम किया।

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समन्दर पार

पंडिता रमाबाई (1858-1922) का पूरा जीवन एक अनथक यात्रा है। जब वे छह महीने की थीं तभी उनके पिता सपरिवार तीर्थयात्रा पर निकल पड़े थे। पुराण बाँचते हुए पूरे परिवार ने भारत भ्रमण किया। उसी बीच उनकी पारंपरिक शिक्षा-दीक्षा हुई। यात्रा के दौरान अकाल में उनके माता-पिता की मृत्यु हो गई। आगे उन्होंने इंग्लैंड जाना तय किया जिसको लेकर लोगों में हलचल मच गई थी। उस समय समुद्र यात्रा को पाप माना जाता था। और उसमें भी स्त्री का अकेले जाना किसी के गले नहीं उतर रहा था। रमाबाई ने यह पत्र महाराष्ट्र के अपने मित्र सदाशिव पाडुरंग केलकर के नाम लिखा था। उन्होंने मराठी भाषा में इसे किताब की शक्ल में छपवा दिया। इंग्लैंड यात्रा के बारे में लिखी गई यह किताब बिकेगी, ऐसी उम्मीद थी। छपाई का खर्च निकल जाने के बाद बिक्री के पैसे रमाबाई की पढ़ाई के खर्चे के काम आएँगे, यह भी इरादा था।
सेंट मेरीज़ होम, इंग्लैंड
प्रिय भाई,
कल दोपहर में आपका पत्र मिला। उसे पढ़ते समय मेरे मन की हालत क्या थी, इसे बता नहीं सकती। अपने लोगों को छोड़कर दूर चले जाने वाला आदमी ही यह समझ सकता है कि मैं क्या महसूस करती हूँ। आप इसे दूसरे अर्थ में नहीं लीजिएगा, मगर यहाँ पर आना मेरी खुशकिस्मती है। अभी तक मैंने बहुत परेशानियाँ झेली हैं और उसके बाद यहाँ का जीवन वाकई सुखमय लगता है। ईश्वर ने यह अच्छा मौका मुझे दिया है।
मनुष्य का जीवन एक नाटक है। हम रंगमंच पर जो देखते हैं, वह मिथ्या है। हकीकत में हमारा जीवन ही नाटक है। लगभग एक साल पहले मैंने आपको बताया था कि मैं यूरोप जाना चाहती हूँ। मेरा इरादा है कि वहाँ जाकर मैं मेडिकल की पढ़ाई करूँ। 20 अप्रैल, 1883 की शाम बंबई से हम ‘एस.एस. बुखारा’ नामक पानी के जहाज़ से इंग्लैंड के लिए रवाना हुए। आप सबने यह यात्रा करने से मना किया था। और मैं अपने दोस्तों से ऊपर नहीं हूँ, लेकिन मुझे लगा कि मुझे जाना चाहिए। मैं इंग्लैंड गई ताकि अपने आपको जीवन और आगे के काम के लिए तैयार कर सकूँ। मेरा फैसला सही है और मैंने वही किया जो करना चाहिए था।
जहाज़ में मेरा केबिन बहुत सँकरा था। छः सीट थी, पर हम तीन ही थे – मैं, मेरी बेटी मनोरमा और मेरी दोस्त आनंदीबाई भगत। हमारे साथ कोई विदेशी नहीं रहना चाहता था, इसलिए हमें सुविधा ही हुई। सत्ताइस दिन का पूरा सफर था। उसमें हम लगभग आधा पेट खाकर रहे या कहिए  आधा भूखे। कारण यह था कि जहाज़ पर जो खाना मिलता था, वह खाया नहीं जा रहा था। फिर भी मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। उसकी कृपा से कम से कम समुद्र के बीचोबीच खाना तो मिल रहा था।
मुझे शुरू से मुश्किल का सामना करने का अभ्यास है। इसलिए दूसरों की तुलना में कम दिक्कत हुई। पहले भी अपने पिता के साथ जहाज़ की यात्रा कर चुकी थी। अपनी माँ-बहन-भाई सबके साथ जहाज़ से मंगलोर से बंबई और बंबई से द्वारका गई थी। इंग्लैंड की इस यात्रा में एडेन देश होते हुए 1 मई, 1883 को हम स्वेज़ बंदरगाह पहुँचे। वहाँ हमने जहाज़ बदला और कलकत्ता से आ रहे दूसरे जहाज़ पर सवार हुए। इस जहाज़ का नाम था ‘एस.एस. केसरी-ए-हिन्द’। यह स्टीमर हालाँकि ज़्यादा बड़ा था, पर भीड़ भी उतनी ही थी।
चार दिन बाद हम जिब्राल्टर देश पहुँचे। उसके बाद समुद्र ने भयानक रूप धारण कर लिया। हमारा स्टीमर बहुत झटके खा रहा था। इतना कि हम केबिन के एक छोर से दूसरे छोर तक एक दूसरे पर लुढ़के जा रहे थे। सारे मुसाफिरों की हालत खराब थी। यदि हम खड़े होने की कोशिश करते तो दीवार से सिर जा टकराता था। 16 मई को लंदन के पास के एक बंदरगाह पर स्टीमर ने लंगर डाला। बंदरगाह पर सेंट मेरीज होम (ईसाई नन की संस्था) से दो सिस्टर मुझसे मिलने आईं। उन्होंने मेरा प्रेम पूर्वक स्वागत किया। उनमें से एक सिस्टर का परिचय मुझ से पूना शहर के सेंट मेरीज़ होम में हुआ था। उनके साथ एक और सज्जन थे, जो बाद में चले गए। सिस्टर के साथ मैं सेंट मेरीज़ होम  पहुँची, जहाँ अच्छे से स्वागत हुआ।
फिलहाल यहाँ आकर मैंने अपनी पढ़ाई शुरू कर दी है। नई दिनचर्या में रम गई हूँ। काफी कुछ पढ़ना और जानना-समझना है। भारत में क्या चल रहा है, इसकी खोज-खबर भी रखती हूँ। अभी यहाँ बाहर घूम-फिरकर नहीं देखा है। आपको फिर लिखूँगी, जब कुछ जान समझ लूँगी।
आपकी रमा
(निरंतर की पत्रिका ‘आपका पिटारा’ के 98वे अंक ‘दुनिया की सैर में प्रकाशित)
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हाॅकी खेलती लड़कियाँ

