कम उम्र में विवाह व बाल विवाह से यौनिकता का सम्बन्ध

मुंबई की एक किशोरी ने हमारे साथ साक्षात्कार की शुरुआत में ही शादी के बारे में कहा था, “हिंदुस्तान में शादी का मतलब है, यौन संबंध, सेक्स”। हालाँकि कोई भी अन्य उत्तरदाता इस बात को इतनी बेबाकी से नहीं कह पाई मगर सभी उसकी बात से सहमत थीं। भले ही वे बहुत स्पष्ट रूप से न कहें कि शादी की मुख्य भूमिका यौन संबंध और प्रजनन को पवित्रता का दर्जा देने की है। शादी के ज़रिए समाज महिलाओं की यौनिकता पर अंकुश रखता है। औरतों की यौनिकता पर अंकुश रखना ही एकमात्र तरीका है जिसके ज़रिए मर्द यह तय कर सकते हैं कि उनकी संतान का पिता कौन है और इस तरह वे अपने वंश का नाम, संपदा, हैसियत, धर्म और अन्य चीज़ों को सुनिश्चित कर सकते हैं। कहने का मतलब यह है कि परिवार और समाज का पुनरुत्पादन सुनिश्चित करने के लिए औरतों की यौनिकता को अंकुश में रखा जाता है।
जाति और खासतौर से रक्त शुद्धता की चाह इस बात को तय करती है कि लड़की जैसे ही यौवनारंभ की अवस्था में पहुँचे, रजस्वला हो जाए उसकी शादी कर दी जाए। अन्यथा इस बात का खतरा रहता है कि कहीं निचली जाति का कोई आदमी उसके खून को ”गंदा“ न कर दे। बिहार में यादव समुदाय के उत्तरदाताओं ने बताया कि लड़की की उम्र जितनी कम हो, उसको “विदा कर देना” उतना ही सम्मानजनक और पुण्य का काम माना जाता है। ये लोग इस बात की तरफ इशारा कर रहे थे कि लड़की की उम्र कम होगी तो उसकी यौन शुद्धता की संभावना ज़्यादा होगी। पूरे बिहार में लोगों ने जाँघदान और पत्तलदान का फर्क बताया। जाँघदान का मतलब यह है कि लड़की कि इतनी कम उम्र में शादी कर दी जाए कि शादी के समय वह अपने पिता की गोद में बैठ सके जबकि पत्तलदान का मतलब है कि शादी के समय लड़की रजस्वला हो चुकी है और अपने पिता की बगल में एक पटिया पर बैठती है। ज़ाहिर है कि लड़की के कौमार्य की गारंटी बहुत बड़ी चीज़ होती है। यह कौमार्य सुनिश्चित करके विभिन्न समाज उन सामाजिक सीमाओं को और मज़बूत कर देते हैं जो संचित संपदा व सुविधाओं को सुरक्षा प्रदान करती हैं। इस तरह समाज वर्ग, जाति व धर्म की मौजूदा विभाजक रेखाओं को और गहरी कर देते हैं।

