शहरों  की चकाचौंध और बदलाव को देखकर लगता है जैसे पूरा शहर बदल गया I ऐसा लगता है, लोगों का जीवन भी बदल गया होगाI लेकिन, अन्दर झाँकने पर पता चलता है कि  अभी भी आम लोगों, खास तौर पर हाशिये पर रह रहे लोगों का जीवन नहीं बदला है I धर्म और जाति से जुड़े मुद्दों पर मीडिया, नेता और सत्ताधारी लोग बहस करते रहते हैं I लेकिन, लोगों की बुनियांदी जरूरतों की ओर क्या किसी का ध्यान जाता है? अगर कभी चला भी जाए तो हवा के रुख की तरह आकर चले जाने में उसे समय नहीं लगता।  नीचे दी गई कविता में लोगों के रोज जीने के लिए चल रहे संघर्षों की झलक दिखाई देती है I 
विकास शब्द सुनकर लगता है,
वही पड़ोस का लड़का,
जो कभी इधर – कभी उधर,
बस दौड़ता रहता है I
बड़ी – बड़ी मीटिंगों में,
बड़े अदब से लेते हैं यह नाम,
कभी ठहर जाती हैं आखें,
कभी ठहर जाती है जुबाँ I
दिल्ली के फ्लाईओवर देखकर,
लगता है विकास, अभी – अभी आया है I
बस अब और देर नहीं I
लेकिन जब मैं दिल्ली की सीमापुरी की गलियों से गुज़री,
तो मानो अँधेरा सा छा गया I
उन तंग गलियों में झाँकने,
कभी विकास आया ही नहीं ?
पुरानी दिल्ली की जामा मस्जिद के पास टूटे रास्तों,
खंडहर से खड़े मकानों को,
अभी भी न जाने क्या आस है।
मौसम की मार को सहकर भी,
सत्ता की शतरंज में गिरकर भी,
चाय की उस पुरानी दुकान पर,
अभी भी कोई खड़ी है,
विकास के इंतज़ार में,
मगर विकास को फुर्सत कहाँ, इस धर्म के बाज़ार में,
न जाने कहाँ छिप गया वो, कौन से दरबार में?
ढूँढती रही मै बेखबर,
हर चहरे, हर दीवार पर,
उन ठेलेवालों, हिम्मतगारों पर,
जो रोज हैं जीते, रोज हैं मरते,
दिल में आस का दिया संजोये !
कभी न कभी तो आएगा,
जीवन रौशन कर जायेगा  ‘विकास’ I

Understanding the Self and the Other through Technology

cropped-cropped-nirantar-logo-final-2.jpgThe following is based on our ongoing research on young people living in a resettlement colony, Dakshinpuri, more specifically, Sanjay Camp, with 20 participants -10 girls and 10 boys, between the ages of 15 and 22 years. It commenced in January 2017. Community members in this resettlement colony mostly belong to Scheduled Caste and Other Backward Castes (like Valmiki, Khateek, Baniya), with Valimikis and Muslims forming the bulk of the population. The research methodology included Focus Group Discussions facilitated separately with girls and boys on five themes; namely, Work, Love-Friendship -Marriage, Education, Media, and State-Citizenship. These were followed by two rounds of in-depth personal interviews that focused on how these affect their structural and personal realities/selves.

Dakshinpuri and Sanjay Camp are both situated in Ambedkar Nagar. While the former is a recognized resettlement colony the latter is an unauthorized Jhuggi Jhopdi (JJ) colony. Its geographic location is telling of its socio-economic standing in the city. Situated in the south of Delhi, the most developed part of the city; it is surrounded by the most luxurious shopping malls and sprawling housing localities of Delhi. This exemplifies the paradox of urban development where a population of about 60-70 thousand lives in a compact and dense housing system, on a small piece of land – the disparity of unequal distribution of resources of land, water and electricity is too stark to be ignored.

