चुनौतियों के बीच, आज़ादी की लहर

निरंतर के सहयोग से सहजनी शिक्षा केंद्र द्वारा नारीवादी शिक्षण पद्धति से जुडी शिक्षिकाओं का सम्मेलन 7-8 नवंबर महरौनी, ललितपुर, उत्तरप्रदेश में आयोजित किया गया। इस दो दिवसीय सम्मेलन में से एक दिन शिक्षिकाओं ने नाटक तैयार कर उसे प्रस्तुत किया। इस नाटक में उन्होंने अपनी कहानी और अपने सामने आने वाली चुनौतियों की एक झलक दिखाई।

इस नाटक को देख कर लगा कि व्यावहारिक स्तर पर भले ही गाँव और शहरों में काम कर रही शिक्षिकाओं की चुनौतियाँ अलग अलग हों मगर भावनात्मक स्तर पर इनमे कोई फर्क नहीं है। नाटक की शुरुवात हुई एक औरत से जिसको घर से बाहर जाकर काम करने का अवसर मिलता हैं। जहाँ एक ओर लोग उसे घर से बाहर काम करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं वहीं दूसरी ओर यही लोग इस काम के दौरान उसकी सीमाएँ भी निश्चित कर देते हैं। वह घर से बाहर जा सकती है लेकिन घर का सारा काम करने के बाद। बाहर जाकर वह महिलाओं को सिखाने का काम कर सकती है लेकिन इस काम के दौरान पुरुषों से बात नहीं कर सकती। वह उन्हीं महिलाओं के घर जा सकती है जो उसकी जाति की हैं। जाति से बाहर लोगों से बात करने की उसे इजाज़त नहीं है। जहाँ एक तरफ घर वाले यह दिखाना चाहते हैं कि वे घर में औरतों को कुछ करने की आज़ादी दे रहे हैं, वहीं उसके गले में इज़्ज़त के नाम का फंदा भी डाला हुआ है। तो ये कैसी आज़ादी है?

natak blog

शिक्षिकाओं की चुनौतियाँ केवल घर तक सीमित नहीं हैं। नाटक के अगले भाग में हम देखते हैं कि जिन महिलाओं को पढ़ाने के लिए शिक्षिकाएँ घर-परिवार से लड़ जाती है, उन्हीं में से वे महिलाएँ जो उनकी जाति से उच्च जाति की हैं शिक्षिकाओं के साथ जातिगत भेदभाव करती है। शिक्षिकाओं का काम महिलाओं को सीखने के लिए प्रेरित करना होता है, मगर यही महिलाएँ इन्हें जातिगत बंधनों की रस्सियों में बाँध कर असहाय कर देतीहैं। समाज के ताने भी इनके साथ चलते है और शिक्षिकाएँ संघर्ष करती रहती हैं। नाटक के आख़िरी भाग में हम देखते हैं कि सारी चुनौतियों से लड़ते हुए जब शिक्षिकाएँ ऐसे मुक़ाम पर आती हैं कि उनकी जद्दोजहद रंग लाने लगती है। काम आगे बढ़ता है और कुशलतापूर्वक होने लगता है तो पता चलता है कि जिस प्रोजेक्ट में वो काम कर रही हैं उसके पैसे ख़तम हो रहे हैं। शिक्षिकाओं को ये डर सताता रहता है कि वे जिस दुनिया से लड़झगड़ कर बाहर निकलीं हैं। इतने संघर्ष के बाद कहीं वापस जाकर दुनिया में न फँस जाएँ। वापस जाने का मतलब है अपनी खिल्ली उड़वाना और जो आज़ादी उन्होंने इतनी मुश्किल से प्राप्त की है उसे खो देना। इस तरह फंडिंग की तलवार उनके सिर पर लटकी रहती है।

इस तरह उन्होंने पारिवारिक, कार्यात्मक और पैसे के स्तर पर आने वाली चुनौतियों को इस नाटक में दर्शाया। इस नाटक ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। भावनात्मक स्तर पर जब इन शिक्षिकाओं की यात्रा को देखती हूँ तो उसे अपनेआप से जोड़ पाती हूँ – घर की सीमाओं को तोड़ना, पुरानी सोच से लड़ना, अपनी राह खुद तय करना और लोगों का साथ न होने के बावजूद संघर्ष करते रहना – यह किसी भी नारीवादी महिला की यात्रा में दिखेगा। लेकिन, आर्थिक रूप से स्वालंभी होना इन सब चुनौतियों का सामना करने के लिए ज़रूरी है। इसके बिना, बाकी सभी लड़ाइयाँ फीकी पड़ जाती है। आज के माहौल में, जहाँ प्रोजेक्ट की फंडिंग एक सीमित ढांचे में आती है, और भविष्य में भी वो मिलती रहेगी इसकी कोई गारंटी नहीं होती। ऐसे में क्या करें कि ये शिक्षिकाएँ घरों से बाहर निकलकर अकेली ना छूट जाएँ। यह सवाल पूरे सम्मेलन में मेरे दिमाग में घूमता रहा।

