पंडिता रमाबाई सरस्वती

Pandita_Ramabai_Life_and_Landmark_Wसन् 1878, कलकत्ता विश्वविद्यालय का सीनेट हाॅल। सामने मंच पर प्रोफेसर टोने, प्रोफेसर गाॅ और पंडित महेशचंद्र न्यायरत्न विराजमान हैं। सब एक से बढ़कर एक संस्कृत के प्रकांड पंडित। पूरा हाॅल खचाखच भरा है। मंच के सामने एक युवा स्त्री सादी सी साड़ी में बैठी है। उसकी भूरी आँखों में चमक है, गंभीरता है। उससे मंच पर बैठे विद्वान् सवाल कर रहे हैं जिनका वह सधे हुए अंदाज़़ में जवाब दे रही है। यह पूरी बातचीत संस्कृत में हो रही है। लगता है कि उनके बीच शास्त्रार्थ चल रहा है। लोग हैरान दिख रहे हैं कि एक स्त्री भरी सभा में धाराप्रवाह संस्कृत बोल रही है। सभी उत्सुकता से पूरी कार्यवाही पर नज़़र रखे हुए हैं और थोड़ी देर बाद तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उस युवती को ‘सरस्वती’ की उपाधि से विभूषित किया जाता है।
यह युवती हैं रमाबाई – पंडिता रमाबाई सरस्वती। महत्त्वपूर्ण यह है कि 19वीं सदी के उत्तरार्ध में केवल उनकी विद्वत्ता का डंका नहीं बजा, बल्कि स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व के लिए उन्होंने स्त्री शिक्षा की पुरज़़ोर वकालत की। सवाल यह है कि अपने ज्ञान और विशेषकर स्त्रियों के लिए वर्जित माने जानेवाली संस्कृत भाषा के ज्ञान से सबको चमत्कृत करनेवाली रमाबाई को हम कितने लोग जानते हैं! अचरज होता है कि महान् व्यक्तित्व की लंबी फेहरिस्त में वे शायद ही कहीं दिखती हैं। अक्सर इतिहास की किताबों में और शिक्षा के क्षेत्र में उनकी कोई आहट नहीं सुनाई पड़ती है।
चाहे वह वंचित वर्ग की लड़कियों एवं महिलाओं को सीखने-सिखाने के लिए आवासीय केंद्र चलाना हो या उनके लिए स्थानीय भाषा में प्राइमर बनाना हो या चाहे ‘पुरुषों का काम माने जानेवाले’ मुद्रण के काम का प्रशिक्षण देना हो। हमें अहसास हुआ कि जब हम शिक्षा के ज़रिए सशक्तीकरण एवं नई भूमिकाओें की बात करती हैं, तो इन सबमें रमाबाई का स्वर ही प्रतिध्वनित होता है।
इतिहास पर नज़़र दौड़ाएँ तो आरंभ में रमाबाई शिक्षित भारतीय नारी के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठापित नज़़र आती हैं। उन्नीसवीं सदी के इस चरण में हिंदुस्तान में ब्रिटिश उपनिवेशवाद अपने पैर पूरी तरह जमा चुका था। इससे टकराते हुए भारतीय अस्मिता का प्रश्न उठ रहा था कि आखिर यह है क्या और इसके कारक कौन से हैं। सामाजिक सुधार और धार्मिक सुधार को लेकर बड़े पैमाने पर बहस छिड़ी थी और उसमें स्त्री सुधार का मुद्दा अहम बन गया था क्योंकि स्त्री के कंधों पर ही भारतीय संस्कृति के मूल्यों को वहन करने का ज़ि़म्मा था। शिक्षा-व्यवस्था में सुधार इस पूरे सुधारवादी आंदोलन का महत्त्वपूर्ण अंग था। उस समय के सुधारकों के एक बड़े समूह द्वारा वैदिक युग को स्वर्ण युग के रूप में और वैदिक साहित्य में वर्णित गार्गी एवं मैत्रेयी को भारतीय संस्कृति के प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा था। ऐसे में संस्कृत ज्ञान ने रमाबाई को विशेष स्थान प्रदान किया। जब वे हज़़ारों मील का सफर तय करके दक्षिण भारत से कलकत्ता पहुँचीं तो प्रगतिशील ब्रह्मो समाज के लोगों तथा सुधारकों ने उन्हें हाथो हाथ लिया ‘सरस्वती’ और ‘पंडिता’ की उपाधि से विभूषित किया। सुधारकों को रमाबाई वैदिक युग से सीधे वर्तमान में चली आ रही साक्षात् गार्गी और मैत्रेयी लगीं। उनके द्वारा उस समय प्राचीन हिंदू स्त्री की जो तस्वीर खींची जा रही थी वह विदुषी सभाओं में शास्त्रार्थ करने की योग्यता रखनेवाली और धार्मिक अनुष्ठान में पुरुष की सहगामिनी ऋषिपत्नी और ऋषिपुत्री की थी। इस कसौटी पर रमाबाई खरी उतरती थीं। इसलिए राष्ट्रवाद के उभरे विमर्श में रमाबाई को राष्ट्र के आदर्श के रूप में स्थापित किया जाने लगा। उनसे अपेक्षा की जाने लगी कि संस्कृत के माध्यम से धार्मिक ज्ञान से लैस होकर वे भारतीय स्त्रियों के उद्धार के मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम देंगी और इसके माध्यम से भारत की गरिमा को पुनःस्थापित करंेगी।
