A chaos

How would you react when the words you read come alive?

I started working in Nirantar in mid-July and for almost three weeks I spent my days reading and learning. It started with reading official proposals and concept notes, sprinkled with talks with the employees who enlightened me about their work. This was followed with on-field reports, and even though they mentioned the girls and their stories, it was all still…formal-ish. The documents which finally shook me were the letters written by the girls who studied in the PACE centres. Off-beat grammar and a mix of dialects – it was quite nice to finally ‘get in touch’ with them. I could almost imagine them writing these, crouched down on their mats in their PACE classroom trying to apply what they had learnt. There expressions carried a risk of seeming mundane and ‘pretty basic’, but if you knew the context, you’d be proud of their mundane expressions.

However, I started noticing something very soon. After every few mundane letters, came one which would take a while to process. Slowly, their frequency increased. Noting of emotional, verbal and physical abuse increased. Some were very hard to read and even come to terms with the fact that these harsh realities exist even today.

I was also in awe. Their courage, strength and ambitions were no mean feat. Their lives were inspiring. Behind their naivety lay struggles which had been normalized for them. Their letters were humbling and motivating.

So imagine being in the same room with 120 such stories; 120 girls and young women who got the opportunity to not think about their routines and the outside world for two days during PACE Alumni meet.

If you were to ask me to describe it all in one word, I’d say: Chaos.

The good kind, you know. The kind where you are running over to your teachers and area coordinators for endless ‘selfies’- carefully stored in phones never to be shared and ‘liked’ by others; where you ensure your make-up is always on point because these are the only times when you are not bound in restrictions; when always giggling and maybe a little shy because you have never met so many new people at once because mobility is unheard of term in their life; where the lunch had a sweet with it and somehow you did not have to help in preparing it; where you are not the most attentive in class because you were never exposed to such events in school or even exposed to a school.

It was truly a chaos. I reiterate the good kind.

After the event was over, I have tried to reflect on the experience and what I felt about those two days. In a way, it was almost like a typical North Indian wedding with dressed up attendees, ‘shaadi wala khana’, photographers and videographers, laughter and some tears. The tears came rolling down while the girls were recounting their experiences and how telling us how grateful they were to their teachers. Gratitude was abundant in that hall, with the teachers, learners, and all the project members having positively touched each others’ lives. I know I was just a month old addition in this team, but I’d be lying if I said that those emotions did not affect me at all. Goosebumps.

Everyone there had learnt something or the other from each other, directly or indirectly. And no one was ready to put a stop to it. Seeing the event unfold into a learning opportunity with facilitators holding discussions based on audio-visual aid, interactive activities and experience sharing was something I will keep on extracting and treat it as a capacity building session for myself.

When I was asked to write this blog post as a personal experience of the PACE Alumni meet 2019, I had tons of thoughts I wanted to explore and write about. There are multiple strands I could pick from, and hopefully I will get the chance to write about them in the future weaving them with new and nurturing stories I hope to collect, but the thing which really surprised me was trust. Since it was a safe space and that they knew it by the virtue of being associated with PACE, the girls let their guards down and trusted me with their personal stories upon our first meet. I was, for lack of a better word coming to my mind right now, confused. ‘Why? Why is she sharing such a personal, albeit a happy, thing with me? We hardly know each other.’ When I think about it now, I understand how these girls need an outlet and how they might have associated me with this safe space they already treasured. This makes me wonder how much do we do trust strangers, and under what conditions? What would happen if we could and did trust each other more? Would it lead to increased vulnerability or comfort? I’m not sure yet.

Maybe I’ll learn about it as we go on. I’ll try to keep you updated. 