Advertisements

यौनिकता युवाओं की शिक्षा का हिस्सा: क्यों और कैसे?

art1

यौनिकता हमारी ज़िंदगी का एक हिस्सा है और हमारा मानना है कि यौनिकता शिक्षा पाना युवाओं का एक अधिकार है जो उनसे नहीं छीना जा सकता। यौनिकता को युवाओं की शिक्षा का हिस्सा क्यों होना चाहिए? अगर शिक्षा का ताल्लुक अपने जीवन के हालात को विवेचनात्मक ढंग से समझने से है तो यौनिकता भी लाज़िमी तौर पर शिक्षा का हिस्सा होनी चाहिए। यौनिकता शिक्षा की ज़रूरत युवाओं की ज़िंदगी के मौजूदा यथार्थ से जुड़ी हुई है। बढ़ती उम्र में युवा लोगों के पास यौनिकता के बारे में ढेरों सवाल, असंख्य भ्रम और न जाने कितनी गलतफहमियां होती हैं लेकिन उन्हें कभी इनका जवाब नहीं मिलता क्योंकि यौनिकता के बारे में सटीक जानकारी के स्रोत बहुत कम हैं। इस कारण उनके भीतर सेक्स और यौनिकता से जुड़े मुद्दों के बारे में शर्मिंदगी, भय और अज्ञानता का अहसास बहुत गहरा हो जाता है। इसका एक गंभीर दुष्परिणाम यह भी होता है कि जो युवा जेंडर और यौनिकता के संबंध में तय सामाजिक कायदे-क़ानूनों का उल्लंघन करते हैं, उन्हें शोषण का सामना करना पड़ता है। युवाओं के सशक्तीकरण के लिए यौनिकता शिक्षा अनिवार्य है।