early marriage 3

शादी की उम्र में इज़ाफे और रजस्वला होने व शादी के समय के बीच के फासले के चलते एक लड़की की यौन पवित्रता ही उसके कौमार्य का सूचक होती है। उसका चाल-चलन हमेशा उसके परिवार और समुदाय की पैनी नज़रों के सामने रहता है। अगर वह शादी को टालना चाहती है तो उसे सही चाल-चलन रखना चाहिए और ऊँच-नीच यानी गैर-वैवाहिक यौन संबंधों की संभावना से कोसों दूर रहना चाहिए। यौन संबंधों का भय केवल यौन हिंसा या जबरिया यौन संबंधों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह भय इस कल्पना के बारे में भी है कि लड़कियाँ कहीं खुद ही अपनी यौन इच्छाओं को तरजीह न देने लगें। ये दोनों ही ऐसी स्थितियाँ हैं जो परिवार के लिए ”बदनामी“ और ”शर्मिंदगी“ का सबब होती हैं। ज़्यादातर माँ-बाप ने इस ‘ऊँच-नीच’ की आशंका को शादी की उम्र में कमी का मुख्य कारण बताया। उनके मुताबिक, लड़कियों की आवाजाही पर अंकुश या शादी से पहले उन पर अन्य प्रकार के नियंत्रणों के पीछे यह डर एक मुख्य वजह है।
एक ऐसी व्यवस्था जो महिलाओं की यौनिकता को अंकुश में रखना चाहती है, उसके लिए इस बात की कल्पना ही एक खौफनाक बात है कि लड़कियाँ अपनी यौन इच्छाओं और कामनाओं को तरजीह भी दे सकती हैं। यह चिंता इतनी गहरी होती है कि लड़कियों के सामने गर्भनिरोधक और सुरक्षित सेक्स से संबंधित चर्चाओं तक को शर्मनाक मान लिया जाता है और उनको अधिक से अधिक हतोत्साह किया जाता है ताकि कहीं इससे लड़कियों को “गंदे खयाल” न आने लगें। इसकी वजह से शादी के रिश्तों से बाहर के तमाम यौन संबंधों को ज़ोर-ज़बर्दस्ती या फुसलावे के नतीजों के रूप में पेश किया जाता है। समाज की नज़र में लड़कियाँ तो केवल मासूम मूकदर्शक होती हैं जिनको आदमी अपने जाल में फंसा लेते हैं। जबकि दूसरी तरफ लड़कियाँ अपनी चाहतों को नज़रअंदाज करना या उनका निषेध करना सीख जाती हैं। इसके साथ ही किशोरावस्था में गर्भधारण करने का भय भी जुड़ा हुआ है क्योंकि शादी के रिश्तों से बाहर पैदा होने वाले बच्चों को समाज की स्वीकृति नहीं मिलती।
बिहार की एक घटना है। उसमें 16 साल के एक लड़के और 14 साल की एक लड़की ने अपने गाँव से भागने का फैसला लिया। तब स्थानीय एनजीओ द्वारा ट्रैफिकिंग विरोधी समिति के साथ मिलकर लड़के के माँ-बाप के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई। लड़की के परिवार वालों ने लड़के के घर के बाहर 300 लोगों को इकट्ठा कर लिया। वे माँग कर रहे थे कि लड़के के घर वाले इस किशोर जोड़े को ढूँढ कर उनके सामने पेश करें। चूँकि लड़की तो पूरे समुदाय की बेटी थी सो वह पूरी बिरादरी की इज़्ज़त थी और यह “बेटी की इज़्जत” का मामला था।
सभी राज्यों में खराब माहौल का डर बार-बार चर्चा में आता है। खासतौर से जब सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के साथ हिंसा और बलात्कार की सनसनीखेज घटनाओं की खबरें आती हैं। बेशक घर की चारदीवारी के बाहर हिंसा की आशंका वास्तविक है, मगर ससुराल के भीतर होने वाली हिंसा और यौन हिंसा से जुड़े मुद्दों पर फैली चुप्पी भी कोई कम नहीं है। यौन हिंसा इस बात का संकेत है कि असली समस्या महिला विरोधी हिंसा के बारे में नहीं है, बल्कि असली समस्या विवाह की वैधानिक सीमाओं के बाहर के यौन संबंध को लेकर है। इतना ही नहीं, अगर हमारा समाज ससुराल में यौन हिंसा को मानने में हिचकिचाता है तो वह मायके में होने वाली यौन हिंसा के बारे में भी पूरी तरह अनजान होने का दिखावा करता है। आंध्र प्रदेश में एक बूढ़ी औरत को अपनी पोती का सिर्फ इसलिए विवाह करना पड़ा क्योंकि उसके पास अपनी पोती को उसके पिता के यौन उत्पीड़न से बचाने का कोई और रास्ता नहीं बचा था। आंध्र प्रदेश में ही एक साक्षात्कार में एक महिला ने बताया, “लड़की चाहे 10 बुरके पहन ले, मगर उसकी इज़्ज़त तो लुट कर ही रहेगी। बेडरूम में क्या-क्या होता है, वो तो आप तब तक नहीं जान सकते जब तक वहाँ कैमरा न रख दें”।