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पंडिता रमाबाई सरस्वती

Pandita_Ramabai_Life_and_Landmark_Wसन् 1878, कलकत्ता विश्वविद्यालय का सीनेट हाॅल। सामने मंच पर प्रोफेसर टोने, प्रोफेसर गाॅ और पंडित महेशचंद्र न्यायरत्न विराजमान हैं। सब एक से बढ़कर एक संस्कृत के प्रकांड पंडित। पूरा हाॅल खचाखच भरा है। मंच के सामने एक युवा स्त्री सादी सी साड़ी में बैठी है। उसकी भूरी आँखों में चमक है, गंभीरता है। उससे मंच पर बैठे विद्वान् सवाल कर रहे हैं जिनका वह सधे हुए अंदाज़़ में जवाब दे रही है। यह पूरी बातचीत संस्कृत में हो रही है। लगता है कि उनके बीच शास्त्रार्थ चल रहा है। लोग हैरान दिख रहे हैं कि एक स्त्री भरी सभा में धाराप्रवाह संस्कृत बोल रही है। सभी उत्सुकता से पूरी कार्यवाही पर नज़़र रखे हुए हैं और थोड़ी देर बाद तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उस युवती को ‘सरस्वती’ की उपाधि से विभूषित किया जाता है।
यह युवती हैं रमाबाई – पंडिता रमाबाई सरस्वती। महत्त्वपूर्ण यह है कि 19वीं सदी के उत्तरार्ध में केवल उनकी विद्वत्ता का डंका नहीं बजा, बल्कि स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए उन्होंने स्त्री शिक्षा की पुरज़़ोर वकालत की। सवाल यह है कि अपने ज्ञान और विशेषकर स्त्रियों के लिए वर्जित माने जानेवाली संस्कृत भाषा के ज्ञान से सबको चमत्कृत करनेवाली रमाबाई को हम कितने लोग जानते हैं! अचरज होता है कि महान् व्यक्तित्व की लंबी फेहरिस्त में वे शायद ही कहीं दिखती हैं। अक्सर इतिहास की किताबों में और शिक्षा के क्षेत्र में उनकी कोई आहट नहीं सुनाई पड़ती है।
चाहे वह वंचित वर्ग की लड़कियों एवं महिलाओं को सीखने-सिखाने के लिए आवासीय केंद्र चलाना हो या उनके लिए स्थानीय भाषा में प्राइमर बनाना हो या चाहे ‘पुरुषों का काम माने जानेवाले’ मुद्रण के काम का प्रशिक्षण देना हो। हमें अहसास हुआ कि जब हम शिक्षा के ज़रिए सशक्तीकरण एवं नई भूमिकाओें की बात करती हैं, तो इन सबमें रमाबाई का स्वर ही प्रतिध्वनित होता है।
इतिहास पर नज़़र दौड़ाएँ तो आरंभ में रमाबाई शिक्षित भारतीय नारी के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठापित नज़़र आती हैं। उन्नीसवीं सदी के इस चरण में हिंदुस्तान में ब्रिटिश उपनिवेशवाद अपने पैर पूरी तरह जमा चुका था। इससे टकराते हुए भारतीय अस्मिता का प्रश्न उठ रहा था कि आखिर यह है क्या और इसके कारक कौन से हैं। सामाजिक सुधार और धार्मिक सुधार को लेकर बड़े पैमाने पर बहस छिड़ी थी और उसमें स्त्री सुधार का मुद्दा अहम बन गया था क्योंकि स्त्री के कंधों पर ही भारतीय संस्कृति के मूल्यों को वहन करने का ज़ि़म्मा था। शिक्षा-व्यवस्था में सुधार इस पूरे सुधारवादी आंदोलन का महत्त्वपूर्ण अंग था। उस समय के सुधारकों के एक बड़े समूह द्वारा वैदिक युग को स्वर्ण युग के रूप में और वैदिक साहित्य में वर्णित गार्गी एवं मैत्रेयी को भारतीय संस्कृति के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा था। ऐसे में संस्कृत ज्ञान ने रमाबाई को विशेष स्थान प्रदान किया। जब वे हज़़ारों मील का सफर तय करके दक्षिण भारत से कलकत्ता पहुँचीं तो प्रगतिशील ब्रह्मो समाज के लोगों तथा सुधारकों ने उन्हें हाथो हाथ लिया ‘सरस्वती’ और ‘पंडिता’ की उपाधि से विभूषित किया। सुधारकों को रमाबाई वैदिक युग से सीधे वर्तमान में चली आ रही साक्षात् गार्गी और मैत्रेयी लगीं। उनके द्वारा उस समय प्राचीन हिंदू स्त्री की जो तस्वीर खींची जा रही थी वह विदुषी सभाओं में शास्त्रार्थ करने की योग्यता रखनेवाली और धार्मिक अनुष्ठान में पुरुष की सहगामिनी ऋषिपत्नी और ऋषिपुत्री की थी। इस कसौटी पर रमाबाई खरी उतरती थीं। इसलिए राष्ट्रवाद के उभरे विमर्श में रमाबाई को राष्ट्र के आदर्श के रूप में स्थापित किया जाने लगा। उनसे अपेक्षा की जाने लगी कि संस्कृत के माध्यम से धार्मिक ज्ञान से लैस होकर वे भारतीय स्त्रियों के उद्धार के मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देंगी और इसके माध्यम से भारत की गरिमा को पुनःस्थापित करंेगी।
समय गुज़़रने के साथ यह स्थिति बड़े नाटकीय तरीके से पलट गई। चूँकि रमाबाई ने समाज, धर्म और स्त्री जाति के कायदों के अनुसार अपने को नहीं ढाला, इसलिए उन पर चारों तरफ से प्रहार किए जाने लगे। पहले अपनी मज़ऱ्ी की शादी और फिर ईसाई बन जाने के उनके निर्णय ने उन्हें अपने प्रशंसकों के सामने चुनौती की तरह खड़ा कर दिया। हिंदू धर्म के दायरे से बाहर हो जाने से उनके समकालीन राष्ट्रवादी नेताओं और सुधारक मित्रों सबको बहुत निराशा हुई। वे स्त्रियों को शिक्षित करके जिस तरह के अंजाम देखना चाहते थे, उससे रमाबाई के जीवन का तालमेल नहीं बैठ रहा था। उनके सामने स्पष्ट हो गया कि उनका इस्तेमाल हिंदू समाज के अंदर की गड़बड़ियों, खासकर स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के काम में अब नहीं हो पाएगा। दयानंद सरस्वती, महादेव गोविंद रानडे, रामकृष्ण गोपाल भंडारकर जैसे लोगों को लगा कि वे अपने रास्ते से भटक रही हैं। तिलक आदि नेताओं ने अखबारों के ज़़रिए सार्वजनिक रूप से उन पर निशाना साधा। रमाबाई को आदर्श की जगह विध्वंसक और राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया गया और धीरे-धीरे उनका नाम लोगों की निगाहों से ओझल होता चला गया।
हमारे सामने रमाबाई के स्त्री संबंधी विचार उनकी असाधारणता को खुले तरीके से लाते हैं। आज से लगभग डेढ़ सदी पहले वे स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्माण के लिए शिक्षा की आवश्यकता और उसके लिए खुले आसमान की ज़़रूरत को महसूस कर रही थीं जोकि उनके समकालीन पुरुष सुधारकों के नज़़रिए से काफी भिन्न था। पुरुष सुधारकों के मतानुसार नए ज़़माने की कुशल गृहिणी एवं माता के रूप में ढालना ही स्त्री शिक्षा के प्रयासों का चरम लक्ष्य होना चाहिए। उसमें भी विधवाओं की शिक्षा दरअसल उनकी पूरी ऊर्जा को सकारात्मक शिक्षा में लगाने के लिहाज़़ से ज़़रूरी मानी गई और विधवा पुनर्विवाह अहम लक्ष्य बन गया। इसमें कोई दो राय नहीं कि विधवा पुनर्विवाह समाज को आगे ले जानेवाला कदम था, लेकिन इसकी सीमा को वे सुधारक नहीं पहचान रहे थे। दूसरी तरफ रमाबाई का स्पष्ट शब्दों में कहना था कि विधवा पुनर्विवाह एकमात्र रास्ता नहीं है।
Pandita-Ramabai
सशक्तीकरण के ठोस ज़़रिए के रूप में रमाबाई शिक्षा को देख रही थीं। उन्हें पता था कि स्त्रियों की किसी संसाधन तक पहुँच नहीं – न ज़़मीन-जायदाद, न रुपया-पैसा और न शिक्षा। उनका संसाधनहीन होना उन्हें घर-परिवार के भीतर एकदम अरक्षित स्थिति में डाल देता है। इस स्थिति में यदि वे पढ़ना चाहती भी हैं तो उनकी शिक्षा पूरी तरह परिवार के पुरुष सदस्यों की कृपा पर निर्भर करती है। यदि उनकी इच्छा और आज्ञा के खिलाफ जाकर वे पढ़ने के लिए घर से बाहर कदम निकालती हैं तो उन्हें सबकी दुत्कार सहनी पड़ती है। इसलिए उन्होंने स्त्रियों के लिए ऐसे आश्रम की स्थापना की जहाँ वे स्वतंत्र तरीके से अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें। वहाँ वे केवल लिखने-पढ़ने का हुनर नहीं सीखती थीं, बल्कि वह आश्रम स्त्रियों के लिए पूरी वैकल्पिक जीवन व्यवस्था थी। वहाँ सबने मिलकर अपने लिए अनाज उगाया, लकड़ी के सामान बनाए चीज़़ों को बाज़़ार में जाकर बेचने की कला सीखी, किताबें बनाईं और छापीं भी। उन्होंने गुरु-शिष्य के परंपरागत रिश्तों से निकालकर एक आधुनिक केंद्र के रूप में अपने आश्रम को चलाया।
उनकी जीवनयात्रा इस बात को रेखांकित करती है कि क्षण विशेष में, संदर्भ विशेष में किस तरह जेंडर, जाति या वर्ग गढ़ा जाता है और कैसे उसमें परिवर्तन होता है। यही नहीं हमारा मानना है कि यह उस दौर और आज के दौर में भी राष्ट्र, परंपरा और आधुनिकता के विचार को परिभाषित करने में जेंडर की अहम भूमिका को पटल पर लाती है। इन सबकी स्त्री शिक्षा के स्वरूप एवं विषयवस्तु को गढ़ने में क्या भूमिका है, यह स्पष्ट होता है।
पंडिता रमाबाई के जीवन पर आधारित निरंतर प्रकाशन ‘भय नाहीं, खेद नाहीं’ की भूमिका से एक अंश 

