‘कलामे निस्वां’: मुस्लिम औरतों की सुलगती आवाजें

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आपके सामने पेश है निरंतर प्रकाशन कलामे निस्वां से एक लेख. इस प्रकाशन में हैं उर्दू में लिखी मुसलमान औरतों की आवाजें, जिनका वैसे के वैसे हिन्दी में लिप्यन्तरण कर दिया गया है. ये आवाजें करीब सौ साल पुरानी हैं. ये मुसलमान औरतें अपनी दुनियाँ देख रही हैं, मज़े ले रही हैं उसकी नुकताचीनी भी कर रही हैं. इनमे हिचकिचाहट भी है तो कहीं वे बेख़ौफ़ भी नज़र आती हैं. ये खुदमुख्तार औरतें है जो कई बार अपने नाम से नहीं लिख पाती हैं. मगर फिर भी वे लिखती हैं, बोलती हैं.

ये लेख मिसेज़ बरलास ने लिखा है जो जापान में रहती हैं. इसमें वे जापान की प्राथमिक शिक्षा पर टिप्पणी करती नज़र आती हैं :  


प्राइमरी तालीम

मिसेज़ बरलास, टोकियो

जापान के प्राइमरी मदारिस (स्कूल) कारामद लड़के लड़कियाँ निकालते हैं और उनको वे बातें सिखा देते हैं जो रोज़मर्रा की ज़रूरियाते ज़िंदगी में शामिल हैं। मसलन झाडू़ देने के तरीके़ को लीजिए। मेरे यहाँ कई मामाएँ (सेविकाएँ) नौकर रह चुकी हैं। आज तक मैंने किसी को ऐसा नहीं देखा जो झाड़ू देने से पहले अपने सिर और मुँह पर कपड़ा न बाँध ले। ये सब आमतौर से प्राइमरी तालीम पाए हुए होती हैं। मुँह पर कपड़ा बाँधने की वजह ये बताती हैं कि ख़ाक में जरासीम होते हैं। ये साँस के साथ अंदर जाते हैं और नुक़सान पहुँचाते हैं। इसी तरह रोज़ाना पहनने के कपड़ों को लीजिए। मामाएँ दिन के पहने हुए कपड़े रात को पहनकर कभी नहीं सोतीं। ये जाए गौर (ध्यान दें) है कि ये सर्द मुल्क है। यहाँ कपड़े ऐसे जल्दी मैले नहीं होते जैसे गर्म मुल्कों में, मगर फिर भी दिन-रात के कपड़े जुदा हैं। उनके कीमोनो हमारे कुर्ते पाजामे के पहनने से मुश्किल हैं। मगर ये तकलीफ़ गवारा करती हैं और सफ़ाई को हाथ से नहीं छोड़तीं। हमारे यहाँ उनकी हैसियत की बहनों का तो कुछ कहना ही नहीं। तालीमयाफ़्ता बहनें भी एक जोड़ा पहनती हैं तो एक हफ्ते की ख़बर लाती हैं। जाड़े में दोपहर को अंगनाई में बैठ-बैठकर जुएँ देखने के सीन याद आते हैं और अपनी बहनों की गलीज़ जिंदगी से नफ़रत होती है। मुझे जापानी जूँ देखने का शौक़ है, मगर आज तक नज़र से नहीं गुज़री।

जापान में घरों की सफ़ाई म्युनिसिपैलिटी की तरफ़ से साल में दो एक मर्तबा लाजिमी है। और इस पर पुलिस की निगरानी होती है। पुलिसवाले देखते हैं और एक सर्टिफ़िकेट दे जाते हैं। सारे जापानी ये सफ़ाई अपना फ़र्ज़ समझकर खु़श-खु़श करते हैं। न तो कोई म्युनिसिपैलिटी के मेम्बरों को गालियाँ देता है, न कोई इस क़ानून की मुख़ालफ़त करता है। समझदार क़ौमें जानती हैं कि ये क़ानून हमारे फ़ायदे के लिए बनाए गए हैं और हमें भी कुछ तकलीफ़ बर्दाशत करनी चाहिए। यहाँ हिंदुस्तानियों की ज़हनियत मुलाहेज़ा हो। मेरी दोस्त एक हिन्दुस्तानी बहन हैं जो अर्साए दराज़ (लम्बे समय से) से यहाँ मुक़ीम (स्थापित, रह रही) हैं। रौशनख़याल और तालीमयाफ्ता हैं। उनसे इस सफ़ाई का जिक्र किया तो मालूम हुआ कि वे इसे टाल जाती हैं। और पुलिस के सिपाही से कह देती हैं कि हमने सफ़ाई कर ली है। हिन्दुस्तानी ज़हनियत ख्व़ाह (चाहे) वो अर्श (आसमान की बुलंदी) पर भी पहुँच जाए अपना रंग दिखाए बगैर नहीं रहती। हिन्दुस्तान में पुरानी वज़ा  के घरों में हवा का माक़ूल  इंतेज़ाम नहीं होता। म्युनिसिपैलिटी ने अब ऐसे क़ानून बनाए हैं कि नक्शे की मंज़ूरी के बगैर कोई मकान तामीर (निर्माण) ना किया जाए। मगर हम हिन्दुस्तानी इसके ख़िलाफ़ करने की कोशिश करते हैं। तहसीलदारों, पेशकारों, जमादारों को रिश्वत देते हैं और अपनी मर्जी के मवाफ़िक़ संदूक़नुमा घर बना लेते हैं। इन सबकी जड़ जहालत है।

