खोल दो

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सआदत हसन मंटो का जन्म पंजाब के लुधियाना ज़िले में हुआ था।  उन्होंने बहुत कुछ लिखा – कहानियां, नाटक, लेख।  देश के बटवारे ने मंटो को तोड़ और झकझोर कर रख दिया।  और इस पर उन्होंने कई कहानियां लिखीं।  उन्होंने अपनी आँखों से पंजाब में हो रहे दंगे देखे।  मार काट देखी। आम आदमी को शैतान बनते देखा।  ‘खोल दो’ आम आदमी में पैदा हुयी इसी हैवानियत का नमूना है।  यहाँ हम निरंतर द्वारा प्रकाशित किताब से इस कहानी को दे रही है, जिसमे इसको आसान भाषा में लिखा गया था, ताकि नवसाक्षर भी इसे पढ़ सकें, चित्रांकन ऑरिजीत सेन का है।  

अमृतसर से रेल रवाना हुई। लाहौर पहुंचते -पहुंचते आठ घंटे लेट हो गई। रास्ते में कई लोग मारे गए। कई घायल हुए और बहुत सारे लापता थे। देश के बंटवारे का समय था।
सिराज को होश आया तो सुबह हो गई थी। उसकी आंखों के सामने सब कुछ घूम गया। लूट… हमला… आग… भागना… स्टेशन… गोलियां… सकीना। हां… सकीना कहां गई ? सिराज एक दम उठ खड़ा हुआ। घंटों अपनी जवान बेटी को ढूंढा। पर सकीना नहीं मिली।
चारों ओर लोग अपनों को खोज रहे थे। आखि़र सिराज थक-हार कर बैठ गया। सोचने लगा- ‘सकीना और उसकी मां से कब और कहां बिछड़ा था?’ अचानक सकीना की मां का मरा शरीर आंखों के सामने आया। उसका चिरा हुआ पेट। ख़ून से लथ-पथ साड़ी। दम तोड़ते हुए उसकी आख़री आवाज़ सिराज आज भी सुन सकता था – ‘‘सकीना को लेकर भाग जाओ ! मुझे रहने दो। हमारी बच्ची को बचा लो।’’ सकीना की कलाई कस के पकड़, सिराज भागा। नंगे पांव, पागलों की तरह दोनों भागते गए। फिर सकीना का दुपट्टा गिर पड़ा। दुपट्टा उठाने सिराज पलभर को रूका था। भागती भीड़ के पांवों से बचाकर दुपट्टा उठाया था ….. अरे! दुपट्टा तो आज भी उसकी जेब में है। पर सकीना कहां गई?
सिराज ने अपने थके दिमाग़ पर बहुत ज़ोर दिया। सकीना कब बिछड़ी? वह रेलवे स्टेशन तक आई या नहीं? गाड़ी में बैठी या नहीं? दंगा करनेवाले उसे उठा तो नहीं ले गए? सिराज को कुछ याद नहीं आ रहा था। कई दिन, बेटी का दुपट्टा जेब में लिए, सिराज इसी तरह भटकता रहा।
