चुप नहीं रहूंगी

‘दहलीज़ से परे: पेस सेंटर में आने वाली लड़कियों की दास्तान’ निरंतर का प्रकाशन है। इस किताब में निरंतर द्वारा चलाए जा रहे परवाज़ अडोलसेंट सेंटर फॉर एजुकेशन (पेस) में आने वाली 8 लड़कियों की ज़िंदगी की झलक मिलती हैं। आइये पढ़ें इसका अंश और जाने इनमे से एक लड़की की कहानी : 
 
अनम का नाम लेते ही हँसती हुई लड़की की छवि, मेरे सामने आ आती है। हमारे सेंटर में कुछ ही शादीशुदा लड़कियाँ थीं, चूँकि अनम शादीशुदा थी इसलिए उसकी दोस्ती उसी की हमउम्र और पड़ोसन अज़रा से थी। उसको सेंटर तक लाने में अज़रा की कोशिश और मेहनत थी। जिस दिन वह अनम को सेंटर लाई हमें एहसास हुआ कि बिना संस्था या अन्य लोगों की मदद के लड़कियाँ एक दूसरे पर कितनी छाप छोड़ सकती हैं।
 
fullpage anam newअगले दिन थोड़ा शर्माते हुए उसने बताया कि उसे सेंटर की सभी चीज़ें और गतिविधियाँ काफी अलग लगीं। सब लड़कियों को देखकर उसे काफी अच्छा लगा। इससे पहले त्रिलोकपुरी में लड़कियों को ऐसे एक साथ नहीं देखा था। अब अनम रोज़ सबसे पहले सेंटर पहुँच जाती। अपने और अपने परिवार के बारे में बहुत सी बातें बताती। उसके पास रोज़ कोई नया किस्सा होता था, जो वह सेंटर में आकर ज़रूर ब्यान करती। 
 
त्रिलोकपुरी में अनम शादी के बाद आई है। शादी से पहले वह अपने परिवार के साथ मुज़फ्फरनगर में रहती थी। गरीबी और रिश्तेदारों की बातों में आकर उसकी शादी काफी कम उम्र में कर दी गई। जब शादी की बात चलने लगी तो उसे पता चला कि लड़का दिल्ली में रहता है। दिल्ली शहर की चकाचौंध और नए जीवन की कल्पना से वह काफी उत्साहित थी। शादी के बाद, अपने पति के साथ दिल्ली आ गई। अनम ने बताया कि उसके पति को पैर में तकलीफ थी जिसकी वजह से वह चल नहीं सकता था। रोज़गार के नाम पर थोड़ा बहुत लकड़ी का काम करता था लेकिन इसकी वजह से अनम को अपने सास-ससुर पर ही निर्भर रहना पड़ता था। दिल्ली आकर उसे लगा कि ज़िंदगी इतनी आसान नहीं है। कई तरह की समस्याएँ थीं। शादी के फौरन बाद, उसे अपने पति के रंगढंग का पता चला। छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई-झगडे़ आम बात हो गई थी। उसका पति, सास- ससुर और देवर किसी न किसी बात पर लड़ते और गुस्सा आने पर पिटाई भी कर देते थे। उसने बताया कि शादी के दौरान ससुराल वालों को कुछ भी दहेज नहीं मिला। बिना किसी लेनदेन की शादी हुई थी। इसलिए उन लोगों का गुस्सा अक्सर लड़ाई-झगड़े का रूप ले लेता था। रोज़ के झगड़े इतने बढ़ गए थे कि किसी पड़ोसी को भी कुछ बोलने या बचाने की हिम्मत नहीं होती थी। सभी मूक दर्शक की तरह रोज़ तमाशा देखते थे। ऐसे ही जीवन चलता रहा और इसी बीच उसके तीन बच्चे भी हो गए।
 