Among our participants, except for four girls, everyone has a smart phone for personal use. While the boys have complete autonomy over their phones, the girls’ phones are also used by other members of the family, mostly their mothers. In addition to that, their brothers, younger or older, have access to their phone and Facebook passwords. Most of them have more than one profile on Facebook, one where their identity is not altered which is used with close friends only and the other where their identity is confidential which is used to chat with people outside their friend circle. This anonymity affords them the safety to talk to people far and wide, in Delhi and in other cities. Their Whatsapp profile photos and Facebook photos reflect their aspirations of a life they hope to live as young adults once they attain economic mobility. Social media then gives the opportunity to project oneself as one would aspire to be, within certain boundaries of anonymity. This research  explores how the proliferation of technology, especially social media, changes the ways in which young people in the resettlement colonies of Dakshinpuri and Sanjay Camp navigate terrains of friendship, mobility, family, romance and leisure, and how this technology changes their relationship with the State and the City?

Exploring the inter-generational nuances, we found that their mothers often don’t have a phone or use the dubba ‘family phone’ (an old style Nokia phone with a torch) restrictively to call or receive calls which is taught to them by their children since they cannot read or write. Fathers have a personal phone but are not on any social media platform. In the current scenario where India is being reimagined as ‘Digital India’ to capitalize further on the encroaching capitalist agenda, the research  wants to explore where this population is placed and if they are even a part of this re-imagination.

In the age of politics being run through PR agents, social media serves as the medium through which propaganda speeches are made and shared and information about employment opportunities or other government schemes and policies are sought. While one has access to information (employment or computer coaching classes) does one really have access to these opportunities? The absence of education and economic structures creates a gap in the presentation of these opportunities and the actualization of these aspirations. While technology has widened the access to the city and its offerings has it further accentuated the already demarcated class boundaries? What kind of a subject is being constructed by the State driven processes of digitization? Who is this new citizen – what is their relationship with the State? One part of this research is an attempt to understand how one defines Citizenship through technology.

हाॅकी खेलती लड़कियाँ

कात्यायनी पिछले 24 सालों से अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं। उन्होंने कई कविताएँ और कहानियाँ भी लिखी हैं। नीचे उनकी एक कविता से अंश दिया गया है।
आज शुक्रवार का दिन है
और इस छोटे से शहर की ये लड़कियाँ
खेल रही हैं हाॅकी, खुश हैं लड़कियाँ
फिलहाल खेल रही हैं हाॅकी, कोई डर नहीं
बाॅल के साथ दौड़ती हुई, हाथों में साधे स्टिक
वे हरी घास पर तैरती हैं
चूल्हे की आँच से, मूसल की धमक से
दौड़ती हुई बहुत दूर आ जाती हैं
लड़कियाँ पैनल्टी काॅर्नर मार रही हैं
लड़कियाँ पास दे रही हैं
लड़कियाँ गोल-गोल चिल्लाती हुई
बीच मैदान की ओर भाग रही हैं
लड़कियाँ एक-दूसरे के ऊपर ढह रही हैं
एक-दूसरे को चूम रही हैं
सीटी मार रही हैं और हँस रही हैं
इसी तरह खेलती रहती लड़कियाँ
निःसंकोच-निर्भीक दौड़ती भागती रहतीं इसी तरह
और हम देखते रहते उन्हें
पर शाम है कि होगी ही रैफरी है कि बाज़ नहीं आएगा
सीटी बचाने से और स्टिक लटकाए हाथों में
एक भीषण जंग से निपटने की तैयारी करती लौटेंगी घर
अगर ऐसा न हो तो समय रूक जाएगा
वज्रपात हो जाएगा, चक्रवात आ जाएगा
घर पर बैठे देखने आए वर पक्ष के लोग पैर पटकते चले जाएँगे
बाबू जी घुस आएँगे गरजते हुए मैदान में
भाई दौड़ता हुआ आएगा और झोंट पकड़कर घसीट ले जाएगा
अम्मा कोसेगी किस घड़ी में पैदा किया था ऐसी कुलच्छनी बेटी को
घर फिर एक अंधेरे में डूब जाएगा
सब सो जाएँगे लड़कियाँ घूरेंगी अंधेरे में
खटिया पर चित्त लेटी हुई अम्मा की लंबी साँसे सुनती
इंतज़ार करती हुई कि अभी वे आकर उनका सिर सहलाएँगी
सो जाएँगी लड़कियाँ
सपने में दौड़ती हुई बाॅल के पीछे
स्टिक को साधे हुए हाथों में पृथ्वी के छोर पर पहुँच जाएँगी
और गोल-गोल चिल्लाती हुई एक-दूसरे को चूमती हुई
लिपटकर धरती पर गिर जाएँगी
(निरंतर के प्रकाशन ‘हमारी कलम से’ में प्रकाशित)