फिर एक दिन कुछ आशा बंधी। सिराज को आठ नौजवान लड़के मिले। उनके पास लाठियां थीं। बंदूकें थीं। एक ट्रक भी था। लड़कों ने बताया कि वे दूसरी तरफ़ छूटी औरतों और बच्चों को वापस ला रहे हैं। सिराज ने बेटी का हुलिया बतासा, ‘‘गोरा रंग है। बड़ी-बड़ी आंखें। काले बाल। दाहिने गाल पर मोटा सा तिल। उम्र सत्रह साल। सकीना नाम है। मेरी बेटी को ढूंढ लाओं। खुदा दुआएं देगा।’’ नौजवानों ने कहा- ‘‘अगर आपकी बेटी ज़िंदा है तो हम उसे खोज निकालेंगे।’’
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वे अमृतसर की ओर रवाना हुए। वहां से लौट रहे थे कि एक लड़की सड़क पर दिखी। उसने नौजवान लड़कों को देखा, वह डर कर भागने लगी। लड़कों ने ट्रक रोका और उसके पीछे भागे। कुछ दूरी पर उसे रोक लिया। लड़कों ने दिलासा दिया, ‘‘घबराओ नहीं। क्या तुम सिराज की बेटी सकीना हो ?’’ अनजान होठों पर अपना नाम सुनकर लड़की चौंकी। पर उसने माना- ‘‘हां, मैं सकीना हूं।’’ लड़कों ने उसे सिराज तक पहुंचाने का वादा किया। और सकीना उनके साथ ट्रक में चल दी।
कई दिन गुज़रे। सिराज को सकीना की कोई ख़बर नहीं मिली। फिर एक दिन वही नौजवान लड़के दिखे। सिराज भागा-भागा उनके पास गया। पूछा- ‘‘बेटा, मेरी सकीना का पता चला?’’ लड़कों ने जवाब दिया- ‘‘अभी तक नहीं मिली।’’
उसी दिन शाम की बात है। चार आदमी एक बेहोश लड़की को अस्पताल ले जा रहे थे। सिराज उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। हिम्मत कर, वह अस्पताल के अंदर गया। वहा लड़की पलंग पर पड़ी थी। किसी ने बत्ती जलाई। कमरे में अचानक रोशनी हो गई। सिराज चीख़ा- ‘‘सकीना! यही है सकीना।’’ पास खड़े डाक्टर ने सिराज को घूर कर देखा। बड़ी मुश्किल से सिराज बोला- ‘‘जी मैं इसका बाप हूं।’’ डाक्टर ने सकीना की नब्ज़ देखी और खिड़की की ओर इशारा करके कहा- ‘‘खोल दो।’’
‘खोल दो’ सुन कर सकीना ज़रा सी हिली। यह देख सिराज ख़ुशी से चीख़ पड़ा- ‘‘मेरी बेटी ज़िंदा है! ज़िदा है।’’ सकीना की आंखें अब भी बंद थीं। पर उसके बेजान हाथ शलवार का नाड़ा टटोलने लगे। धीरे-धीरे नाड़ा खोला। शलवार नीचे सरककाई। और पैर चौड़े कर दिए। डॉक्टर ने शर्म से आंखें नीचे कर लीं। उसके माथे पर पसीने की बूंद चमक आई।
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फेरीवालों की आवाजें