सशक्तीकरण करने वाली यौनिकता शिक्षा की ओर बढ़ने के लिए हमारी निम्न सिफारिशें हैं

  • आयु अनूकुल सूचनाएं मुहैया कराना एक अनिवार्य मार्गदर्शक सिद्वांत होना चाहिए। ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शिक्षा की विषयवस्तु और शैली संबंधित आयु समूह की ज़रूरतों और हितों के अनुरूप हों। ये इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यौनिकता एक जीवन भर चलने वाला अनुभव है और केवल किशोरावस्था से शुरू नहीं होता।
  • यौनिकता शिक्षा रोगों की रोकथाम के उद्देश्य से उपकरणवादी ढंग से संचालित नहीं होनी चाहिए। एचआईवी और एड्स सहित विभिन्न अन्य बीमारियों के बारे में जानकारियां देना तो महत्वपूर्ण है परंतु यह पाठ्यक्रम का केवल एक हिस्सा हो सकता है। उसके केंद्र में युवाओं की शिक्षा संबंधी आवश्यकताएं ही होनी चाहिए।
  • यौनिकता शिक्षा भय पर आधारित और उपदेशात्मक नहीं होनी चाहिए। भय आधारित रवैया निश्चित रूप से नुकसानदेह रहता है। यदि कोई सामग्री या पद्धति विद्यार्थियों में भय पैदा करने की कोशिश करता है तो यह शिक्षा के बुनियादी सिद्वांत — विद्यार्थी के प्रति सम्मान — का हनन है। डर की वजह से विद्यार्थी सीखने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से हिस्सा नहीं ले पाते। यदि उद्देश्य केवल व्यवहार में बदलाव लाने तक ही सीमित है तो भी भय आधारित रवैये से ऐसा बदलाव नहीं लाया जा सकता।
  • यौनिकता शिक्षा युवाओं के सूचना के अधिकार पर आधारित होनी चाहिए। हमारा मानना है कि इस सामग्री में यौनांगों एवं प्रजनन तंत्र की बनावट और शरीर विज्ञान, गर्भनिरोध, हस्तमैथुन आदि के बारे में सूचनाएं ज़रूर होनी चाहिए। इन चीज़ों के बारे में जो गलतफहमियां फैली हुई हैं उनको दूर करने के लिए ये बहुत ज़रूरी है क्योंकि इन गलतफहमी से युवाओं को बहुत नुकसान होता है। इस सामग्री में दी जाने वाली सूचना गुमराह करने वाली नहीं होनी चाहिए। क्योंकि यह सूचना मौजूदा सामाजिक मान्यताओं से तय हो रही है इसलिए उसके ज़रिए जो संदेश दिए जाते हैं उनमें सूचनाओं के विकृत होने का खतरा बना रहता है।
  • यौनिकता शिक्षा की पद्धति अपने बारे में सकारात्मक बोध पैदा करने वाली और यौनिकता के प्रति सकारात्मक रवैये पर आधारित होनी चाहिए। हमारे जीवन के अन्य आयामों की तरह यौनिकता के भी सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों आयाम होते हैं। लिहाज़ा हम केवल नकारात्मक आयामों पर ज़ोर नहीं दे सकते क्योंकि ऐसी स्थिति में यौनिकता के एक विस्तृत आयाम को नकारा जाएगा। केवल सकारात्मक रवैया अपनाने से ही युवा अपने साथ होने वाले अन्याय और अधिकारों के हनन को रोक सकते हैं। शरीर और यौनिकता के बारे में शर्मिंदगी का भाव पैदा करने वाली नैतिकतावादी सोच बच्चों और किशोर-किशोरियों को अपने साथ होने वाली गलत हरकतों को पहचानने और उनके बारे में बात करने से रोक देती है। यहां तक कि बच्चे और किशोर-किशोरियां यौन उत्पीड़न के बारे में भी मुंह खोलने से डरते हैं।
  • यौनिकता शिक्षा का फ्रेमवर्क समता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित सामाजिक विश्लेषण वाला होना चाहिएपाठ्यक्रम के ज़रिए यौनिकता के बारे में भी उसी तरह समझ विकसित की जानी चाहिए जिस तरह कुछ सामग्रियों में जेंडर के बारे में समझाया गया है। इसके लिए समाजीकरण की संरचनाओं और प्रक्रियाओं के बारे में समझाया जाना चाहिए जिनकी वजह से भेदभाव और अन्याय पैदा होता है। जेंडर की तरह यहां भी कोशिश यह होनी चाहिए कि युवाओं को इस बात का अहसास कराया जाए कि वर्चस्व और नियंत्रण की ताकतों के बावजूद परिवर्तन संभव है। यौनिकता शिक्षा को मौजूदा पूर्वाग्रहों को पुष्ट नहीं करना चाहिए बल्कि विद्यार्थियों को उन पर सवाल खड़ा करने की ताकत देनी चाहिए।
  • हाशियाकरण के मुद्दे सभी के लिए महत्वपूर्ण हैं। ऐसे मुद्दों का महत्व केवल उन्हीं के लिए नहीं है जो प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहे होते हैं, हममें से सभी जीवन के किसी न किसी बिंदु पर इनसे सीधे प्रभावित होते हैं। विकलांगता से जुड़े अधिकारों पर काम करने वाले एक्टिविस्ट गैर-विकलांगों को टैब्स – टैम्प्रेरीली एबल्ड बॉडीड – कहते हैं। यह संबोधन इस मान्यता पर आधारित है कि विकलांगता किसी भी समय किसी भी व्यक्ति के जीवन का हिस्सा हो सकती है। समलैंगिक चाह और जेंडर ट्रांसग्रैशन के मुद्दों के संदर्भ में क्वीयर एक्टिविस्ट लोगों का मानना है कि हम जेंडर और यौन इच्छाओं को जिस तरह अनुभव करते हैं वह न तो प्राकृतिक होता है और न ही स्थायी होता है। विकलांगता की तरह समलैंगिकता, द्विलैंगिकता या विषमलैंगिकता जैसी कोई स्थायी श्रेणियां नहीं होतीं।
  • यौनिकता शिक्षा के ज़रिए ‘सामान्य’ (नार्मल) और ‘प्राकृतिक’ जैसे विचारों को पुष्ट नहीं किया जाना चाहिए। यौनिकता शिक्षा इस समझदारी पर आधारित होनी चाहिए कि जेंडर की तरह यौनिकता ही नहीं बल्कि हमारे जीवन के सभी आयाम सामाजिक रूप से निर्मित होते हैं। ‘प्राकृतिक’ और ‘स्वाभाविक’ जैसी कोई चीज़ नहीं होती। प्राकृतिक और सामान्य क्या होता है, इस आशय के विचार दरअसल समाज में मौजूद सत्ता असमानताओं को ही बनाए रखने का साधन होते हैं। इनकी वजह से कुछ लोगों के साथ भेदभाव और उनका हाशियाकरण होने लगता है जिन्हें ‘असामान्य’ या ‘अस्वाभाविक’ माना जाता है। दरअसल कुछ भी प्राकृतिक या सामान्य नहीं होता।
  • यौनिकता शिक्षा जीवन के यथार्थ पर आधारित और विविधताओं को प्रतिबिंबित करने वाली होनी चाहिए। यौनिकता शिक्षा में शहरी-ग्रामीण, धार्मिक, विकलांगता, जेंडर, यौन रुझान आदि के लिहाज़ से युवाओं के जीवन में मौजूद विविधता को रेखांकित और प्रतिबिंबित किया जाना चाहिए।
  • यौनिकता शिक्षा प्रदान करने के लिए पूर्वाग्रह मुक्त और सहभागी पद्धति का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यौनिकता शिक्षा के सहारे युवाओं को बहस और संवाद का मौका मिलता है और उन्हें झुंड की तरह हांकने की ज़रूरत नहीं पड़ती। इस शिक्षा को स्वतंत्र चिंतन, विवेचनात्मक सोच, संवेदनशीलता और सहमर्मिता की परिधि बनाया जा सकता है।

