भय नाही खेद नाही – पंडिता रमाबाई

हमारे इतिहास में ऐसी कौन सी महिलाएँ रही हैं जिन्होंने औरतों की अपनी जगह बनाने की लड़ाई लड़ी हो? हमने इतिहास में राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासन के बारे में पढ़ा है। मगर दूसरे लोग कहाँ हैं? महिलाएँ कहाँ हैं? 19वीं सदी के भारत में पंडिता रमाबाई निश्चित रूप से औरतों और लड़कियों की शिक्षा के अधिकार की लड़ाई में बहुत आगे रही हैं। ‘भय नाहीं, खेद नाहीं’ किताब पंडिता रमाबाई का सफर, उनका संघर्ष दर्शाती है।

bachao-revisedमार्च, 1889 – शारदा सदन का शुभारंभ हुआ। यह शारदा यानी सरस्वती का घर था। इसमें घरेलू जीवन और संस्कृति दोनों का मेल हो, यही सपना लेकर मैं चली थी। नामकरण की एक वजह यह भी थी कि इसकी पहली छात्रा शारदा नाम की लड़की थी। मैंने सोच रखा था कि एक भी छात्रा हो तो मैं शारदा सदन शुरू कर दूँगी। अच्छा हुआ कि पहले दिन दो छात्राएँ हो गईं। एक महीने के अंदर आठ छात्राएँ मेरे स्कूल में आईं। उनमें से दो बाल विधवाएँ थीं।

बंबई की चैपाटी पर एक किराये के मकान को शारदा सदन नाम दिया था और उसे सादे ढंग से झंडियों और केलो के पत्तों से सजाया था। शारदा सदन का उद्घाटन समारोह सादा, पर भव्य था। मैंने अपने नाम से निमंत्रण पत्र बाँटा था और शहर के सभी नामी-गिरामी लोगों, समर्थकों, हितैषियों को बुलाया था। श्रीमती काशीबाई कानेटकर ने समारोह की अध्यक्षता की। किसी जन समारोह में अध्यक्षता करनेवाली वे पहली भारतीय महिला थीं। उसमें मैंने लोगों के सामने स्त्रियों के लिए संस्थान खोलने की जरूरत क्या है, इसे रखा। शुरुआत में विदेशी मित्रों से सहायता मिली है, परंतु स्वजनों का सहयोग मिले तो इसकी गरिमा बढ़ेगी। मेरा सबसे यही आग्रह था कि आगे इस नन्हें पौधे को सींचने और फलने-फूलने लायक बनाने की जिम्मेदारी लें ताकि बेसाहरा बहनें इसकी छाँह से लाभ उठा सकें।

सभा में मेरे मित्र सदाशिव पांडुरंग केलकर ने व्यवस्थापक समिति के सदस्यों के नाम और शारदा सदन के नियम कानून के बारे में विस्तार से बताया। इसमें घर से आकर पढ़नेवाली लड़कियाँ भी होंगी और सदन में रहनेवाली भी। रहने की व्यवस्था मुख्यतः ऊँची जाति की विधवाओं और अनाथ लड़कियों के लिए होगी। सदन में शिक्षा का माध्यम मराठी, अंग्रेजी, गुजराती और संस्कृत चारों भाषाएँ होंगी। पठन-पाठन सामग्री में वे मराठी पाठ्य पुस्तकें भी होंगी जिनका ‘द हाईकास्ट हिंदू वुमन’ की बिक्री के पैसों से मैंने अंग्रेजी से अनुवाद करवाया था। अंत में न्यायमूत्र्ति काशीनाथ त्रयंबक तेलंग ने अंग्रेजी में सभा का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया और राव साहब वामन आबाजी मोदक ने धन्यवाद ज्ञापन किया।…

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…शारदा सदन के प्रचार-प्रसार के माध्यम से मैं लोगों के बीच लड़कियों और विधवाओं का सवाल उठाने की कोशिश कर रही थी। उन्हें पुरुषों के समान बोलने का अधिकार चाहिए और बराबरी के स्तर पर शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा आदि चाहिए – इस पर मेरा बल था। मैंने मध्य भारत, काठियावाड़ और दक्कन आदि की यात्राएँ की। जहाँ भी जाती, वहाँ लोगों को शारदा सदन जैसी संस्था की जरूरत बतलाती। यह अपनी तरह का महाराष्ट्र का पहला ऐसा केंद्र था। इसमें लड़कियों को भाषा, गणित, विज्ञान पढ़ाने से लेकर उन्हें डिजाइन बनाना, नक्शा बनाना, लकड़ी की चीजें बनाना आदि हर तरह की कारीगरी सिखाई जाती थी।

