चुप नहीं रहूंगी

‘दहलीज़ से परे: पेस सेंटर में आने वाली लड़कियों की दास्तान’ निरंतर का प्रकाशन है। इस किताब में निरंतर द्वारा चलाए जा रहे परवाज़ अडोलसेंट सेंटर फॉर एजुकेशन (पेस) में आने वाली 8 लड़कियों की ज़िंदगी की झलक मिलती हैं। आइये पढ़ें इसका अंश और जाने इनमे से एक लड़की की कहानी : 
 
अनम का नाम लेते ही हँसती हुई लड़की की छवि, मेरे सामने आ आती है। हमारे सेंटर में कुछ ही शादीशुदा लड़कियाँ थीं, चूँकि अनम शादीशुदा थी इसलिए उसकी दोस्ती उसी की हमउम्र और पड़ोसन अज़रा से थी। उसको सेंटर तक लाने में अज़रा की कोशिश और मेहनत थी। जिस दिन वह अनम को सेंटर लाई हमें एहसास हुआ कि बिना संस्था या अन्य लोगों की मदद के लड़कियाँ एक दूसरे पर कितनी छाप छोड़ सकती हैं।
 
fullpage anam newअगले दिन थोड़ा शर्माते हुए उसने बताया कि उसे सेंटर की सभी चीज़ें और गतिविधियाँ काफी अलग लगीं। सब लड़कियों को देखकर उसे काफी अच्छा लगा। इससे पहले त्रिलोकपुरी में लड़कियों को ऐसे एक साथ नहीं देखा था। अब अनम रोज़ सबसे पहले सेंटर पहुँच जाती। अपने और अपने परिवार के बारे में बहुत सी बातें बताती। उसके पास रोज़ कोई नया किस्सा होता था, जो वह सेंटर में आकर ज़रूर ब्यान करती। 
 
त्रिलोकपुरी में अनम शादी के बाद आई है। शादी से पहले वह अपने परिवार के साथ मुज़फ्फरनगर में रहती थी। गरीबी और रिश्तेदारों की बातों में आकर उसकी शादी काफी कम उम्र में कर दी गई। जब शादी की बात चलने लगी तो उसे पता चला कि लड़का दिल्ली में रहता है। दिल्ली शहर की चकाचौंध और नए जीवन की कल्पना से वह काफी उत्साहित थी। शादी के बाद, अपने पति के साथ दिल्ली आ गई। अनम ने बताया कि उसके पति को पैर में तकलीफ थी जिसकी वजह से वह चल नहीं सकता था। रोज़गार के नाम पर थोड़ा बहुत लकड़ी का काम करता था लेकिन इसकी वजह से अनम को अपने सास-ससुर पर ही निर्भर रहना पड़ता था। दिल्ली आकर उसे लगा कि ज़िंदगी इतनी आसान नहीं है। कई तरह की समस्याएँ थीं। शादी के फौरन बाद, उसे अपने पति के रंगढंग का पता चला। छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई-झगडे़ आम बात हो गई थी। उसका पति, सास- ससुर और देवर किसी न किसी बात पर लड़ते और गुस्सा आने पर पिटाई भी कर देते थे। उसने बताया कि शादी के दौरान ससुराल वालों को कुछ भी दहेज नहीं मिला। बिना किसी लेनदेन की शादी हुई थी। इसलिए उन लोगों का गुस्सा अक्सर लड़ाई-झगड़े का रूप ले लेता था। रोज़ के झगड़े इतने बढ़ गए थे कि किसी पड़ोसी को भी कुछ बोलने या बचाने की हिम्मत नहीं होती थी। सभी मूक दर्शक की तरह रोज़ तमाशा देखते थे। ऐसे ही जीवन चलता रहा और इसी बीच उसके तीन बच्चे भी हो गए।
 