समय गुज़़रने के साथ यह स्थिति बड़े नाटकीय तरीके से पलट गई। चूँकि रमाबाई ने समाज, धर्म और स्त्री जाति के कायदों के अनुसार अपने को नहीं ढाला, इसलिए उन पर चारों तरफ से प्रहार किए जाने लगे। पहले अपनी मज़ऱ्ी की शादी और फिर ईसाई बन जाने के उनके निर्णय ने उन्हें अपने प्रशंसकों के सामने चुनौती की तरह खड़ा कर दिया। हिंदू धर्म के दायरे से बाहर हो जाने से उनके समकालीन राष्ट्रवादी नेताओं और सुधारक मित्रों सबको बहुत निराशा हुई। वे स्त्रियों को शिक्षित करके जिस तरह के अंजाम देखना चाहते थे, उससे रमाबाई के जीवन का तालमेल नहीं बैठ रहा था। उनके सामने स्पष्ट हो गया कि उनका इस्तेमाल हिंदू समाज के अंदर की गड़बड़ियों, खासकर स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के काम में अब नहीं हो पाएगा। दयानंद सरस्वती, महादेव गोविंद रानडे, रामकृष्ण गोपाल भंडारकर जैसे लोगों को लगा कि वे अपने रास्ते से भटक रही हैं। तिलक आदि नेताओं ने अखबारों के ज़़रिए सार्वजनिक रूप से उन पर निशाना साधा। रमाबाई को आदर्श की जगह विध्वंसक और राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया गया और धीरे-धीरे उनका नाम लोगों की निगाहों से ओझल होता चला गया।
हमारे सामने रमाबाई के स्त्री संबंधी विचार उनकी असाधारणता को खुले तरीके से लाते हैं। आज से लगभग डेढ़ सदी पहले वे स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्माण के लिए शिक्षा की आवश्यकता और उसके लिए खुले आसमान की ज़़रूरत को महसूस कर रही थीं जोकि उनके समकालीन पुरुष सुधारकों के नज़़रिए से काफी भिन्न था। पुरुष सुधारकों के मतानुसार नए ज़़माने की कुशल गृहिणी एवं माता के रूप में ढालना ही स्त्री शिक्षा के प्रयासों का चरम लक्ष्य होना चाहिए। उसमें भी विधवाओं की शिक्षा दरअसल उनकी पूरी ऊर्जा को सकारात्मक शिक्षा में लगाने के लिहाज़़ से ज़़रूरी मानी गई और विधवा पुनर्विवाह अहम लक्ष्य बन गया। इसमें कोई दो राय नहीं कि विधवा पुनर्विवाह समाज को आगे ले जानेवाला कदम था, लेकिन इसकी सीमा को वे सुधारक नहीं पहचान रहे थे। दूसरी तरफ रमाबाई का स्पष्ट शब्दों में कहना था कि विधवा पुनर्विवाह एकमात्र रास्ता नहीं है।
Pandita-Ramabai
सशक्तीकरण के ठोस ज़़रिए के रूप में रमाबाई शिक्षा को देख रही थीं। उन्हें पता था कि स्त्रियों की किसी संसाधन तक पहुँच नहीं – न ज़़मीन-जायदाद, न रुपया-पैसा और न शिक्षा। उनका संसाधनहीन होना उन्हें घर-परिवार के भीतर एकदम अरक्षित स्थिति में डाल देता है। इस स्थिति में यदि वे पढ़ना चाहती भी हैं तो उनकी शिक्षा पूरी तरह परिवार के पुरुष सदस्यों की कृपा पर निर्भर करती है। यदि उनकी इच्छा और आज्ञा के खिलाफ जाकर वे पढ़ने के लिए घर से बाहर कदम निकालती हैं तो उन्हें सबकी दुत्कार सहनी पड़ती है। इसलिए उन्होंने स्त्रियों के लिए ऐसे आश्रम की स्थापना की जहाँ वे स्वतंत्र तरीके से अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकें। वहाँ वे केवल लिखने-पढ़ने का हुनर नहीं सीखती थीं, बल्कि वह आश्रम स्त्रियों के लिए पूरी वैकल्पिक जीवन व्यवस्था थी। वहाँ सबने मिलकर अपने लिए अनाज उगाया, लकड़ी के सामान बनाए चीज़़ों को बाज़़ार में जाकर बेचने की कला सीखी, किताबें बनाईं और छापीं भी। उन्होंने गुरु-शिष्य के परंपरागत रिश्तों से निकालकर एक आधुनिक केंद्र के रूप में अपने आश्रम को चलाया।
उनकी जीवनयात्रा इस बात को रेखांकित करती है कि क्षण विशेष में, संदर्भ विशेष में किस तरह जेंडर, जाति या वर्ग गढ़ा जाता है और कैसे उसमें परिवर्तन होता है। यही नहीं हमारा मानना है कि यह उस दौर और आज के दौर में भी राष्ट्र, परंपरा और आधुनिकता के विचार को परिभाषित करने में जेंडर की अहम भूमिका को पटल पर लाती है। इन सबकी स्त्री शिक्षा के स्वरूप एवं विषयवस्तु को गढ़ने में क्या भूमिका है, यह स्पष्ट होता है।
पंडिता रमाबाई के जीवन पर आधारित निरंतर प्रकाशन ‘भय नाहीं, खेद नाहीं’ की भूमिका से एक अंश 
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