चूड़ीवाली

इस साल अप्रैल में निरंतर द्वारा आयोजित ‘जाति प्रशिक्षण’ में मुझे भाग लेने का मौका मिला। इस प्रशिक्षण में भाग लेकर मैं अपनी जाति और धर्म की समझ को और गहरा कर सकी। जाति और धर्म की परतो को खोलने और सामूहिक विश्लेषण करने के अवसर मिले।  इसी दौरान भेदभाव, छूत – अछूत, पवित्र – अपवित्र , ऊँच – नीच के सामाजिक ढ़ाचे पर चर्चा करते – करते, मैंने अपने बचपन के अनुभवों को याद किया और खट्टी – मीठी यादो में दोबारा गोता लगाया। इस दौरान, मुझे अपने बचपन में घर आने वाली एक चूड़ी बेचने वाली औरत लगातार ध्यान आ रही थी।  वापस आकर मैंने उस चूड़ीवाली के नाम एक पत्र लिखा।  आज वो इस दुनिया में नहीं हैं।  मगर हाँ, अपने दिल की बात इसके ज़रिए ज़रूर कह दी। आज अपने दिल की ये बात मैं आपके सामने रख रही हूँ।

मेरी प्यारी चूड़ीवाली,

आज तुम्हारी बहुत याद आ रही थी। बचपन की बातों को याद करते-करते तुम्हारा हँसता चेहरा सामने आ गया। तुम्हे तो मालूम भी नहीं बचपन में हम दोनों बहनें तुम्हारे बारे में कितनी बाते करते थे। तुम्हे कभी अपनी बाते ठीक से बता भी नहीं पाये। जब कभी तुम घर के बाहर आवाज लगाती थी, ‘चूड़ी लेब, चूड़ी…नया नया चूड़ी.. सावन का चूड़ी, तीज का चूड़ी….’ तुम्हारी आवाज सुनकर, हम तुम्हे देखने के लिए दौड़ कर घर के दरवाजे पर आते थे। फिर मम्मी आती थीं और तुमसे लेकर चूड़ियाँ देखने लगती थी। तुम्हारी रंग-बिरंगी चूडियो को देखने में बहुत मजा आता था। इस बीच हम एकटक बस तुम्हें देखते ही रहते थे। हमने अपने घर में या आसपास किसी औरत को इतना लम्बा नहीं देखा था। हैरानी से हम दोनों तुम से पूछते थे,’ तुम इतना बड़ा कुर्ता क्यों पहनती हो? तुम मम्मी की तरह साडी क्यों नहीं पहनती?

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हँसते हुए तुम कहती, ‘बउआ, हमनी में एहे पहनल जाई छई’ (हमारे समुदाय में यही पहना जाता है)। तुम घर के आँगन में आकर अपनी टोकड़ी उतारतीं। हम दोनों बहने टोकड़ी के पास पहुच जातीं और टोकड़ी के ऊपर से कपड़ा हटाने के लिए बेहाल होतेI तुम हमें छोटी – छोटी चूड़िया दिखाती। कई बार हम दोनों खुद से सारी चूड़ियाँ निकाल-निकाल कर देखते, कभी पहनने की कोशिश भी करते।

तुम्हें हमपर गुस्सा नहीं आता था क्या? तुम हँसते हुए चूडियो को फिर से सजाने लगाती थीI चूड़ी लेने के बाद, मम्मी हमेशा तुमसे मोलभाव करती थी। मगर तुम हंसते हुए उन्हें उसी दाम में चूड़ी खरीदने को मना लेती थी। मम्मी हमारे लिए हर बार चूड़ी नहीं लेती थीं।  कई बार तुम हमें बिना पैसे भी चूड़ियाँ पहना जाती थीं।

तुम्हारे जाने के बाद दादी – मम्मी, हमें आँगन में खड़ा करके गंगा जल डालती थी। मै मम्मी से पूछती थी, पानी क्यों डाल रही हो, क्या हुआ? तो कहती, ‘अरे वो मुसलमान है। करना पड़ता है। पापा को मत बताना, इस सब के बारे में।’ पापा की डांट से दोनों डरते थे। हम पापा को कुछ नहीं बताते। लेकिन हमे कुछ भी समझ नहीं आता। मन में ख्याल आता, ‘ये मुसलमान कौन से लोग होते है? ऐसा क्या अंतर है हमलोगों में कि चूड़ीवाली के जाने के बाद हमें गंगाजल से पवित्र किया जाता है?’

साल बीते, धीरे धीरे तुमने हमारे घर आना बंद कर दिया। 5-6 साल बाद कॉलेज की छुट्टियों में जब घर आई तब अचानक एक दिन हम तुमसे अचानक बाज़ार में टकरा गए।  मैंने सोचा तुम हमें नहीं पहचानोगी।  लेकिन तुम बोलीं, ‘केना न चिन्ह्बई, उहे ता छी, गटली- बुटली। कतेक बड हो गेली ह।’ (कैसे नहीं पहचानेंगे, वही तो हो, गटली – बुटली। कितने बड़े हो गए हो तुम)।  ऐसा कहते – कहते तुम्हारे चेहरे की ख़ुशी देखने लायक थी। इतने सालों में तुम बिल्कुल भी नहीं बदली थीं। ऐसा लगता था हम लोग बढ़ रहे हैं और तुम बिलकुल वैसी की वैसी। उम्र जैसे कही रुक गई हो।

इसके बाद नौकरी के चक्कर में तुमसे कई साल नहीं मिल पाई। एक बार  छुट्टी में जब गाँव आई तो परिवारवालों से मिलने के बाद सबसे पहले तुम्हारा ही ध्यान आया। अपनी बहन के साथ मैं निकल गई तुम्हारी खोज में।  घर का पता मालूम नहीं था।  लोगों से पूछते पूछते गाँव के बाहर की तरफ, जहा मुस्लिम टोला है, वहां पहुँच गए।  तुम्हारे घर पहुंचे तो तुम हैरान रह गईं। तुम्हारा वो हँसता हुआ चेहरा हमें आज भी याद है। उस दिन तुमसे ढेर सारी बातें कीं हमने। पता नहीं हम लोगों के बीच उम्र के बंधन से दूर कैसी दोस्ती थी, क्या रिश्ता था? जो हमेशा तुम्हारी तरफ खिंचे चले जाते थे।

मेरे बचपन की खट्टी – मीठी यादों में तुम आज भी शामिल हो। हाँ, वक़्त ने ज़रूर इन यादों को थोड़ा धुंधला दिया था मगर जाति प्रशिक्षण के दौरान चली चर्चाओं से  एक बार फिर तुम्हारे हँसते चेहरे, रंग बिरंगी चूड़ियों की याद ताज़ा हो गई ।

बहुत सारे प्यार के साथ,

तुम्हारी प्यारी,

गटली – बुटली

 

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