घर की बातों और तनाव की वजह से सेंटर की गतिविधियों में अनम का ज़्यादा ध्यान नहीं लगता था। लिखने-पढ़ने में उसे दिक्कत आती थी क्योंकि वह कभी स्कूल नहीं गई थी, सिर्फ दीनी तालीम ली थी और उर्दू पढ़ना ही उसने सीखा था। घर की परेशानियों ने उसके दिमाग को घेर रखा था, घर पर होने वाली हिंसा और मानसिक तनाव की वजह से वही बातें उसके दिमाग में कौंधती रहती थीं। एक दिन उसने बताया कि उसके दोनों बेटे उसे गालियाँ देते हैं और अनपढ़ होने की वजह से हमेशा मज़ाक उड़ाते हैं। ऐसे ही बात करते-करते उसने हँसकर कहा, “मैं पढ़ाई करके अपने पति और बच्चों को जवाब देना चाहती हूँ” गुज़रते दिनों के साथ अनम अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों को सुनाने लगती। सेंटर की कुछ लड़कियों की उसकी बातों में कोई रूचि नहीं दिखती थी क्योंकि उन्हें लगता था कि उसकी शादीशुदा ज़िंदगी को क्या सुनना। ऐसा ही कुछ अनम भी सोचती जब दूसरी लड़कियाँ अपने दोस्तों और उनसे रिश्तों की बातें करतीं। लेकिन सेंटर की ज़्यादातर लड़कियाँ, शादी, रिश्तों और आगे के जीवन को लेकर काफी उत्साहित दिखती थीं। अनम अपने छोटे बच्चे को लेकर आती थी और रोज़ थोड़ा जल्दी निकलकर अपने बड़े बेटे को स्कूल छोड़ने जाती थी। चर्चा के दौरान वह अपने बच्चों के बारे में बताती थी। उसने बताया कि उसके बच्चे सेंटर का नाम लेकर उसे डराते थे। उन्हें लगता था कि स्कूल की तरह यहाँ भी डांट और पिटाई लगती होगी। 
 
एक दिन शाम को घर पर पढ़ते समय, उसके बेटे ने हँसते हुए कहा, “अम्मी, अपनी किताब तुम भी पढ़ लो नहीं तो टीचर पिटाई करेगी।” अनम ने बताया, “दीदी मेरे बड़े बेटे को घड़ी देखनी नहीं आती। सेंटर में गणित सीखने के बाद, मैंने उसे घड़ी देखना सिखाया। मुझे बहुत मज़ा आया” उस दिन अनम के चेहरे पर अलग ही खुशी थी। पूरे दिन काफी उत्साहित दिखाई दे रही थी। अनम के बच्चे की बातें सुनकर समझ में आता है कि पढ़ाई का खौफ बच्चो में कितना हावी है। अनम और उसके बच्चों का साथ में सीखना और पढ़ाई को ज़िंदगी से जोड़ना कितना अलग अनुभव था। अनम कभी अपने बच्चों के बीच खुद बच्चा बनकर उनकी बातें सुनती थी तो कभी माँ बनकर उन्हें हिंदी और गणित की कुछ चीज़े सिखाती थी।
 