घर की बातों और तनाव की वजह से सेंटर की गतिविधियों में अनम का ज़्यादा ध्यान नहीं लगता था। लिखने-पढ़ने में उसे दिक्कत आती थी क्योंकि वह कभी स्कूल नहीं गई थी, सिर्फ दीनी तालीम ली थी और उर्दू पढ़ना ही उसने सीखा था। घर की परेशानियों ने उसके दिमाग को घेर रखा था, घर पर होने वाली हिंसा और मानसिक तनाव की वजह से वही बातें उसके दिमाग में कौंधती रहती थीं। एक दिन उसने बताया कि उसके दोनों बेटे उसे गालियाँ देते हैं और अनपढ़ होने की वजह से हमेशा मज़ाक उड़ाते हैं। ऐसे ही बात करते-करते उसने हँसकर कहा, “मैं पढ़ाई करके अपने पति और बच्चों को जवाब देना चाहती हूँ” गुज़रते दिनों के साथ अनम अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को सुनाने लगती। सेंटर की कुछ लड़कियों की उसकी बातों में कोई रूचि नहीं दिखती थी क्योंकि उन्हें लगता था कि उसकी शादीशुदा ज़िंदगी को क्या सुनना। ऐसा ही कुछ अनम भी सोचती जब दूसरी लड़कियाँ अपने दोस्तों और उनसे रिश्तों की बातें करतीं। लेकिन सेंटर की ज़्यादातर लड़कियाँ, शादी, रिश्तों और आगे के जीवन को लेकर काफी उत्साहित दिखती थीं। अनम अपने छोटे बच्चे को लेकर आती थी और रोज़ थोड़ा जल्दी निकलकर अपने बड़े बेटे को स्कूल छोड़ने जाती थी। चर्चा के दौरान वह अपने बच्चों के बारे में बताती थी। उसने बताया कि उसके बच्चे सेंटर का नाम लेकर उसे डराते थे। उन्हें लगता था कि स्कूल की तरह यहाँ भी डांट और पिटाई लगती होगी। 
 
एक दिन शाम को घर पर पढ़ते समय, उसके बेटे ने हँसते हुए कहा, “अम्मी, अपनी किताब तुम भी पढ़ लो नहीं तो टीचर पिटाई करेगी।” अनम ने बताया, “दीदी मेरे बड़े बेटे को घड़ी देखनी नहीं आती। सेंटर में गणित सीखने के बाद, मैंने उसे घड़ी देखना सिखाया। मुझे बहुत मज़ा आया” उस दिन अनम के चेहरे पर अलग ही खुशी थी। पूरे दिन काफी उत्साहित दिखाई दे रही थी। अनम के बच्चे की बातें सुनकर समझ में आता है कि पढ़ाई का खौफ बच्चो में कितना हावी है। अनम और उसके बच्चों का साथ में सीखना और पढ़ाई को ज़िंदगी से जोड़ना कितना अलग अनुभव था। अनम कभी अपने बच्चों के बीच खुद बच्चा बनकर उनकी बातें सुनती थी तो कभी माँ बनकर उन्हें हिंदी और गणित की कुछ चीज़े सिखाती थी।
 
सेंटर में एक दिन सभी के साथ समूह में रिश्तों को लेकर बात चल रही थी। अनम सत्र में काफी उत्साहित लग रही थी। किसी एक लड़की के अनुभव सुनने के बाद उसने अपनी बात बतानी शुरू कर दी। सभी उसे देख कर हैरान थे क्योंकि प्यार और रिश्तों से जुड़ी बातों को बताने में पहले वह बहुत शर्माती थी और कोई रूचि नहीं दिखाती थी। लेकिन उस दिन उसने बताया कि किसी भी रिश्ते में भरोसा बहुत ज़रुरी है क्योंकि शक की वजह से उसका पति रोज़ उससे लड़ता था। अनम का एक रिश्ते का भाई जिससे कभी अनम की शादी की बात चली थी, उसका अक्सर घर में आना जाना रहता था। इसी बात से उसके पति को ऐतराज़ था। यही नहीं, अगर कभी अनम फोन पर अपनी बहन या रिश्तेदारों से बात करती हुई दिख गई या खुश नज़र आ गई तो उसे ऐसा लगता था कि किसी ‘यार’ से बात कर रही है। अनम अपने पति के मुकाबले दिखने में काफी सुंदर है। शायद इसीलिए हमेशा वह उस पर शक करता है और उसे मारता-पीटता है। एक दिन उसने अनम के साथ मार-पिटाई करके उसका मोबाइल भी तोड़ दिया था। उसने अनम को किसी से मिलने और बात करने से भी मना किया था। उसने थप्पड़ मारते हुए कहा, “अगर तुमने किसी से मिलने और बात करने की कोशिश की तो तुम्हारी खैर नहीं। बहुत देख लिया तुम्हारा नाटक”। लेकिन इन सबके बावजूद, अनम किसी से अपने दिल की बात नहीं कह पाती थी। 
 