कम उम्र में विवाह व बाल विवाह से यौनिकता का सम्बन्ध

मुंबई की एक किशोरी ने हमारे साथ साक्षात्कार की शुरुआत में ही शादी के बारे में कहा था, “हिंदुस्तान में शादी का मतलब है, यौन संबंध, सेक्स”। हालाँकि कोई भी अन्य उत्तरदाता इस बात को इतनी बेबाकी से नहीं कह पाई मगर सभी उसकी बात से सहमत थीं। भले ही वे बहुत स्पष्ट रूप से न कहें कि शादी की मुख्य भूमिका यौन संबंध और प्रजनन को पवित्रता का दर्जा देने की है। शादी के ज़रिए समाज महिलाओं की यौनिकता पर अंकुश रखता है। औरतों की यौनिकता पर अंकुश रखना ही एकमात्र तरीका है जिसके ज़रिए मर्द यह तय कर सकते हैं कि उनकी संतान का पिता कौन है और इस तरह वे अपने वंश का नाम, संपदा, हैसियत, धर्म और अन्य चीज़ों को सुनिश्चित कर सकते हैं। कहने का मतलब यह है कि परिवार और समाज का पुनरुत्पादन सुनिश्चित करने के लिए औरतों की यौनिकता को अंकुश में रखा जाता है।
जाति और खासतौर से रक्त शुद्धता की चाह इस बात को तय करती है कि लड़की जैसे ही यौवनारंभ की अवस्था में पहुँचे, रजस्वला हो जाए उसकी शादी कर दी जाए। अन्यथा इस बात का खतरा रहता है कि कहीं निचली जाति का कोई आदमी उसके खून को ”गंदा“ न कर दे। बिहार में यादव समुदाय के उत्तरदाताओं ने बताया कि लड़की की उम्र जितनी कम हो, उसको “विदा कर देना” उतना ही सम्मानजनक और पुण्य का काम माना जाता है। ये लोग इस बात की तरफ इशारा कर रहे थे कि लड़की की उम्र कम होगी तो उसकी यौन शुद्धता की संभावना ज़्यादा होगी। पूरे बिहार में लोगों ने जाँघदान और पत्तलदान का फर्क बताया। जाँघदान का मतलब यह है कि लड़की कि इतनी कम उम्र में शादी कर दी जाए कि शादी के समय वह अपने पिता की गोद में बैठ सके जबकि पत्तलदान का मतलब है कि शादी के समय लड़की रजस्वला हो चुकी है और अपने पिता की बगल में एक पटिया पर बैठती है। ज़ाहिर है कि लड़की के कौमार्य की गारंटी बहुत बड़ी चीज़ होती है। यह कौमार्य सुनिश्चित करके विभिन्न समाज उन सामाजिक सीमाओं को और मज़बूत कर देते हैं जो संचित संपदा व सुविधाओं को सुरक्षा प्रदान करती हैं। इस तरह समाज वर्ग, जाति व धर्म की मौजूदा विभाजक रेखाओं को और गहरी कर देते हैं।

