जेल की महिलाओं के साथ काम करने का मेरा पहला अनुभव

जेल शब्द का नाम सुनते ही आपके मन मे जेल, कैदी, अपराधी, हत्या, चोरी, डकैती, कानून, अदालत, आदि आते होंगे और साथ ही ये भी मन में आता होगा कि कैसे दिखते होंगे, कैसे घर परिवार से होंगे, किस जुर्म में जेल में बन्द होंगे। कुछ ऐसे ही सवाल मेरे मन मंे भी थे। जब मंै पहली बार जेल में महिलाओं के साथ साक्षरता का काम करने जा रही थी। पर मेरे ये सारे भ्रम टूट गयें, जब मैं 8 मार्च (अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस) मनाने के लिए जेल गयी। जहां चार दीवारी के अन्दर बन्द लगभग 300 से भी ज्यादा महिला कैदियों से आमने सामने मिली। उनके चेहरे की हंसी, उनके आखों की चमक और उनके ज़ज्बे को देख व सुन कर लगा। उस दिन ये सभी जेल की सजावट को देखकर बहुत खुश थे। मानो उनके लिए कोई त्योहार का दिन हो। सभी नये कपड़े और सजधज के साथ पूरी मस्ती मे थी।
इन औरतों के बच्चे भी अपनी मां के ही साथ जेल में रहते है और वहीं पर अपनी पढ़ाई लिखाई करते हैं। जेल में कई ऐसी महिलाएं है जिनसे बात करने प

र पता चला कि जब उन्हे सजा हुई थी तो वो गर्भवती थी और उन्होंने अपने बच्चों को जन्म इसी जेल में दिया। जिनमें से कुछ बच्चे इस समय 4 से 5 साल के भी हो गये हैं। महिलाएं जेल में आने वाले लोगों को देखकर इस कदर खुश होती है जैसे आने वाला हर व्यक्ति उनके लिए कोई खुशी का सन्देश लेकर आया हो।

जब मैंने उन्हें अपना परिचय दिया कि मैं कहां से आई हूं, क्या काम करती हूं और अपने काम के संदर्भ मे और किस-किस जिले में जाना होता है तो वो मुझे घेर लीं और पूछने लगी कि आप कौन-कौन से जिले जाती हैं, क्या आप मेरे जिले में भी जाती हैं, मेरे घर संदेश पहुंचा देंगी? कह देना आ के मिल जाएं। बच्चों के बारे में और घर-परिवार के बारे में हाजचाल दे जाएं। मेरे लिए एक अन्र्तदेषी लाकर दो। जब लिखना-पढ़ना सीख जाऊंगी तो घर के लिए पत्र लिखूंगी। एक ने तो 10 रू. दिये और कहने लगी की हमारे घर फोन कर देना। और इतना कह कर रोने लगी। एक दूसरी महिला ने चुप करवाते हुए कहा रोती क्यों है रे जब बाहर जायेंगे तो सभी से मिल लेना। क्या करेगी हमारे कर्म ही खोटे है।
जेल में मैं कई ऐसी भी महिलाओं से मिली जो पिछले 10-15 सालो से जेल में बन्द हैं। जिसके कारण वो मानसिक रूप से अस्वस्थ भी हो गयीं हैं। उन्हंे यह भी याद नहीं है कि उन्हें किस जुर्म मे जेल लाया गया है और क्यों सजा मिली है। एक महिला ने बताया कि वो अपनी मां और बड़ी बहन के साथ इस जेल में लगभग 10-12 साल पहले आई थी और इसी जेल में रहते हुए उसने अपनी मां और बहन को अन्तिम विदाई भी दी। महिलाओं ने बताया कि उन्हें झुठे केस में अन्दर रखा गया है तो किसी महिला कैदी को यह तक पता नहीं है कि उन्हें कितने दिनों की सजा हुई है और अभी कितने दिन और जेल में रहना होगा।
जेल में 50 से 55 महिलाओं के साथ पढ़ने-लिखने का काम हो रहा है। महिलाएं अपना-अपना काम करने के बाद जेल में ही 2-3 घंटे पढने-लिखने में अपना समय देती है।। सभी को करीब 6 महीने हो गए हैं पढ़ते हुए। महिलाओं का कहना है कि थोड़ा पढ़ने लिखने आने लगा है। वो अब अपने घर चिट्ठी लिख सकती हैं। जब वो अपनी सजा पूरी कर बाहर आएगीे तो कुछ काम भी कर सकतीं हैं।
आपको यह जान कर हैरानी होगी की इन महिलाओं को पढ़ाने-लिखाने का काम इन्ही के बीच की 2 महिलाएं कर रहीं हैं। इनका कहना है कि हमें बहुत खुशी होती है जब महिलाएं हमें मास्टराइन दीदी कह कर बुलाती है, हमारी बात मानती है और इज्जत भी करती हैं। हमें ऐसा लगता है कि हमारे पुराने दिन फिर से लौट आयें और हम जेल से बाहर हैं।

जब मैं बाहर निकली तो मेरे आंखों के सामने उन सबके चेहरे घुम रहे थे। मानो वो मुझसे सवाल कर रहें हो कि क्या आप सब हम लोगों को अपने सभ्य समाज में वो ज़गह देंगे जिसमें हम अपनी बाकी की बची जिंदगी खुले आसमान के नीचे बीना डर के आजादी व खुशी से बिता सकें? क्या आपका समाज मेरे घर व मेरे

बच्चों को अपनायेंगा? क्या हम जो सपने लेकर जेल से बाहर आयेंगे उनको पुरा करने में आप लोग हमारी मदद करेंगे? क्या हमारे बच्चे दुसरे बच्चों की तरह अपनी जिंदगी बीता पायेंगे।

इनमें से कुछ महिलाओं ने अपने संघर्ष के बारे में मुझे पत्र लिखकर बताया। मैं उन महिलाओं के सघर्ष और हौसले को सलाम करते हुए उनके द्रारा लिखे पत्रो को आप के साथ भी साझा करना चाहती हुं।
सनतकदा संस्था लखनऊ जिले के आदर्श नारी बन्दीगृह जेल में बन्द महिलाओं के साथ पिछले 4 साल से उनके केसो पर पैरवी करने का काम कर रहीं हैं और समय-समय पर जेल में ही महिला कैदियों को मेंहदी, कम्पूूटर हुनर सी

खाती है। अभी एक साल से सनतकदा जेल की महिलाओं के साथ शिक्षा साक्षरता का काम कर रही हैं जिसमें निरंतर उनके कार्यक्रम में एक क्षमता वर्धन की भूमिका निभा रही है।

jail

 

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