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पुराने ज़माने में फेरीवाले दिल्ली की ज़िंदगी का एक हिस्सा थे। उनके बिना जीवन नीरस हो जाता। कोई रिहायशी या कारोबारी जगह ऐसी नहीं थी जहाँ फेरीवाले नहीं आते-जाते थे। गली-मुहल्ले, कूचे-बाज़ार, दफ्तर-मदरसे कोई चप्पा उनसे नहीं बचा था।
फेरीवाले अपने सौदे को बड़ी मज़ेदार भाषा में बेचते थे। भाषा ही नहीं उनकी आवाज़ भी लच्छेदार और बुलंद होती थी। आदमी को अगर चीज़ न भी लेनी हो तो ले ले। उनकी आवाज़ सुनकर खरीदने की इच्छा मन में पैदा हो जाती। गा-गाकर सौदे बेचने का यह रिवाज मुगलों के ज़माने में शाहजहाँ के काल से शुरू हुआ। उस समय से लेकर फेरीवालों की आवाज़ें हाल फिलहाल तक सुनाई पड़ती रही हैं।
दिल्ली की गलियों में फेरीवालों की भाषा और उनके बोलने का अंदाज़ देखिए। गंडेरीवाला आकर मुहल्ले के एक कोने में बैठ जाता है। उसके हाथ में एक सरौता है। वह गन्ने को छीलकर गंडेरियाँ एक कपड़े पर बिछाता है। और हाँक लगाता है, ”पेट का भोजन, हाथ की टेकन होंठों से छीलो, कटोरा भर शरबत पी लो।“ मूँगफली के रसिया सारे दिल्लीवाले थे। मूँगफलीवाले की तान सुनिए, “ले लो पिशावर की गरियाँ, चीना बादाम की गरियाँ।“
दिल्लीवालों में औरतों और मर्दों दोनों को पान खाने का बड़ा शौक था। अक्सर घरों में पानदान होता था। पानवाले गली-गली घूमकर पान बेचा करते, “हरियाला है, मतवाला है, अच्छे जोबन वाला है, मेरे पान का यह बीड़ा।“ दिल्ली में कई मुहल्लों में औरतें फेरी पर सौदा बेचती थीं। ज़रा दिन चढ़ता तो कोई अपना छीबा लिए पहुँच जाती। बड़े मजे़दार कचालू बेचती। दोने में वह बच्चों को कचालू पकड़ाती जाती। उसके मुँह से दुआएँ निकलती रहतीं, “अल्लाह उमर दें, नेक नसीबा हो।”
बारिश के छींटे दिल्ली में पड़ते और शहतूत और जामुन बिकने लगतीं। उधर से ऊदेे यानी बैंगनी रंग का फालसा बेचनेवाले की आवाज़ आती, “ऊदे ऊदे नोन के बतासे, शरबत को।“ मौसम के मुताबिक फेरीवाले हर फल लाते रहते थे। गर्मियों में आमवाला चिल्लाता, “लड्डू हैं पाल के, बासी पराँठे के संग खा लो।“ खरबूज़ेवाला लहक-लहककर गाता, “नन्हे के अब्बा चक्कू लाना चख के लेना, फीके या मीठे सच्ची कहना।“ बीच में कोई शकरकंदवाला बोल उठता, “बिन कढ़ाई का हलवा, शकरकंदी।“ ककड़ियोंवाला ककड़ियों को पानी से तर करता रहता, “लैला की उँगलियाँ, मजनूँ की पसलियाँ। तैर कर आई हैं बहते दरियाव में।“
गली में अचानक आवाज़ आती, “चने की दाल में घुलाव, भाड़ में भुलभुलाओ।“ बेचनेवाला बैंगन का नाम नहीं लेता था। केवल इशारों में बता देता था कि क्या बेच रहा है। बेरवाला खनकता, “काँटा चुभ गया, बिखर गए बेर, घँूघटवाली ने भई तोड़े हैं बेर।“ खजूरवाला आमतौर पर शाम को आता था और दलील देता, “कलकत्ते से मँगाई है और रेल में आई है।“ दही के बड़े और पकौड़ेवाला आता तो उसके गिर्द एक भीड़ लग जाती थी। “दही के बड़े, मियाँ-बीबी से लड़े।“ और “खाओ पकौड़ी, बनो करोड़ी।“ पानी के बताशे यानी गोलगप्पेवाला किसी को देखता कि ज़ुकाम हो रहा है तो कहता, “पानी के बताशे खाओ, नज़ला भगाओ।“
कभी पटरी पर और कभी चैराहे पर दुकान जमाए बनियानवाला बोलता रहता “बड़े-बड़े बनियान, गरमियों की जान। मियाँ ले लो बनियान, बढ़ाओ अपनी शान।“ मद्रास की तरह दिल्ली में भी फूल जगह-जगह बिकते थे। फूलवाले की आवाज़ की महक लीजिए, “ये कटोरे हैं गुजराती मोतिया के। फूल लो जी चीनी के, कंठे अलबेली के।“ उधर एक संदूक बेचनेवाला आवाज़ लगाता, “हमसे मंदा कोई न बेचे, नौ रुपए के तीन, मियाँजी नौ रुपए के तीन।“ ज़रा टोपीवाले का आवाज़ लगाने का रंग देखिए, “सर की इज़्ज़त चार आने को। इज़्ज़तदारों के सौदे, सरदारों के सौदे। चार आने को, चार आने को।“ लकड़ी के तख्ते पर धड़ाधड़ जूता बजने की आवाज़ पर मुड़िए तो जूतेवाला नज़र आता। उसका ज़ोरदार दावा है, “टूटे न फूटे जान ले के छूटे और छह महीने कब्र पर धरा रहे।“
गली के मुहाने पर रेवड़ियाँ लिए एक खोमचेवाला खड़ा दिख जाता। वह पुकारता जाता, “दिल्ली शहर बड़ा गुलदस्ता, जिसमें बने रेवड़ी खस्ता। लिया स्कूल का सीधा रस्ता। आकर खावे रेवड़ी खस्ता, खाकर जाए मदरसा हँसता।“
आज भी फेरीवाले तो बहुत घूमते हैं मगर वह तुकबंदी और फड़कते वाक्य अब कहाँ हैं। वह माहौल एकदम बदल गया है। न वह दिल है, न मिज़ाज।