सिर्फ पड़ोस में अज़रा के घर जाकर या फिर सेंटर में हमारे साथ बात करके कभी-कभी अपना दिल हल्का कर लेती थी। शुरू-शुरू में तो उसे लगता था कि घर की बात बाहर नहीं जाए तो अच्छा है। लेकिन जब हिंसा को लेकर उससे यह बात हुई कि किसी के साथ शारीरिक या मानसिक हिंसा करना अपराध है। हिंसा सहने से ही हिंसा करनेवाले ज़्यादा हावी होते हैं। ऐसा सुनकर उसकी हिम्मत बंधी। लेकिन इसके बावजूद वह पति और परिवार के खिलाफ खुलकर कुछ भी कदम नहीं उठा पाई।
 
Anam and violent husbandकुछ महीनों बाद, कई दिनों तक अनम सेंटर नहीं आई। सभी लड़कियों से उसके बारे में पूछा, किसी को कुछ खास नहीं मालूम था। अज़रा ने बताया कि अनम अपने घर के माहौल की वजह से काफी परेशान है। इन्ही कारणों से वह सेंटर भी नहीं आ पा रही है। फिर, हमने अज़रा के घर अनम को बुलवाया। उसके आने पर अज़रा बोली, “बाजी, अनम तो पता नहीं क्या-क्या बातें सोच रही थी। इसने तो खुदकुशी या करने की सोच ली थी”। 
 
ऐसा सुनकर, पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। हमने अनम की तरफ देखा, वह बिल्कुल चुप थी और बहुत बेबस भी। ऊपरी मन से मुस्कराने की कोशिश करते हुए बातें छिपाने की कोशिश कर रही थी। हमने उससे पूछा, “क्या बात है अनम? तुमने ऐसा कैसे सोच लिया?” ऐसा सुनते ही, अनम की आँखें भर आईं। उसने कहा, “बाजी, मैं रोज़-रोज़ की मार-पिटाई से परेशान हो गई हूँ। अब ये सब बर्दाश्त करना मेरे बस की बात नहीं है। मैं इस सबसे छुटकारा पाना चाहती थी। इसीलिए ऐसा ख्याल मेरे दिमाग में आया।” बातचीत के दौरान, अनम ने अपने परिवार के बारे में कई और चीज़े भी बताईं। उसकी बातों से साफ पता चल रहा था कि इतना सबकुछ होने के बावजूद भी, न ही वह अपने पति को छोड़ना चाहती थी, न ही, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाना चाहती थी। बातों ही बातों में मैंने कहा, “तुम इतना परेशान हो तो पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं कर देतीं?” उसने दुखी होकर बोला, “बाजी, इस परिवार के आलावा, मेरा इस शहर में कोई नहीं है। जीने के लिए कुछ साधन तो चाहिए। बिना कमाई के बच्चों का गुज़ारा कैसे होगा।” 
 
ऐसी स्थिति को देखकर लगता है कि सिर्फ कानून बनाने से लोगों की ज़िंदगी में, उनके रिश्तों में बदलाव नहीं आएगा। सवाल यह है कि क्या महिलाएँ इस लड़ाई को लड़ने के लिए तैयार हैं? और अगर तैयार भी हैं तो क्या सभी के पास आगे बढ़ने के अवसर हैं? क्या ऐसे रिश्तों को तोड़कर आगे जीने के अवसर नहीं मिल सकते? ऐसे ही और कई सवालों के बादे में सोचते हुए हम अनम से मिलकर वापस आ गए। अगले दिन सेंटर में अनम को देखकर हम बहुत खुश हुए।  
 
एक दिन हम सभी लड़कियों के साथ खेल से जुड़ी गतिविधि कर रहे थे, सभी लड़कियाँ अपने पसंद के खेल के बारे में बता रही थीं और अनम कुछ सोच रही थी। पूछने पर उसने बताया कि बचपन में उसे खेलना बहुत पसंद था लेकिन शादी के बाद, उसे खेलने का मौका नहीं मिला। फिर, हँसते हुए बोली कि कभी-कभी अपने बच्चों के साथ दरवाज़ा बंद करके खेल लेती है। सभी लड़कियाँ उसकी बातें सुनकर हँसने लगी। हम सोच रहे थे कि ऐसा खेल करवाया जाए जिसमें ज़्यादा भाग दौड़ नहीं हो क्योंकि अनम एक पाँव को सीधा करके खड़ी नहीं हो सकती थी।
 
