छोटी की बहादुरी

आज मैं आपके साथ एक ऐसी महिला का किस्सा साझा करना चाहती हूँ जिनसे मेरी मुलाकात वनागंना संस्था द्वारा, उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के मानिकपुर ब्लाॅक के एक छोटे से गाँव में चलाए जा रहे, साक्षरता केंद्र में हुई। साक्षरता केन्द्र पर अन्य महिलाओं के साथ-साथ वे भी पढ़ने के लिए आई थीं। वे उस केन्द्र पर पढ़ाने वाली टीचर की सास थीं। उनका नाम था – छोटी। उन्होंने मुझे 15 साल पहले घटी अपनी एक आपबीती सुुनाई।  उसे सुनने पर उनकी बहादुरी और हिम्मत की मैं क़ायल हो गई। ये कहानी कुछ इस प्रकार थी।  :
पहले इस गांव में जीवन यापन और घर में चूल्हा जलाने के लिए जंगल से लकडी लानी होती थी और यह काम महिलाएं करती थीं। जंगल से लकडी लेने महिलाएं समूहों में जाया करती थीं। छोटी भी अपने पडौस की महिलाओें के साथ जंगल जाया करती थी। यूं तो अक्सर सभी महिलाएं एक साथ ही चला करती थीं परन्तु एक बार जब छोटी अपने समूह की महिलाओं के साथ जंगल से लकडी लेकर लौट रही थी तो उसके साथ की महिलाएं आगे निकल गईं। सूरज भी ढलने को था, छोटी लम्बे डग भरते हुए उनतक पहुंचने की कोशिश कर रही थी। लेकिन वह उनके पास पहुंच पाती उससे पहले ही एक जंगली सूअर उस पर झपट पड़ा और उसे नीचे गिरा दिया। पहले तो एकाएक उसे समझ ही नहीं आया कि वह क्या करे और जब तक वह कुछ समझ पाती तब तक सूअर उस पर हावी हो चुका था, वह उसकेे हाथ-पैर और शरीर के कई हिस्सों से मांस खींचकर निकाल चुका था। अब वह सूअर के चंगुल से अपने आपको छुडाने की कोशिश कर रही थी लेकिन एक तो उसकी स्वयं की शक्ति जवाब दे रही थी और दूसरा, सूअर ने भी छोटी को लहु लुहान करने में कोई कसर नहीं छोडी थी। वह लगभग दो घंटे तक बिना हार माने सूअर से लड़ती रही। आखिर उसे लगने लगा कि अब वो नहीं बचेगी। तभी उसकी नज़र एक कुल्हाड़ी पर पड़ी। शायद कोई उसे वहां भूल से छोड़ गया था। वह किसी तरह कुल्हाड़ी तक पहुंची और जितनी भी ताकत बची थी सब समेटते हुए उसने वो कुल्हाडी सूअर के मुंह पर दे मारी। चूंकि कुल्हाडी तेजी से लगी थी सूअर ने छोटी को झटके से छोडा और जंगल की तरफ भाग गया। छोटी भी उठी कुछ दूर तक चली और फिर बेहोश होकर गिर पडी।
अब तक उसके साथ की औरतें घर पहुंच चुकी थीं, पहले तो सभी को लगा कि शायद वह थोडा पीछे रह गई होगी, आती होगी। लेकिन जब वह बहुत देर तक घर नहीं पहुंची तो उसके घरवाले उसे ढूंढने निकले और उसे जंगल में बेहोश पडा पाया। उसे तुरन्त अस्पताल ले जाया गया जहां उसे एक-दो छोटे आॅपरेशनों से गुज़रना पडा और कुछ टांके आये। उसके बाद से छोटी अपने बाएं हाथ को सीधा नहीं कर पाती क्योंकि वहां से काफी सारा मांस सूअर ने निकाल दिया था और टांके इस तरह से लगे कि अब हाथ की चमडी का खिंच पाना सम्भव नहीं।
उस गाँव से लौटते हुए कई तरह के सवाल मेरे दिमाग में घूम रहे थे। अक्सर कहा जाता है कि लड़कियां कमज़ोर और डरपोक होती हैं, बहादुर तो लड़के होते हैं। जैसे बहादुरी पर लड़कों या आदमियों का काॅपी राइट हो गया हो। यदि कोई लड़की बहादुरी का काम करे भी तो उसे मर्दानी कहा जाता है जैसे ‘खूब लडी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी।’ मगर सवाल ये है कि क्या सिर्फ लड़के ही बहादुर होते हैं? छोटी की कहानी से तो ऐसा नहीं लगता। 
 
एक बात ये भी है कि हम किसे बहादुर कहते हैं। बहादुरी को एक खास तरह से ही परिभाषित किया जाता है। बहादुरी में शारीरिक बल का एक खास तरह से प्रयोग ही शामिल होता है। औरतों का घंटो-घंटों लगातार काम करते रहना, खेतों में झुककर काम करना, बच्चों को अपनी कमर पर बांधकर काम करना या दूर दराज के जंगलों से लकडियां ढोकर अपने घर लाना, इन सब में शारीरिक बल शामिल है।  क्या इन सभी कामों को बहादुरी के रूप में परिभाषित किया जा सकता है? यदि नहीं तो क्यों? इस तरह के सवालों पर विचार करने की ज़रूरत है। 
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