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शादी की उम्र में इज़ाफे और रजस्वला होने व शादी के समय के बीच के फासले के चलते एक लड़की की यौन पवित्रता ही उसके कौमार्य का सूचक होती है। उसका चाल-चलन हमेशा उसके परिवार और समुदाय की पैनी नज़रों के सामने रहता है। अगर वह शादी को टालना चाहती है तो उसे सही चाल-चलन रखना चाहिए और ऊँच-नीच यानी गैर-वैवाहिक यौन संबंधों की संभावना से कोसों दूर रहना चाहिए। यौन संबंधों का भय केवल यौन हिंसा या जबरिया यौन संबंधों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह भय इस कल्पना के बारे में भी है कि लड़कियाँ कहीं खुद ही अपनी यौन इच्छाओं को तरजीह न देने लगें। ये दोनों ही ऐसी स्थितियाँ हैं जो परिवार के लिए ”बदनामी“ और ”शर्मिंदगी“ का सबब होती हैं। ज़्यादातर माँ-बाप ने इस ‘ऊँच-नीच’ की आशंका को शादी की उम्र में कमी का मुख्य कारण बताया। उनके मुताबिक, लड़कियों की आवाजाही पर अंकुश या शादी से पहले उन पर अन्य प्रकार के नियंत्रणों के पीछे यह डर एक मुख्य वजह है।
एक ऐसी व्यवस्था जो महिलाओं की यौनिकता को अंकुश में रखना चाहती है, उसके लिए इस बात की कल्पना ही एक खौफनाक बात है कि लड़कियाँ अपनी यौन इच्छाओं और कामनाओं को तरजीह भी दे सकती हैं। यह चिंता इतनी गहरी होती है कि लड़कियों के सामने गर्भनिरोधक और सुरक्षित सेक्स से संबंधित चर्चाओं तक को शर्मनाक मान लिया जाता है और उनको अधिक से अधिक हतोत्साह किया जाता है ताकि कहीं इससे लड़कियों को “गंदे खयाल” न आने लगें। इसकी वजह से शादी के रिश्तों से बाहर के तमाम यौन संबंधों को ज़ोर-ज़बर्दस्ती या फुसलावे के नतीजों के रूप में पेश किया जाता है। समाज की नज़र में लड़कियाँ तो केवल मासूम मूकदर्शक होती हैं जिनको आदमी अपने जाल में फंसा लेते हैं। जबकि दूसरी तरफ लड़कियाँ अपनी चाहतों को नज़रअंदाज करना या उनका निषेध करना सीख जाती हैं। इसके साथ ही किशोरावस्था में गर्भधारण करने का भय भी जुड़ा हुआ है क्योंकि शादी के रिश्तों से बाहर पैदा होने वाले बच्चों को समाज की स्वीकृति नहीं मिलती।
बिहार की एक घटना है। उसमें 16 साल के एक लड़के और 14 साल की एक लड़की ने अपने गाँव से भागने का फैसला लिया। तब स्थानीय एनजीओ द्वारा ट्रैफिकिंग विरोधी समिति के साथ मिलकर लड़के के माँ-बाप के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। लड़की के परिवार वालों ने लड़के के घर के बाहर 300 लोगों को इकट्ठा कर लिया। वे माँग कर रहे थे कि लड़के के घर वाले इस किशोर जोड़े को ढूँढ कर उनके सामने पेश करें। चूँकि लड़की तो पूरे समुदाय की बेटी थी सो वह पूरी बिरादरी की इज़्ज़त थी और यह “बेटी की इज़्जत” का मामला था।
सभी राज्यों में खराब माहौल का डर बार-बार चर्चा में आता है। खासतौर से जब सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ हिंसा और बलात्कार की सनसनीखेज घटनाओं की खबरें आती हैं। बेशक घर की चारदीवारी के बाहर हिंसा की आशंका वास्तविक है, मगर ससुराल के भीतर होने वाली हिंसा और यौन हिंसा से जुड़े मुद्दों पर फैली चुप्पी भी कोई कम नहीं है। यौन हिंसा इस बात का संकेत है कि असली समस्या महिला विरोधी हिंसा के बारे में नहीं है, बल्कि असली समस्या विवाह की वैधानिक सीमाओं के बाहर के यौन संबंध को लेकर है। इतना ही नहीं, अगर हमारा समाज ससुराल में यौन हिंसा को मानने में हिचकिचाता है तो वह मायके में होने वाली यौन हिंसा के बारे में भी पूरी तरह अनजान होने का दिखावा करता है। आंध्र प्रदेश में एक बूढ़ी औरत को अपनी पोती का सिर्फ इसलिए विवाह करना पड़ा क्योंकि उसके पास अपनी पोती को उसके पिता के यौन उत्पीड़न से बचाने का कोई और रास्ता नहीं बचा था। आंध्र प्रदेश में ही एक साक्षात्कार में एक महिला ने बताया, “लड़की चाहे 10 बुरके पहन ले, मगर उसकी इज़्ज़त तो लुट कर ही रहेगी। बेडरूम में क्या-क्या होता है, वो तो आप तब तक नहीं जान सकते जब तक वहाँ कैमरा न रख दें”।
यौनिकता के बारे में कुल मिलाकर रवैया नकारात्मक है। किशोर-किशोरियों की यौनिकता और उनकी चाहत को बदनामी व गंभीर दुष्परिणामों के साथ जोड़े बगैर स्वीकार करने की गुंजाइश नहीं है। इन रवैयों का अर्थ है कि किशोर-किशोरियाँ खुद शादी से पहले यौन संबंध को एक विकल्प नहीं मानते और कई बार अपनी जिस्मानी ज़रूरतों को शांत करने के लिए कम उम्र में शादी करना चाहते हैं।
कुछ किशोर-किशोरियाँ माँ-बाप की मर्ज़ी से बाहर एक-दूसरे को पसंद कर लेते हैं और भागने का रास्ता चुनते हैं। इसके बदले में आमतौर पर अपनी बिरादरी के साथ उनके ताल्लुकात हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं। दूसरी तरफ, बहुत सारे युवा माँ-बाप द्वारा चुने गए व्यक्ति से ही शादी करते हैं ताकि गंभीर दुष्परिणामों के बिना अपनी कामनाओं को पूरा कर सकें। चूँकि ये सारे नियम एक बहुत सख्त माहौल पैदा कर देते हैं इसलिए जो माँ-बाप अंकुश चाहते हैं और जो नौजवान अपनी यौन चाहतों को तरजीह देना चाहते हैं, उनके पास शादी का फैसला लेने के अलावा कोई खास विकल्प नहीं बचता।
विडंबना यह है कि कम उम्र में विवाह और बाल विवाह दोनों ही भाग कर विवाह करने का नतीजा भी हैं और ऐसी घटनाओं को रोकने की एक कोशिश भी हैं। जिन माँ-बाप को यह डर है कि उनका बेटा और बेटी भाग सकते हैं, वे अक्सर उसकी जल्दी शादी कर देना चाहते हैं। यह इस बात का उदाहरण है कि असली भय अक्सर यौन सक्रियता या किशोरावस्था में गर्भधारण का नहीं होता, बल्कि अपने बच्चों पर तथा उसकी यौनिकता पर नियंत्रण खो देने का होता है।
मीडिया और संचार साधनों तक सहज पहुँच उपलब्ध कराते हुए वैश्वीकरण ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है। इन साधनों की मदद से आपसी संवाद बढ़़ा है और किशोर-किशोरियों को अपने जोड़ीदार से मिलने के रास्ते मिल जाते हैं। मोबाइल टेक्नोलाजी के आने से किशोर-किशोरियों पर अभिभावकों का नियंत्रण कम हुआ है और इस बात की संभावना बढ़ी है कि वे खुद अपने जोड़ीदार चुनें और यहाँ तक कि यौन संबंध भी बनाएँ। इस स्थिति में कम उम्र में विवाह और बाल विवाह एक ऐसा तरीका है जिसके ज़रिए माँ-बाप अपने नियंत्रण को एक बार फिर जताने की कोशिश करते हैं। मीडिया के बढ़ते संपक्र के चलते लड़के-लड़कियों में भिन्न जीवन शैलियों की कामना जगी है और रूमानी प्रेम व साहचर्य की भी एक खास छवि बनी है। इस तरह की छवियों से लड़के-लड़कियों के भागने की घटनाओं में इज़ाफा भी हुआ है। बहुत सारी माँओं ने ऐसे टीवी धारावाहिकों और फिल्मों के बारे में अपनी नाखुशी जताई जिनमें लड़के और लड़कियाँ मोहब्बत के चक्कर में पड़ जाते हैं। बकौल उनके, ‘अब उनकी बहनें और बेटियाँ भी प्यार के चक्कर में पड़ना चाहती हैं।’
जिन समुदायों में यौनिकता के प्रति बहुत बंदिशों वाला रवैया नहीं हैं वहाँ शादी की उम्र अन्य समुदायों से ज़्यादा पाई गई है। यह सह-संबंध जनजातीय समुदायों और देश के कुछ इलाकों, जैसे असम आदि के हमारे दौरों में साफ दिखाई दिया। असम में कम उम्र में विवाह और बाल विवाह की घटनाएँ अभी भी कम हैं और यौन संबंधों के प्रति एक ज़्यादा ”खुला“ रवैया दिखाई देता है। अध्ययन के द्वितीय स्रोतों में भी इस आशय के साक्ष्य उपलब्ध हैं कि कम उम्र में विवाह और बाल विवाह का चलन सामान्य रूप से उत्तरी अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया में ज़्यादा है। वहाँ लैटिन अमेरिका और सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में स्थित अफ्रीकी हिस्सों के मुकाबले महिलाओं की यौनिकता के प्रति रवैया और उसपर नियंत्रण बहुत कठोर है।

