जनीशाला की हरिबाई

जनीशला का आखि़री दिन, हम सब घर वापस जाने के लिए अपना सामान बाँध रहे थे। पिछले 8 महीने से हम सब साथ थे लेकिन ऐसा लग रहा है जैसे बरसों का साथ हो। जनीषाला में मुझे रामा दीदी अपने साथ लाई थीं। रामा दीदी हमारे साक्षरता केन्द्र में पढ़ाती थीं जहां मै पिछले तीन साल से जाया करती थी।

5वीं कक्षा तक मैं गाँव के स्कूल में ही पढ़ती थी, मगर जनीषाला उस स्कूल से बिल्कुल अलग था। उस स्कूल में तो पढ़ाई ही नही होती थी और जनीषाला, यह बिल्कुल ही अनोखा था। यहाँ लाइब्रेरी  भी थी जिसमें अलग अलग तरह की किताबें और अख़बार पढ़ने के लिए होती थीं। पहले तो जब दुकान पर अखबार या किताबें देखती थी तो लगता था कि ये सिर्फ बड़े लोगों के लिए ही है पर अब तो ये सब मैं भी पढ़ने लगी थी। यहाँ के विषयों में भाषा, गणित, इतिहास ही नही जल जंगल ज़मीन, शरीर, यौनिकता और कम्प्यूटर भी शामिल थे। इनमें से दो विषय मेरे मन को ज्यादा भाते थे, गणित और कम्प्यूटर।

पहले तो कम्प्यूटर के नाम से ही मुझे डर लगता था मगर जब सीखना शुरू किया तो सब कुछ बहुत ही आसान लगा। ऐसे ही यौनिकता भी एक नया विषय था, इसके बारें में भी गहराई से पढ़ा और ये भी जाना कि दोस्तों में भी प्यार हो सकता है फिर चाहे वे दो लड़कियाँ ही क्यों न हों।

जनीषाला के दौरान हम दिल्ली भी घूमने गए। मैं तो पहली बार ट्रेन में बैठी थी, उसकी रफ़्तार से ही मुझे चक्कर आने लगे। दिल्ली पहुँच कर हम ख़ूब घूमें और किताबों में पढ़ी हुई जगहें अपनी आँखों से देखीं-लाल किले में दरबार देखा, राजघाट में गाँधी जी की समाधि देखी जिसपर ‘हे राम’ लिखा हुआ था, कुतुब मिनार भी देखने गए। चिडि़या घर गए तो वो इतना बड़ा और इतना फैला हुआ है कि आधा ही घूम पाए। हम सब जगहों पर बस से गए। हर जगह घूमें पर डर बिल्कुल भी नही लगा यहाँ तक कि हमने तो चाँदनी चैक में ख़रीदारी भी की।

दिल्ली की वह सैर कभी नही भूलेगी। और न ही भूलेंगें जनीशाला में बिताये वे दिन।  वहाँ हमने जितना सीखा उतनी ही मस्ती भी की, कई सहेलियाँ बनाई। अक्सर सोचती हूँ कि आज वे कहाँ होगी, और क्या वे भी मुझे ऐसे ही याद करती होंगी।

 ≠ हरिबाई से हुई बातचीत पर आधारित

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