क्रियान्वयन से संबंधित मुख्य सिफारिशें

  • मूल स्कूली पाठ्यक्रम में यौनिकता शिक्षा को शामिल करने के लिए फ्रेमवर्क तय करने के वास्ते सरकार को एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन करना चाहिए। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) इस तरह की कमेटी का सबसे अच्छी तरह संचालन कर सकती है क्योंकि उसे देश के सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा संस्थानों में गिना जाता है।
  • पाठ्यक्रम का फ्रेमवर्क विकसित करने की प्रक्रिया में ऐसे व्यक्तियों और संगठनों को शामिल किया जाना चाहिए जिनके पास जेंडर/यौनिकता और किशोरावस्था के मुद्दों पर काम करने का अनुभव है। यौनिकता शिक्षा को युवा केंद्रित, समतापरक और न्यायपूर्ण बनाने के लिए ज़रूरी है कि पाठ्यक्रम के विकास की प्रक्रिया ऐसे लोगों की देखरेख में चले जिनके पास इन विषयों की उचित समझ और विशेषज्ञता है।
  • सामग्री ऐसी होनी चाहिए जो युवाओं पर केंद्रित हो। इसके साथ ही शिक्षकों के लिए भी सामग्री तैयार की जानी चाहिए। किसी भी दूसरे विषय की तरह यौनिकता शिक्षा की सामग्री ऐसी होनी चाहिए जो सीधे पाठकों को संबोधित करे। ऐसी सामग्री भी बहुत ज़रूरी है जिसे विद्यार्थी खुद प्रयोग कर सकें।
  • विकलांगता के साथ रह रहे लोगों के मामले में विशेष तकनीकों से सामग्री तैयार करना ज़़रूरी हैं क्योंकि उनकी ज़़रूरतें और अपेक्षाएं अलग तरह की हो सकती हैं। हमें इस बात को समझना चाहिए कि विकलांगता कई तरह की होती है और ऐसे युवाओं की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न
  • art2 तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस क्रम में ब्रेल, ऑडियो-विजुअल सहायता आदि का इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • चाहे स्कूली पाठ्यक्रम हो या गैर-स्कूली बच्चों के सीखने के लिए कोई और परिधि हो, यौनिकता शिक्षा उसके पाठ्यक्रम में शामिल होनी चाहिए। यौनिकता शिक्षा को एक ‘अतिरिक्त विषय’ के रूप में नहीं देखा जा सकता। जब तक यौनिकता शिक्षा को पाठ्यचर्या का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा तब तक उसे उचित संसाधन नहीं मिलेंगेऔर उस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाएगा। इसलिए इसे पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग बनाया जाना ज़रूरी है।
  • सघन शिक्षक प्रशिक्षण तथा अन्य लोगों का क्षमतावर्द्धन ज़रूरी है। यौनिकता और जेंडर ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें बड़े पैमाने पर वयस्कों को भी सीखने और भुलाने की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है। जो लोग स्कूली व्यवस्था से जुड़े हुए हैं उनके साथ-साथ युवाओं के बीच काम करने वाले अन्य लोगों, जैसे स्वास्थ्यकर्मी, आदि का भी क्षमतावर्द्धन आवश्यक है।

