राम कुंवर का स्कूल: जनीशाला के पन्नों से

पढ़िए राम कुंवर के बारे में, जो निरंतर के पूर्व फील्ड प्रोग्राम सहजनी शिक्षा केंद्र के ज़रिए चलने वाले जनीशाला का हिस्सा थी। जनीशाला उत्तर प्रदेश के ललितपुर ज़िले के महरौनी ब्लॉक में एक आवासीय स्कूल था, जिसे 2008 में शुरू किया गया था। जनीशाला में स्थानीय संदर्भ को जोड़ते हुए पढ़ाया जाता था। यहाँ पढ़ने वाली लड़कियों की उम्र 14 से 25 साल के बीच थी। इनमें से कुछ लड़कियाँ कभी स्कूल नहीं गई थीं और कुछ की कम उम्र में शादी के कारण पढ़ाई बीच में ही छूट गई। आइये पढ़ते हैं राम कुंवर के बारे में जिसने पढ़ाई करने के लिए अपनी पहचान से ही नहीं बल्कि अपने आस पास की कईं मुश्किलों को झेला और चुनौती दी।

गरीब दलित परिवार की राम कुंवर अपनी बहन और पिता के साथ सुकुल गुवां गाँव में रहती थी। जब वह सिर्फ 2 साल की थी तो उसकी माँ चल बसी। हालाँकि उसकी शादी 10 साल की उम्र में करवा दी गई, मगर तब भी वह अपने मायके में रह रही थी क्योंकि उसके पति की दिमागी हालत ठीक नहीं थी। अपने पिता के घर पर वह सारा काम देखती थी और अपने बीमार पिता की देखभाल भी करती थी। इतनी जिम्मेदारियों के चलते उसके लिए स्कूल के लिए समय निकालना मुमकिन नहीं था, इसलिए वह सहजनी शिक्षा केंद्र के सेंटर आने लगी, जहाँ पढ़ाई के घंटे कम थे। यहाँ उसने जनीशाला के बारे में सुना और उसमें आने का फैसला किया। उसके पिता ने फीस भरने से इन्कार करा तो राम कुंवर ने मज़दूरी की और इतना पैसा जोड़ा कि जनीशाला की 25 रु. महीना फीसimage दे सके।

हालाँकि राम कुंवर सिर्फ 15 साल की थी जब वह जनीशाला आई थी। मगर बातें और व्यवहार वह प्रौढ़ महिलाओं जैसा करती थी। शुरुआती दिनों में उसे अपने गाँव की बहुत याद सताती थी और अक्सर उसे शाम को रोता हुआ देखा जा सकता था। लेकिन जैसे-जैसे पढ़ाई में उसने ध्यान लगाया गाँव की याद आने का सिलसिला कम होता गया। वीडियोग्राफी कोर्स के दौरान उसे अलग-अलग शॉट के बारे में सीखना बहुत पसंद आता था। ‘जल, जंगल, ज़मीन’ सत्र के दौरान उसने जाना कि भूकंप धरती के नीचे साँपों के चलने से नहीं आते और उसका असली कारण धरती के नीचे हिलने वालीं परतें हैं। यह जानकारी वह जल्द से जल्द अपने गाँववालों के साथ भी बंटाना चाहती थी।

जनीशाला में आने से पहले राम कुंवर को पता था कि दलित होनेका क्या मतलब होता है। मगर यहाँ आकर उसने जाति और उसकी संरचना को एक ढांचागत व्यवस्था के रूप में समझा और उसका अपनी स्थिति से जुड़ाव बनाया। यौनिकता के सत्र में उसने जाना कि ‘सही’, ‘गलत’ के नियम लड़कियों को काबू में रखने के लिए बनाए जातें हैं। वह यह इसलिए भी समझ पाई क्योंकि उसे याद आया कि कैसे उसके पिता सहेलियों के साथ घूमने वाली लड़कियों को बुरी लड़कियाँ कहा करते थे। उसने बताया, “लड़कियों की जल्दी शादी कर दी जाती है ताकि वे बिगड़ न जाएँ।

आठ महीने के आवासीय स्कूल के बाद अपने गाँव जाने पर उसे कई सवालों का सामना करना पड़ा था। गाँव वाले जानना चाहते थे कि वह कहाँ थी? क्या वह नौकरी करने गई थी? राम कुंवर को काफी गुस्सा आया कि उसे  गाँव वालों को जवाब देना पड़ रहा है।


आज भी उसकी जिंदगी जिम्मेदारियों से भरी है जहाँ उसे मज़दूरी के साथ साथ अपने घर की देखभाल भी करनी पड़ रही होगी। लेकिन उसके मन में पढ़ाई के लिए जो उत्साह था उसे देखकर लगता था कि औरतों के सपने और इच्छाएं सिर्फ़ घर परिवार से जुड़ीं नहीं होतीं। दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद भी वो रात को थोड़ा समय निकाल ही लेती थी पढ़ने के लिए, क्योंकि पढ़ना उसका जूनून था जो किसी मकसद से बंधा नहीं था।

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