बाबरनामे के पन्नों से

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पुरुष के शरीर की सुंदरता का विवरण हो न हो एक पुरुष के दूसरे पुरुष के प्रति आकर्षण की बात ज़रूर है हमारे इतिहास में। पढ़ते हैं बाबरनामा, जो पाँच सौ साल पहले, बाबर ने लिखा था। वही बाबर जिन्होंने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव रखी थी। 

उस समय उर्दू बाज़ार में एक लड़का था। उसका नाम था बाबरी। हमनाम (यानी अपने जैसे नामवाले) के साथ यह लगाव भी क्या लगाव निकला! इससे पहले मैं किसी पर फिदा न हुआ था। तब तक किसी से प्यार-मोहब्बत की बात तक न हुई थी। अब यह हुआ कि प्यार की कविता तक कहने लगा:
उस परी-चेहरा पर हुआ शैदा (आशिक)
बल्कि अपनी खुदी  (अपना आपा) भी खो बैठा
मैं आशिक बना बरबाद हुआ जा रहा था। जबकि बाबरी को कोई परवाह ही नहीं थी। लेकिन अगर कभी बाबरी मेरे सामने आ जाता तो मेरा अजीब हाल होता था। लाज और सकुचाहट के मारे मैं उसकी ओर आँख भर देख भी नहीं सकता था। ऐसे में उससे मिलने और बातें करने का सवाल ही नहीं था। उसके आने का शुक्रिया तक अदा नहीं कर पाता था।
आशिकी और दीवानगी के उन्हीं दिनों की बात है। मैं अपने कुछ एकदम नज़दीकी चाकरों के साथ गली में चला जा रहा था। अचानक बाबरी से मेरा आमना-सामना हो गया। मेरी अजब हालत हो गई थी। मुँह से एक भी बोल न निकल पाया। उस समय फारसी भाषा का यह शेर याद आ गया:
गड़ा जाता हूँ जब-जब यार का रू  (चेहरा) देखता हूँ मैं
मुझे सब देखते हैं, और ही सू  (तरफ) देखता हूँ मैं
यह मेरे हाल पर सोलहों आने सच था। उन दिनों प्यार-मोहब्बत का ज़ोर, जवानी का जुनून और हंगामा मुझ पर सवार था। कभी मैं पागलों की तरह जंगलों-पहाड़ों में मारा-मारा फिरता। तो कभी नंगे पाँव बागों और मोहल्लों में गली-गली भटकता रहता। न तो भटकने फिरने पर अपना बस था और न मन मारे बैठे रहने पर। न चलने में चैन मिलता था न ठहरने में।
इतिहास, धर्म, कला और साहित्य में झाँककर हमने पाया कि हमारे देश में यौनिक इच्छा की अभिव्यक्ति की पूरी जगह थी। शादी से पहले, शादी के बाहर, समलैंगिक, एक से ज़्यादा लोगों के साथ। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हम किसी सुनहरे युग की बातें कर रहे हैं। उसी इतिहास में मनुस्मृति की प्रताणनाएँ भी हैं और सीता की अग्नि परीक्षा भी। हम यह रेखांकित करना चाहतेे हैं कि आज जो दावा किया जाता है कि आज की तारीख में जो यौनिक कायदे हैं वे हमेशा से चले आ रहे हैं। ये सरासर गलत है। मुख्यधारा का समाज हमेशा संस्कृति के उन पहलुओं को उभारता है जो आज की व्यवस्था बनाए रखने में मददगार हों। 
(‘खुलती परतें : यौनिकता और हम’ किताब से एक अंश)
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