यौनिकता के बारे में कुल मिलाकर रवैया नकारात्मक है। किशोर-किशोरियों की यौनिकता और उनकी चाहत को बदनामी व गंभीर दुष्परिणामों के साथ जोड़े बगैर स्वीकार करने की गुंजाइश नहीं है। इन रवैयों का अर्थ है कि किशोर-किशोरियाँ खुद शादी से पहले यौन संबंध को एक विकल्प नहीं मानते और कई बार अपनी जिस्मानी ज़रूरतों को शांत करने के लिए कम उम्र में शादी करना चाहते हैं।
कुछ किशोर-किशोरियाँ माँ-बाप की मर्ज़ी से बाहर एक-दूसरे को पसंद कर लेते हैं और भागने का रास्ता चुनते हैं। इसके बदले में आमतौर पर अपनी बिरादरी के साथ उनके ताल्लुकात हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं। दूसरी तरफ, बहुत सारे युवा माँ-बाप द्वारा चुने गए व्यक्ति से ही शादी करते हैं ताकि गंभीर दुष्परिणामों के बिना अपनी कामनाओं को पूरा कर सकें। चूँकि ये सारे नियम एक बहुत सख्त माहौल पैदा कर देते हैं इसलिए जो माँ-बाप अंकुश चाहते हैं और जो नौजवान अपनी यौन चाहतों को तरजीह देना चाहते हैं, उनके पास शादी का फैसला लेने के अलावा कोई खास विकल्प नहीं बचता।
विडंबना यह है कि कम उम्र में विवाह और बाल विवाह दोनों ही भाग कर विवाह करने का नतीजा भी हैं और ऐसी घटनाओं को रोकने की एक कोशिश भी हैं। जिन माँ-बाप को यह डर है कि उनका बेटा और बेटी भाग सकते हैं, वे अक्सर उसकी जल्दी शादी कर देना चाहते हैं। यह इस बात का उदाहरण है कि असली भय अक्सर यौन सक्रियता या किशोरावस्था में गर्भधारण का नहीं होता, बल्कि अपने बच्चों पर तथा उसकी यौनिकता पर नियंत्रण खो देने का होता है।
मीडिया और संचार साधनों तक सहज पहुँच उपलब्ध कराते हुए वैश्वीकरण ने इन चिंताओं को और बढ़ा दिया है। इन साधनों की मदद से आपसी संवाद बढ़़ा है और किशोर-किशोरियों को अपने जोड़ीदार से मिलने के रास्ते मिल जाते हैं। मोबाइल टेक्नोलाजी के आने से किशोर-किशोरियों पर अभिभावकों का नियंत्रण कम हुआ है और इस बात की संभावना बढ़ी है कि वे खुद अपने जोड़ीदार चुनें और यहाँ तक कि यौन संबंध भी बनाएँ। इस स्थिति में कम उम्र में विवाह और बाल विवाह एक ऐसा तरीका है जिसके ज़रिए माँ-बाप अपने नियंत्रण को एक बार फिर जताने की कोशिश करते हैं। मीडिया के बढ़ते संपक्र के चलते लड़के-लड़कियों में भिन्न जीवन शैलियों की कामना जगी है और रूमानी प्रेम व साहचर्य की भी एक खास छवि बनी है। इस तरह की छवियों से लड़के-लड़कियों के भागने की घटनाओं में इज़ाफा भी हुआ है। बहुत सारी माँओं ने ऐसे टीवी धारावाहिकों और फिल्मों के बारे में अपनी नाखुशी जताई जिनमें लड़के और लड़कियाँ मोहब्बत के चक्कर में पड़ जाते हैं। बकौल उनके, ‘अब उनकी बहनें और बेटियाँ भी प्यार के चक्कर में पड़ना चाहती हैं।’
जिन समुदायों में यौनिकता के प्रति बहुत बंदिशों वाला रवैया नहीं हैं वहाँ शादी की उम्र अन्य समुदायों से ज़्यादा पाई गई है। यह सह-संबंध जनजातीय समुदायों और देश के कुछ इलाकों, जैसे असम आदि के हमारे दौरों में साफ दिखाई दिया। असम में कम उम्र में विवाह और बाल विवाह की घटनाएँ अभी भी कम हैं और यौन संबंधों के प्रति एक ज़्यादा ”खुला“ रवैया दिखाई देता है। अध्ययन के द्वितीय स्रोतों में भी इस आशय के साक्ष्य उपलब्ध हैं कि कम उम्र में विवाह और बाल विवाह का चलन सामान्य रूप से उत्तरी अफ्रीका, मध्य पूर्व और एशिया में ज़्यादा है। वहाँ लैटिन अमेरिका और सहारा रेगिस्तान के दक्षिण में स्थित अफ्रीकी हिस्सों के मुकाबले महिलाओं की यौनिकता के प्रति रवैया और उसपर नियंत्रण बहुत कठोर है।

 

स्रोत : निरंतर प्रकाशन “भारत में कम उम्र में विवाह और बाल विवाह : परिदृश्य का विश्लेषण”

 

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