 

स्रोत : निरंतर प्रकाशन “भारत में कम उम्र में विवाह और बाल विवाह : परिदृश्य का विश्लेषण”

 

औरत की जाति, वर्ग और उनके विकल्प

अक्सर, मुझे जीवन और विकल्पों के बारे में प्रेरणादायक उद्धरण देखने को मिलते हैं। ऐसा ही एक उद्धरण कहता है, “आज मैं जो हूँ वो उन विकल्पों की वजह से हूँ जो मैंने कल चुने थे।” लेकिन क्या यह वास्तव में उतना आसान है? क्या हमारे जीवन में विकल्प/चयन हमारे परिवेश, जेंडर, संस्कृति और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं से प्रभावित नहीं होते?

मैं पिछले कुछ समय से उन लड़कियों के साथ काम कर रही हूँ जिन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। मेरे इस काम ने मुझे दिल्ली के शहरी गरीब समुदायों में रहने वाली लड़कियों को करीब से समझने और बातचीत करने का अवसर दिया है। लड़कियों के लिए सीखने के वैकल्पिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से, परवाज़ अडोलसेंट सेंटर फॉर एडुकेशन (पेस) नामक एक प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में, मैं निरंतर संस्था के साथ जुड़ी हुई हूँ। निरंतर संस्था दिल्ली और बरेली (उत्तर प्रदेश) में समुदाय आधारित संगठनों के साथ साझेदारी के तहत शहरी पुनर्वास बस्तियों और असंगठित बस्तियों की स्कूल ना जाने वाली (आउट-ऑफ-स्कूल) लड़कियों के साथ काम कर रही है।

ये केंद्र, लड़कियों के लिए उनके जीवन, भावनाओं और अनुभवों के बारे में बात करने और दोस्ती बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षित स्थान के रूप में उभरे हैं। पेस में लड़कियों के साथ हमारे नियमित सत्रों के दौरान, हमने प्यार, रिश्ते, पसंद और यौनिकता के बारे में बातचीत शुरू करने के लिए थिएटर सत्र आयोजित किए। अधिकांश लड़कियाँ सत्र के बारे में बहुत उत्साहित लग रही थीं और उन्होंने प्यार और रिश्तों के बारे में बात करने में रुचि दिखाई, लेकिन अक्सर जब मैंने उनसे उनके जीवन के पहले प्यार या क्रश के बारे में पूछा तो उन्होंने बातचीत का रुख बदल दिया। इसके बजाय, उन्होंने मुझसे मेरे जीवन के पहले क्रश के बारे में बात करने का अनुरोध किया और जब मैं उनके साथ अपने पहले क्रश के बारे में बात करती, तो उनमें से अधिकांश हँसती और उत्साह के साथ अपने अनुभवों के बारे में बात करना शुरू कर देतीं।

एक ऐसे ही सत्र में, जहाँ कुछ इसी तरह की बातचीत चल रही थी, कुछ लड़कियाँ बातचीत में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रही थीं। जब मैंने उनसे अपने अनुभव साझा करने के लिए कहा तो उनमें से एक ने कहा, “दीदी, मेरे पास साझा करने के लिए कुछ नहीं है। मेरी जाति में लड़कियों की शादी कम उम्र में हो जाती है। मैं बहुत छोटी थी, जब इसके बारे में कुछ भी समझे बिना मेरी शादी हो गयी। शादी के बाद, मैंने अपने पति के साथ प्यार हुए बिना ही यौन संबंध बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे मुझे शादीशुदा जिंदगी की आदत हो गई और मुझे बहुत शिकायतें नहीं हैं। मुझे लगता है कि अगर इसे ही प्यार कहा जाता है, तो मेरे जीवन का पहला प्यार मेरे पति हैं।”

रुखसार (बदला हुआ नाम), एक और युवा लड़की, जो कुछ समय से चुप थी, बाद में अपने अनुभवों को साझा करने के लिए चर्चा में कूद पड़ी। जब रुखसार ने बोलना शुरू किया, तो दूसरी लड़कियाँ उन्हें करीब से देख रही थीं, क्योंकि उनकी शादी कम उम्र में हो गई थी और उन्होंने कुछ साल पहले ही अपने पति से तलाक के लिए अर्जी दी थी। उन्होंने समूह में पहले कभी भी अपने भावनात्मक अनुभवों के बारे में बात नहीं की थी और हमेशा शैक्षिक चर्चा पर अधिक ध्यान केंद्रित करती थीं।

