स्कूल की लड़कियाँ

(ज़्ाफ़र जहाँ बेगम, ‘तहज़्ाीबे निस्वाँ’, 1927)
जो लड़कियाँ स्कूलों में तालीम पाती हंै, तालीमे निस्वाँ के मुख़ालिफ़ीन (विरोधियों) की निगाहें उनके तमाम हालात का मुआएना निहायत ग़्ाौर से करती रहती हैं। और ज़्ारा कोई बात खि़लाफ़े मामूल (दस्तूर के खि़लाफ) नज़्ार आई नहीं कि फ़ौरन इसकी गिरफ़्त हो जाती है। और तमाम इल्ज़्ााम स्कूल की तालीम पर थोप दिया जाता है। हालाँकि इसी कि़स्म के उयूब (बुराइयाँ) घर की लड़कियों में भी मौजूद हों तो कोई परवाह नहीं की जाती और किसी पर इल्ज़्ााम नहीं आता। मसलन आजकल लड़कियों में अमूमन फ़ैशन की वबा रोज़्ा बरोज़्ा तरक़्क़ी पर है। घर के ख़ास कर बावर्चीख़ाने के कामों को अपने हाथ से करना आर (शर्मिंदगी) समझती हैं। अब घर की लड़कियों पर ज़्यादा से ज़्यादा इन बातों पर बड़ी बूढि़याँ नाराज़्ा हो लेती हैं। लेकिन बेचारी स्कूल वालियों की तो वो शामत आती है कि कुछ न पूछिए।

हाँ, साहब अब तो वो स्कूल में पढ़कर मेम साहब हो गईं। वो क्यों ऐसे ज़्ालील काम करने लगी थीं? उनकी शान में फ़कऱ् न आ जाएगा? खु़दा बचाए ऐसी तालीम से औरतें औरतें ही नहीं रहीं। घर के कामों से इन्हें नफ़रत, बच्चों की टें-टें से इन्हें वहशत । बस काम में काम है तो सिर्फ़ लिबास की तराश ख़राश से कि सुबह को एक वज़्ाा (ढंग, तौर-तरीक़ा) है, तो शाम को दूसरी। नए-नए तज़र््ा से बाल बनाए जा रहे हैं। हर वक़्त सहेलियों के आने जाने का ताँता बँधा हुआ है। कभी ख़ुद मिलने जाती हैं, कभी वो इनके पास आती हैं। बाक़ी न कोई काम है, न धंधा। ख़ुदा बचाए ऐसी तालीम से। इससे तो जाहिल बेहतर हैं।
मेरी एक अज़्ाीज़्ाा का क़ौल (वक्तव्य) है कि बड़ी बूढि़याँ जिस नज़्ार से अपनी बहू और बेटी को देखती हैं, बिल्कुल उसी नज़्ार से स्कूल और घर की लड़कियों को देखती हैं। यानी जिस तरह कोई ऐब अगर बहू में होगा और इसी कि़स्म का या बिल्कुल वही ऐब बेटी में भी होगा तो बहू का तो साफ़ नज़्ार आ जाएगा, लेकिन बेटी का या तो नज़्ार ही न आएगा या अम्दन (जान-बूझकर) नज़्ारअंदाज़्ा कर दिया जाएगा। बिल्कुल यही फ़कऱ् घर और स्कूल की लड़कियों के साथ होता है। यानी जो बरताव बहू के साथ होगा वो स्कूल की लड़की के साथ होगा। और जो तरीक़ा अपनी बेटी के साथ बरता जाता है वो घर की लड़कियों के साथ बरता जाता है। ग़्ाौर करती हूँ तो अज़्ाीज़्ाा के इस क़ौल को हर्फ़ बहर्फ़ सही पाती हूँ। आजकल अमूमन लड़कियों को रंगीनी से नफ़रत होती जाती है। तमाम लिबास में अक्सर सिर्फ़ दुपट्टा रंगीन ओढ़ा जाता है। वो भी निहायत हल्के रंग का। वरना वो भी सफ़ेद हो तो मुज़्ाायक़ा (परवाह) नहीं। जूता अमूमन ऊँची ऐड़ी का पसंद किया जाता है।
अक्सर लड़कियों को मैंने ऐनक लगाते भी देखा है। घर की लड़कियों को तो कह नहीं सकते कि इन्होंने शौकि़या लगाई या ज़्ारूरत से। ग़्ाालिबन इसमें शौक़ और ज़्ारूरत दोनों ही शामिल हैं। लेकिन स्कूल की लड़कियों की बाबत (बारे मंे) तो ये ज़्ााहिर हुआ कि जब तक वो घर में रहीं किसी को महसूस ही न हुआ कि इन्हें ऐनक की ज़्ारूरत है। लेकिन जब स्कूल जाकर बोर्ड पर लिखे हुए सवालात को अपनी जगह से न पढ़ सकीं, बल्कि बोर्ड के पास जाकर पढ़ने पर मजबूर हुईं, तो उस्तानियों को उनकी नज़्ार का फ़कऱ् महसूस हुआ और डाॅक्टरी जाँच करवाकर उनको ऐनक लगाने पर मजबूर किया गया। अब ज़्ौल (निम्नलिखित)  की मिसाल से मालूम होगा कि मेरी अज़्ाीज़्ाा का मक़ूला (कथन) कितना सही है।
