बेबी हालदार: अक्षरों से की ज़िन्दगी में रौशनी

समाज की दर्जाबंदी ने महिलाओं और पिछड़ी जाति के लोगों के साथ भेदभाव को बरक़रार रखा है और उनकी आवाज को दबाया है। महिला आन्दोलन में बाबा साहेब अम्बेडकर की भूमिका और जाति आधारित सामाजिक ढांचे पर उनके द्वारा उठाये गए सवाल आज भी मायने रखते हैं। उन्होंने जाति आधारित, सामाजिक ढांचे को महिलाओं के खिलाफ माना और महिलाओं को जन आन्दोलनों में शामिल होने के लिए उत्साहित किया। महिलाओं के ऊपर धर्म आधारित और धार्मिक ग्रंथो द्वारा उल्लेखित भेदभाव को उन्होंने बार–बार समाज के सामने उभारा।

बाबा साहब के शब्दों ने न जाने कितनो को अपने जीवन में संघर्ष के लिए प्रोत्साहित किया। ऐसे में उनकी पुण्यतिथि पर आइए जाने बेबी हालदार के जीवन संघर्ष की कहानी उनके ही शब्दों में। उन्होंने ‘आलो आंधारि’ नाम की किताब लिखी। वे कोई जानी मानी लेखिका नहीं, दिल्ली के पास गुडगाँव शहर के एक घर में काम करती हैं। झाड़ू – पोछा करने और खाना बनाने के साथ – साथ इसी घर में बेबी ने किताब लिखी। पहले तो वो अक्षरों से जूंझती रहीं। और फिर अक्षरों से लिखे शब्दों में उन्हें अपनापन नज़र आने लगा। शायद इसी लिए उनके नीचे दिए शब्दों में सच्चाई और ईमानदारी नज़र आती है।

मेरी कहानी मेरे शब्दों में : बेबी हालदार

“बचपन में मैं अपनी पढाई पूरी नहीं कर सकी। घर के हालात ऐसे थे कि छठी के बाद मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। मेरा 12वां साल लगा था कि मेरी शादी कर दी गयी। पति उम्र में मुझसे 14 साल बड़ा था। शादी के तीन – चार दिन बाद उसने मेरे साथ बलात्कार किया। वह मुझे अक्सर मारता – पीटता। कम उम्र में मेरे तीन बच्चे पैदा हुए। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब मुझे लगा अब बहुत हो गया। मैंने अपने तीन बच्चों को लिया और घर छोड़ निकली। तीन साल पहले मुझे गुड़गाँव के एक प्रोफेसर, प्रबोध जी, के घर काम मिला। उन्हें पढ़ने का शौक था इसीलिए घर में बहुत सी किताबें थी। प्रबोध जी के यहाँ अक्सर धूल पोछते समय मैं किताब के पन्नों को गौर से देखती। प्रबोध जी मेरे लिए कॉपी-पेंसिल लेकर आये और बोले, ‘अपने बारे में लिखो, गलती हो तो कोई बात नहीं। बस लिखती जाओ।’ मेरा इतना मन लगने लगा कि मैं लिखती गयी। रसोई घर में मैं सब्जी काटना छोड़, लिखने बैठ जाती। खाना बनाते समय भी कॉपी बगल में रहती। बच्चों को सुलाने के बाद भी मैं देर रात तक लिखती रहती। मेरे मन की बातें शब्दों का रूप लेने लगीं। लिखने से मेरा दिल हल्का हुआ। प्रबोध जी मेरी कॉपियाँ लगातार पढ़ते रहे। आखिर मैंने अपनी पूरी कहानी लिख डाली। प्रबोध जी ने मेरी कहानी का बांग्ला से हिंदी में अनुवाद किया। और उन्होंने उसे छपा के आलो – अन्धारि किताब का रूप दिया। मेरे पिता कहते हैं कि मैंने उनका नाम ऊंचा कर दिया। आलो आंधारि छपने के बाद से जैसे जिन्दगी में रोशनी आ गई है। अब मैं रोज लिखती हूँI लिखे बिना अब रहा भी नहीं जाता। अपनी बात को मैं शब्दों में लिख सकी इस बात की मुझे खुशी है।”

(निरंतर द्वारा प्रकाशित पिटारा 61 से लिया गया अंश)

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