(ये लेख निरंतर द्वारा प्रकाशितयुवाओं के लिए यौनिकता शिक्षाकिताब पर आधारित है। इस लेख को पहली बारफेमिनिज्म इन इंडियावेबसाइट पर प्रकाशित किया गया था।)

Vacancy Announcement – Team Member, TransLiteracy Project

 

ad FB

 

About Nirantar:

Nirantar works towards enabling empowering education, especially for those from marginalized communities. We seek to promote transformatory formal and non-formal learning processes which enable the marginalized to better understand and address their realities. Our focus on gender interlinks strongly with other social dimensions, in particular those of caste, sexuality and religion. Nirantar promotes access to information, literacy, and perspective and skill building through interactive trainings and educational resources that are simple but not simplistic. Nirantar also works at the community level and undertakes research and advocacy, particularly on critical issues which need greater attention from the State as well as civil society. 

About the TransLiteracy Project:

The TransLiteracy project is a new project within Nirantar that works with trans persons on developing an adult literacy module that addresses the specific literacy and numeracy concerns of adult trans persons. In the pilot phase, Nirantar has partnered with SAATHII and Basera to set up an adult literacy centre for a group of Hijra learners in Noida. The primary objective of the  project in this phase is to recognize and understand the ways in which our learners’ gender identity/ies, combined with their caste, class and religious identities, has affected their access to education in their formative years and to formulate a way in which they can begin re-engaging with education in a meaningful way.

Along with this project, Nirantar is also part of a coalition that aims to understand and address the issues in mainstream education to make spaces and curriculum more diverse, inclusive and safe.

Currently the team is focusing on:

  • Developing a curriculum that is positive and political in its approach in dealing with the individual and collective struggles of trans persons.
  • Developing a curriculum that widens and challenges our understanding of our feminist notions of body, gender, love, sex and violence.
  • Visibilizing and representing narratives that are often excluded from the mainstream.
  • Reviewing and analyzing education policies to make them more LGBTI friendly.

Scope of Work:
The responsibilities of the Team Member:

  • Coordination and management of the project to deliver the work and achieve outcome of the project within the given time period.
  • Working with the team lead and other resource persons to develop the literacy and numeracy curriculum for the project.
  • Policy analysis of relevant documents and development of advocacy material.
  • Regular relationship building with partner organizations with whom the projects are implemented and also beyond the project based partnerships
  • Training and capacity building on curriculum and perspective building with partner organizations.
  • Organize workshops, consultation or any other event as per the planned activities within the organization and the project.
  • Report writing for the internal purposes as well as for funding agencies.
  • Networking, lobbying and advocacy with peer organizations as well as other stakeholders, communicating the events to them and extracting their participation wherever relevant.
  • Proposal writing and supporting fund raising activities for the project related initiatives as well as other work areas of the organization.
  • Creating material for training and critical engagement in simple accessible language.

Essential Qualification:

  • Postgraduate in social work/development studies/women’s studies/ or any other relevant subject.
  • Minimum 1 year of experience of working on issues of gender and sexuality and programme implementation and/or curriculum development.
  • Good communication skills in English and Hindi
  • Good writing skills in English and ability to read and write in Hindi as well

Desirable: 

  • Experience of working with grassroots organizations in rural or urban contexts
  • Past experience of working on projects with people from marginalized communities.
  • Previous experience of organizing and managing workshops and training programmes.
  • Previous experience of working on literacy material.
  • Good understanding of gender and sexuality issues.
  • Aptitude to learning and engaging with new issues.
  • Demonstrated public relations, management skills and experience of having worked with communities.
  • Ability to multi-task, produce to daily deadlines, manage independent projects, plus work in a team. 

Salary: As per the qualification and years of experience. 

Candidates are requested to:

  • Attach a full Curriculum Vitae and a letter of intent
  • Provide the names and contact details for two references

Please send your applications to nirantar.mail@gmail.com mentioning the position you are applying for in the subject line. For more information on our organization, please visit www.nirantar.net by 20th November, 2017.

