जानिये सावित्रीबाई फुले के जीवन से जुड़ी 7 बातें

सावित्रीबाई फुले का नाम कितनी ही बार शिक्षा या फिर नारीवादी मुद्दों के बारे में बात करते हुए आता है। उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर लड़कियों की शिक्षा तक पहुँच बनाई, जाति प्रथा और जेंडर के आधार पर भेदभाव का विरोध किया, और अपने समय में प्रचलित कई पुराने कायदों को चुनौती दी। उनकी सोच सिर्फ उनके काम में नहीं, बल्कि उनकी पूरी ज़िन्दगी में झलकती है। आइये सुलझाते हैं उनके जीवन के बारे में कुछ पहेलियाँ और जानते हैं उन्हें और बेहतर तरीके से। Continue reading

शिक्षा और स्वतंत्रता की तलाश में

दिल्ली की अलग अलग पुनर्वासित कॉलोनियों में परवाज़ अडोलोसेंट सेंटर फॉर एजुकेशन (PACE) प्रोजेक्ट के तहत ड्रॉपआउट किशोरियों को साक्षर करने के लिए लर्निंग सेंटर खोले गए हैं. पढ़ाई के अलावा किशोरियों को यह भी मौक़ा दिया जाता है कि वो अपनी जानकारी, अपनी समस्याओं और ज्ञान को लिखित रूप दे सकें. इसके लिए सेंटर में सभी किशोरियां मिलकर ब्रॉडशीट तैयार करती हैं. समूह में किशोरियों को अपनी ज़िन्दगी के किसी मुद्दे या पहलू को लेकर ब्रॉडशीट बनानी होती है. उस मुद्दे पर किशोरियां आपस में चर्चा करती हैं. फिर सभी अपने अपने मनपसंद तरीकों और रंगों से अपने लेख लिखती हैं और सजाती हैं. कई किशोरियां अपने लेख से जुड़े चित्र भी बनाती हैं. ब्रॉडशीट के नाम से लेकर उसकी कलाकारी इत्यादि की ज़िम्मेदारी खुद वही निभातीं हैं.

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बेबी हालदार: अक्षरों से की ज़िन्दगी में रौशनी

समाज की दर्जाबंदी ने महिलाओं और पिछड़ी जाति के लोगों के साथ भेदभाव को बरक़रार रखा है और उनकी आवाज को दबाया है। महिला आन्दोलन में बाबा साहेब अम्बेडकर की भूमिका और जाति आधारित सामाजिक ढांचे पर उनके द्वारा उठाये गए सवाल आज भी मायने रखते हैं। उन्होंने जाति आधारित, सामाजिक ढांचे को महिलाओं के खिलाफ माना और महिलाओं को जन आन्दोलनों में शामिल होने के लिए उत्साहित किया। महिलाओं के ऊपर धर्म आधारित और धार्मिक ग्रंथो द्वारा उल्लेखित भेदभाव को उन्होंने बार–बार समाज के सामने उभारा।

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महिलाओं के खिलाफ हिंसा की यह भी है एक वजह

25 नवम्बर को अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस था। न जाने कितने ऐसे अंतर्राष्ट्रीय दिवस आए और चले गए। महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा कम होने के बजाए और अधिक बर्बर होती जा रही है।

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पिटारा पत्रिका

औरत की ‘न’ में ‘हाँ’ होती है, यह ज़्यादातर माना जाता है। मगर ये मान्यता कितनी सही है और इस मान्यता के कारण या मर्दों द्वारा ‘न’ ना सुन पाने के कारण कितनी औरतों को हिंसा सहनी पड़ती है या जान गँवानी पड़ती है क्या हम कभी ठहरकर ये सोचते हैं?

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“कौन सी आज़ादी मांग रहे हो?” – Pinjra Tod Strikes Back!

Their fight has been lately catching national attention, with support pouring in from feminist groups and individuals across the country. But they have continued to fight and march against discrimination and sexism for some time now.

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In their latest march against student political group ABVP, they are not just tackling college politics but confronting a Patriarchal structure, especially in university campuses.

Here are a few slogans on what their fight is about and against.

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#pinjratod is an autonomous collective effort to ensure secure, affordable and not gender-discriminatory accommodation for women students across Delhi.