ड्रैग और क्रॉस ड्रेसिंग के कई रंग

यह बात लगभग दो हफ्ते पहले गाँव पठा, ललितपुर जिला, महरौनी ब्लॉक के सूचना केंद्र की है। निरंतर में काम कर रही नीलिमा वहाँ सहजनी शिक्षा केंद्र[1] टीम के साथ असाक्षर और नव-साक्षर औरतों के साथ भाषा के बारे में सत्र कर रहीं थी।

“सत्र के दौरान दो औरतों की सास वहां उनकी पूछ-ताछ करते हुए आती है, कि वे दोनों केंद्र में क्या कर रहीं हैं और हम लोग कौन हैं। किताबों से मुंह ऊपर उठा कर देखा तो उसका पहनावा कुछ अजीब लगा। ज़्यादातर वहां गावों की औरतें साड़ी पहनती हैं, वह भी घूँघट के साथ। लेकिन हमने देखा कि वह साड़ी के ऊपर शेरवानी पहन कर आई थी। इतने में वहां बैठी कुछ औरतें और बच्चे उसका पहनावा देख कर हंसने लगे और कुछ खुसर-फुसर कर रहे थे। उनकी हंसी और हमारे पूछने पर उसने गर्व से कहा कि ये बब्बा (उसका पति) की जैकेट है। जब वह आई थी तो मैं वहां पढ़ रही औरतों की फोटो अपने फ़ोन से खींच रही थी। मुझे ऐसा करते देख उसने बोला कि मैं उसकी भी फोटो खींचू। जब मैं उसकी फोटो खींचने लगी तो थोड़ी देर में ही उसने अपना पल्लू भी सर पर से उतार दिया और खूब चाव और खुलेपन से अपना फोटो खिचवाने लगी। उस समय मैं उसके खुलेपन और जोश को देख कर हैरान हो गयी थी। मैंने उन गावों में बहुत समय बिताया है, लेकिन एक औरत को ऐसा करते कभी नहीं देखा। उन इलाकों की औरतों का व्यवहार ज़्यादातर संकोची और शर्मीला होता है। सिर्फ यही नहीं, वे औरत सेहरिया समुदाय की है, जो कि आदिवासियों में सबसे गरीब समुदाय है। उसके औरत होने, या सेहरिया समुदाय से होने, या फिर एक गाँव के माहौल में रहने से उसे जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा था।

उसके चेहरे की ख़ुशी और बेफिक्री को देख कर मैं सोचने लगी कि ऐसा उसने कैसे किया। अपने घर से वह यहाँ केंद्र तक कैसे चल कर आई? गावों के आदमियों ने उसे कैसे देखा होगा? क्या उसे कुछ बातें भी सुननी पड़ी होगी? इन्ही सवालों के बीच मैंने देखा कि वह वापस लौटने लगी, जैसे कि अब कहीं और जाकर अपनी पोशाक दिखा कर इठलायेगी।”

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अब उस औरत के मन में ऐसा करते हुए क्या आया था, ये तो उसे ही पता होगा। पर उसका मन किया शेरवानी पहनने का, तो उसने बिना किसी की परवाह किये पहनी। अपनी इच्छा को पूरा किया। मगर कई बार इस तरह अलग कपड़े पहनने के पीछे सिर्फ इच्छा ही नहीं, और भी कई कारण हो सकते हैं।

जब ड्रैग, क्रॉस ड्रेसिंग, और गाँव के बारे में बात करें, जहाँ शायद इस शब्द का वजूद भी आपको कहीं ना मिले, मगर वहाँ इस कला का वजूद ज़रूर मिलेगा। गावों में होने वाली नौटंकी या मेले के नाटको में आपको ऐसे कलाकार ज़रूर मिलेंगे जो अपने से अलग जेंडर की वेश-भूषा और हाव-भाव इस्तेमाल कर रहे होंगे। यहाँ तक कि रामलीला और कृष्णलीला में भी आपको ऐसा देखने को मिल सकता है।

चलिए ड्रैग और क्रॉस ड्रेसिंग के इतिहास में भी थोड़ा झांकते हैं।

‘ड्रैग’ शब्द का इतिहास नाट्यकला में पाया जाता है, जिसमें नाटक करने वाले क्रॉस ड्रेसिंग करते हैं। ड्रैग एक संस्कृति या पहचान की तरह विकसित हुआ है, जहाँ 1940 से ड्रैग क्वीन (आदमी जो औरताना रूप में हो) और ड्रैग किंग (औरत जो मर्दाना रूप में हो) को जाना जाता है। यहाँ जानने का मतलब यह नहीं है कि इस संस्कृति या पहचान को उस समय मान्यता प्राप्त थी। 90 का दशक आते-आते इस पहचान को और खुले रूप से देखा गया। लेकिन आज भी ड्रैग को कला या प्रदर्शन में ज़्यादा देखा जा सकता है।