 

 

वे बेनाम लड़कियां

भारत में जातिगत भेदभाव आम बात है।  कई बार अनजाने में हम भी उसका हिस्सा बन जाते हैं।  ये भेदभाव हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे घुल मिल गया है कि इसका अहसास होने में भी समय लग जाता है।  कई बार कोई चर्चा अचानक इन यादों को ताज़ा कर देती है।  ऐसा ही कुछ हुआ निरंतर द्वारा आयोजित जाति पर प्रशिक्षण में।  आइये जानें।

बात उन दिनों की है जब मै बहुत छोटी थी, मुश्किल से 8-10 साल की। मेरे घर के पीछे चरवाहे और बाकि लोग जिन्हें निचली जाति के लोग कहा जाता है, उनके बच्चे अपनी भैस–बकरी चराते थे। वहां बड़ा सा खुला मैदान था I हम सभी बच्चे वहीं शाम को खेला करते थे। कभी–कभी, मैदान में घास चरते–चरते, बकरियां ख़ास तौर से बकरी के बच्चे, बांस की बाड़ को पार करके हमारी बाड़ी में आ जाते थे। जब भी ऐसा होता, हम सभी बच्चे खुश भी होते और गुस्सा भी आता। ख़ुशी इस बात की होती कि बकरी के बच्चे के साथ खेलेंगे और गुस्सा इस लिए आता क्योंकि बकरियां बाड़ी से सब्ज़ी चर जाती थीं।

काफी बचपन से ही, बड़ी जाति के होने का गहरा आभास था। इसका ज्यादा मतलब नहीं मालूम था, लेकिन किसी छोटी जाति के बच्चे या बड़े द्वारा हमारी चीज़ को ख़राब करने या इस्तेमाल करने पर रौब ज़माना हमें बखूबी आता था। उनके जानवरों को नुक्सान पहुँचाना, उन्हें डांटना, अपनी कोई चीज़ उन्हें न देना मुफ्त में नहीं देना ही हमारी जातिगत ताकत की पहचान थी।

एक दिन, दोपहर को हमारी बाड़ी में एक बकरी का बच्चा घुस आया। हमने उसे पकड़कर बाँध दिया और उनके मालिक के आने का इंतजार करने लगे। लेकिन ये सब कुछ पापा से छुप कर चलता था, जिससे उनकी डांट न लगे। हमने सोचा हमेशा की तरह इस बार भी बकरी के मालिक को खूब डांट लगाएंगे और धमकाएंगे। फिर माफ़ी मागने पर, बकरी वापस कर देंगे। बच्चो के सामने, बड़ों को ऐसे जी हुज़ूरी करते देखने में मज़ा आता था। ऐसे ही मौके पर, हम बच्चों को अपनी ताकत का एहसास होता था।

goat

पता नहीं क्यों, उस दिन, पूरे दिन कोई बकरी लेने नहीं आया। इधर घर के पीछे के कमरे की तरफ बंधी बकरी ने दोपहर से ही शोर मचाना शुरू किया था। गनीमत थी कि पापा उस दिन घर पर नहीं थे। बाल–बाल बचे थे हम सभी। शाम को पापा के आते ही हम सभी ने बकरी को और घास लाकर दी और पानी भी पिलाया। धीरे–धीरे बकरी थोड़ी शांत हुई। लेकिन , बीच–बीच में अपनी माँ को याद करके मिमियाती भी थी। शाम ढलने के करीब, दो लडकियां, जो करीब 9-10 साल की होंगी, शोर मचाती हुई घर के पीछे के बाड़ से अन्दर आ गईं। आकर कहने लगीं, ‘ हमर बकरी के बच्चा, तोहरा एह अलेउअ। हमर बकरी दे दे।’ हमने भी गुस्से में एक साथ कहा , ‘ किसी की बकरी नहीं आई है।’ लेकिन वे परेशान सी, बिना हमारी बातों पर ध्यान दिए इधर- उधर ढूंढने लगी।

उसकी उम्र भी हम सभी के बराबर थी लेकिन आवाज़ बहुत कड़क थी। मेरी दीदी ने कहा, ‘उधर है तुम्हारी बकरी। हम नहीं देंगे। बुलालो अपनी माई को।’ वे नहीं मानी, फिर से बकरी मांगने लगी। उनमें से एक ने कहा,’ ज़रा सी बकरी अन्दर क्या आ गई, बकरी को पकड़ लिया।’ न जाने गुस्से में क्या–क्या बड़–बड़ किए जा रही थी। उसकी आधी बात समझ में आती और आधी नहीं। ये सब शोर सुनकर मां भी आ गईं। उन्होंने हमसे कहा, ‘ दे दो इसकी बकरी।’ और उससे, “अगली बार से ठीक से बांधना, इधर नहीं आए” कहती वहां से चली गई। हम सभी बच्चों को अन्दर ही अन्दर बहुत गुस्सा आ रहा था। बकरी देने का बिल्कुल मन नहीं था। उनमें से एक लड़की ने कहा, ‘ माई बाज़ार गेल हई। मुढ़ी बेचे। घरे न हई।’ मां की बात मान, बेमन से हमने उसकी बकरी दे दी। हम सभी को पहली बार किसी छोटी जाति की लड़की ने पलट कर जवाब दिया था। हमें अपना रौब दिखाने का ज्यादा मौका नहीं मिला। हमने सोचा अगली बार मज़ा चखाएंगे। उसके बाद अक्सर वो मुझे रस्ते में दिखाई देती मगर न कभी मैने उससे बात की, न उसने मुझसे।