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रुखसार ने मुस्कुराते हुए धीरे से कहा, “किशोरावस्था के दौरान, मुझे अपने गाँव का एक युवा लड़का बहुत पसंद था क्योंकि वह अपनी उम्र के अन्य लड़कों की तुलना में बहुत आकर्षक था। शुरुआत में, मैं उसे अपने मुहल्ले में देखने के मौकों की तलाश करती थी और उसके साथ बात करने के लिए बहाने बनाती थी। यह जानने के बावजूद कि वह भी मेरी तरह मुसलमान था, मैंने अपनी भावनाओं के बारे में उसे कभी नहीं बताया। गुजरते महीनों के दौरान उसका साथ पाने के मेरे सपने और इच्छाएँ परवान चढ़ते रहे लेकिन वे कभी पूरे नहीं हुए। धीरे-धीरे, मुझे उसके बारे में और पता चला और समझ आया कि उसे शराब की लत थी, और उसे अपने गुस्से पर कोई नियंत्रण नहीं था। उसे उन युवा लड़कों के बीच नेता माना जाता था जो आपराधिक गतिविधियों में शामिल थे। इन बातों को जानने पर मैं आश्चर्यचकित रह गई और मेरी भावनाएँ और इच्छाएँ धीरे-धीरे बदल गईं। फिर, मेरा जीवन मेरे गाँव की किसी भी अन्य मुस्लिम लड़की की तरह आगे बढ़ा और इससे पहले कि मैं समझ पाती कि जीवन में प्यार का क्या मतलब है मुझे कम उम्र में शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। शादी के बाद, मैंने एक बहू की भूमिका निभानी सीख ली जो बिना कुछ कहे आदेश का पालन करती है। मैंने परिवार के लिए बंधुआ मजदूर की तरह काम किया; मुझे घर का सारा काम करना पड़ता था, खेत में परिवार का साथ देना पड़ता था, जानवरों की देखभाल करनी पड़ती थी और रात में अपने पति के साथ जबरन यौन संबंध बनाने के साथ मेरा दिन ख़त्म होता था।

मेरे पति के साथ मेरे यौन संबंध हिंसा से शुरू हुए और इसने मुझे बहुत दर्दनाक और भयानक अनुभव दिया, एक ऐसा सम्बन्ध जिसमें मेरी कोई भूमिका नहीं थी, सिवाय इसके कि मेरे पति अपने यौन सुख के लिए जो करने को कहें मैं वो करती रहूँ। हमारे जैसी कई महिलाओं के जीवन में सीमित विकल्प हैं जहाँ प्यार, इच्छा और आनंद का महिलाओं के जीवन में पूरी तरह से कोई अर्थ नहीं है।” उसके अनुभवों को सुनकर समूह में हर कोई चुप हो गया।

रुखसार ने आगे बताया, “अपने पति के साथ अपने रिश्ते के दौरान, मैंने अपने जीवन में कभी प्यार का अनुभव नहीं किया और मैंने यौन संबंधों को हिंसा से जोड़कर ही देखा जहाँ साथी के लिए आनंद, अन्वेषण और देखभाल के लिए कोई जगह नहीं थी। मेरे पति सेक्स करते समय हमेशा हिंसक रहते थे| मुझे छोटी-छोटी बातों पर मारते थे और परिवार के लोग एक शब्द कहे बिना, दर्शकों की तरह सब कुछ देखते रहते थे। कई अन्य प्रेम कहानियों को सुनने के बाद, मैं अपने जीवन में फिर से प्यार की भावना का अनुभव करना चाहती हूँ लेकिन मैं किसी से शादी नहीं करना चाहती। अन्य युवा लड़कियों की तरह, मैं एक ऐसे प्रेमी की चाहत रखती हूँ जो मेरी देखभाल करे और प्यार और स्नेह से रिश्ता बनाए, भले ही यह रिश्ता कम समय के लिए ही क्यों न हो।”

उनके अनुभव सुनकर मैं अपने विचारों में पूरी तरह खो गई। एक ओर जहाँ मैं यौन हिंसा के स्तर के बारे में जानकर दंग रह गई, जो महिलाओं को शादी में अनुभव करना पड़ता है, जहाँ लोग जोड़ों के बीच हिंसक रिश्तों पर शायद ही सवाल उठाते हैं, वहीं दूसरी ओर मुझे यह जानकर खुशी हुई कि रुखसार ने एक बार फिर से प्यार में पड़ने और अपने जीवन को अपने तरीके से खोजने में रुचि दिखाई। पूरी चर्चा ने मेरे दिमाग में एक और आंतरिक बातचीत शुरू कर दी। मुझे रुखसार समूह की सबसे शर्मीली लड़कियों में से एक के रूप में याद आई, जिसने हमेशा पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया और दूसरों के साथ अपनी व्यक्तिगत भावनाओं पर कभी चर्चा नहीं की। विवाह के बाद संबंध, आकर्षण और प्रेम ऐसे शब्द थे, जिनका उनके जीवन में ज़्यादा मायने नहीं थे क्योंकि उन्होंने यह आत्मसात कर लिया था कि केवल ‘खराब/बुरी’ औरतें ही शादी के बाद, चाहे वह कितनी भी हिंसात्मक क्यों न हो, किसी से प्यार करती हैं। एक बार, उन्होंने कहा था, “मैं सिर्फ़ अपनी बेटी के लिए जी रही हूँ और भविष्य में उसे अच्छी तरह से पढ़ाऊँगी। मेरी बेटी के अलावा मेरे जीवन में और कुछ नहीं है। मैं अपने माता-पिता के विश्वास को कभी नहीं तोड़ूँगी जो मेरे कठिन समय में मेरा ध्यान रख रहे हैं।”

उस सत्र के बाद, मैंने रुखसार के साथ अधिक बातचीत करना शुरू कर दिया और उन्होंने थिएटर के अधिकांश सत्रों का आनंद लिया। वह पास की कॉलोनी में एक घरेलू कामगार के रूप में काम करती थीं, और कभी-कभी समय निकालना और थियेटर सत्रों के लिए कुछ घंटों के लिए आना उनके लिए मुश्किल हो जाता था, लेकिन फिर भी वह नियमित रूप से आने में कामयाब रहीं। मुझे उस रुखसार में, जो पहले पेस केंद्र में शामिल हुई थीं और जिन्होंने अब थिएटर गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया था, अंतर दिखाई देता था।

