खोल दो

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सआदत हसन मंटो का जन्म पंजाब के लुधियाना ज़िले में हुआ था।  उन्होंने बहुत कुछ लिखा – कहानियां, नाटक, लेख।  देश के बटवारे ने मंटो को तोड़ और झकझोर कर रख दिया।  और इस पर उन्होंने कई कहानियां लिखीं।  उन्होंने अपनी आँखों से पंजाब में हो रहे दंगे देखे।  मार काट देखी। आम आदमी को शैतान बनते देखा।  ‘खोल दो’ आम आदमी में पैदा हुयी इसी हैवानियत का नमूना है।  यहाँ हम निरंतर द्वारा प्रकाशित किताब से इस कहानी को दे रही है, जिसमे इसको आसान भाषा में लिखा गया था, ताकि नवसाक्षर भी इसे पढ़ सकें, चित्रांकन ऑरिजीत सेन का है।  

अमृतसर से रेल रवाना हुई। लाहौर पहुंचते -पहुंचते आठ घंटे लेट हो गई। रास्ते में कई लोग मारे गए। कई घायल हुए और बहुत सारे लापता थे। देश के बंटवारे का समय था।
सिराज को होश आया तो सुबह हो गई थी। उसकी आंखों के सामने सब कुछ घूम गया। लूट… हमला… आग… भागना… स्टेशन… गोलियां… सकीना। हां… सकीना कहां गई ? सिराज एक दम उठ खड़ा हुआ। घंटों अपनी जवान बेटी को ढूंढा। पर सकीना नहीं मिली।
चारों ओर लोग अपनों को खोज रहे थे। आखि़र सिराज थक-हार कर बैठ गया। सोचने लगा- ‘सकीना और उसकी मां से कब और कहां बिछड़ा था?’ अचानक सकीना की मां का मरा शरीर आंखों के सामने आया। उसका चिरा हुआ पेट। ख़ून से लथ-पथ साड़ी। दम तोड़ते हुए उसकी आख़री आवाज़ सिराज आज भी सुन सकता था – ‘‘सकीना को लेकर भाग जाओ ! मुझे रहने दो। हमारी बच्ची को बचा लो।’’ सकीना की कलाई कस के पकड़, सिराज भागा। नंगे पांव, पागलों की तरह दोनों भागते गए। फिर सकीना का दुपट्टा गिर पड़ा। दुपट्टा उठाने सिराज पलभर को रूका था। भागती भीड़ के पांवों से बचाकर दुपट्टा उठाया था ….. अरे! दुपट्टा तो आज भी उसकी जेब में है। पर सकीना कहां गई?
सिराज ने अपने थके दिमाग़ पर बहुत ज़ोर दिया। सकीना कब बिछड़ी? वह रेलवे स्टेशन तक आई या नहीं? गाड़ी में बैठी या नहीं? दंगा करनेवाले उसे उठा तो नहीं ले गए? सिराज को कुछ याद नहीं आ रहा था। कई दिन, बेटी का दुपट्टा जेब में लिए, सिराज इसी तरह भटकता रहा।
फिर एक दिन कुछ आशा बंधी। सिराज को आठ नौजवान लड़के मिले। उनके पास लाठियां थीं। बंदूकें थीं। एक ट्रक भी था। लड़कों ने बताया कि वे दूसरी तरफ़ छूटी औरतों और बच्चों को वापस ला रहे हैं। सिराज ने बेटी का हुलिया बतासा, ‘‘गोरा रंग है। बड़ी-बड़ी आंखें। काले बाल। दाहिने गाल पर मोटा सा तिल। उम्र सत्रह साल। सकीना नाम है। मेरी बेटी को ढूंढ लाओं। खुदा दुआएं देगा।’’ नौजवानों ने कहा- ‘‘अगर आपकी बेटी ज़िंदा है तो हम उसे खोज निकालेंगे।’’
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वे अमृतसर की ओर रवाना हुए। वहां से लौट रहे थे कि एक लड़की सड़क पर दिखी। उसने नौजवान लड़कों को देखा, वह डर कर भागने लगी। लड़कों ने ट्रक रोका और उसके पीछे भागे। कुछ दूरी पर उसे रोक लिया। लड़कों ने दिलासा दिया, ‘‘घबराओ नहीं। क्या तुम सिराज की बेटी सकीना हो ?’’ अनजान होठों पर अपना नाम सुनकर लड़की चौंकी। पर उसने माना- ‘‘हां, मैं सकीना हूं।’’ लड़कों ने उसे सिराज तक पहुंचाने का वादा किया। और सकीना उनके साथ ट्रक में चल दी।
कई दिन गुज़रे। सिराज को सकीना की कोई ख़बर नहीं मिली। फिर एक दिन वही नौजवान लड़के दिखे। सिराज भागा-भागा उनके पास गया। पूछा- ‘‘बेटा, मेरी सकीना का पता चला?’’ लड़कों ने जवाब दिया- ‘‘अभी तक नहीं मिली।’’
उसी दिन शाम की बात है। चार आदमी एक बेहोश लड़की को अस्पताल ले जा रहे थे। सिराज उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। हिम्मत कर, वह अस्पताल के अंदर गया। वहा लड़की पलंग पर पड़ी थी। किसी ने बत्ती जलाई। कमरे में अचानक रोशनी हो गई। सिराज चीख़ा- ‘‘सकीना! यही है सकीना।’’ पास खड़े डाक्टर ने सिराज को घूर कर देखा। बड़ी मुश्किल से सिराज बोला- ‘‘जी मैं इसका बाप हूं।’’ डाक्टर ने सकीना की नब्ज़ देखी और खिड़की की ओर इशारा करके कहा- ‘‘खोल दो।’’
‘खोल दो’ सुन कर सकीना ज़रा सी हिली। यह देख सिराज ख़ुशी से चीख़ पड़ा- ‘‘मेरी बेटी ज़िंदा है! ज़िदा है।’’ सकीना की आंखें अब भी बंद थीं। पर उसके बेजान हाथ शलवार का नाड़ा टटोलने लगे। धीरे-धीरे नाड़ा खोला। शलवार नीचे सरककाई। और पैर चौड़े कर दिए। डॉक्टर ने शर्म से आंखें नीचे कर लीं। उसके माथे पर पसीने की बूंद चमक आई।
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