मेरे घर के पास, हमारा आम, कटहल और जामुन का बड़ा बगीचा था । पूरे साल तो हमें वहां जाने का मौका नहीं मिलता था, लेकिन आम के मौसम में हम सभी जरुर जाते थे । गर्मी की छुट्टी में पूरे दिन बगीचे में खेलते, पढाई करते और आम की रखवाली भी करते थे । एक दिन वे दोनों बहनें, हमारे बगीचे में आईं । वे बगीचे से पत्ता बीनने आई थीं और बड़ी सी टोकरी लिए, बांस की झाड़ू से पत्ता बीन रही थीं। हमें देखकर रुक गईं । हमें लगा अब पुराना बदला लेने का मौक़ा आ गया है। हमनें उन्हें डांटते हुए कहा, ‘ हमारे बगीचे में पत्ता बीनने कभी मत आना । कहीं और जाओ । भागो यहाँ से ।’ दोनों ने बुरा सा मुंह बनाया और बड़–बड़ाती हुई चली गईं । हमें अपनी जीत पर बहुत ख़ुशी थी ।

कुछ साल बाद एक दिन मै बाज़ार जा रही थी तो रास्ते में उन्हें देखा । वे दोनों बहनें सरकारी तालाब के किनारे छोटी झोपड़ी बना रही थीं। उनकी माई टाटी ( घास-फूस की दीवार) लगा रही थी और दोनों उसकी मदद कर रहे थे। मैंने पहले कभी उनका घर नहीं देखा था। कहीं छोटी–छोटी गलियों के अंदर जाकर था। अब वे थोड़ा बाहर तालाब के पास झोपड़ी बना रही थीं । पहली बार उन्हें देखकर आज गुस्सा नहीं आया था । उन्हें इतनी मेहनत से वह छोटी सी झोपड़ी बनाते देख एक अलग सी अनुभूति हुई जिसके लिए आज कोई शब्द नहीं ढूंढ पा रही हूँ । मैंने घर जाकर मां से उनके बारे में पूछा । उन्होंने बताया कि वे चार बहनें हैं और सबसे छोटी बेटी के पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही पिता गुजर गए । बहनों के बीच भी कुछ ख़ास उम्र का अंतर नहीं है । पता चला कि कि वे दोनों बहने ही घर का सारा काम करती हैं और माई का बाज़ार के काम में भी हाथ बटाती हैं। बकरी चराना, लकड़ी लाना, खाना बनाना और बाज़ार का काम करना, सभी कुछ करना पड़ता है दोनों को।

उस दिन के बाद भी मैंने उनसे कभी बात नहीं की, लेकिन अब कभी लड़ाई भी नहीं करती थी। उन्हें अपने बगीचे से पत्ते बिनने देती और उनकी बकरी अन्दर आने पर भगा देती थी। जब मै आठवीं कक्षा में पहुची तो मेरा बाज़ार जाना कम हो गया। इसलिए, काफी दिनों से उसका घर नहीं देख पाई थी। वो आजकल बकरी चराने भी नहीं आती थीं। पहले बाज़ार आते-जाते उनके घर की तरफ देख लेती थी। कभी वो बकरी बांधती, कभी तालाब में बर्तन धोती तो कभी घर लीपती हुई नज़र आ जाती थीं। काफी महीनों बाद एक दिन उनमे से एक बहन को देख मैं चौक गई। उसने पीली साड़ी पहनी थी और लाल सिंदूर लगाया था। मुझे समझ अया गया कि उसकी शादी हो गई है। उसे तो ठीक से साड़ी पहनना भी नहीं आ रहा था। साड़ी लपेटे हुए, घर के बाहर गेहू समेट रही थी। उस वक्त उसकी उम्र मुश्किल से 13 -14 साल की रही होगी।