गर्मियों की दो महीने की ता’तील (छुट्टियों) में स्कूल की लड़कियाँ घर आईं। गाड़ी से उतरीं तो तमाम जिस्म और चेहरा बुरक़े से छिपा हुआ था। पैरों में मोज़्ो और हाथों में दस्ताने पहने हुए थीं। घर में दाखि़ल होते ही उन्होंने बुरक़े उतारे तो देखा कि सर से पैर तक सफे़द लिबास था। इस ख़याल से कि बेअदबी न हो सबने अपने-अपने क़़ुरान शरीफ़ गले में पहन रखे थे। बुरक़ा खूँटी पर डाल कर क़ुरान शरीफ़ उतार कर अलमारी में रखे और ग़्ाुसलख़ाने का रूख़ किया क्योंकि ज़्ाोहर (दोपहर की नमाज़) का वक़्त तंग था। झटपट वुज़्ाू करके नमाज़्ा को खड़ी हो गईं। नमाज़्ा से फ़ारिग़्ा होकर अपना असबाब  (सामान) ठिकाने-ठिकाने रखा। और फिर इत्मिनान से थोड़ी देर बैठकर सब से बातचीत की। माँ से हिदायत लेकर बावर्चीख़ाने में पहुँचीं। और असर की नमाज़्ा (शाम की नमाज) पढ़कर माँ को खाना तैयार करने में मदद दी। मग़्ारिब की नमाज़्ा (सूरज डूबने के बाद पढ़े जाने वाली नमाज) के बाद दस्तरख़ान बिछाया और सबने मिलकर खाना खाया। थोड़ी देर बातचीत करके इशा  की नमाज़्ा पढ़ी और सो गईं। सुबह अभी सारा घर महवे ख़्वाब (सपनों में खो जाना) था कि यही बदनाम लड़कियाँ उठीं और ज़्ारूरियात से फ़ारिग़्ा होकर नमाज़्ो फ़ज्र (भोर की नमाज) अदा की और तिलावते क़़ुरान मजीद (पवित्र क़ुरान का पाठ) शुरू कर दी। इससे फ़ारिग़्ा हुईं तो छोटे बहन भाइयों को बुलाकर इनके पढ़ने-लिखने का हाल पूछा और इनकी किताबें वग़्ौरह मँगाकर इनको पढ़ाना शुरू किया।
अब कोई पूछे कि इन ग़रीबों ने कौन सा काम क़ाबिले एतराज़्ा किया और क्यों ये बेचारियाँ बदनाम हैं? मगर इसको क्या किया जाए कि बड़ी बूढि़यों को जो स्कूल के नाम से भी मुतनफि़्फ़र (नफ़रत) हैं, इस पर भी ऐतराज़्ा है। सबसे पहला सवाल जो मोहल्ले की बड़ी बूढि़यों का जिनकी गोदियों की ये लड़कियाँ खेली हुई हैं, ये हुआ कि बुआ ये मेमें तुम्हारे यहाँ कहाँ से आईं? क्या ख़ुदा न ख़ास्ता कोई बीमार है और ये डाॅक्टरनियाँ उसे देखने आई हैं? ये ऐतराज़्ा इनकी ऐनक, सफ़ेद लिबास, खड़े पाँयचों के पाजामों और ऊँची ऐड़ी के जूतों पर था। मगर सबसे ऊपर की चीज़्ा बुरक़ा इन्हें नज़्ार न आया जिसका मेमों से कोई ताल्लुक़ ही नहीं। फिर इनके गले में क़ुरान शरीफ़ देखकर भी इसका सुबूत न हुआ कि वो मुसलमान हैं। हद हो गई कि नमाज़्ा की पाबंदी और रोज़्ााना कलाम मजीद की तिलावत और रमज़्ाान के पूरे रोज़्ो भी इनके इस्लाम के शाहिद (गवाह) न समझे गए और बावजूद इन सब बातों के भी इनको मेमों ही के लक़ब (उपाधि) से याद किया जाता है। जिस घर में जाए यही तज़्ाकिरा (वर्णन), जिस महफि़ल में सुनिए यही चर्चा कि ये लड़कियाँ तो स्कूल में पढ़कर बिल्कुल मेमें हो गईं। तो आखि़र इस ता’स्सुब (पक्षपात) का क्या इलाज? और इन मुहमल (बेकार) ऐतराज़्ाों का क्या जवाब दिया जा सकता है। सिवाय इस दुआ के कि ख़ुदा ऐसे लोगों को अक़्ल और इंसाफ़ से काम लेने की तौफ़ीक़ (हौसला) दे। और ता’स्सुब का पर्दा इनकी आँखों से उठा दे और इस गुनाह से बचाए, जो वो सरीहन (खुल्लम खुल्ला) मुसलमान बच्चों को दायरे इस्लाम से ख़ारिज करके अपने सर लेती हैं।
(’कलामे निस्वाँ’ किताब से लेख)
Tarze taalim
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