स्रोत: युवा पिटारा श्रृंखला : भाषा के रंग ढंग, निरंतर

दीदी की शादी

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निरंतर, शिक्षा और जेंडर पर काम करने वाले एक समूह के रूप में बाल विवाह या कम उम्र में शादी के मुद्दे से कई बार रूबरू हुआ लेकिन इसे महिलाओं के साथ जुड़ी जेंडर की हकीकतों के संदर्भ में ज़्यादा देखा गया, बाल विवाह के मुद्दे की तरह कम। आज बदलते सामाजिक व आर्थिक परिवेश में हमें लगा कि बाल विवाह अथवा कम उम्र में शादी के मुद्दे को नारीवादी नज़रिए से समझने और विश्लेषित करने की ज़रूरत है। इसके लिए निरंतर ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘अर्ली और चाइल्ड मैरिजः ए लैण्डस्केप एनालिसिस’, नाम से अध्ययन किया। 
अध्ययन करने के लिए हमने सात राज्यों और लगभग 19 संस्थाओं का दौरा किया। जिसके अंतर्गत इस मुद्दे से जुड़े विभिन्न लोगों जैसे, युवा लड़के-लड़कियाँ, माता-पिता, पंचायत सदस्य, प्रशासन अधिकारी, स्वयं सहायता समूहों इत्यादि से बातचीत की। इसके अलावा एक राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन भी आयोजित किया जिसमें 38 संस्थाओं से 42 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। साथ ही इस क्षेत्र में कार्य कर रहे विशेषज्ञों तथा अन्य क्षेत्र के विशेषज्ञों जिनका इस मुद्दे से जुड़ाव बनता है उनसे व्यक्तिगत साक्षात्कार किए व जानकारियाँ इकट्ठी कीं।
बाल विवाह या कम उम्र में शादी पर हमारी जो समझ बनी उसे कहानी के रूप में पिरोकर आपके सामने लाए ‘पंख होते तो उड़ जाती’ पुस्तिका में।  आइये पढ़ें इस पुस्तिका से एक अंश: 
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आज रूबी को मम्मी ने स्कूल नहीं जाने दिया, ‘‘मौसी के घर जाना है उनकी, बेटी की शादी है।’’ एक तो उसको गुस्सा आ रहा था कि मम्मी ने स्कूल नहीं जाने दिया, दूसरा रूही की शादी है ये जानकर तो जैसे उसके तन-बदन में आग लग गई। फट पड़ी एक दम मम्मी के ऊपर, ‘‘क्या ज़रूरत है इतनी जल्दी शादी की। अभी मुश्किल से 16 साल की ही तो हुई है।’’ रूही रूबी से एक साल ही बड़ी है। रूही के कारण ही उसका नाम रूबी पड़ा। दोनों बहनें एक साथ खेलकर बड़ी हुई हंै। अब उसकी शादी हो रही है और वो हमेशा के लिए ससुराल चली जाएगी। ये सोचकर अब उसे गुस्से के साथ-साथ दुख भी हो रहा है।
वो जाकर ज़रूर रूही से बात करेगी और पूछेगी कि उसने इन्कार क्यों नहीं किया शादी से। लेकिन अभी तो वो अपनी भड़ास मम्मी पर ही निकाल रही है। ‘‘क्यों उसकी पढ़ाई होने तक इंतज़ार नहीं कर सकते मौसी-मौसा?’’ उसने तीखे स्वर में मम्मी से पूछा। उन्होंने थोड़ा हँसते हुए कहा, ‘‘तुम क्यों इतनी परेशान हो! वो कोई दूध पीती बच्ची नहीं है, दो महीने में 16 की पूरी होकर 17वें में लग जाएगी। एक अच्छा लड़का मिल गया है रूही को भी कोई एतराज़ नहीं है।’’ रूबी बिल्कुल नहीं मान सकती थी कि इसमें रूही की भी इच्छा है। मौसा-मौसी अपना बोझ उतारने के लिए ऐसा कर रहे हैं, ये मानते हुए वो मम्मी से आगे बहस करने लगी। इतनी देर से दोनों की बातें सुन रहे पापा ने थोड़ा झिड़क कर कहा, ‘‘ये क्या तुम दोनों में बहस चल रही है? तबसे सुन रहा हूँ।’’ इतना सुनकर मम्मी तो सहम गईं लेकिन रूबी इतनी आसानी से मानने वाली नहीं थी। फुसफुसा कर मम्मी से बोली, ‘‘मैं तो ज़रूर मौसी से बात करूँगी और रूबी से भी। उसका क्या दिमाग खराब है जो कि इस तरह की बातें कर रही है।’’ मम्मी अब और इस बात को बढ़ाना नहीं चाहती थीं, सो जान छुड़ाने के लिए कह दिया, ‘‘जो मन में आए करना अभी तो जाओ, वरना हम दोनों की शामत आएगी।’’
मौसी के घर पहुँचते ही वो भागी रूबी से मिलने के लिए लेकिन मौसी ने बताया कि वो अपनी सहेली के घर गई हुई थी। रूबी के अन्दर तो भुकंप मचा हुआ था और वो अपनी बात कहे बिना अब रह नहीं सकती थी, अपने गुस्से को थोड़ा दबाते हुए लाड से बोली, ‘‘मौसी क्यों कर रही हो दीदी की शादी? अभी तो उनकी उम्र 18 से कम है।’’ मौसी उसकी बात सुनकर हँसते हुए बोलीं, ‘‘और अगर 18 की होती तो क्या होता? उसका शरीर मज़बूत हो जाता, बच्चे जनने के लिए, बच्चे स्वस्थ होते, ये ही बताएगी न तू मुझे। पिछले हफ्ते एक संस्था वाले भी आकर यही बताकर गए हैं।’’
रूबी का मुँह अब देखने लायक था, वह नहीं जानती थी कि मौसी को यह सब बातंे पता हंै। फिर भी रूही की शादी 18 से पहले कर रही हैं। रूबी ने इस पर कहा, ‘‘सब जानती हो तो ऐसा क्यों कर रही हो?’’ मौसी थोड़ा गंभीर होते हुए बोलीं, ‘‘देख बिटिया हमारे पास इतने पैसे नहीं है कि बेटी को घर बिठा कर बड़ी उम्र में ज़्यादा दहेज देकर शादी करें। और फिर लड़के कौन सा गली-गली मिलते हैं। किस्मत से अच्छा लड़का मिल गया है, उसे भी पसंद है तो फिर क्या फर्क पड़ता है एक दो साल से। लेकिन अगर इससे न किया तो फिर न जाने ऐसा अच्छा रिश्ता कब मिले। और फिर हम कौन सा उसकी शादी दस साल में कर रहे हैं जो तुम इतना परेशान हो।’’
अब तो रूबी का जैसे सब्र का बाँध टूट गया। गुस्से से बोली, ‘‘क्या मतलब है मौसी, 10 साल में नहीं कर रहीं? 15-16 साल भी कोई शादी की उम्र नहीं है। ये उम्र है पढ़ने की, अपनी ज़िंदगी बनाने की, अपने भविष्य की तैयारी करने की।’’ इस पर मौसी ने तुरंत नहले पे दहला मारा, ‘‘वो ही तो कर रही हूँ-भविष्य की तैयारी। शादी ही उसका भविष्य है।’’ रूही यह सुनकर अन्दर तक सिहर गई। उसने कभी नहीं सोचा कि शादी ही उसका भविष्य है लेकिन उसके मम्मी-पापा और आस-पास के सभी लोग शादी को ही एकमात्र भविष्य मानते हैं।
रूबी ने मन ही मन ठाना कि वो रूही से इस बारे में बात करेगी। वो तो नए ज़माने की है, वो ज़रूर समझेगी कि रूबी क्या कहना चाहती है। रात को आखिर दोनों बहनें साथ बैठीं तो रूबी को मौका मिल ही गया बात करने का।

