संघर्ष जारी है

समानता…….औरत और आदमी के बीच समानता…… औरत और आदमी के बीच समानता होनी चाहिए ऐसा सभी मानते हैं पर क्या हकीकत में हमारे और आपके परिवारों में ऐसा है। कुछ लोग ये दावा कर सकते हैं कि उनके यहां आदमी और औरत बराबर हैं और शायद हों भी, पर ये कितने परिवारों और महिला पुरूषों के बीच की हकीकत है? अपने काम के दौरान अक्सर जो हकीकत सामने आती है वो यह कि गांव की महिलाओं से जब औरत और आदमी के बीच की समानता के बारे में बात करती हैं तो उन्हें बहुत अजीब लगता है। वो तो पहले से ही यह मानकर बैठी हैं कि आदमी सर्वोपरी हैं और महिलाओं का स्थान उनके बाद आता है। जो ऐसा नहीं भी मानतीं, वे ये मानती हैं कि उनके परिवार में पति उनको महत्त्व देते हैं और जहां ज़रूरी हो उनकी बात सुन भी ली जाती है। पर सवाल ये है कि जहां ज़रूरी हो का क्या मतलब है? क्या यही समानता है?

हाल ही के एक प्रशिक्षण में महिलाओं और पुरूषों के द्वारा किए जाने वाले काम और विभिन्न संसाधनों पर किसका हक होता है, इनपर चर्चा के द्वारा हम समानता की बात करने का प्रयास कर रही थीं। बात की शुरूआत हुई कहानी सुनाने से।

इस कहानी में सोहन अपनी पत्नी रामप्यारी को रोज़ाना ये ताना देता है कि घर का थोड़ा सा काम करके खाना बनाकर खेत लाने में वह देर कर देती है। जब रामप्यारी कहती है कि घर के काम बहुत हैं तो सोहन दावा करता है कि वह रामप्यारी की तुलना में कम समय में घर का काम पूरा करके दिखा सकता है। फिर क्या अगले दिन रामप्यारी तो जाती है खेत और सोहन अपने दावे को सच करने में जुट जाता है… मगर घर का काम इतना अधिक होता है कि उससे संभल नहीं पाता। हडबडाहट में किसी तरह खाना लेकर खेत पर पहुंचता है, मगर जल्दी में धोती पहनना ही भूल जाता है।

इस कहानी से शुरूआत हुई महिलाओं और पुरूषों के काम पर चर्चा की और उनके द्वारा किए जाने वाले कामों की सूची बनाने की। जब हम महिलाओं और पुरूषों के द्वारा किए जाने वाले कामों की सूची बना रही थीं तो प्रतिभागियों को ये देख हैरानी हुयी कि आदमियों के कामों की सूची में उनका सुबह उठकर हग कर आना और शाम में काम से आकर आराम करना भी दर्ज हो गया। वहीं दूसरी ओर इसके विपरीत दिखाई दिया कि महिलाओं को दिनभर में घर-खेत के कामों के बीच आराम करने का समय ही बहुत कम मिलता है। मगर इसके बावजूद वे अपने काम को आदमियों से हर तरह से कम मानती हैं और अक्सर उन्हें घर पर बैठने का और कुछ न करने का ताना झेलना पड़ता है।

इसके साथ ही चर्चा हुई संसाधनो पर हक की। चर्चा में पहले तो प्रतिभागियों ने कहा कि उनके घर पर उनका हक है पर जब उदाहरण देकर उनसे पूछा गया कि मान लें कि उन्होंने पति की मर्ज़ी के खिलाफ नौकरी करने का फैसला लिया होता तो उन्हें सबसे पहले क्या सुनने को मिला होता? सभी प्रतिभागियों से एकमत निकलकर आया कि उन्हें उसी घर से निकल जाने का फरमान जारी हो जाता। तो फिर वह घर उनका कैसे हुआ? चर्चा को और आगे बढ़ाते हुए जब उनसे पूछा कि उनकी नौकरी से मिले वेतन पर हक किसका होगा तो दस में से सात प्रतिभागियों का कहना था कि  उस पैसे पर उन्हीं का हक होगा। वे उस पैसे को अपनी मर्ज़ी से खर्च कर सकती हैं। मगर फिर निकल कर आया कि इस मर्ज़ी में पति या घर के मुखिया पुरूष की सहमति होना आवश्यक है। इस चर्चा के दौरान मुझे झारखंड़ में काम करने वाली टीचर के साथ हुई एक घटना याद आ गई।