समन्दर पार

पंडिता रमाबाई (1858-1922) का पूरा जीवन एक अनथक यात्रा है। जब वे छह महीने की थीं तभी उनके पिता सपरिवार तीर्थयात्रा पर निकल पड़े थे। पुराण बाँचते हुए पूरे परिवार ने भारत भ्रमण किया। उसी बीच उनकी पारंपरिक शिक्षा-दीक्षा हुई। यात्रा के दौरान अकाल में उनके माता-पिता की मृत्यु हो गई। आगे उन्होंने इंग्लैंड जाना तय किया जिसको लेकर लोगों में हलचल मच गई थी। उस समय समुद्र यात्रा को पाप माना जाता था। और उसमें भी स्त्री का अकेले जाना किसी के गले नहीं उतर रहा था। रमाबाई ने यह पत्र महाराष्ट्र के अपने मित्र सदाशिव पाडुरंग केलकर के नाम लिखा था। उन्होंने मराठी भाषा में इसे किताब की शक्ल में छपवा दिया। इंग्लैंड यात्रा के बारे में लिखी गई यह किताब बिकेगी, ऐसी उम्मीद थी। छपाई का खर्च निकल जाने के बाद बिक्री के पैसे रमाबाई की पढ़ाई के खर्चे के काम आएँगे, यह भी इरादा था।
सेंट मेरीज़ होम, इंग्लैंड
प्रिय भाई,
कल दोपहर में आपका पत्र मिला। उसे पढ़ते समय मेरे मन की हालत क्या थी, इसे बता नहीं सकती। अपने लोगों को छोड़कर दूर चले जाने वाला आदमी ही यह समझ सकता है कि मैं क्या महसूस करती हूँ। आप इसे दूसरे अर्थ में नहीं लीजिएगा, मगर यहाँ पर आना मेरी खुशकिस्मती है। अभी तक मैंने बहुत परेशानियाँ झेली हैं और उसके बाद यहाँ का जीवन वाकई सुखमय लगता है। ईश्वर ने यह अच्छा मौका मुझे दिया है।
मनुष्य का जीवन एक नाटक है। हम रंगमंच पर जो देखते हैं, वह मिथ्या है। हकीकत में हमारा जीवन ही नाटक है। लगभग एक साल पहले मैंने आपको बताया था कि मैं यूरोप जाना चाहती हूँ। मेरा इरादा है कि वहाँ जाकर मैं मेडिकल की पढ़ाई करूँ। 20 अप्रैल, 1883 की शाम बंबई से हम ‘एस.एस. बुखारा’ नामक पानी के जहाज़ से इंग्लैंड के लिए रवाना हुए। आप सबने यह यात्रा करने से मना किया था। और मैं अपने दोस्तों से ऊपर नहीं हूँ, लेकिन मुझे लगा कि मुझे जाना चाहिए। मैं इंग्लैंड गई ताकि अपने आपको जीवन और आगे के काम के लिए तैयार कर सकूँ। मेरा फैसला सही है और मैंने वही किया जो करना चाहिए था।