ऐसे ही एक सत्र के दौरान,  वह लगातार हँस रही थी और दूसरी लड़कियों के साथ बॉलीवुड के हिंदी गाने गा रही थी। जब मैंने उनकी हँसी के पीछे का राज़ पूछा, तो वह मुस्कुराई और बोलीं, “दीदी, मैं इन दिनों बहुत खुश हूँ। मैं अपने जीवन का आनंद लेना चाहती हूँ और कुछ मज़ा करना चाहती हूँ। लोग अपने क्षेत्रों से अन्य महिलाओं और लड़कियों पर इतनी निगाह क्यों रखते हैं? तलाक के बाद भी महिलाएँ प्रेम संबंध क्यों नहीं बना सकती? ” पाठ्यक्रम की अवधि के दौरान, उन थिएटर सत्रों ने स्वयं के प्रति उनके दृष्टिकोण को बदल दिया था और वे खुद से ईमानदार हो सकीं,एक ‘अच्छी’ तलाकशुदा युवती की तरह प्रदर्शन करने के लिए मज़बूर महसूस किए बिना जिसे इस बारे में सोचना पड़ता कि लोग उसके द्वारा उठाए गए किसी भी कदम के बारे में क्या कहेंगे। धीरे-धीरे, उन्होंने अच्छे कपड़े पहनना और पेस सेंटर में आने के दौरान थोड़ा सजना संवरना शुरू कर दिया। दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में एक्सपोज़र विज़िट के दौरान, वह अच्छी तरह से कपड़े पहनती थीं, मेकअप लगाती थीं और सड़क पर घूमने वाले किसी भी युवा लड़के की ओर इशारा करके अन्य लड़कियों के साथ हंसी-मज़ाक करती थीं। उन्होंने अन्य लड़कियों से उनके जानने वाले कुछ लड़कों के फोन नंबर साझा करने का अनुरोध किया, ताकि वह उनसे दोस्ती कर सकें।

शुरुआत में, अन्य लड़कियों को उनके व्यवहार में बदलाव से वास्तव में आश्चर्य हुआ और उन्होंने हमारे समाज में विवाहित महिलाओं के लिए परिभाषित सामाजिक मानदंडों के अनुसार रुखसार को आँकने की कोशिश की। पितृसत्तात्मक समाज के हिस्से के रूप में, जब अविवाहित लड़कियाँ अच्छे कपड़े पहनना और कुछ मेकअप लगाना पसंद करती हैं, तो उन्हें ‘अच्छा‘ नहीं माना जाता है, लेकिन शादी के तुरंत बाद, अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के बावजूद, युवा लड़कियों को नव-विवाहित महिलाओं के रूप में तैयार होने के लिए मज़बूर किया जाता है। दूसरी ओर, युवा विधवाओं को उनकी यौनिकता को नियंत्रित करने के लिए चमकीले कपड़े पहनने या सजने सँवरने की अनुमति नहीं होती है। इसी तरह, रुखसार जैसी, विशेष रूप से एक वंचित वर्ग और जाति से संबंधित तलाकशुदा महिला, पर पितृसत्तात्मक मानदंडों को बनाए रखने के लिए अधिक प्रतिबंध होते हैं। जीवन के निर्णय, विकल्प और इच्छाएँ सभी इन मानदंडों द्वारा निर्धारित और निर्देशित होते हैं।

‘उच्च‘ वर्ग की एक तलाकशुदा महिला को ‘निम्न‘ वर्ग की महिलाओं की तुलना में प्रचलित मानदंडों को चुनौती देने के लिए अपनी पसंद और इच्छाओं का दावा करने का विशेषाधिकार है। लेकिन ‘निम्न‘ जाति की पृष्ठभूमि वाली महिलाओं के पास ‘उच्च‘ जाति की महिलाओं, जो केवल पवित्रता का प्रतीक बन जाती हैं, की तुलना में विकल्प और यौनिकता को खोजने-परखने के लिए अधिक गुंजाइश होती है। जब हम विकल्पों और यौनिकता का विश्लेषण करते हैं, तो यह पता लगाना महत्वपूर्ण है कि ये अलग-अलग जातियों और वर्गों में कैसे अलग-अलग तरीके से संचालित होते हैं।

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जब हमने प्यार, इच्छाओं और रिश्तों के बारे में बातचीत शुरू की, तो लड़कियों ने अपने अलग-अलग अनुभवों को साझा किया और इससे समूह के सदस्यों को एक-दूसरे को स्वीकार करने के लिए अधिक खुले रहने में मदद मिली। क्या हम युवा लड़कियों के ऐसे स्थान बनाने में सक्षम हैं जहाँ वे अपने जीवन में इच्छा, और रोमांटिक रिश्तों से जुड़ी इन जटिलताओं के बारे में इसे ‘सही’ या ’गलत’ के रूप में चिह्नित बॉक्स में डाले बिना बातचीत कर सकें?

रुखसार के व्यवहार और नज़रिए में धीरे-धीरे हुए बदलाव ने भी मुझे उनके संदर्भ और आसपड़ोस के बारे में सोचने के लिए उकसाया। जीवन, रिश्ते और इच्छाओं के बारे में विकल्प ये सभी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, जाति, वर्ग, जेंडर और यौनिकता के आधार पर निर्धारित किए गए हैं। जब इन युवा लड़कियों को एक सहज और सुरक्षित स्थान मिला, तो उन्होंने अपनी इच्छाओं और अनुभवों के बारे में और कैसे उन्होंने अपनी इच्छाओं को आगे बढ़ाने के लिए अपने मौजूदा परिवेश से समझौता किया, इन सब के बारे में खुलकर बातचीत की। जैसा कि उनकी कहानियों में वर्णित है, महिलाओं के पास बहुत ही सीमित विकल्प हैं कि वे अपने जीवन में जो करना चाहती हैं उसे जारी रखें और यह उन युवा महिलाओं के मामले में बदतर हो जाता है जो तलाकशुदा हैं, जिनके बच्चे हैं और जो अपने माता-पिता के साथ शहरी गरीब समुदायों में रहती हैं।

हमें इस तरह से ढाला गया है कि तथाकथित ‘विकल्प‘ जो हमारे संबंधों को परिभाषित करते हैं, वे भी हमारे लिए हुए विकल्प नहीं बल्कि समाज द्वारा सृजित हैं। हालाँकि, जैसा कि हमने देखा है, इन सभी चुनौतियों के बावजूद, महिलाएँ, जब वे खुद को व्यक्तियों के रूप में महत्वपूर्ण मानने लगती हैं, तो वे अपने परिवेश और परिवार के सदस्यों के साथ बातचीत करने की रणनीति तैयार करती हैं। इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं है कि कल के निर्णय हमारे आज को आकार देते हैं; हमें यह भी सवाल करना चाहिए कि उन विकल्पों को किस कारक ने निर्धारित किया गया।

यह लेख इससे पहले तारशी की डिजिटल मैगज़ीन इन प्लेनस्पीक मे प्रकाशित हो चुका है।

Musings of an Observer- the Yuva, Yaunikta aur Adhikar course

DSCN6598Gender. Sexuality. Masculinity. Patriarchy. Love. Sex. Desire. Fantasies. LGBTQIA. Youth. Policy. Marriage. Technology. Collectives. And the list goes on.

