नीचे दिया गया 2005 में महिला दिवस पर डॉक्टर नूरित इलहानन के बयान से अंश और राधारमण की कविता निरंतर की पत्रिका आपका पिटारा के फिलिस्तीन अंक में जनवरी 2009 में प्रकाशित हुए थे। भले ही इस अंक को प्रकाशित हुए 5 साल के करीब हो गए है, मगर इज़राइल द्वारा गाज़ा में चल रहे नरसंहार को देखें तो लगता है जैसे कल की ही बात हो, स्थिति ज़रा भी नहीं बदली। फिलिस्तीन के लोगों का वही संघर्ष जारी है और जारी हैं इज़राइल के वही दमनकारी तरीके। 

 

एकजुटता का नारा

अपनी बची-खुची ताकत से आज़ादी की लड़ाई लड़ते फिलिस्तीन में कई तरह के दल हैं। उनमें कई दल इज़राइल के खिलाफ मानवबम, घर के बने राॅकेट आदि का इस्तेमाल करते हैं। जो भी हो इससे इज़राइल की हिंसा और दमन को सही नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया के बहुत सारे देश फिलिस्तीन के हक की लड़ाई में साथ हैं। इस लड़ाई के दौरान जेरुसलम शहर में एक हमले में एक लड़की मारी गई थी। वह थी तेरह साल की इज़राइली लड़की स्मादर। उसकी माँ डाॅ. नूरित इल्हानन का बयान दिल को छू लेनेवाला है। दिन था 8 मार्च, 2005 अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस। इस मौके पर उन्होंने युद्ध और महिला हिंसा के खिलाफ भाषण दिया। इसे उन्होंने गाजा पट्टी में मिरियम और उनके पति कमाल के नाम किया। जिनके पाँच बच्चे बगीचे में से फल तोड़ते हुए इज़राइली सैनिकों द्वारा मारे गए थे। डाॅ. नूरित कहती हैं –

जाति, नस्ल और रंग के भेद की बड़ी-बड़ी बातें संसार करता है। लेकिन इस का असर सहते हैं वो मुट्ठी भर लोग जिनकी यह आपबीती है। अपमान, यौन हिंसा, अत्याचार और मौत का दुख कोई बाँट नहीं सकता। इसके घाव सिर्फ सहनेवाले ही झेलते हैं। मैंने कभी भी इतना कुछ नहीं सहा जितनी एक फिलिस्तीनी महिला हर रोज़ या हर घंटे सहती है। एक महिला की जि़ंदगी को नरक बना देनेवाली हिंसा को मैं तो जानती तक नहीं थी। सच तो यह है कि फिलिस्तीनी महिलाओं का कोई मानवाधिकार नहीं है। दिन हो या रात किसी भी समय घर में अनजान लोग घुस आते हैं। बंदूक की नोंक पर उनके बच्चों के सामने ही कपड़े उतरवाकर तलाशी लेते हैं। उनके घर ढहा दिए जाते हैं। उनके पास पैसा कमाने का साधन नहीं है। न है एक आम जिं़दगी जीने का हक। यह सब मेरी आपबीती नहीं। पर हाँ, अगर बच्चों के प्रति हिंसा को हम माँ के प्रति हिंसा कहते हैं तो मैंने भी इस हिंसा का सामना किया है।
फिलिस्तीनी हो, इराकी हो या अफगानी, ये सभी महिलाएँ मेरी बहनें हैं। हम सभी तरह-तरह की हिंसा की शिकार हैं। पश्चिमी देशों में माँओं को सिखाया जाता है कि उनकी कोख पर देश का हक है। हम सबको भी यही सीख देकर बड़ा किया गया। यही कि अच्छी माँ घर बैठकर अपने बेटों के वापस आने का इंतज़ार करे। और अपने बेटे की लाश देखकर वह गर्व महसूस करे। ऐसी शिक्षा हम सबके जीवन में ज़हर घोलती है। और हमारी परवरिश इस तरह होती है कि हम चुपचाप यह सब सहते रहें। धीरज न खोएँ। घबराहट होने पर दवा खा लें, लेकिन आँसू न गिराएँ।
नेता लोग लोकतंत्र, देशभक्ति, भगवान, जन्मभूमि के नाम पर तरह-तरह से लोगों को भड़काते हैं। ये सब ढकोसला है। इससे केवल अमीर और अमीर बनता है, ताकतवर और ताकतवर। असल में हम सभी महिलाएँ एक जैसे ही अपराधियों की पकड़ में हैं। नाइंसाफी करनेवाले ये इज़रायली अपराधी अपने आपको आज़ाद और विकसित देश के नेता मानते हैं। इसी के नाम पर वे हमसे हमारे बच्चे छीन लेते हैं। उन्होंने लोगों के दिमाग में ज़हर घोल दिया है। खासकर मुसलमानों के बारे में। लोगों के दिमाग में यह बैठा दिया जाता है कि मुसलमान औरत की कोख से दुनियाभर को खतरा है। जबकि हकीकत में धर्म मात्र से मुझे या किसी को कोई खतरा नहीं है। चाहे वह इस्लाम हो, यहूदी हो या ईसाई धर्म। हमें असल खतरा है अमरीकी नेताओं की दादागिरी से, यूरोप की उदासीनता और मिलीभगत से। और इज़राइली नस्लवाद से।
मैं इज़राइल की हिंसा की भी शिकार हूँ। माँ के रूप में मेरा अधिकार छीन लिया गया है। मुझे डर है कि जिस दिन मेरा बेटा 18 साल का होगा, उसे मुझसे अलगकर फौज में भेज दिया जाएगा। अमरीका, इंग्लैंड, इज़राइल और उनके चट्टे-बट्टों के हाथों का खिलौना बना दिया जाएगा। ये सभी खून के प्यासे हैं, ज़मीन और तेल के भी। (इस पूरे इलाके की ज़मीन में जो तेल पाया जाता है, उस पर कब्ज़े की भी लड़ाई है।)
दुनिया में जगह-जगह लड़ाई छिड़ी है। उसमें महिलाओं की आवाज़ को लंबे अरसे से दबा दिया गया है। देश-दुनिया के सम्मेलनों में माँओं की पुकार नहीं सुनी जाती। उन्हें बुलाया ही नहीं जाता। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का यह मंच मौजूद है, पर यह काफी नहीं। लेकिन मुझे संतोष है कि मैं अपनी फिलिस्तीनी बहनों के दुख और उनकी लड़ाई में साथ खड़ी हूँ।

राधारमण अग्रवाल की कविता 

मेरी बेटी पूछती है
पापा, फिलिस्तीन माने
क्या होता है?
क्या फिलिस्तीन है नाम
किसी अमरीकी चाॅकलेट का
या किसी मिठाई के टुकड़े का?
बेटी, फिलिस्तीन नाम है
हमारे दिल के टुकड़े का
जैसे तुम
फिलिस्तीन नाम है हमारे खून का
बहता है जो
दूर, परदेस में लड़ते
जुझारू फिलिस्तीनियों की रगों में
फिलिस्तीन नाम है एक सपने का
एक सच का
जिसका नाम लेते डरते हैं
कायर भी, ताकतवर भी
फिलिस्तीन तब था
जब नहीं था कुछ भी
फिलिस्तीन तब भी होगा
जब नहीं रहेगा कुछ भी
फिलिस्तीन नहीं होगा सिर्फ फिलिस्तीन में

palestine4

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