जहाज़ में मेरा केबिन बहुत सँकरा था। छः सीट थी, पर हम तीन ही थे – मैं, मेरी बेटी मनोरमा और मेरी दोस्त आनंदीबाई भगत। हमारे साथ कोई विदेशी नहीं रहना चाहता था, इसलिए हमें सुविधा ही हुई। सत्ताइस दिन का पूरा सफर था। उसमें हम लगभग आधा पेट खाकर रहे या कहिए  आधा भूखे। कारण यह था कि जहाज़ पर जो खाना मिलता था, वह खाया नहीं जा रहा था। फिर भी मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। उसकी कृपा से कम से कम समुद्र के बीचोबीच खाना तो मिल रहा था।
मुझे शुरू से मुश्किल का सामना करने का अभ्यास है। इसलिए दूसरों की तुलना में कम दिक्कत हुई। पहले भी अपने पिता के साथ जहाज़ की यात्रा कर चुकी थी। अपनी माँ-बहन-भाई सबके साथ जहाज़ से मंगलोर से बंबई और बंबई से द्वारका गई थी। इंग्लैंड की इस यात्रा में एडेन देश होते हुए 1 मई, 1883 को हम स्वेज़ बंदरगाह पहुँचे। वहाँ हमने जहाज़ बदला और कलकत्ता से आ रहे दूसरे जहाज़ पर सवार हुए। इस जहाज़ का नाम था ‘एस.एस. केसरी-ए-हिन्द’। यह स्टीमर हालाँकि ज़्यादा बड़ा था, पर भीड़ भी उतनी ही थी।
चार दिन बाद हम जिब्राल्टर देश पहुँचे। उसके बाद समुद्र ने भयानक रूप धारण कर लिया। हमारा स्टीमर बहुत झटके खा रहा था। इतना कि हम केबिन के एक छोर से दूसरे छोर तक एक दूसरे पर लुढ़के जा रहे थे। सारे मुसाफिरों की हालत खराब थी। यदि हम खड़े होने की कोशिश करते तो दीवार से सिर जा टकराता था। 16 मई को लंदन के पास के एक बंदरगाह पर स्टीमर ने लंगर डाला। बंदरगाह पर सेंट मेरीज होम (ईसाई नन की संस्था) से दो सिस्टर मुझसे मिलने आईं। उन्होंने मेरा प्रेम पूर्वक स्वागत किया। उनमें से एक सिस्टर का परिचय मुझ से पूना शहर के सेंट मेरीज़ होम में हुआ था। उनके साथ एक और सज्जन थे, जो बाद में चले गए। सिस्टर के साथ मैं सेंट मेरीज़ होम  पहुँची, जहाँ अच्छे से स्वागत हुआ।
फिलहाल यहाँ आकर मैंने अपनी पढ़ाई शुरू कर दी है। नई दिनचर्या में रम गई हूँ। काफी कुछ पढ़ना और जानना-समझना है। भारत में क्या चल रहा है, इसकी खोज-खबर भी रखती हूँ। अभी यहाँ बाहर घूम-फिरकर नहीं देखा है। आपको फिर लिखूँगी, जब कुछ जान समझ लूँगी।
आपकी रमा
(निरंतर की पत्रिका ‘आपका पिटारा’ के 98वे अंक ‘दुनिया की सैर में प्रकाशित)