That was an extremely overwhelming and exciting week of my life, 15 to 21st April, 2019; the week I coordinated the Yuva, Yaunikta aur Adhikar course. I had never attended any such residential course in my limited work experience of one year, leave alone coordinate one. So you can only imagine the myriad of emotions running through my mind the entire time! One the one hand, I was extremely excited while on the other, I was feverishly hoping that nothing would go wrong.

15th April evening, the participants trickled in one by one into the hall for an introductory session, their experiences as vibrant as the spring blossoms outside the hall. Hailing from twelve different states, the participants worked on various issues that included curriculum development, grassroots community work, early marriage, sexual and reproductive health rights, mental health and issues related to transgender communities.

The use of photos for introduction gave us an initial insight into each of their lives, a little beyond the usual and mundane introduction of citing names and the organizations that they are from. While one narrated a story of how she fought and smiled through different ups and downs of her life, including standing up against her own early marriage; another narrated the experience of breaking all gender stereotypes in spite of constant mockery and taunt by those around them. Everyone had a story to tell. And more than that, they were so brave to tell their stories to a bunch of strangers that they had just met. Now that I think it, I guess it was in fact easier because we were all a bunch of strangers. It is interesting how sharing stories and emotions with strangers can be such a catharsis sometimes. You feel a real connection at that moment with the people around. It may last, it may not. However, in that moment, it’s all that matters- creation of a safe space.

DSCN6768The next few days were packed with sessions, readings, activities and energizers. Basic concepts on gender and sexuality were covered, with emphasis on intersectionality of gender, sexuality, patriarchy, masculinity, and so on. Because it was a first experience for me as well, I got to learn so much. It even triggered many moments of reflection on so many aspects on my life.

Growing up, I was always this tall and lanky kid with short hair, often bullied and ridiculed by being called names. I enjoyed sports and crafts, baggy t-shirts and dresses, all at the same time and never really identified any of it either as a boy or girl thing. I grew up feeling isolated and like I did not belong anywhere. While filling out the examination form, I always made sure no one saw me tick next to the OBC category. I had been conditioned to feel ashamed about it. Over time, I slowly understood about social norms, gender expressions and the expected markers to fit into a certain gender or any other category. Society conditions you in such a way to fit into set markers since the day you were born that even a slight deviation from it made you feel out of place. The names never really bothered me. These expectations bothered me. For a child who is not familiar yet with concepts of patriarchy, gender, sexuality and binaries, it is confusing. It can even be devastating. Because there are no conversations around these issues, so many people have it worse. And that is not fair.

I think one of the main objectives of this course itself is to make as many people possible, aware of these things; to approach different aspects of life with a lens of gender and sexuality; and to look at people beyond certain categories and in a non-judgmental manner. There were questions raised after the sessions on gender that since we have now understood gender and gendered roles, are we supposed to go fight with everyone for whatever they say? I may be completely wrong but from what I have understood so far, I think it is important to understand that learning about concepts of gender, sexuality and gendered roles does not necessarily mean we fight and strain our relations with everyone, or overthrow everything we have right now overnight. Instead, it also means that we should be constantly aware of the social structures we are embedded in, and be empowered enough to find spaces for contestations and negotiations. Every small amount of change is some amount of change. More importantly, and especially after listening to several experiences and narratives of the participants, I felt that we should become more conscious of the language and words we use; making sure it is not exclusionary, full of judgment or stereotyping someone.

DSCN6846These conversations always carried on beyond the planned sessions. Since it was a residential course and all the participants were staying at the venue, there was a lot of interaction in the evenings, even carrying on till the wee hours – games, dancing and singing, activities, discussions, and sharing of various experiences from the field. I believe this peer learning supported in further building a space for many to share their personal experiences, so much as to comfortably share with each other one’s wildest dreams and sexual fantasies during a session on love, sex and desire.

This edition of the course also focused a lot on young people and their rights. Reviewing different policies that were related to young people, we see the construction of the idea of an ideal youth. No lens of gender or sexuality. No desires. No messiness. No differentiation among the needs of young people coming from different classes, castes, religion, gender or sexual identities and so on. Who will look out for these youth? As activists, we work on a daily basis with young people and rarely do we go through policies that are related to them. This particular session was designed keeping these issues in mind.

DSCN6874The sessions on technology and pornography were well received by the participants, as it helped in broadening the understanding on their linkages with patriarchy, masculinity, markets and capitalism. Consent was also discussed in great details, and beyond the binaries of just yes and no. I think it is important to understand the messiness that comes along with consent, like the other kinds of messiness in our day to day lives, and acknowledging the need to have a conversation about that is so important.

The participants provided a sense of support to one another as non-judgmental listeners while personal stories and experiences were being shared. Acknowledging that importance and the need for it in everyone’s lives, the last session planned was on collectivization and the need for support groups at the grassroots level. While it was important for conceptual understanding of theories on gender, patriarchy, masculinity and so on, how this understanding is carried forward to the field is of utmost importance. Standing up against a set norm or issue can be difficult and isolating for many and this is where support groups come to aid. As we listened to one another, discussed and debated over the last few days of the course; it is important to have that support at the grassroots too- a support group- a safe space for anyone who needs it.

Thereafter, parting ways was emotional. We had all known each other only for 6 days. Yet, with all the vulnerable moments and rich experiences that were shared with one another, there was a sense of belongingness. It felt as if there was never a time when one of us did not know the other. I guess that is one of the many beauties of these residential courses.

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