स्कूल की पढाई के बाद जब भी मै घर जाती वो मुझे कभी नहीं दिखी। इतने साल बीत गए, मैंने कॉलेज की पढाई खत्म करके, नौकरी भी शुरू कर दी। लेकिन वे दोनों बहनें उसके बाद नहीं दिखीं। निरंतर द्वारा आयोजित जाति पर प्रशिक्षण के दौरान चर्चा से कई पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। बचपन की वो बातें जो बहुत साधारण लगाती थीं, उन्हें गहराई से सोचने का मौका मिला। पढाई के साथ–साथ जातिगत भेदभाव को धीरे–धीरे समझने लगी थी। लेकिन इस प्रशिक्षण के दौरान अलग-अलग घटनाओं और सामाजिक ढांचे पर हुई चर्चा ने यादें ताज़ा कर दीं।  कैसे बचपन में हम उन्हें ‘झगरौनी ‘, यानी झगड़ा करने वाली कहकर आपस में बातें करते थे। उनका नाम न तो हमें  मालूम था नाहीं जानने की कभी कोशिश की थी। अब समझ में बात आती है कि वे इतना झगड़ा क्यों करती थीं? उनकी विधवा माई और दोनों बहनों को ही पूरे परिवार का खर्च चलाने के लिए मेहनत करनी पड़ती थी। दूसरों के बगीचे से पत्ते लाना, लकड़ी लाना, खेतो से चुरा कर साग–सब्जी लाना, लोगों की लालची नज़रो का सामना करना, इन हालातों में गुस्सा, गाली, लडाई और बोलने के सिवा और कोई गुंजाइश नहीं थी। बिना झगडे तो वे तालाब किनारे घर तक नहीं बना पाई थीं। तालाब किनारे जमीन तो सरकारी थी लेकिन, ऊँची जाति के लोग किसी गैर को वहां बसने नहीं देते थे। काफी लड़–झगड़कर उनलोगों ने अपनी झोपड़ी बनाई थी। अपनी रोज की रोटी के लिए लड़ना उन्होंने इस बेरहम समाज से ही सीखा था।

Understanding Caste

Bangla Lady---3
(This article is based on a conversation from the 4-day workshop on Understanding Caste, organized by Nirantar and conducted by DiptaBhog and Purnima Gupta, was initiated by this question. The workshop, which was attended by participants from 5 organizations -Vanangana, Sakar, Vikalp, SahajaniShiksha Kendra and Nirantar.)

“If a Dalit case-worker asks a savarna complainant to drink water offered by her, isn’t the case-worker perpetuating another kind of violence on the complainant?”

One of the most revealing conversations during the course of the workshop happened towards the end of the second day, when different organizations were sharing their experiences in the field. Vanangana, a UP based organization, shared the story of the Dalit Mahila Samiti, and their work with survivors of domestic violence and assault. The Samiti, run by Dalit women, in the area, they shared, had an important pre-condition before accepting someone’s case. They would help a woman and her family with their casework, if the survivor and the survivor’s family drank a glass of water from their hands.

The moment this was shared, another participant voiced a concern that by doing so – by asking the survivor (presumed here to be a savarna woman) to drink a glass of water offered by them, wasn’t the Samiti perpetuating another violence upon the already stricken woman? The articulation of that question – the concern that a Dalit woman asking an upper caste woman to drink a glass of water from her hands, is an act of violence – reveals the deep, insidious, and sordid nature of caste based discrimination in our societies. A system in which the institutionalization of violence towards certain communities and people is so normalized that it is not even viewed as violence any more but any move these communities make towards destabilizing the status quo is seen as an egregious act of violence. The expectation that a Dalit woman will help an upper caste woman in resolving her case, but will agree to be treated without dignity or basic courtesy without it being even remotely considered as problematic also reveals the historic entitlement upper-caste communities have over Dalit women’s bodies, their labour and their time. This expectation is seen as normal and even natural and any move to destabilize that – any assertion of equality is seen as violence. It also drove home the point that many of us constantly seek to invisibilize and was something that was constantly reiterated during the workshop – Caste is not a problem, external to upper-caste communities. Mr. Satish Deshpande, in his session described caste as a two-way relationship and also mentioned how historically certain processes have enabled upper caste communities to invisibilize their caste identities while visbilizing the caste identities of lower caste communities. This is an idea that most of us have internalised very deeply, because when we talk about caste, we only seem to talk about Dalit identities or OBC identities, seeing ourselves and our upper caste identities as above or in many ways, having transcended the caste system. A question like this brings to the fore the ways in which we are not only deeply embedded in the system and have reaped the privileges of the system but continue to reap those benefits by excluding others or committing violence against others. It is our privilege that we hold a sense of entitlement over certain bodies and our blinding privilege that we continue to not see it as an expression of our caste based violence.