कात्यायनी पिछले 24 सालों से अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं। उन्होंने कई कविताएँ और कहानियाँ भी लिखी हैं। नीचे उनकी एक कविता से अंश दिया गया है।
आज शुक्रवार का दिन है
और इस छोटे से शहर की ये लड़कियाँ
खेल रही हैं हाॅकी, खुश हैं लड़कियाँ
फिलहाल खेल रही हैं हाॅकी, कोई डर नहीं
बाॅल के साथ दौड़ती हुई, हाथों में साधे स्टिक
वे हरी घास पर तैरती हैं
चूल्हे की आँच से, मूसल की धमक से
दौड़ती हुई बहुत दूर आ जाती हैं
लड़कियाँ पैनल्टी काॅर्नर मार रही हैं
लड़कियाँ पास दे रही हैं
लड़कियाँ गोल-गोल चिल्लाती हुई
बीच मैदान की ओर भाग रही हैं
लड़कियाँ एक-दूसरे के ऊपर ढह रही हैं
एक-दूसरे को चूम रही हैं
सीटी मार रही हैं और हँस रही हैं
इसी तरह खेलती रहती लड़कियाँ
निःसंकोच-निर्भीक दौड़ती भागती रहतीं इसी तरह
और हम देखते रहते उन्हें
hockey
पर शाम है कि होगी ही रैफरी है कि बाज़ नहीं आएगा
सीटी बचाने से और स्टिक लटकाए हाथों में
एक भीषण जंग से निपटने की तैयारी करती लौटेंगी घर
अगर ऐसा न हो तो समय रूक जाएगा
वज्रपात हो जाएगा, चक्रवात आ जाएगा
घर पर बैठे देखने आए वर पक्ष के लोग पैर पटकते चले जाएँगे
बाबू जी घुस आएँगे गरजते हुए मैदान में
भाई दौड़ता हुआ आएगा और झोंट पकड़कर घसीट ले जाएगा
अम्मा कोसेगी किस घड़ी में पैदा किया था ऐसी कुलच्छनी बेटी को
घर फिर एक अंधेरे में डूब जाएगा
सब सो जाएँगे लड़कियाँ घूरेंगी अंधेरे में
खटिया पर चित्त लेटी हुई अम्मा की लंबी साँसे सुनती
इंतज़ार करती हुई कि अभी वे आकर उनका सिर सहलाएँगी
सो जाएँगी लड़कियाँ
सपने में दौड़ती हुई बाॅल के पीछे
स्टिक को साधे हुए हाथों में पृथ्वी के छोर पर पहुँच जाएँगी
और गोल-गोल चिल्लाती हुई एक-दूसरे को चूमती हुई
लिपटकर धरती पर गिर जाएँगी
(निरंतर के प्रकाशन ‘हमारी कलम से’ में प्रकाशित)