शिक्षा और स्वतंत्रता की तलाश में

दिल्ली की अलग अलग पुनर्वासित कॉलोनियों में परवाज़ अडोलोसेंट सेंटर फॉर एजुकेशन (PACE) प्रोजेक्ट के तहत ड्रॉपआउट किशोरियों को साक्षर करने के लिए लर्निंग सेंटर खोले गए हैं. पढ़ाई के अलावा किशोरियों को यह भी मौक़ा दिया जाता है कि वो अपनी जानकारी, अपनी समस्याओं और ज्ञान को लिखित रूप दे सकें. इसके लिए सेंटर में सभी किशोरियां मिलकर ब्रॉडशीट तैयार करती हैं. समूह में किशोरियों को अपनी ज़िन्दगी के किसी मुद्दे या पहलू को लेकर ब्रॉडशीट बनानी होती है. उस मुद्दे पर किशोरियां आपस में चर्चा करती हैं. फिर सभी अपने अपने मनपसंद तरीकों और रंगों से अपने लेख लिखती हैं और सजाती हैं. कई किशोरियां अपने लेख से जुड़े चित्र भी बनाती हैं. ब्रॉडशीट के नाम से लेकर उसकी कलाकारी इत्यादि की ज़िम्मेदारी खुद वही निभातीं हैं.

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इन ब्रॉडशीट को बनाने का एक अहम् मक़सद यह भी है कि लड़कियों का नज़रिया और उनकी सोच खुलकर सामने आ सके, और साथ ही उनकी समझ भी पुख्ता हो सके. ब्रॉडशीट में किशोरियों को अपने विचार रखने के लिए भी मौक़ा मिलता है. कुछ ऐसे मुद्दे भी इसमें आ जाते हैं जिस पर लड़कियां सबके सामने खुल कर बात नहीं कर पातीं हैं, लेकिन उनके लेख में उनके अनुभव और नज़रिया दिख जाता है.

ब्रॉडशीट में लड़कियों के मुद्दे उनकी परेशानियाँ व चुनौतियाँ होती हैं. लड़कियों के ही सवाल और उनकी ज़िन्दगी से जुड़े हुए पहलू होते हैं. दिल्ली शहर में रहने वाली इन लड़कियों के लिए रिश्ते, दोस्ती, और प्यार क्या अहमियत रखते हैं, इन सबका उनकी निजी ज़िन्दगी पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी साफ़ तौर पर नज़र आता है. जहाँ ये किशोरियां अपने मन की बातें इन ब्रॉडशीट के ज़रिये ज़ाहिर करती हैं, वहीं इस मौके का इस्तेमाल वे जाने अनजाने अपने मानवाधिकारों और मौलिक अधिकारों के बारे में सवाल उठाने में भी करती हैं. कुछ लड़कियां अपने पढने के अधिकार पर बात करतीं हैं, तो कुछ अपने घर और इलाके में होने वाली घटनाओं से, अपनी मुश्किलों से हमें वाकिफ़ करातीं हैं.

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शिक्षा पाने का अधिकार न केवल हमारे संविधान द्वारा प्रदान किया गया मौलिक अधिकार है, बल्कि एक मूलभूत मानवाधिकार भी है . खानपुर और त्रिलोकपुरी की लड़कियों ने “शिक्षा और अधिकार” विषय पर ब्रॉडशीट तैयार की थी. इनमे सभी लड़कियों ने उन पहलुओं पर रौशनी डाली है जिनका उनकी ज़िन्दगी पर गहरा असर दिखाई देता है. इन ब्रॉडशीट में आप उनके अधिकारों के साथ साथ उनकी ज़िन्दगी के अनुभवों को भी टटोल कर देख सकते हैं.

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इन लड़कियों तक उनके मूलभूत अधिकारों या मानवधिकारों की पूरी जानकारी तक नहीं पहुंचती, फिर भी वे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कहीं न कहीं अपने अधिकारों की लड़ाई लड़तीं हैं, अपने पर लगाई बंदिशों से जूंझती हैं।

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