1889 के दिसंबर महीने में ‘इलस्टेटेड क्रिश्चन सोसाइटी’ नामक पत्रिका में सदन में रहनेवाली दो विधवाओं के धर्मांतरण की संभावना की खबर छपी। इसने कट्टर राष्ट्रवादियों और हिंदूधर्म के रखवालों की नींद उड़ा दी। लोकमान्य तिलक का विरोधी स्वर जो इधर थोड़ा मद्धम हुआ था, वह फिर से तेज हो गया। हमारे शारदा सदन पर जबरदस्ती धर्मांतरण करवाने, ईसाई धर्म प्रचारक संस्था होने और विदेशी धन से चलने के कारण राष्ट्रविरोधी होने का धुआँधार आरोप लगाया गया। तिलक का अखबार ‘केसरी’ खुल्लम-खुल्ला बोल रहा था कि मैंने स्कूल की आड़ में स्त्रियों को ईसाई बनाने का काम चला रखा है। इसका सार्वजनिक रूप से खंडन करना मुझे आवश्यक लगा। मैंने एक प्रतिष्ठित अखबार में छपवाया कि सच्चाई यह है कि सदन की हर लड़की को अपने धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने की आजादी है।

सचमुच मैंने किसी को धर्मांतरण के लिए प्रेरित नहीं किया था। शायद मुझे देखकर या श्रद्धावश कुछ लड़कियाँ अपने आप ईसाई धर्म की ओर आकृष्ट हुई थीं। लेकिन धर्म बदल लेने के बाद से मुझपर लोगों को सहज विश्वास नहीं होता था। खासकर ऊँची जाति के हिंदुओं में सारे मिशनरी लोग और उनके काम के प्रति गहरा शक का भाव है। मेरी एक अमेरिकी सहयोगी का खयाल था कि यदि मैं नीची जाति की स्त्रियों के बीच काम कर रही होती तो मेरा इतना प्रतिरोध नहीं होता। ऊँची जाति के हिंदू भाई अपनी स्त्रियों की शुद्धता को लेकर जरूरत से ज्यादा सतर्क थे। उन्होंने मुझे कमरा बंद करके बाइबल पढ़ने का सुझाव दिया, जिसे मैंने नामंजूर कर दिया। मेरे कमरे का दरवाजा चैबीसों घंटे खुला रहता है और खुला ही रहेगा। मुझे भी इन लड़कियों की तरह अपने धर्म का पालन करने की आजादी है। जब मैं 24 घंटे में कभी अपने कमरे का दरवाजा नहीं बंद करती, तो अपनी प्रार्थना करते समय क्यों करूँ? जाहिर था कि मेरे इस जवाब से लोगों का मेरे प्रति असंतोष बढ़ा।

तनाव के दिन बहुत लंबे रहे। दिवाली के दिन रमाबाई रानडे सदन की लड़कियों के लिए फल-मिठाई लेकर आईं। मुझे हैरत हुई कि दिवाली जैसे त्योहार के मौके पर अशुभ मानी जानेवाली विधवाओं के आश्रम में भला वे कैसे आईं। सच पूछिए तो इस शुभ मौके पर उनका आना मेरे लिए एक सर्टिफिकेट से कम न था। वे मेरी अच्छी सहेली थीं और मुझे उनका बड़ा आसरा था।

