अदालत

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दिल्ली हाई कोर्ट की पहली महिला जज और भारतीय हाई कोर्ट के इतिहास में पहली महिला चीफ जस्टिस (हिमाचल प्रदेश) लीला सेठ (20 अक्टूबर 1930 – 5 मई 2017) ने ज़िंदगी को भरपूर जिया है। ‘घर और अदालत’ नाम की अपनी आत्मकथा में उन्होंने अपनी ज़िंदगी के खुशनुमा पलों के साथ-साथ मुश्किलों का भी ज़िक्र किया है। पेश है कहीं अंतरंग, कहीं पेचीदा और कहीं हँसा देने वाली इस किताब से एक अंश।


मैं कलकत्ता से पटना 1958 में पहुँची। लेकिन एक वकील के तौर पर प्रैक्टिस सही मायने में 1959 में शुरू की। उस समय मैं पटना हाई कोर्ट की मात्र दो महिला वकीलों में से एक थी। दूसरी थीं धर्मशिला लाल, जो पुरानी और बहुत सफल वकील थीं। पटना में हर कोई उनके नाम से परिचित था और अदालतें भी उनके पूरे साहस और ज़ोरदारी से अपनी बात रखने के तरीके से अच्छी तरह वाकिफ थीं।
मेरा पटना हाई कोर्ट पहुँचना अचानक ही हुआ और धर्मशिला किसी भी तरह मित्रवत या मददगार नहीं थीं। दुर्भाग्यवश वहाँ पर महिलाओं के लिए टाॅयलेट की उचित व्यवस्था नहीं थी। इसके लिए एक पुराने से स्टोररूम का इस्तेमाल किया जाता था। वह कमरा चमगादड़ों से भरा था। मैं तो अंदर जाने के नाम से ही आतंकित हो जाती थी। जब भी दरवाज़ा खुलता तो चमगादड़ विरोध की जैसी मुद्रा अपनाते हुए उड़ना शुरू कर देती थीं। मुझे समझ नहीं आता कि आखिर धर्मशिला इससे कैसे निपटती थीं।
एक दिन इस बारे में मैंने धर्मशिला से बात की। उन्होंने काफी आश्चर्य से कहा,
“अगर तुम्हें चमगादड़ों से डर लगता है तो बिहार में रहकर अच्छी प्रैक्टिस करने का इरादा कैसे रखती हो?“
इससे मैं हक्का-बक्का रह गई। धीरे-धीरे मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और मैंने इस सारे मामले से ‘बार एसोसिएशन’ (वकीलों का संगठन जो उनके हितों की रक्षा करता है) के अध्यक्ष और सचिव को अवगत कराया और इस तरह मुझे उस कमरे की चमगादड़ों से निजात मिली।

25 जुलाई 1978 को चीफ जस्टिस टाटाचारी ने मुझे दिल्ली हाई कोर्ट के जज के रूप में शपथ ग्रहण कराई।
अदालत में वकील मुझे ‘माई लाॅर्ड’ कहकर ही संबोधित करते, जिस तरह से वे अन्य जज बंधुओं को संबोधित करते थे। जबकि सही संबोधन ‘माई लेडी’ होता।
मुझसे पूछा ज़रूर गया था कि क्या मुझे यह मंज़ूर होगा। मैंने बता दिया कि मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वैसे भी मुझे पता था कि वे इस संबोधन का इस्तेमाल किसी खास सम्मान की भावना से नहीं बल्कि अपने विचार व्यक्त करते समय विराम लेने के तौर पर करते हैं।
कोई मेरे लिए सही संबोधन के इस्तेमाल पर ज़ोर दे, यह स्थिति तब आई जब मैंने कोर्ट में जस्टिस टी.पी.ए. चावला के साथ बैठना शुरू किया। एक बार अदालत में मैंने एक वकील से कुछ सवाल किया तो उसने ‘माई लाॅर्ड’, कहकर जवाब देना शुरू किया। इस पर जस्टिस चावला ने उसे टोका और कोर्ट को सही तरीके से संबोधित करने को कहा। वकील एकदम हक्का-बक्का रह गया। उसे समझ ही नहीं आया कि क्या करे। उसने अपना चेहरा जस्टिस चावला की ओर करके सवाल का जवाब दिया, जैसे वह सिर्फ उन्हीं से मुखातिब हो।
शायद उसे यही आसान लगा होगा कि लाॅर्ड को संबोधित करो और लेडी को भूल जाओ।
मेरे ख्याल से ऐसे मौके बहुत कम आए जब मुझे ‘माई लेडी’ कहकर संबोधित किया गया हो।
दूसरी तरफ ज़्यादातर जज मुझे जब किसी बाहरी व्यक्ति से मिलवाते तो मेरा परिचय कराते हुए कहते, “ये हैं नई लेडी जज।“ मैं उनसे कहती भी, “आप जस्टिस नरिंदर गोस्वामी का परिचय कराते समय उन्हें नए जेंटलमैन जज क्यों नहीं कहते। यह तो देखकर ही पता चल जाता है कि मैं महिला हूँ। मैं नई लेडी जज नहीं बल्कि नई जज हूँ।“
मेरे साथीगण, मेरे उनके कुनबे में शामिल होने पर गौरवान्वित थे। ऐसा नहीं था कि मुझे लेकर उनका गर्व एकदम निस्वार्थ था। यह हाई कोर्ट की तरफ से आयोजित किए जाने वाले अगले ही समारोह में स्पष्ट हो गया।
जब जजों ने काफी खुश होकर एक सुर में कहा, “अब जब हमारे बीच एक महिला जज भी हैं, हमें खाने-पीने के इंतज़ाम के बारे में चिंता करने की कोई ज़रूरत ही नहीं है। वह सारी व्यवस्था कर देंगी।“ लेकिन मैं भी अड़ गई कि मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगी और जो पहले से इसकी व्यवस्था करता रहा है, वही अब भी करेगा।
अपने घर में ये सारे काम कर लेना ही मेरे लिए बहुत था।

एक दिन मैं कोर्ट में बैठी हुई यूँ ही एक फैसला पढ़ रही थी। मैंने कुछ लोगों के चलने की आवाज़ और फुसफुसाहटें सुनीं। नज़रें उठाईं तो पाया कि कोर्ट रूम दर्जनों लोगों से भरा हुआ था और वे एकटक मुझे ही देख रहे थे। मैंने अपनी सहायक से पूछा, “क्या अचानक मुझे कोई बेहद सुर्खियों में रहने वाला मामला सौंप दिया गया है?“ तो उसका जवाब था,
“अरे नहीं! ये तो वे किसान हैं जिन्हें प्रधानमंत्री चरण सिंह ने दिल्ली दर्शन के लिए बुलाया है। ये लोग चिड़ियाघर होकर आए हैं और अब दिल्ली हाई कोर्ट में महिला जज को देखने आए हैं।“
स्रोत : युवा पिटारा श्रृंखला ‘हमारी कलम से’
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