हर मुल्क में अमीर, गरीब सभी क़िस्म के लोग होते हैं। जापान में भी गरीब बहुत हैं, मगर तालीम से बेतवज्जही (लापरवाही) नहीं बरतते। गरीबों की लड़कियाँ अपने छोटे बहन भाइयों की तालीम का बोझ उठाती हैं। माँएँ भी अपनी औलाद को तालीम दिलाने की गरज़ से मेहनत मज़दूरी करती हैं। और इस तरह से रोज़ी पैदा करनेवालों को कोई ज़लील नहीं समझता। हमारे यहाँ घर के घर फ़ाक़ामस्त (गरीबी में खुश) हैं और बेकार पड़े चारपाइयाँ तोड़ते हैं। बाप-दादा की लाज इन्हें कुछ करने नहीं देती। दूसरों के आगे हाथ फैलाएँगे, धोखे से ठगेंगे, मेहनत मज़दूरी नहीं करेंगे।

लड़कियों का तो ज़िक्र ही क्या। वे तो घरों में कै़दियों की जिंदगी गुज़ार रही हैं। न बेचारियों को कोई हुनर ही सिखाए गए हैं, न इस क़ाबिल बनाया गया है कि वे मेहनत मज़दूरी करके अपने वालदैन की ज़ईफ़ी (बुढ़ापे) में कोई ख़िदमत कर सकें।

लड़के भी मारे-मारे फिरते हैं। क़लम चलाने के अलावा उन्होंने कोई काम ही नहीं सीखा। भला ऐसे मुल्क की हालत कैसे सुधर सकती है जहाँ के बाशिंदे खु़द मेहनत व मज़दूरी करना तो आर (शर्मिन्दगी) समझें, मगर दूसरों की मेहनत पर अपना पेट पालना इज़्ज़्त समझें। अब तो ये वक्त है कि हर शख़्स कुदाल-फावड़ा हाथ में ले, घास काटे, टोकरी ढोए, मगर चार पैसे पैदा करे।

आज कल अख़बारात से हर मुल्क की बातें सबको मालूम हो जाती हैं। जापानी लोग भी हमारे हिन्दुस्तान की बाबत (बारे में) जानते बूझते हैं। लेकिन छोटी-छोटी ख़ानगी (घरेलू) बातें मालूम नहीं हो सकतीं। मेरी जापानी दोस्तें ऐसी बातों की बहुत ज़्यादा पूछगछ करती हैं। और ख़ुदा माफ़ करे मुझे झूठ बोलना पड़ता है। इस सवा दो बरस में जिस क़दर झूठ बोली हूँ अपनी ज़िंदगी में अब तक नहीं बोली होंगी।

मेरी बहनो! प्राइमरी तालीम का मसला तुम्हारे अपने किए से हल होगा। गैर क़ौमों की औरतों के कारहाए नुमायाँ (बड़े और गौरवपूर्ण काम) से अख़बारात भरे नज़र आते हैं। और वे जिस काम को उठाती हैं पूरा करके छोड़ती हैं। तुम भी होश में आ जाओ और जबरी (ज़बरदस्ती) प्राइमरी तालीम की चीख़-पुकार शुरू कर दो। क्या अच्छा हो कि हिन्दुस्तान की जबरी तालीम का सेहरा मेरी हिन्दुस्तानी बहनों के सिर हो। आमीन!

(तहज़ीबे निस्वाँ, 1935)

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