जानिये सावित्रीबाई फुले के जीवन से जुड़ी 7 बातें

सावित्रीबाई फुले का नाम कितनी ही बार शिक्षा या फिर नारीवादी मुद्दों के बारे में बात करते हुए आता है। उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर लड़कियों की शिक्षा तक पहुँच बनाई, जाति प्रथा और जेंडर के आधार पर भेदभाव का विरोध किया, और अपने समय में प्रचलित कई पुराने कायदों को चुनौती दी। उनकी सोच सिर्फ उनके काम में नहीं, बल्कि उनकी पूरी ज़िन्दगी में झलकती है। आइये सुलझाते हैं उनके जीवन के बारे में कुछ पहेलियाँ और जानते हैं उन्हें और बेहतर तरीके से।

1

सही। सावित्री बाई का जन्म महाराष्ट्र के सातारा ज़िले के नायगांव नामक छोटे से देहात में हुआ था।इनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था।


2

गलत। शादी के समय ज्योतिबा की उम्र 13 साल थी और सावित्री 9 साल की थीं। उनका विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था।


3

गलत। सवित्रीबाई 1852 में खोले गए दलित लड़कियों के पहले स्कूल की टीचर थीं। इससे पहले भी ज्योतिबा ने 1848 में लड़कियों के लिए स्कूल खोल था, जिसमे सावित्रीबाई पढ़ाती थीं। उन्होंने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जिया जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछात मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना।


4

गलत। सावित्रीबाई जब काम पर जाती थीं तो लोग उन पर पत्थर और गोबर फेंकते थे, उन्हें गंदी गालियाँ देते थे क्योंकि आज से 160 साल पहले, बालिकाओं के लिये स्कूल खोलना पाप का काम माना जाता था।


5

सही। दलितों के प्रति नीति के बारे में सावित्रीबाई अपने भाषणों में कहती हैं “अरे, आप लोग आमचनी-कटोरा की धुन में पंचांग काहे को पड़ते हो? महार-मांगों को अछूत क्यों समझते हो? शूद्रातिशूद्रों को अशिक्षित क्यों रखते हो?” … “जब तक हम इस बात से अवगत नहीं हो जाते कि सब इंसान एक ईश्वर की संतान हैं, तब तक ईश्वर का सही रूप समझ पाना मुश्किल है।”


6

सही। ज्योतिबा को मुठा नदी के किनारे एक गर्भवती विधवा ब्राह्मणी मिली। वे उससे बोले, “बेटी तुम आत्महत्या मत करो। मैं तुम्हारा धर्मपिता हूँ। मेरी कोई संतान नहीं है। मैं तुम्हे अपनी धर्मकन्या समझ कर तुम्हारी और तुम्हारी कोख से जन्म लेने वाले शिशु की परवरिश करूँगा। मेरी पत्नी भी तुम्हे देख कर प्रसन्न होगी।”


7

सही। प्लेग महामारी में सावित्रीबाई प्लेग के मरीज़ों की सेवा करती थीं। एक प्लेग से प्रभावित बच्चे की सेवा करने के कारण उनको भी ये बीमारी लग गई। और इसी कारण से 10 मार्च, 1897 को उनकी मृत्यु हुई।

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