कुछ लोग ड्रैग शौंकिया तौर पर या प्रदर्शित करने के लिए भी करते आ रहे हैं। जहाँ कुछ के लिए यह जीवनशैली या सामाजिक नियम हो सकता है, वहीं कई लोगों के लिए ड्रैग का मतलब एक सपना, दूसरी ज़िन्दगी, या अपनी जेंडर भूमिका से अलग होना भी हो सकता है। ऐसी इच्छाओं और सपनों को हमारे समाज में सामान्य या प्राकृतिक नहीं माना जाता, बल्कि उल्टा ऐसे लोगों को शर्मसार ही किया जाता है।

ज़रा सोचिये, एक शादीशुदा आदमी अगर घर से साड़ी पहन कर निकले क्योंकि उसको ऐसा पहनावा अच्छा लगता है, तो क्या इसका मतलब ये है कि वह औरत बन गया है? या फिर उसे अब आदमियों के साथ शारीरिक सम्बन्ध भाता है? या इसका मतलब ये है कि वह एक आदमी है और उसे साड़ी पहनना अच्छा लगता है? क्या उसका परिवार, समाज, या दफ्तर के लोग उसे इस रूप में अपनाएंगे?

चलिए, साड़ी छोडिये! अगर सड़क पर ऐसा कोई दिखे जो समाज में अदायगी के निर्धारित नियमों के अनुरूप नहीं होता है, तो क्या होता है? उसे घूरा जाता है, मज़ाक उड़ाया जाता है, और उसके साथ छेड़खानी/हिंसा भी हो सकती है। ऐसे माहौल में कोई अपनी इच्छाओं या सपनों को कहाँ जगह दे?

एक तरफ अगर ऐसा नज़रिया है, वहीं दूसरी ओर कई संस्कृतियों में या समुदायों में शादी की परम्पराओं में कुछ ऐसी प्रथाएं होतीं हैं जहां क्रॉस ड्रेसिंग के अंश देखने को मिलेंगे। लेकिन कुछ इलाकों में ड्रैग और क्रॉस ड्रेसिंग को इस्तेमाल करके लोग अपने आप को सुरक्षित भी रखते हैं, जैसे जंगल में अगर कोई औरत आदमी के कपड़े पहन कर जाए तो उसे डाकू नहीं उठाएंगे।

कहीं यह एक ज़रूरत जैसा लगता है और कहीं किसी के मन में छुपे अरमानों का हिस्सा हो सकता है। किन्हीं ही हालात में ये दोनों ही गलत नहीं तो फिर इनमें से जब इच्छाएं पूरा करने की बात आती है तो लोग इसे छिपाते क्यों है। जब ज़रूरत के चलते लोग अपने जेंडर की निर्धारित भूमिकाओं या पहनावे से जुड़े विचारों को तोड़ देते हैं या बदल लेते हैं, तो यही मन चाहने पर कोई करे तो उन्हें बुरा या अप्राकृतिक क्यों मन जाता है। ड्रैग और क्रॉस ड्रेसिंग का मूल जेंडर तरलता (fluidity) में बसता है। इस तरलता में ना सिर्फ मर्दाना या औरताना भूमिकाओं के लिए जगह है, लेकिन इसमें उनके लिए भी जगह है जो निर्धारित खांचों में समाना नहीं चाहते। लेकिन समाज में रहते हुए वो ऐसा नहीं कर पाते। ऐसा चलते ड्रैग और क्रॉस ड्रेसिंग संस्कृति में कई लोगों को अपनी इच्छाएं, दबे सपने, और कल्पना को सच करने का एक रास्ता मिलता है। दुनिया के सामने या फिर एक बंद कमरे में, लोग अपने ऐसे सपनों को पूरा करने का रास्ता खोज ही लेते हैं।

निरंतर – निरंतर जेंडर और शिक्षा पर एक सन्दर्भ समूह है जो जेंडर, यौनिकता, शिक्षा और महिला साक्षरता पर नारीवादी नज़रिये से वर्ग, जाति, यौनिकता और धर्म के बीच कड़ियों और जुड़ावों को ध्यान में रखते हुए काम करता है।

[1] सहजनी शिक्षा केंद्र संस्था उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के पांच ब्लॉक में महिला और किशोरी शिक्षा, साक्षरता और सशक्तिकरण का कार्यक्रम चलाता है. 2003 में निरंतर ने सहजनी शिक्षा केंद्र कार्यक्रम की शुरुआत की थी और अब निरंतर की भूमिका यहाँ सन्दर्भ संस्था के रूप में है। निरंतर में काम कर रही नीलिमा यहाँ हर महीने कुछ दिन बिता कर सहजनी टीम के साथ काम को देखतीं हैं और मदद करती है। सहजनी कई गावों में सूचना केंद्र भी चलाता है जहाँ गावों के लोग वहां पढने, सीखने, और जानकारी लेने आते हैं।

– ऐनी और नीलिमा द्वारा

(लेख मूल रूप से इन प्लेनस्पीक में प्रकाशित हुआ था)

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