एक्टिविज़्म पर कुछ विचार

ऑल इंडिया विमेन्ज़ असोसिएशन  की कॉनफरेन्स (आई.ए.डब्ल्यू.एस.) एक ऐसी मंच है जहाँ देश भर से छात्र और अकादमिक अपने  रिसर्च पेपर प्रस्तुत करने आते हैं और देश भर में  जाने पहचाने शिक्षाविद, छात्र, अकादमिक और विकास क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के कार्यकर्ताओं के साथ इनपर चर्चा करते हैं। इस कॉनफरेन्स में नारीवादी मुद्दों पर चर्चा होती है। इस साल आयोजित की गई कॉनफरेन्स के कुछ विषय थे – जेंडर और काम, विकलांगता, जेंडर और यौनिकता के सम्बन्ध, जेंडर और यौनिकता के सन्दर्भ  में नारीवादी सवाल इत्यादि।आई.ए.डब्ल्यू.एस. साल 1982 में एक सदस्यता आधारित  संस्था के रूप में शुरू हुआ था, और साल  2017 में उन्हें काम करते हुए 35 साल पूरे हो गए हैं।

जब चेन्नई में कॉनफरेन्स शुरू हुई, जल्‍लीकट्टू को लेकर विरोध प्रदर्शन उफान पर था। इसके बावजूद कांफ्रेंस अपने समय पर शुरू हुई। इस कॉनफरेन्स के आयोजन में शामिल संस्थाओं के लोगों ने आई.ए.डब्ल्यू.एस. के इतिहास और आज के संदर्भ में इसके महत्व पर ज़ोर देते हुए कार्यक्रम का आरम्भ किया। लोगों ने नए-उभरते और पुराने, कई तरह के मुद्दों पर अपने विचार और तथ्य भी पेश किये।

मज़दूर किसान शक्ति संगठन की संस्थापक और एक्टिविस्ट अरुणा रॉय ने इन मुद्दों पर बोलते हुए कहा कि जब तक हम सब अपने मुद्दों को लेकर सड़क पर जाकर विरोध नहीं करेंगे, तक तक सरकार को ये समझ नहीं आयेगा कि हम सब एकजुट हैं।

अरुणा रॉय ने नारीवादी एक्टिविज़्म को लेकर कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाये जो हमें सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि  हमारा एक्टिविज़्म और क्या नए रूप ले सकता है। उन्होंने कहा कि  नारीवादी सोच से काम करने वाले  लोगों के शोध और ज़मीनी स्तरीय कार्यक्रम  का एक्टिविज्म के साथ  गहरा रिश्ता होना चाहिए।

जब तक हमारा एक्टिविज़्म और शोध दोनों साथ साथ नहीं चलेंगे और एक दूसरे  से नहीं सीखेंगे, तब तक वह दोनों ही अधूरे रह जायेंगे।

साथ ही साथ अरुणा का एक बहुत अहम् अवलोकन यह था कि आज के समय में कोई ऐसा नया एक्टिविज़्म का तरीका नहीं है जिससे आम लोगों  तक पहुंचा जा सके। उनका कहना था कि अपने एक्टिविज़्म को नया, लोकप्रिय और रचनात्मक रूप देना महत्त्वपूर्ण है ताकि मुद्दों पर जीवंत रूप से आवाज़ उठा पाएँ। और अपनी लड़ाइयों को  नाचकर, गाकर और कई रचनात्मक तरीकों से लड़ पाएँ।

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह न केवल एक्टिविज़्म के ज़रिये हैं पर सांस्कृतिक प्रभुत्व को चुनौती देने के ज़रिये भी हैं, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा स्थानीय गीत, और नाटक और नाच गाने के तरीके मुख्यधारा का हिस्सा बन पाएँ।

हमारी राय में एक ऐसे संदर्भ में, जहाँ इस वक़्त अनेक मुद्दों पर आवाज़ उठाने की एक ठोस रूप से ज़रुरत है, वहाँ नए ज़रियों को खोजना और उनको अपने एक्टिविज़्म का भाग बनाना बहुत ज़रूरी हो जाता है। शायद इन ज़रियों में एक ऐसी ताकत भी हो जो हमारी लड़ाइयों को एक नई ऊर्जा दे। अरुणा का यह कहना था कि नारीवादी आंदोलन के लिए यह कुछ नए अवसर हो सकते हैं अपनी एकजुटता दर्शाने के और अपनी आवाज़ को उन तक पहुँचाने के जिनके पास सत्ता है।

आई.ए.डब्ल्यू.एस. की कॉनफेरेन्स के दौरान यह विचार सुनकर हमें भी लगा कि एक ऐसे संदर्भ में जहाँ डिजिटल मंच पर एक्टिविज़्म एक बहुत बड़े रूप में उभर कर आ रहा है, रचनात्मक तरीकों का इस्तेमाल ज़रूरी है ।

शायद भारतीय महिला आन्दोलन में एक्टिविज्म को लेकर कही गई ये बातें बहुत नई ना हों। मगर इसे अधिक सफल बनाने के लिए ये महत्त्वपूर्ण अवश्य हैं।

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