आओ, मिलते हैं कुछ औरतें से जो हमारे पार्टनर संस्थाओं के महिला शिक्षा के कार्यक्रम से जुड़े हैं

valविजया
जब मैंने पहली बार कैलकुलेटर सीखा, उस दिन में बहुत खुष थी। उस रात सोने तक मैं बस यही सोचती रही कि अब मैंने कैलकुलेटर भी सीख लिया, अब मैं और आगे पढू़ँगी।

मंजू
मंजू वाराणसी जि़ले के छाँही गाँव में अपने परिवार के साथ रहती है। आर्थिक तंगी की वजह से उसके पति के पैर का समय पर इलाज न होने की वजह से वह ज़्यादा काम नही कर सकता अब मंजू ने ही मनरेगा में काम करके अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाई हुई है और अपने बेटे की आँख का इलाज भी कराया है। पढ़ने लिखने का उसे बहुत चाव था पर नही पढ़ पाई।….

आज मंजू षिक्षा केन्द्र में पढ़ने जाती है और सरस्वती स्वयं सहायता समूह की सदस्य भी बन गई है। वह अपनी इकलौती बेटी को भी खूब पढ़ाना चाहती है। वह खुद कहती है कि षिक्षा केन्द्र में आने के बाद उसमें काफ़ी बदलाव आ गया है। औऱ समझ गई है कि क्यँू उसका राषन कार्ड पीला और उससे अच्छी स्थिति वालों का लाल या सफेद कार्ड है।

।। आषा की पूरी हो रही है आषा।।
आषा प्रतापगढ़ के धनऊपुरवा गाॅंव की रहने वाली अपने तीन भाइयों की अकेली बहन थी। इनके पिता का नाम कालूराम यादव और माॅं का नाम कमला देवी है पिता जी बम्बई में टेक्सी चलाते थे उसी से घर का खर्चा चलता था भाइयों की पढ़ाई हुयी लेकिन आषा की पढ़ाई नहीं हो पायी क्योंकि घर से स्कूल दूर था और माॅं के साथ काम करने वाला कोई नहीं था आषा की पढ़ने की बहुत इच्छा थी मगर वह पूरी नहीं हो पायी। 16 साल की उम्र में आशा की शादी प्रतापगढ़ के सराय सुल्तानी गाॅंव के निवासी फूलचन्द्र यादव से हो गयी और पढ़ने की इच्छा मन में ही रह गयी। फूलचन्द्र गाॅंव में ही काम करते थे इनके चार बच्चे हुये 3 लड़की और 1 लड़का। बच्चे बड़े होने लगे। आषा जी ने अपनी तीनों लड़कियों को पढ़ाया। घर में खर्च बढ़ रहा था इसलिये फूलचन्द्र नौकरी के लिये बम्बई चले गये। घर की पूरी जिम्मेदाी आषा जी के ऊपर आ गयी जब भी अपने पति से बात करना हो तो बच्चों व पड़ोसियो की मदद लेकर मोबाइल से बात कर पाती थी, क्योंकि इन्हें मोबाइल चलाना नहीं आता था इस कारण इन्हें बहुत बुरा लगता था।
बाएफ सुनहरा भारत परियोजना की तरफ से गाॅंव में महिलाओं को पढ़ाने के लिए सक्षम महिला केन्द्र खोला जा रहा था उसके लिए महिलाओं का नाम लिखा जा रहा था आषा जी के अन्दर पढ़ने की इच्छा भी जाग गयी पति के पास फोन करवाकर उन्हें पूॅछा कि गाॅंव में महिलाओं को पढ़ाने के लिए सेन्टर खुला है मैंे उसमें पढ़ना चाहती हूॅं और गाॅंव की ही कंचन देवी पढ़ायेंगी। पति कि सहमति पाकर आषा प्रतिदिन सेन्टर में पढ़ने आने लगी साथ ही 10 रू0 प्रति माह के हिसाब से फीस भी जमा किया। गाॅव के लोग उसका मजाक बनाते थे कि बुढ़ापे में पढ़ने जा रही है। आषा कहती हैं कि लोगों के तानो का भी मेरे ऊपर कोई असर नहीं हुआ, मैं जेन्डर की ट्रेनिंग लेने के लिये 30 महिलाओं के साथ लखनऊ गई। मैं पहली बार इस तरह से किसी ट्रेनिंग में भाग लिया था वहाॅं से वापस आकर मुझे बहुत खुषी हुई और उससे ज्यादा खुषी मुझे तब हुई जब मैं खुद से मोबाइल में नम्बर मिलाकर अपने पति से बात की। अब मैं थोड़ा-2 हिन्दी पढ़ना लिखना सीख रही हूॅं , इतना कह कर आषा मोबाइल हाथ में लेकर सेन्टर की तरफ चल दी।

चिन्ता की दुर हुई चिन्ता
मेरा नाम चिन्ता चाँदपुर गाँव में रहती हूं। मेरी उम्र 40 साल है। मैं अपने पति और 4 बच्चों के साथ रहती हुँ। मैं मजदूरी और भैंस पालने का काम करती हूं। भैंस का दूध बेचती हूं। दुधवाला एक सप्ताह में जितना दूध ले जाता है उसका पैसा देता है लेकिन मैं जानती थी कि यह पैसे का घपला कर रहा है। ज्यादा दूध ले जाता है और कम पैसा देता है लेकिन पहले मुझमें आत्मविष्वास न होने की वजह से मैं कुछ नहीं बोलती थी पर जब से मैं लक्ष्मी बाई सेन्टर पर पढ़ने जा रही हूं तब से मुझे कुछ पढ़ना-लिखना आ रहा है मेरा खुद पर विष्वास भी बढ़ा है। रोज दूध का हिसाब अपनी कापी पर लिख लेती हूं। अब दूधवाला घपला करता है तो उसे अपना हिसाब दिखा देती हूं। मेरा काॅपी पर हिसाब देखकर दूधवाला चैंक गया और घपला करते हुये पकड़े जाने पर दूधवाला षर्मा गया।

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