कविता: खेल सी ज़िन्दगी

(This poem was first featured at Feminism in India on July 1, 2016)

न जाने मैं कब इतनी बड़ी हो गयी,
खेल-कूद, दौड़-भाग को भूल,
जीवन की पतंग की लरी हो गयी।

कामकाज को, चाल-ढाल को,
सीख-सीख कर मैं बड़ी हो गयी।

अनमनी बेरुखी सी , गुमसुम मुरझाई सी,
किसी पिंजड़े की चिड़िया सी ,
मैं ऐसे ही बड़ी हो गयी।

Image 1

मैं कागज की गुड़िया सी, हाथों की कठपुतली सी,
किसी की इज़्ज़त, किसी का मान हो गयी।

अपने से दूर, अपने मन से दूर,
न जाने कब परायी हो गयी।

चहकना भूल गयी, उड़ना भूल गयी ,
पिंजड़े में बैठी, मैना के जैसी,
आसमान से क्यों लड़ाई हो गयी ?

Image 2

आज, खेल का नाम सुनकर,
बचपन के समंदर में, गोता लगाया,
मन को बहकाया, दौड़ाया-भगाया,
फिर से आज खेल में सबको हराया,
कितनों को गिराया, कितनों को हँसाया।

चीखी-चिल्लाई, ठहाके लगायी।
ये कौन थी आज बिलकुल समझ न पायी।

– प्रार्थना


Prarthana Thakur has recently reclaimed her love for creating heartfelt poems in Hindi, alongside her passion for working at PACE (Parvaaz Adolescent Centre for Education), an educational programme with a gender and feminist perspective for adolescent girls, by Nirantar. 

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s