सिस्टम पास, बच्चे फेल

imageबाल शिक्षा अधिकार 2009 के तहत इस देश के सभी बच्चों को यह गांरटी दी गई है कि उन्हें न्यूनतम स्तर की इमारत, किताबें, वर्दी, शिक्षक व शिक्षा मिलेगी और यह सब देने की ज़िम्मेदारी सरकार की होगी। इसके अतंर्गत शिक्षा को एक अच्छा जीवन जीने की मूलभूत आवश्यकता के रूप में देखा गया है।

इस अधिकार के बनने पर इसे पूरी तरह से देश के सभी हिस्सों में लागू करने के लिए सरकार को तीन साल का समय दिया गया था, लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी यह कानून पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया है। पहली बार जीने के अधिकार को अन्य मूलभूत अधिकारों से जोड़ते हुए शिक्षा को इसके दायरे में लाया गया है। लेकिन सरकार चाहे कांग्रेस की हो या बी‐जे‐पी, की इस अधिकार को हकीकत बनाने के लिए जो इच्छाशक्ति और बजट चाहिए वह कभी नहीं मिला। पिछले तीन सालों में यह सिर्फ एक नाम बनकर रह गया है।

बाल शिक्षा अधिकार कानून की मौजूदा स्थिति को समझे और आंके बिना, शिक्षा के कार्यक्रम, जैसे- सर्व शिक्षा अभियान और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान मिलकर समग्र शिक्षा अभियान हो गए। समग्र शिक्षा अभियान में एक दो जगह बाल शिक्षा अधिकार का ज़िक्र है लेकिन इसे असली चोला पहनाने के लिए जिस रफ्तार और प्रतिवद्धता से काम होना था, नहीं हुआ है। बाल अधिकार के मुख्य बिन्दुओं में शिक्षकों की पर्याप्त उपस्थिति, पढाने के नियमित घंटे और सिखाने की ज़िम्मेदारी शिक्षक की होना शामिल हैं। कानून यह स्पष्ट तौर पर मानता है कि बच्चे एक भयमुक्त और दबावरहित वातावरण में बेहतर सीखते हैं इसलिए उनपर किसी तरह की शारीरिक मारपीट अथवा फेल होने का डर नही होना चाहिए।

इन सभी आयामों को यदि आज के संदर्भ में आंकलित करें तो आंकड़े बताते हैं कि अभी भी लगभग 40 प्रतिशत शिक्षकों की स्कूलों में कमी है, अभी भी शिक्षक शिक्षा से ज़्यादा अन्य कामों में व्यस्त रहते हैं। स्कूलों में कितने घंटे पढाई हो रही है और इसकी क्या गुणवत्ता है, इस बात की कोई मॉनिटरिंग नही होती है। और यहाँ हम इमारत, पानी व शौचालय की बात तो कर ही नहीं रहे हैं। शिक्षा के नाम पर गरीब और पिछड़े समुदाय के बच्चों (क्योंकि अब वे ही सरकारी स्कूलों में आते है) और लड़कियों को जो दिया जा रहा उसकी गुणवता जांचने और आंकने के लिए न कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है और न ही किसी की जबावदेही है। यदि स्कूलों में पढाई का स्तर अच्छा नहीं है तो व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक किसकी क्या जबावदेही है. इसपर न कोई बात करता है और न ही किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही होती है (भ्रष्टाचार के कारणों को छोड़कर)।

यही सिस्टम जो शिक्षा की गुणवत्ता की जबावदेही के दायरों से मीलो दूर है, अब बच्चों को जबावदेह बनाने के लिए कमर कस चुका है। शिक्षा व्यवस्था ने अपनी गुणवत्ता कितनी बेहतर की है, यह सवाल कोई नहीं पूछ रहा लेकिन शिक्षा व्यवस्था ने यह तय कर लिया है कि बच्चे ठीक परफॉर्म नही कर रहे इसलिए इन्हे फेल करना ज़रूरी है। हमारे शिखर पर बैठे शिक्षा की दिशा तय करनेवाले संस्थानों ने भी माना है कि शिक्षा व्यवस्था नहीं बच्चों की जबावदेही तय करना ज़रूरी है। अभी जबकि बाल शिक्षा अधिकार कानून पूरी तरह से लागू भी नहीं हो पाया है, इसके तहत एक नियम सबके लिए नासूर बन गया है जिसके अनुसार कोई भी स्कूल बच्चों को फेल नही कर सकता और न ही आगे की कक्षा में जाने से रोक सकता है। बिना किसी वैज्ञानिक सर्वे या अध्ययन या सबूत के सबने तय कर लिया है कि शिक्षा की गिरती गुणवत्ता का एक की कारण हैं ‘बच्चे’। बच्चों को फेल नहीं किया जा रहा है इसलिए उनपर पढने का काई दबाव नही है और इसलिए शिक्षा का स्तर गिर गया है। तो अब अगर भारत का सुनहरा भविष्य बनाना है तो फेल होने के डर और दबाव में जीना और खासतौर पर पढना-सीखना ज़रूरी है। शिक्षक पढाए न पढाए, किताबे मिलें न मिले, स्कूल जाने की व्यवस्था हो न हो, शिक्षक स्कूल आएं न आएं लेकिन बच्चों की ज़िम्मेदारी है कि वे पढे और पास हो जाएं।

