दलित जीवन का दर्पण: आपका पिटारा, अंक 55

‘आपका पिटारा’ पत्रिका 1994 से 2010 तक निरंतर ने सरल हिंदी में प्रकाशित की थी। इस पत्रिका को हिंदी भाषी राज्यों में प्रौढ़ पाठकों और किशोर-किशोरियों के लिए नियमित रूप से प्रकाशित किया जाता था। हर अंक में पाठकों के लिए ताज़ा खबरें, कहानियाँ, कविताएँ, लेख, चुटकुले और तस्वीरें हुआ करतीं थीं।

pitara55

‘आपका पिटारा’ का अंक 55 (दलित महिला-जीवन के संघर्ष) एक विशेषांक था जिसमें दलित औरतों के जीवन की कहानियाँ तथा उनके सामाजिक और निजी अनुभवों के बारे में लिखा गया था।

इन कहानियों में दर्शाई गयी औरतें अपनी ज़िंदगी में गरीबी, अन्याय, और अत्याचार के बावजूद मजबूर और लाचार नहीं दिखाई नहीं देतीं। उनका अपना अस्तित्व, अपनी एक पहचान और उनका आत्मविश्वास शब्दों में साफ़ झलकता है।

इस अंक के ज़्यादातर लेखक भी दलित थे, और सभी लेख और कहानियों में दलितों के हालात और उनके अनुभव बहुत गहराई से पिरोए गए थे।  इसमें दलित महिला लेखकों की दो रचनाएं भी शामिल की गई थीं जिन्हें पढ़ाई के ज़्यादा मौके नहीं मिल सके, पर इसके बावजूद इन्होंने अपने लेखन के द्वारा समाज को और खासकर दलित समाज के हालातों को गहराई से परखा।

इस अंक में गाँव का कुआँ और यह अंत नहीं की नायिकाएं अपने व्यवहार और अपनी ताकत से औरों को चुनौती देती दिखाई देंगीं क्योंकि दोनों के लिए उनका आत्मसम्मान बहुत मायने रखता है। ये कहानियाँ क्रमशः आचार्य कोलकलूरी और ओमप्रकाश बाल्मीकि की लिखी कहानियों पर आधारित हैं।

जाति के अलावा गरीबी की भी दोहरी मार झेलतीहैं दलित औरतें। डॉक्टर कुसुम वियोगी की कहानी पर आधारित आटे सने हाथ की नन्हीं सूरजमुखी अपनी ज़िंदगी में गरीबी के बावजूद शिक्षा के मौके तलाश करती नज़र आती है। जहाँ सूरजमुखी को अपने संघर्ष में दूसरों से मदद मिलती है, वहीं कृत्यांश की कहानी पर आधारित फुलेसेरा की बहु की नायिका पूरे गाँव-समाज से अलग कर दी जाती है। खूबसूरत आँखों वाली फुलेसेरा की बहु को समाज डायन करार देता है।

पी. साईनाथ के लेख पर आधारित काम की सज़ा में राजस्थान की मैला ढ़ोने वाली दलित औरतें समाज के रवैये पर सवाल उठाती दिखेंगी। इस लेख में जो समाज इन्हें मैला उठाने का काम देता है, वही इन्हें अछूत बना कर समाज का हिस्सा नहीं बनने देता। साथ ही डग्गूपाटि पद्माकर की कहानी पर आधारित मेरे अधिकार की नायिका चंद्रावती दलित समाज में औरतों की स्थिति पर आवाज़ उठाती है और अपने जीवन के फैसलों को खुद लेने का फैसला करती है।

दलित आंदोलन ने जाति के भेदभाव को मिटाने की कई कोशिशें की हैं मगर ज़्यादातर औरतों के साथ होने वाले भेदभाव को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। रजनी तिलक इस आंदोलन का हिस्सा रही हैं और उन्होंने कभी इस मुद्दे को अनदेखा नहीं किया। वे दलित आंदोलन की एक सशक्त कार्यकर्ता हैं और समय-समय पर अपने साथ होने वाले अन्याय से संघर्ष करती आईं हैं। अपनी इस जद्दोजेहद को उन्होंने जीवन के संघर्ष लेख में हमारे साथ बांटा है।

संक्षेप में कहें तो दलित महिला के जीवन के संघर्षों का दर्पण है ‘आपका पिटारा’ का ये विशेषांक। अन्य अंकों की तरह ही इसे भी आसान भाषा में लिखा गया है और सुन्दर चित्रों से सजाया गया है। इस कारण वे लोग भी इसे पढ़ सकते हैं जिन्होंने अभी पढ़ना-लिखना सीखा है, या जिनकी हिंदी भाषा पर अच्छी पकड़ नहीं है।

(यदि आप अपने लिए या अपने किसी जानकार के लिए ये विशेषांक मंगाना चाहें तो हमसे nirantar.mail@gmail.com पर संपर्क करें।)

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s