फेरीवालों की आवाजें

pheriwalon

पुराने ज़माने में फेरीवाले दिल्ली की ज़िंदगी का एक हिस्सा थे। उनके बिना जीवन नीरस हो जाता। कोई रिहायशी या कारोबारी जगह ऐसी नहीं थी जहाँ फेरीवाले नहीं आते-जाते थे। गली-मुहल्ले, कूचे-बाज़ार, दफ्तर-मदरसे कोई चप्पा उनसे नहीं बचा था।
फेरीवाले अपने सौदे को बड़ी मज़ेदार भाषा में बेचते थे। भाषा ही नहीं उनकी आवाज़ भी लच्छेदार और बुलंद होती थी। आदमी को अगर चीज़ न भी लेनी हो तो ले ले। उनकी आवाज़ सुनकर खरीदने की इच्छा मन में पैदा हो जाती। गा-गाकर सौदे बेचने का यह रिवाज मुगलों के ज़माने में शाहजहाँ के काल से शुरू हुआ। उस समय से लेकर फेरीवालों की आवाज़ें हाल फिलहाल तक सुनाई पड़ती रही हैं।
दिल्ली की गलियों में फेरीवालों की भाषा और उनके बोलने का अंदाज़ देखिए। गंडेरीवाला आकर मुहल्ले के एक कोने में बैठ जाता है। उसके हाथ में एक सरौता है। वह गन्ने को छीलकर गंडेरियाँ एक कपड़े पर बिछाता है। और हाँक लगाता है, ”पेट का भोजन, हाथ की टेकन होंठों से छीलो, कटोरा भर शरबत पी लो।“ मूँगफली के रसिया सारे दिल्लीवाले थे। मूँगफलीवाले की तान सुनिए, “ले लो पिशावर की गरियाँ, चीना बादाम की गरियाँ।“
दिल्लीवालों में औरतों और मर्दों दोनों को पान खाने का बड़ा शौक था। अक्सर घरों में पानदान होता था। पानवाले गली-गली घूमकर पान बेचा करते, “हरियाला है, मतवाला है, अच्छे जोबन वाला है, मेरे पान का यह बीड़ा।“ दिल्ली में कई मुहल्लों में औरतें फेरी पर सौदा बेचती थीं। ज़रा दिन चढ़ता तो कोई अपना छीबा लिए पहुँच जाती। बड़े मजे़दार कचालू बेचती। दोने में वह बच्चों को कचालू पकड़ाती जाती। उसके मुँह से दुआएँ निकलती रहतीं, “अल्लाह उमर दें, नेक नसीबा हो।”
बारिश के छींटे दिल्ली में पड़ते और शहतूत और जामुन बिकने लगतीं। उधर से ऊदेे यानी बैंगनी रंग का फालसा बेचनेवाले की आवाज़ आती, “ऊदे ऊदे नोन के बतासे, शरबत को।“ मौसम के मुताबिक फेरीवाले हर फल लाते रहते थे। गर्मियों में आमवाला चिल्लाता, “लड्डू हैं पाल के, बासी पराँठे के संग खा लो।“ खरबूज़ेवाला लहक-लहककर गाता, “नन्हे के अब्बा चक्कू लाना चख के लेना, फीके या मीठे सच्ची कहना।“ बीच में कोई शकरकंदवाला बोल उठता, “बिन कढ़ाई का हलवा, शकरकंदी।“ ककड़ियोंवाला ककड़ियों को पानी से तर करता रहता, “लैला की उँगलियाँ, मजनूँ की पसलियाँ। तैर कर आई हैं बहते दरियाव में।“
गली में अचानक आवाज़ आती, “चने की दाल में घुलाव, भाड़ में भुलभुलाओ।“ बेचनेवाला बैंगन का नाम नहीं लेता था। केवल इशारों में बता देता था कि क्या बेच रहा है। बेरवाला खनकता, “काँटा चुभ गया, बिखर गए बेर, घँूघटवाली ने भई तोड़े हैं बेर।“ खजूरवाला आमतौर पर शाम को आता था और दलील देता, “कलकत्ते से मँगाई है और रेल में आई है।“ दही के बड़े और पकौड़ेवाला आता तो उसके गिर्द एक भीड़ लग जाती थी। “दही के बड़े, मियाँ-बीबी से लड़े।“ और “खाओ पकौड़ी, बनो करोड़ी।“ पानी के बताशे यानी गोलगप्पेवाला किसी को देखता कि ज़ुकाम हो रहा है तो कहता, “पानी के बताशे खाओ, नज़ला भगाओ।“
कभी पटरी पर और कभी चैराहे पर दुकान जमाए बनियानवाला बोलता रहता “बड़े-बड़े बनियान, गरमियों की जान। मियाँ ले लो बनियान, बढ़ाओ अपनी शान।“ मद्रास की तरह दिल्ली में भी फूल जगह-जगह बिकते थे। फूलवाले की आवाज़ की महक लीजिए, “ये कटोरे हैं गुजराती मोतिया के। फूल लो जी चीनी के, कंठे अलबेली के।“ उधर एक संदूक बेचनेवाला आवाज़ लगाता, “हमसे मंदा कोई न बेचे, नौ रुपए के तीन, मियाँजी नौ रुपए के तीन।“ ज़रा टोपीवाले का आवाज़ लगाने का रंग देखिए, “सर की इज़्ज़त चार आने को। इज़्ज़तदारों के सौदे, सरदारों के सौदे। चार आने को, चार आने को।“ लकड़ी के तख्ते पर धड़ाधड़ जूता बजने की आवाज़ पर मुड़िए तो जूतेवाला नज़र आता। उसका ज़ोरदार दावा है, “टूटे न फूटे जान ले के छूटे और छह महीने कब्र पर धरा रहे।“
गली के मुहाने पर रेवड़ियाँ लिए एक खोमचेवाला खड़ा दिख जाता। वह पुकारता जाता, “दिल्ली शहर बड़ा गुलदस्ता, जिसमें बने रेवड़ी खस्ता। लिया स्कूल का सीधा रस्ता। आकर खावे रेवड़ी खस्ता, खाकर जाए मदरसा हँसता।“
आज भी फेरीवाले तो बहुत घूमते हैं मगर वह तुकबंदी और फड़कते वाक्य अब कहाँ हैं। वह माहौल एकदम बदल गया है। न वह दिल है, न मिज़ाज।

स्रोत: युवा पिटारा श्रृंखला : भाषा के रंग ढंग, निरंतर

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