पाई अपनी पहचान

निरंतर के सहयोग से सहजनी शिक्षा केंद्र द्वारा नारीवादी शिक्षण पद्धति से जुडी शिक्षिकाओं का सम्मेलन 7-8 नवंबर महरौनी, ललितपुर, उत्तरप्रदेश में आयोजित किया जा रहा था। इस सम्मेलन में पर्दे पर दिखाई जा रहीं थीं शिक्षिकाओं के संघर्ष की कहानियाँ। सम्मेलन में लगभग 200 महिला शिक्षिकाएँ शामिल हुई थी।  इन्ही में से 8 शिक्षिकाओं को चुनकर हमने 10 मिनट की यह वीडिओ तैयार की थी. इस वीडियो में सभी ने अपने अनुभवों, चुनौतियों, सीख, और अपने अंदर आए बदलाव और आत्मविश्वास को साँझा किया था।  इन्हीं में से एक थी कृष्णा की कहानी। वह प्रतापगढ, उत्तर प्रदेश में बायफ संस्था द्वारा 2014 से 2016 तक चलाए जा रहे महिला शिक्षा साक्षरता कार्यक्रम के तहत एक सेंटर में शिक्षिका रह चुकी है।  कृष्णा का मन सेंटर और सेंटर की महिलाओं से कुछ ऐसा जुड़ गया कि कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद भी वह खुद को इनसे अलग नही कर पाई। वर्तमान समय में वह अभी भी बिना वेतन के महिलाओं को पढ़ाने लिखाने का काम कर रही है। कृष्णा वीडियो में बता रही थी – “मैं 12वी कक्षा तक पढ़ाई करके मनरेगा में काम करती थी। जब मुझे एक मज़दूर से शिक्षिका की पहचान मिली तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। जब हर रोज सेंटर तक पहुचने में घर पर मेरा किसी ने साथ ना दिया तो मैंने खुद की साइकल खरीद ली, मानो जैसे पर लग गये थे मेरे।  साइकिल पर बैठकर पूरी दुनिया देखनी थी मुझे।  मैं साइकिल चलाती हूँ तो लोग पलट पलट कर देखते हैं और कहते हैं – ये देखो कैसी है, ये साड़ी पहन कर साइकिल चला रही है ज़रा भी शर्म नही आती। मगर लोगों के तानों पर मैंने कभी ध्यान नहीं दिया।  आज मैं अपनी आगे की पढाई पूरी करने की तमन्ना को पूरा कर रहीं हूँ।  B.A में नाम लिखवा लिया है और साथ ही एक कान्वेंट स्कूल की टीचर भी हूँ।  हर रोज स्कूल से आने के बाद महिलाओं को पढ़ाने का काम भी करती हूँ . मैं अपने बचपन के अरमान को महिलाओं को पढ़ा कर पूरा कर रही हूँ . ऐसा लगता है बायफ द्वारा कार्यक्रम महिलाओं के लिए नही बल्कि मेरे लिए बनाया गया था ”.

ये वीडियो चल ही रहा था कि मैंने देखा अपनेआप को परदे पर देख, भावविभोर होकर कृष्णा अपनी जगह से उठ कर रोती हुई बाहर चली गई है। मैं उसके पीछे पीछे गई और उसे चुप कराते हुए उसके रोने का कारण पूछने लगी। वह बोली, “दीदी मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं खुद की दम पर एक दिन अपनी इतनी पहचान बना लूंगी कि मुझे इतने लोग पर्दे पर देखेंगे. कृष्णा अब भी रो रही थी पर उसके आँखों में एक चमक थी और आवाज़ में एक आत्मविश्वास और ख़ुशी .

कृष्णा की बातो को सुनकर मुझे लगा यह महिला शिक्षा साक्षरता कार्यक्रम सिर्फ सेंटर में पढ़ने वाली महिलाओं के लिए ही नही है, बल्कि कृष्णा जैसी हर उस शिक्षिका के लिए है जो इस कार्यक्रर्म से जुडी है।  इस कार्यक्रम के जरिये कहीं न कहीं उन्होंने अपनी खुद की जिंदगी में बहुत कुछ बदला है फिर चाहे वो सीखने सिखाने की प्रक्रिया से जुड़ा हो या खुद की पहचान और आत्मविश्वास से।

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