लेकिन, अनम को देखकर हम सभी हैरान हो गए। अनम ने अपना दुपट्टा बाँधा और सभी से साथ दौड़ने लगी। जब तक सभी थके नहीं वह भी खेलती रही। अनम के चेहरे पर हँसी और खेल में बच्चों वाली शरारत को देखकर जैसे हमें भी ऊर्जा मिल रही थी। कुछ घंटो के लिए ही सही, सभी अपने बचपन में पहुँच गए थे और खेलने में मशगूल थे। खेल के बाद, अनम ने हँसकर बचपन की शरारत भरी कहानियाँ सुनाईं जिन पर सभी हँस-हँसकर लोटपोट हो रहे थे। उसकी मस्ती का आलम देखकर लग रहा था कि कुछ देर के लिए ही सही वह अपने घर की ज़िम्मेदारियों और परेशानियों को भूल चुकी थी। 
 
अनम सेंटर की सभी गतिविधियों में खुलकर भागीदारी करने लगी थी। एक सत्र में हम सभी, किशोरावस्था को लेकर चर्चा कर रहे थे। शुरुआत में कुछ लड़कियाँ अपनी बात कहने में झिझक रही थीं लेकिन जब अनम ने अपना अनुभव सबके साथ बाँटा, तो सभी उसकी बातों में रूचि लेने लगे। उसने बताया कि कैसे उसके गाँव में किशोरियों की छाती पर गरम लोहा बाँधा जाता है जिससे छाती का विकास कम हो जाए। बचपन में अनम की छाती पर भी गरम लोहा बाँधा गया था और इसकी वजह से काफी दिनों तक घाव भी रहा। चर्चा की गतिविधियों के दौरान वह सहज रूप से अपनी बातें बताने लगी थी। शरीर, किशोरावस्था और रिश्तों वाले सत्रों में अनम की अहम भूमिका दिखने लगी थी और नाज़ुक मुद्दों पर भी गहराई से चर्चा होने लगी थी। अब अनम खेल और गतिविधियों के दौरान अपने गम को भूलकर, खुलकर मस्ती करने लगी थी। 
 
Anam warning her husbandकोर्स पूरा हुआ और इसके तीन-चार महीने बाद हम समुदाय की लड़कियों से एक बार फिर से मिलने गए। जब हम अमन के घर पहुँचे तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने सबको गले से लगाया और अपना हाल बताया। उसने चहककर कहा, “बाजी मेरा पति फिर से मुझे मारने की कोशिश कर रहा था। फिर मैंने उसे धमकाया और कहा, “अगर तू नहीं मानेगा तो मैं दीदी से बोलकर महिला आयोग में शिकायत दर्ज करवा दूँगी और इस घर को छोड़कर किसी महिलाओं की संस्था में रहने चली जाऊँगी। मुझे अकेले मत समझना। उसे मेरी बातें सुनकर काफी हैरानी हुई। वो बिल्कुल चुप हो गया। उस दिन के बाद से, कभी उसने मेरे ऊपर हाथ उठाने की हिम्मत नहीं की।“ उसने यह भी बताया कि वह अपने बच्चों को एक संस्था द्वारा चलाए जा रहे सेंटर में पढ़ाई के लिए भेजती है और उनकी पढ़ाई पर ध्यान देती है। जब हम उसके घर से निकलने लगे तो उसने कहा, “बाजी, अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। आप सबके इतना समझाने के बाद, मैंने हिम्मत जुटाकर पुलिस को बुलाया और सास-ससुर के खिलाफ केस दर्ज करवाने की बात कही। अब सास ससुर कभी बुरा-भला नहीं कहते। मैं अपने पति के साथ अलग रहती हूँ।” वापस आते हुए हम सोचने लगे कि पढ़ाई और जेंडर पर हुई चर्चा का जो असर पूरे दस महीने तक उसपर नहीं दिखा, वह अब उसके जीवन की गहराइयों तक पहुँच चुका है।
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