दोस्ती

15 अगस्त इस्मत चुग़ताई का जन्मदिवस है। इस अवसर पर आइये पढ़े इस्मत चुग़ताई की आत्मकथा ‘कागज़ी है पैरहन’ से ये अंश।  इसे आपका पिटारा अंक 92 में आसान भाषा में प्रकाशित किया गया था।  
लेखिका इस्मत चुगताई की जिं़दगी की यह सच्ची घटना है। वे कहती हैं – यह घटना मेरे बचपन की है जिसका मुझपर बहुत असर पड़ा। अब्बा काफी खुले खयाल के थे। बहुत से हिंदू खानदानों से मेलजोल था। सब एक दूसरे का खयाल रखते थे। पर हमें एहसास होने लगा था कि हिंदू-मुसलमान एक दूसरे से कुछ न कुछ अलग ज़रूर हैं। अगर कोई हिंदू आए तो गोश्त-वोश्त का नाम न लिया जाए। साथ बैठकर खाते वक्त भी ध्यान रखा जाए कि उनकी कोई चीज़ न छू जाए। सारा खाना दूसरे नौकर लगाएँ, उनका खाना पड़ोस का महाराज लगाए। बर्तन भी वहीं से मँगा दिए जाएँ। …”क्या हिंदू आ रहे हैं?“ पाबंदियाँ लगते देखकर हम लोग बोर होकर पूछते। जवाब मिलता, ”खबरदार! चाचाजी और चाचीजी आ रहे हैं। बदतमीज़ी की तो खाल खींचकर भूसा भर दिया जाएगा।“ और हम फौरन समझ जाते। 
आगरा शहर में हमारे पड़ोस में एक लालाजी रहते थे। उनकी बेटी सूशी से मेरी दाँत-काटी रोटी थी। एक उम्र तक बच्चों पर छूत की पाबंदी ज़रूरी नहीं समझी जाती। सूशी हमारे यहाँ खाना भी खा लेती थी। यह मालूम था कि वह गोश्त नहीं खाती। मगर उसे धोखे से किसी तरह गोश्त खिलाके मुझे बड़ा मज़ा आता था। सूशी को पता भी नहीं चलता था।
दिन भर हम एक-दूसरे के घर में घुसे रहते थे। मगर बकरीद के दिन सूशी ताले में बंद कर दी जाती थी। बकरे अहाते के पीछे टट्टी खड़ी करके काटे जाते। कई दिन तक गोश्त बँटता रहता। उन दिनों हमारे घर में लालाजी से नाता टूट जाता। उनके यहाँ भी जब कोई त्योहार होता तो हम पर पहरा बिठा दिया जाता।
एक बार लालाजी के यहाँ धूमधाम से जन्माष्टमी का जश्न मनाया जा रहा था। कड़ाह चढ़ रहे थे और धड़ाधड़ पकवान तले जा रहे थे। मिठाइयों की खुशबू मुझे अपनी तरफ खींच रही थी। “भागो यहाँ से“ कहकर आते-जाते लोगों ने मुझे धुतकारा। पर फूले पेट की पूरियाँ तलते देखने का किस बच्चे को शौक नहीं होता है? उधर सामने का कमरा फूल-पत्तों से दुल्हन की तरह सजा हुआ था। अंदर से घंटियाँ बजने की आवाज़ें आ रही थीं। मेरे जी में खुदबुद हो रही थी-हाय अल्ला, अंदर कौन है! “वहाँ भगवान बिराजे हैं“, सूशी ने गरदन अकड़ाकर कहा।
मैंने मन ही मन कहा, “भगवान! उनके भगवान क्या मज़े से आते-जाते हैं। एक हमारे अल्ला मियाँ हैं, न जाने कहाँ छिपकर बैठे हैं।“ धीरे-धीरे खिसक कर मैं बरामदे में पहुँच गई। किसी की नज़र न पड़ी। मेरे मुँह पर मेरा मज़हब (धर्म) तो लिखा नहीं था। उधर से एक देवीजी आरती की थाली लिए आईं। सबके माथे पर चंदन-चावल चिपकाती हुई मेरे माथे पर भी लगाती गुज़र गईं। मैंने फौरन हथेली से टीका छुटाना चाहा। सुनते थे, जहाँ टीका लगे उतना गोश्त जहन्नुम में जाता है। खैर, इतना सा गोश्त चला गया जहन्नुम में तो कौन टोटा आ जाएगा! मेरे बदन में गोश्त की कमी न थी। यह सोचकर मैंने टीका रहने दिया। माथे पर सर्टिफिकेट लिए मैं मज़े से कमरे में घुस गई। वहाँ भगवान बिराज रहे थे।
