समन्दर पार

पंडिता रमाबाई (1858-1922) का पूरा जीवन एक अनथक यात्रा है। जब वे छह महीने की थीं तभी उनके पिता सपरिवार तीर्थयात्रा पर निकल पड़े थे। पुराण बाँचते हुए पूरे परिवार ने भारत भ्रमण किया। उसी बीच उनकी पारंपरिक शिक्षा-दीक्षा हुई। यात्रा के दौरान अकाल में उनके माता-पिता की मृत्यु हो गई। आगे उन्होंने इंग्लैंड जाना तय किया जिसको लेकर लोगों में हलचल मच गई थी। उस समय समुद्र यात्रा को पाप माना जाता था। और उसमें भी स्त्री का अकेले जाना किसी के गले नहीं उतर रहा था। रमाबाई ने यह पत्र महाराष्ट्र के अपने मित्र सदाशिव पाडुरंग केलकर के नाम लिखा था। उन्होंने मराठी भाषा में इसे किताब की शक्ल में छपवा दिया। इंग्लैंड यात्रा के बारे में लिखी गई यह किताब बिकेगी, ऐसी उम्मीद थी। छपाई का खर्च निकल जाने के बाद बिक्री के पैसे रमाबाई की पढ़ाई के खर्चे के काम आएँगे, यह भी इरादा था।
सेंट मेरीज़ होम, इंग्लैंड
प्रिय भाई,
कल दोपहर में आपका पत्र मिला। उसे पढ़ते समय मेरे मन की हालत क्या थी, इसे बता नहीं सकती। अपने लोगों को छोड़कर दूर चले जाने वाला आदमी ही यह समझ सकता है कि मैं क्या महसूस करती हूँ। आप इसे दूसरे अर्थ में नहीं लीजिएगा, मगर यहाँ पर आना मेरी खुशकिस्मती है। अभी तक मैंने बहुत परेशानियाँ झेली हैं और उसके बाद यहाँ का जीवन वाकई सुखमय लगता है। ईश्वर ने यह अच्छा मौका मुझे दिया है।
मनुष्य का जीवन एक नाटक है। हम रंगमंच पर जो देखते हैं, वह मिथ्या है। हकीकत में हमारा जीवन ही नाटक है। लगभग एक साल पहले मैंने आपको बताया था कि मैं यूरोप जाना चाहती हूँ। मेरा इरादा है कि वहाँ जाकर मैं मेडिकल की पढ़ाई करूँ। 20 अप्रैल, 1883 की शाम बंबई से हम ‘एस.एस. बुखारा’ नामक पानी के जहाज़ से इंग्लैंड के लिए रवाना हुए। आप सबने यह यात्रा करने से मना किया था। और मैं अपने दोस्तों से ऊपर नहीं हूँ, लेकिन मुझे लगा कि मुझे जाना चाहिए। मैं इंग्लैंड गई ताकि अपने आपको जीवन और आगे के काम के लिए तैयार कर सकूँ। मेरा फैसला सही है और मैंने वही किया जो करना चाहिए था।
जहाज़ में मेरा केबिन बहुत सँकरा था। छः सीट थी, पर हम तीन ही थे – मैं, मेरी बेटी मनोरमा और मेरी दोस्त आनंदीबाई भगत। हमारे साथ कोई विदेशी नहीं रहना चाहता था, इसलिए हमें सुविधा ही हुई। सत्ताइस दिन का पूरा सफर था। उसमें हम लगभग आधा पेट खाकर रहे या कहिए  आधा भूखे। कारण यह था कि जहाज़ पर जो खाना मिलता था, वह खाया नहीं जा रहा था। फिर भी मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। उसकी कृपा से कम से कम समुद्र के बीचोबीच खाना तो मिल रहा था।
मुझे शुरू से मुश्किल का सामना करने का अभ्यास है। इसलिए दूसरों की तुलना में कम दिक्कत हुई। पहले भी अपने पिता के साथ जहाज़ की यात्रा कर चुकी थी। अपनी माँ-बहन-भाई सबके साथ जहाज़ से मंगलोर से बंबई और बंबई से द्वारका गई थी। इंग्लैंड की इस यात्रा में एडेन देश होते हुए 1 मई, 1883 को हम स्वेज़ बंदरगाह पहुँचे। वहाँ हमने जहाज़ बदला और कलकत्ता से आ रहे दूसरे जहाज़ पर सवार हुए। इस जहाज़ का नाम था ‘एस.एस. केसरी-ए-हिन्द’। यह स्टीमर हालाँकि ज़्यादा बड़ा था, पर भीड़ भी उतनी ही थी।
चार दिन बाद हम जिब्राल्टर देश पहुँचे। उसके बाद समुद्र ने भयानक रूप धारण कर लिया। हमारा स्टीमर बहुत झटके खा रहा था। इतना कि हम केबिन के एक छोर से दूसरे छोर तक एक दूसरे पर लुढ़के जा रहे थे। सारे मुसाफिरों की हालत खराब थी। यदि हम खड़े होने की कोशिश करते तो दीवार से सिर जा टकराता था। 16 मई को लंदन के पास के एक बंदरगाह पर स्टीमर ने लंगर डाला। बंदरगाह पर सेंट मेरीज होम (ईसाई नन की संस्था) से दो सिस्टर मुझसे मिलने आईं। उन्होंने मेरा प्रेम पूर्वक स्वागत किया। उनमें से एक सिस्टर का परिचय मुझ से पूना शहर के सेंट मेरीज़ होम में हुआ था। उनके साथ एक और सज्जन थे, जो बाद में चले गए। सिस्टर के साथ मैं सेंट मेरीज़ होम  पहुँची, जहाँ अच्छे से स्वागत हुआ।
फिलहाल यहाँ आकर मैंने अपनी पढ़ाई शुरू कर दी है। नई दिनचर्या में रम गई हूँ। काफी कुछ पढ़ना और जानना-समझना है। भारत में क्या चल रहा है, इसकी खोज-खबर भी रखती हूँ। अभी यहाँ बाहर घूम-फिरकर नहीं देखा है। आपको फिर लिखूँगी, जब कुछ जान समझ लूँगी।
आपकी रमा
(निरंतर की पत्रिका ‘आपका पिटारा’ के 98वे अंक ‘दुनिया की सैर में प्रकाशित)
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