हाॅकी खेलती लड़कियाँ

कात्यायनी पिछले 24 सालों से अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं। उन्होंने कई कविताएँ और कहानियाँ भी लिखी हैं। नीचे उनकी एक कविता से अंश दिया गया है।
आज शुक्रवार का दिन है
और इस छोटे से शहर की ये लड़कियाँ
खेल रही हैं हाॅकी, खुश हैं लड़कियाँ
फिलहाल खेल रही हैं हाॅकी, कोई डर नहीं
बाॅल के साथ दौड़ती हुई, हाथों में साधे स्टिक
वे हरी घास पर तैरती हैं
चूल्हे की आँच से, मूसल की धमक से
दौड़ती हुई बहुत दूर आ जाती हैं
लड़कियाँ पैनल्टी काॅर्नर मार रही हैं
लड़कियाँ पास दे रही हैं
लड़कियाँ गोल-गोल चिल्लाती हुई
बीच मैदान की ओर भाग रही हैं
लड़कियाँ एक-दूसरे के ऊपर ढह रही हैं
एक-दूसरे को चूम रही हैं
सीटी मार रही हैं और हँस रही हैं
इसी तरह खेलती रहती लड़कियाँ
निःसंकोच-निर्भीक दौड़ती भागती रहतीं इसी तरह
और हम देखते रहते उन्हें
hockey
पर शाम है कि होगी ही रैफरी है कि बाज़ नहीं आएगा
सीटी बचाने से और स्टिक लटकाए हाथों में
एक भीषण जंग से निपटने की तैयारी करती लौटेंगी घर
अगर ऐसा न हो तो समय रूक जाएगा
वज्रपात हो जाएगा, चक्रवात आ जाएगा
घर पर बैठे देखने आए वर पक्ष के लोग पैर पटकते चले जाएँगे
बाबू जी घुस आएँगे गरजते हुए मैदान में
भाई दौड़ता हुआ आएगा और झोंट पकड़कर घसीट ले जाएगा
अम्मा कोसेगी किस घड़ी में पैदा किया था ऐसी कुलच्छनी बेटी को
घर फिर एक अंधेरे में डूब जाएगा
सब सो जाएँगे लड़कियाँ घूरेंगी अंधेरे में
खटिया पर चित्त लेटी हुई अम्मा की लंबी साँसे सुनती
इंतज़ार करती हुई कि अभी वे आकर उनका सिर सहलाएँगी
सो जाएँगी लड़कियाँ
सपने में दौड़ती हुई बाॅल के पीछे
स्टिक को साधे हुए हाथों में पृथ्वी के छोर पर पहुँच जाएँगी
और गोल-गोल चिल्लाती हुई एक-दूसरे को चूमती हुई
लिपटकर धरती पर गिर जाएँगी
(निरंतर के प्रकाशन ‘हमारी कलम से’ में प्रकाशित)

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