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घी और अगरबत्ती की खुशबू से कमरा महक रहा था। बीच कमरे में था एक चाँदी का पालना। रेशम और गोटे के तकियों और गद्दों पर एक रुपहली (चाँदी का) बच्चा लेटा झूल रहा था। गले में माला, सर पर मोरपंखी का मुकुट। और सूरत इस गज़ब की भोली! जैसे ज़िद कर रहा है, मुझे गोदी में ले लो। हौले से मैंने बच्चे का नरम-नरम गाल छुआ। मेरा रोआँ-रोआँ मुस्कुरा दिया। मैंने उसे उठाकर सीने से लगा लिया।
एकदम जैसे तूफान फट पड़ा। और बच्चा मेरी गोद से उछलकर गिर पड़ा। सूशी की नानी माँ का मुँह फटा का फटा रह गया। चाचीजी ने झपटकर मेरा हाथ पकड़ा। भगाती हुई लाईं और दरवाजे़े से बाहर मुझे फेंक दिया। फौरन मेरे घर शिकायत पहुँची कि मैं चाँदी के भगवान की मूर्ति चुरा रही थी। अम्मा ने अपना सर पीट लिया और फिर मुझे भी पीटा। वह तो कहो, अपने लालाजी से काफी मेलमिलाप था। बात बढ़ी नहीं। नहीं तो इससे भी मामूली बातों पर आजकल आए दिन खूनखराबे होते रहते हैं। मुझे समझाया गया कि मूर्ति की पूजा करना गुनाह है। जबकि मैं पूजा नहीं कर रही थी, एक बच्चे को प्यार कर रही थी।
उसके बाद मेरा आगरा छूट गया और हमलोग अलीगढ़ चले आए थे। सालों बीत गए। बी.ए. करने के बाद फिर अपने आगरा जाने का मौका मिला। मालूम हुआ कि दूसरे दिन मेरी बचपन की गुइयाँ सूशी की शादी है। सारे घर का बुलावा आया है। मुझे ताज्जुब यह हुआ कि लालाजी जैसे कट्टर इन्सान से मेरे भाई का लेनदेन कैसे चल रहा है। लालाजी को पता चला तो झट से अपने छोटे बेटे सुरेश को भेजा। मैंने टालना चाहा, “शाम को आऊँगी।“ सुरेश पीछे पड़ गया, “दीदी कहती है, बस दो घड़ी को आ जाओ। फिर रस्में शुरू हो जाएँगी तो बात न हो सकेगी।“
मैं गई तो सूशी हल्दी लगाए कमरे में बैठी थी। वहीं जहाँ एक दिन भगवान कृष्ण का झूला सजाया गया था। वहीं जहाँ से मुझे निकाला गया था। जी चाहा उल्टे कदम वापस चली आऊँ, मगर मुझे देखकर वह लपकी। “कैसी है री चुन्नी,“ उसने मेरा प्यार का नाम लेकर पुकारा। बचपन के साथ यह नाम भी कहीं दूर छूट गया था। अजीब सा लगा। उसने हाथ पकड़कर मुझे अंदर घसीटा और कुंडी चढ़ा दी। बाहर नानी माँ बड़बड़ा रही थी, “ऐसे समय हर कोई का आना-जाना ठीक नहीं।“
सूशी देर तक भरी-भरी आँखों से मुझे देखती रही। मेरी झूठी मुस्कुराहट से उसने धोखा नहीं खाया। जैसे रूठे हुए बच्चे को देखते हैं वैसे उसने मुझे देखा। मुस्कुराहट दबाकर बोली,  “हाय राम, कितनी लंबी ताड़ की ताड़ हो गई।“ फिर उसने अलमारी खोली और मिठाई की थाली निकाली। मैं लड्डू हाथ में लेने लगी कि बाहर जाकर कूड़े पर फेंक दूँगी। जो हमसे छूत करे, हम उसका छुआ क्यों खाएँ!
“ऊँहुक, मुँह खोल।“ सूशी के कहने पर मैंने मजबूरन ज़रा सा लड्डू कतर लिया। बाकी का बचा हुआ लड्डू उसने मुँह में डाल लिया। तो वह भी नहीं भूली थी! बचपन में हम कैसे एक ही अमरूद बारी-बारी दाँत से काटकर खाते थे! उसके बाद देर तक हम सर जोड़े बातें करते रहे, हँसते रहे। चलते समय सूशी ने एक नन्ही-सी पीतल की मूर्ति मेरी हथेली पर रख दी- भगवान कृष्ण की मूर्ति। मुझसे बोली, “ले चुड़ैल! अब तो तेरे कलेजे में ठंडक पड़ी।“
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