दरअसल झारखण्ड में प्रौढ़ केन्द्र पर पढ़ाने वाली इस टीचर ने अपने पति से कहा कि उसने अपनी नौकरी से जो पैसे इकट्ठे किए हैं उनसे वह स्कूटी खरीदना चाहती है। इससे उसे सेन्टर जाने में सहुलियत होगी। पति ने मना किया पर वह ज़िद करने लगी। इसपर पति ने उसे बहुत मारा। बावजूद इसके उसने स्कूटी खरीद ली। पति को यह बात इतनी नागवार गुज़री कि उसने दोबारा न केवल पत्नी की पिटाई की बल्कि स्कूटी भी तोड़ दी। प्रतिभागियों के साथ जब इस घटना को सांझा किया तो संसाधनों पर हक की चर्चा में उन्होंने यह बात कही कि दीदी आप सही कह रही हैं। महिलाओं का हक केवल नाम के लिए ही होता है। सभी संसाधनों पर मालिकाना हक/नियंत्रण तो पुरूषों का ही होता है। हालांकि चर्चा के अन्त में यह भी जुड़ा कि आजकल महिलाओं के नाम पर ज़मीन या घर लिखवाया जाता है और वह इसलिए कि ऐसा करने पर रजिस्ट्री में कुछ प्रतिशत की छूट मिलती है, पर इससे भी उस ज़मीन या घर को बेचने का फैसला महिला नहीं कर सकती है, क्योंकि असल नियंत्रण तो पुरूष का ही होता है।

जब शाम में चर्चा में शामिल एक प्रतिभागी ने अपने पति को सत्रों के दौरान हुई चर्चा के बारे में बताया तो सुनते ही पति ने कहा – ‘ये दीदी क्या घर तुड़वाने आई हैं?’ यह सुनना मेरे लिए नया नहीं था। इस तरह के प्रशिक्षणों में, जहां पर महिला और पुरूषों के बीच गहरी असमानता पर बात की जाती है, प्रशिक्षक की छवि घर तुडवाने वाले की ही बनाई जाती है। मैं अक्सर ये सवाल करती हूं कि आखिर ऐसा क्यों? क्यों समानता की बात करना घर तोड़ने जैसा लगता है? जब तक औरत चुप है तब तक घर परिवार बना हुआ है। क्या इसलिए कि औरत को बराबरी और अपने हक की बात करनी ही नहीं चाहिए। यदि औरत अपने हक को समझेगी और बराबरी की बात करेगी तो पुरूष को ये नागवार गुज़रेगा और यदि वह नहीं मानेगी तो दोनो साथ न रह पाएंगे। तो क्या आंखें मूंद कर चुपचाप रहना और ऊपर से ये चोला ओढ़ लेना कि घर में बराबरी है, सब ठीक है, सही है?

एक बात और जो इस तरह की चर्चाओं में होती है वह यह कि अक्सर प्रतिभागी प्रशिक्षक को एक रोल मॉडल के रूप में देखने लगती हैं और उसके निजी जीवन में झांकने की कोशिश करती हैं। वे ये जानना चाहती हैं कि जो इतनी बराबरी की बात कर रही हैं, वे अपने घर में कितनी बराबरी से जीती हैं? इसलिए अधिकतर ये सवाल किये जाते हैं कि क्या आपकी शादी हो गई है? आपके पति आपके साथ ही रहते हैं? ऐसे में मुझे लगता है कि प्रतिभागियों से यह सांझा करना बहुत ज़रूरी है कि प्रशिक्षकों की जिंदगी भी इतनी सुलझी और साफ-सुथरी नहीं है। हम सभी अपने-अपने स्तर पर संघर्ष कर रही हैं। ज़रूरत है तो इस गैर बराबरी को पहचानने की और जब भी जहां भी मौका मिले इसपर चोट करने की, आवाज़ उठाने की।

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