‘कलामे निस्वां’: मुस्लिम औरतों की सुलगती आवाजें

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आपके सामने पेश है निरंतर प्रकाशन कलामे निस्वां से एक लेख. इस प्रकाशन में हैं उर्दू में लिखी मुसलमान औरतों की आवाजें, जिनका वैसे के वैसे हिन्दी में लिप्यन्तरण कर दिया गया है. ये आवाजें करीब सौ साल पुरानी हैं. ये मुसलमान औरतें अपनी दुनियाँ देख रही हैं, मज़े ले रही हैं उसकी नुकताचीनी भी कर रही हैं. इनमे हिचकिचाहट भी है तो कहीं वे बेख़ौफ़ भी नज़र आती हैं. ये खुदमुख्तार औरतें है जो कई बार अपने नाम से नहीं लिख पाती हैं. मगर फिर भी वे लिखती हैं, बोलती हैं.

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Experiences and Learnings from a Conference on Sustainable Development through Multilingual Education- Part 2

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This is the second part of this article where Prarthana shares her experiences and learnings at the 5th International Conference on Language and Education at UNESCO, Bangkok, where we presented a paper on ‘Breaking the Barriers of Languages in India’.

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Experiences and Learning from a Conference on Sustainable Development through Multilingual Education- Part 1

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Nirantar recently participated in the 5th International Conference on Language and Education at UNESCO, Bangkok, where we presented a paper on ‘Breaking the Barriers of Languages in India’. One of the participants from Nirantar, Prarthana, has described her experiences below of being a part of this platform and has shared her learning from this space.

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कल्पना की उड़ान

आज कल्पना चावला (मार्च 17, 1962 – फ़रवरी 1, 2003) की  14वीं बरसी है। वे कोलंबिया स्पेस शटल हादसे में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं। उनके काम और सफलता की चर्चा आज भी देश में ही नहीं, पूरे विश्व में होती है. लेकिन क्या थे उनके सपने और कैसे वो पहुंची अपने सपनों तक, आईये पढ़ते है उनके चाँद-तारों को छू लेने की चाहत और सपनों के बारे में।

pitara27-copyआसमान कितना सुंदर दिखता है। दिन में सूरज की चमक, तो रात में झिलमिलाते चाँद-तारे। मन करता है आसमान तक पहुँच जाएँ। क्या होगा बादलों के ऊपर? जाने चाँद-तारे पास से कैसे दिखते होंगे?

ऐसी ही बातें हरियाणा की एक लड़की सोचती थी। उसका नाम है – कल्पना चावला। बचपन में उसका कमरा चाँद-तारों की तस्वीरों से भरा रहता था। बड़ी होने पर वह सचमुच धरती से लाखों मील ऊपर तक घूम आई। इस लाखों मील ऊपर की जगह को अंतरिक्ष कहते हैं। वैसे तो दुनिया के कई आदमी-औरत वहां जा चुके हैं। पर कल्पना हिंदुस्तान की सबसे पहली औरत है जो अंतरिक्ष में गई।

अंतरिक्ष में धरती जैसे कई ग्रह हैं – जैसे शनि और मंगल, इसके अलावा वहाँ चाँद, तारे, और सूरज भी हैं। पर यह सब धरती से बहुत अलग हैं। हमारी धरती पर साँस लेने के लिए हवा होती है। पर जैसे-जैसे हम धरती से ऊपर जाते हैं, हवा कम होती जाती है। अंतरिक्ष में तो हवा होती ही नहीं है! साँस लेने के लिए लोग वहाँ सिलिंडर में हवा ले जाते हैं। और हैरानी की बात यह है कि वहाँ पहुँचते ही लोग उड़ने लगते हैं। धरती में हर चीज़ को अपनी ओर खींचने की ख़ास ताकत होती है। इसलिए पेड़ से फल हमेशा ज़मीन पर गिरता है। अंतरिक्ष में ऐसी कोई ताकत नहीं होती। इसलिए वहाँ ज़मीन पर टिकने के लिए ख़ास कपड़े पहनने पड़ते हैं।

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दलित जीवन का दर्पण: आपका पिटारा, अंक 55

‘आपका पिटारा’ पत्रिका 1994 से 2010 तक निरंतर ने सरल हिंदी में प्रकाशित की थी। इस पत्रिका को हिंदी भाषी राज्यों में प्रौढ़ पाठकों और किशोर-किशोरियों के लिए नियमित रूप से प्रकाशित किया जाता था। हर अंक में पाठकों के लिए ताज़ा खबरें, कहानियाँ, कविताएँ, लेख, चुटकुले और तस्वीरें हुआ करतीं थीं।

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‘आपका पिटारा’ का अंक 55 (दलित महिला-जीवन के संघर्ष) एक विशेषांक था जिसमें दलित औरतों के जीवन की कहानियाँ तथा उनके सामाजिक और निजी अनुभवों के बारे में लिखा गया था।

इन कहानियों में दर्शाई गयी औरतें अपनी ज़िंदगी में गरीबी, अन्याय, और अत्याचार के बावजूद मजबूर और लाचार नहीं दिखाई नहीं देतीं। उनका अपना अस्तित्व, अपनी एक पहचान और उनका आत्मविश्वास शब्दों में साफ़ झलकता है।

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