सिस्टम तो फेल होता नहीं, न हो सकता है और न होगा। फेल होगें बच्चे ही। और उन्हें फेल करके क्या सिस्टम खुद को अव्वल दर्जे का साबित कर देगा?

ऐन फ्रैंक की डायरी

anne-frank-1 copy 1933 में एडोल्फ हिटलर ने जर्मनी देश में नस्लवादी साम्राज्य की स्थापना की। उसने यहूदी समुदाय के लोगों को इन्सानी नस्ल का हिस्सा नहीं माना। 1939 में दूसरा विश्व युद्ध भड़काने के बाद हिटलर ने यहूदियों को जड़ से मिटाने के प्रयास शुरू कर दिए। युद्ध के 6 साल के दौरान नाज़ियों ने तकरीबन 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी। इस बीच यहूदी परिवारों को अकल्पनीय तकलीफों से गुज़रना पड़ा। गुप्त तहखानों में लंबे-लंबे अरसे तक छुपे रहना, गैस चेम्बर, भूख, बीमारी, शारीरिक और मानसिक यातना।
ऐसे ही दो यहूदी परिवारों ने एक गुप्त आवास में जुलाई 1942 से रहना शुरू किया और दो बरस से भी ज़्यादा अरसे तक छुपे रहे। ये थे फ्रैंक परिवार और वान दान परिवार। फ्रैंक परिवार की 13 वर्षीय ऐन डायरी लिखती थी। गुप्त आवास में बिताए गए दिनों को भी उसने डायरी के रूप में लिपिबद्ध किया। यह डायरी यहूदियों पर ढाए गए ज़ुल्मों का जीवंत दस्तावेज़ है। यह डायरी 2 जून 1942 से शुरू होकर 1 अगस्त 1944 तक लिखी गई। 4 अगस्त 1944 में किसी की सूचना पर दोनों परिवारों को पकड़ लिया गया। 1945 में ऐन की मृत्यु हो गई। इसके लगभग 2 साल बाद उसके पिता ओटो फ्रैंक ने डायरी को प्रकाशित कराया। पेश हैं इस डायरी से अंश। इनमें से पहला गुप्त आवास में जाने से पहले का है और दूसरा बाद का।