एक बार पहले रमाबाई रानडे खुद एक विधवा लड़की को शारदा सदन लेकर आई थीं। उसकी उम्र अट्ठारह साल थी, मगर दुख और तकलीफ से वह तीस साल से कम की नहीं लग रही थी। सिर मुँड़ा हुआ, आँखें धँसी हुईं, देह पर जगह-जगह दागने के घाव और उसकी छाती से चिपका चार महीने का बच्चा। सदन में उसे लाने के पहले रमाबाई रानडे ने मुझे अपने घर बुलाया था ताकि वहीं विधवा लड़की से मुझे मिलवा सकें। हर्ष की बात यह रही कि मुझसे मिलाने के उद्देश्य से रमाबाई रानडे की ननदें उस लड़की को घर से बुलाने गईं, जो कभी मेरा चेहरा तक देखना पसंद नहीं करती थीं। इधर वह लड़की खुद से रमाबाई रानडे के घर पर पहुँच गई। मेरा परिचय उससे करवाया गया। उसे सदन के माहौल के बारे में विस्तार से बताया गया। एक बार फिर उससे पक्का करने के खयाल से रमाबाई रानडे ने पूछा कि वह शारदा सदन जाएगी या पहले घर जाकर एक बार ठंडे दिमाग से अपने निर्णय पर विचार करेगी। उसने कहा, ”नहीं, मुझे कुछ नहीं सोचना, मुझे घर जाकर अपने कपड़े भी नहीं लाने हैं, मुझे अब केवल स्कूल जाना है।“ वह एकदम उतावली थी। हमने उसकी हालत समझी और समय नहीं गँवाया। रमाबाई रानडे के साथ सदन में दाखिल होते ही उस लड़की को सबने घेर लिया। उसका बच्चा तो हाथोहाथ घूमता रहा। उस लड़की के चेहरे पर जो संतोष और खुशी का भाव झलक रहा था वह मेरे लिए अनमोल था। यह सदन की अपने उद्देश्य में कामयाबी का प्रमाण था। इसी तरह पूना के कई कट्टर ब्राह्माणों ने भी विधवाओं को हमारे स्कूल में भेजा जो पहले सदन पर छींटाकशी करने से बाज न आते थे। इसके सिवा उनके पास कोई चारा न था। धर्मांतरण पर उठे सारे तूफान के बावजूद यही शारदा सदन उन लाचार स्त्रियों के लिए उम्मीद की किरण है, यह साबित हो रहा था। मुझे तो पूरा विश्वास है कि इसकी नींव कोई नहीं हिला सकता। यह सदन बालू पर नहीं, शाश्वत चट्टान पर टिका है।

बंबई में शारदा सदन चलाना काफी महँगा पड़ रहा था। एक बड़ी तब्दीली यह आई कि सदन को बंबई से पूना ले आया गया। पूना अपेक्षाकृत सस्ता शहर था। यहाँ मैंने कैंप इलाके में रेलवे स्टेशन के पास एक बंगला किराये पर लिया। नए सिरे से समितियाँ बनाई गईं और नई व्यवस्था की गई। कुछ ही महीनों में एक बड़ी खुशखबरी यह मिली कि हमारे सदन में रहनेवाली गोदूबाई की शादी प्रो. कर्वे से तय हो गई। वे विधुर थे और खुशी-खुशी इस विवाह के लिए राजी हुए थे। शारदा सदन की सारी लड़कियों ने मिलकर गोदूबाई को सजाया, शादी का जोड़ा पहनाया। शादी का इंतजाम एक मित्र के घर पर था। इस समारोह में 40-45 प्रगतिशील सुधारक लोग मौजूद थे। शाम में हमने अपने सदन में वर-वधू को खाने पर बुलाया। गाना-बजाना, आशीर्वाद और भावोद्गार के बीच वह दिन गुजरा। अंत में हम सबने कपड़े-लत्ते, उपहार आदि देकर शुभकामनाओं के साथ गोदूबाई को उसके इस मायके से विदा किया।

अच्छी चीजों के साथ परेशानियाँ भी आई थीं। मुझ पर धर्मांतरण करवाने का आरोप लग रहा था। कभी-कभी तो मुझे लगता था कि आसमान काले बादलों से ढँका हुआ है और जैसे कभी साफ नहीं होगा। आखिर मेरी मंशा पर सवाल क्यों उठे? मैं अपने स्कूल के शैक्षणिक तौर-तरीके को लेकर अपनी जगह पर शुरू से कायम थी। मेरा इरादा स्कूल को धर्मनिरपेक्ष बनाने का था क्योंकि यदि यह धार्मिक संस्थान होता तो कभी भी ऊँची जाति की हिंदू लड़कियों को इसका लाभ नहीं मिल पाता, वे आती ही नहीं। मगर कुछ दोस्तों के अति उत्साह, खैरखाही और अतिशयोक्ति का नतीजा यह निकला कि तस्वीर का रुख ही पलट गया। भगवान बचाए ऐसे दोस्तों से!

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One thought on “भय नाही खेद नाही – पंडिता रमाबाई

  1. Dr. Devendra Singh says:

    Dear Sir
    Please told me where I get this book भय नाहीं, खेद नाहीं’ पंडिता रमाबाई का सफर .

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