मज़दूर दिवस और समान मज़दूरी कानून

समान मज़दूरी कानून होने के बावजूद भी हमारे देश में महिलाओं को पुरुषों  से कम मज़दूरी मिलती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुरुषों को अगर 100 रुपए मिलते हैं तो महिलाओं को केवल 70 रूपए। गांवों में तो इससे भी कम मज़दूरी मिलती है।

काम की पूरी मज़दूरी मिलनी चाहिए। काम चाहे महिला करे या पुरुष। मज़दूरी दिए बिना कोर्इ भी किसी से काम नहीं करा सकता। आमतौर पर महिलाओं को पुरुषों से कम मज़दूरी दी जाती है। इसलिए सरकार ने समान मज़दूरी का कानून बनाया।

“चूका का घरवाला नहीं रहा। चूका का न अपना घर था, न ज़मीन। मज़दूरी ढूंढी पर मिल नहीं पार्इ। इस कारण गाँव ही छूट गया। भूख की सतार्इ चूका शहर आ गर्इ। उसका भार्इ लादू भी वहीं रहता था। मज़दूरी कर घर चल रहा था। लादू का टूटा-फूटा मकान था। चूका लादू संग वहीं रहती। वह ‘मज़दूरी-मंडी’ जा काम ढूंढती। कभी काम मिल जाता, कभी यूँ ही खाली हाथ वापस आ जाती।

मज़दूरी का काम कठिन था – सारा दिन र्इंट-पत्थर लादना, चूना-गारा मिलाना। ऊपर तक सिर पर रखकर चढ़ाना। हर मज़दूर यही काम करता। लादू भी मज़दूरी करता। मगर लादू दूनी मज़दूरी पाता। वह पाता साठ, चूका पाती बस तीस।

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चूका की आँख भर आती। कहती यह कानून नहीं, न्याय नहीं। वहाँ  मज़दूर यूनियन भी थी। यूनियन का मतलब है मज़दूर संगठन। मज़दूर महिलाएँ इस संगठन का हिस्सा नहीं थीं। हिम्मत कर चूका वहाँ गर्इ। दूसरी मज़दूर बहनें भी साथ आर्इं। सारी जानकारी लार्इं। चूका का साथ दिया। चूका घर-घर जाती। समान मज़दूरी की बात बताती। अब क्या था, चूका बन गर्इ मज़दूर लीडर। सब बहनें ‘मज़दूर-यूनियन ज़िन्दाबाद, ‘चूका ज़िन्दाबाद का नारा लगातीं। चूका का कहना था। महिला मज़दूरी इतनी कम? बस-तीस? आदमी की साठ। हँसती हँसती कहती – ‘वाह ! खूब रही। किस कारण? महिला मज़दूर काम कम करती? यही ना! बच्चा संभालती, दूध पिलाती – इस कारण मज़दूरी कम पाती?

मगर लादू बीड़ी फूँकता, श्यामू आधा टाइम काम टालता, घीसू मालिक की चापलूसी करता। तब क्या मज़दूरी काटी जाती? नहीं, साठ ही मिलती। चूका की सूझ-बूझ रंग लार्इ। मज़दूर यूनियन भी चूका की बात मान गर्इ। अमावस बाद हड़ताल चालू की गर्इ। मालिक बहुत घबराया, खूब मनाया। उसकी ज़रा भी न चली। महिला मज़दूरी बढ़ार्इ गर्इ – तीस की जगह पचास कर दी। अब चूका की मंजि़ल दूर नहीं थी। चूका समान मज़दूरी हासिल नहीं कर पार्इ पर मज़दूरी बढ़ा ही ली।”

– ‘सूझ-बूझ‘, बोलती है भाषा

समान मज़दूरी कानून कहता है कि

महिला और पुरुष को बराबर काम के लिए बराबर मज़दूरी मिले। अगर दोनों ने आठ घंटे काम किया है तो दोनों को कम से कम कानूनी रूप से न्यूनतम मज़दूरी तो मिलनी ही चाहिए। महिला और पुरुष में भेदभाव नहीं किया जा सकता। कानून की नज़र में महिलाएँ सभी काम कर सकती हैं। जैसे – मकान बनाने के लिए मिस्त्री चाहिए – अगर कोर्इ महिला यह काम जानती है और उसे महिला होने के नाते काम पर नहीं रखा जाता तो ये कानून की नज़र में अपराध है।

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