रविवार, 21 जून, 1942

मेरी अपने सभी अध्यापकों से खूब पटती है। हमारे कुल 9 अध्यापक हैं। मिस्टर कीसिंग, वे बूढ़े खड़ूस जो हमें गणित पढ़ाते हैं, मुझसे अरसे से नाराज़ चले आ रहे थे। कारण, मैं उनके हिसाब से बक-बक बहुत करती हूँ। उन्होंने मुझे चैटरबाॅक्स यानी गपोड़शंख जैसे विषय पर निबंध लिखने के लिए कह दिया।
उस शाम को मैं निबंध लिखने बैठी। कोई और होता तो ढेर सारा हाशिया और शब्दों के बीच में जगह छोड़ते हुए कुछ भी लिख देता। लेकिन बात तो तभी बनती जब मैं अपने ज़्यादा बोलने के बारे में संतुष्ट कर सकने लायक तर्क दे सकती। मैंने पूरे तीन पेज लिख डाले। अब मैं संतुष्ट थी। मैंने उसमें लिखा कि मैं अपने बोलने को काबू में रखने की कोशिश करूँगी। फिर भी मुझे नहीं लगता कि मैं अपनी इस आदत से पूरी तरह छुटकारा पा सकूँगी। कारण, मेरी माँ भी बहुत ज़्यादा बोलती हैं। आप जानते ही हैं, आनुवांशिक गुणों के बारे में ज़्यादा कुछ किया नहीं जा सकता।
मिस्टर कीसिंग मेरे तर्क पढ़कर खूब हँसे। जब अगले पाठ के दौरान भी मुझे बात करते पाया तो उन्होंने मुझे एक और निबंध लिखने का आदेश दे दिया। इस बार मुझे ‘लगातार बकबक करने वाली’ विषय पर लिखना था। मैंने इस विषय पर भी उन्हें लिखकर दे दिया। दो दिन तक तो मैंने उन्हें शिकायत का मौका नहीं दिया। तीसरे दिन मेरी बकबक करने की आदत से परेशान होकर उन्होंने मुझे फरमान सुना डाला, “मिस ऐन फ्रैंक तुम्हें एक निबंध लिखना होगा – क्वैक, क्वैक, क्वैक, करती है मिस चैटरबाॅक्स“
पूरी क्लास हँसते-हँसते दोहरी हो गई। मेरे सामने भी हँसने के अलावा और कोई चारा नहीं था। चैटरबाॅक्स पर मैं पहले ही दो निबंध लिख चुकी थी। अब वक्त आ गया था कि कुछ नया लिखा जाए। मैंने अपनी सहेली की मदद से एक कविता लिखी। इसमें एक कहानी थी – एक बत्तख थी, उसके तीन बच्चे थे। बच्चे क्वैक, क्वैक बहुत करते थे इसलिए उनके पिता ने उन्हें मार डाला। किस्मत से मिस्टर कीसिंग ने कविता में कही गई बात को सही भावना से स्वीकार किया। उन्होंने कक्षा में यह कविता पढ़कर सुनाई। अपनी टिप्पणियाँ भी दीं। उसके बाद से उन्होंने कक्षा में मेरे बोलने पर कभी टोका-टाकी नहीं की। इसके विपरीत आजकल मिस्टर कीसिंग खुद लतीफे सुनाने लगे हैं।

तुम्हारी ऐन

रविवार, 2 मई, 1943

जब मैं यहाँ (गुप्त आवास में) अपने यानी हम लोगों के जीवन के बारे में सोचती हूँ तो अक्सर एक नतीजे पर पहुँचती हूँ। वह यह कि हम उन यहूदियों की तुलना में जो हमारी तरह छुपे नहीं हैं स्वर्ग में रह रहे हैं। मैं हैरान हूँ कि हम हमेशा सुविधाजनक परिस्थितियों में रहते हुए भी इतने असंतुष्ट क्यों रहे। अब यही देखो, जब से हम यहाँ आए हैं, खाने की मेज़ पर वही मेज़पोश पड़ा हुआ है। प्लेटें पोछने का कपड़ा भी यहाँ हमारे आने से पहले खरीदा गया था और इसमें इतने सुराख हैं कि गिनना मुश्किल है। वान दान परिवार पूरी सर्दियाँ एक ही चादर पर सोता रहा है। इसे धोया भी तो नहीं जा सकता। क्योंकि साबुन राशन में मिलता है और उसकी कमी हमेशा बनी रहती है। इसके अलावा साबुन इतना घटिया है कि पूछो मत। पापा बेचारे घिसी हुई पैंट पहने रहते हैं। माँ और मार्गोट (मेरी बड़ी बहन) वही तीन शमीजें पूरी सर्दियाँ मिल-बाँट कर पहनती रही हैं। मेरी शमीज इतनी छोटी है कि कमर तक भी नहीं पहुँचती। ये ऐसी चीजें हैं, जिनसे पार नहीं पाया जा सकता। हम सब कुछ फटा-पुराना, घिसा-पिटा इस्तेमाल कर रहे हैं। मेरी नेकर से लेकर पापा के शेविंग ब्रश तक। किस तरह हम उम्मीद करें कि हम युद्ध से पहले की सी स्थिति में आ जाएँगे?

तुम्हारी ऐन

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