सेंटर में एक दिन सभी के साथ समूह में रिश्तों को लेकर बात चल रही थी। अनम सत्र में काफी उत्साहित लग रही थी। किसी एक लड़की के अनुभव सुनने के बाद उसने अपनी बात बतानी शुरू कर दी। सभी उसे देख कर हैरान थे क्योंकि प्यार और रिश्तों से जुड़ी बातों को बताने में पहले वह बहुत शर्माती थी और कोई रूचि नहीं दिखाती थी। लेकिन उस दिन उसने बताया कि किसी भी रिश्ते में भरोसा बहुत ज़रुरी है क्योंकि शक की वजह से उसका पति रोज़ उससे लड़ता था। अनम का एक रिश्ते का भाई जिससे कभी अनम की शादी की बात चली थी, उसका अक्सर घर में आना जाना रहता था। इसी बात से उसके पति को ऐतराज़ था। यही नहीं, अगर कभी अनम फोन पर अपनी बहन या रिश्तेदारों से बात करती हुई दिख गई या खुश नज़र आ गई तो उसे ऐसा लगता था कि किसी ‘यार’ से बात कर रही है। अनम अपने पति के मुकाबले दिखने में काफी सुंदर है। शायद इसीलिए हमेशा वह उस पर शक करता है और उसे मारता-पीटता है। एक दिन उसने अनम के साथ मार-पिटाई करके उसका मोबाइल भी तोड़ दिया था। उसने अनम को किसी से मिलने और बात करने से भी मना किया था। उसने थप्पड़ मारते हुए कहा, “अगर तुमने किसी से मिलने और बात करने की कोशिश की तो तुम्हारी खैर नहीं। बहुत देख लिया तुम्हारा नाटक”। लेकिन इन सबके बावजूद, अनम किसी से अपने दिल की बात नहीं कह पाती थी। 
 
सिर्फ पड़ोस में अज़रा के घर जाकर या फिर सेंटर में हमारे साथ बात करके कभी-कभी अपना दिल हल्का कर लेती थी। शुरू-शुरू में तो उसे लगता था कि घर की बात बाहर नहीं जाए तो अच्छा है। लेकिन जब हिंसा को लेकर उससे यह बात हुई कि किसी के साथ शारीरिक या मानसिक हिंसा करना अपराध है। हिंसा सहने से ही हिंसा करनेवाले ज़्यादा हावी होते हैं। ऐसा सुनकर उसकी हिम्मत बंधी। लेकिन इसके बावजूद वह पति और परिवार के खिलाफ खुलकर कुछ भी कदम नहीं उठा पाई।
 
Anam and violent husbandकुछ महीनों बाद, कई दिनों तक अनम सेंटर नहीं आई। सभी लड़कियों से उसके बारे में पूछा, किसी को कुछ खास नहीं मालूम था। अज़रा ने बताया कि अनम अपने घर के माहौल की वजह से काफी परेशान है। इन्ही कारणों से वह सेंटर भी नहीं आ पा रही है। फिर, हमने अज़रा के घर अनम को बुलवाया। उसके आने पर अज़रा बोली, “बाजी, अनम तो पता नहीं क्या-क्या बातें सोच रही थी। इसने तो खुदकुशी या करने की सोच ली थी”। 
 
ऐसा सुनकर, पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। हमने अनम की तरफ देखा, वह बिल्कुल चुप थी और बहुत बेबस भी। ऊपरी मन से मुस्कराने की कोशिश करते हुए बातें छिपाने की कोशिश कर रही थी। हमने उससे पूछा, “क्या बात है अनम? तुमने ऐसा कैसे सोच लिया?” ऐसा सुनते ही, अनम की आँखें भर आईं। उसने कहा, “बाजी, मैं रोज़-रोज़ की मार-पिटाई से परेशान हो गई हूँ। अब ये सब बर्दाश्त करना मेरे बस की बात नहीं है। मैं इस सबसे छुटकारा पाना चाहती थी। इसीलिए ऐसा ख्याल मेरे दिमाग में आया।” बातचीत के दौरान, अनम ने अपने परिवार के बारे में कई और चीज़े भी बताईं। उसकी बातों से साफ पता चल रहा था कि इतना सबकुछ होने के बावजूद भी, न ही वह अपने पति को छोड़ना चाहती थी, न ही, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाना चाहती थी। बातों ही बातों में मैंने कहा, “तुम इतना परेशान हो तो पुलिस में रिपोर्ट क्यों नहीं कर देतीं?” उसने दुखी होकर बोला, “बाजी, इस परिवार के आलावा, मेरा इस शहर में कोई नहीं है। जीने के लिए कुछ साधन तो चाहिए। बिना कमाई के बच्चों का गुज़ारा कैसे होगा।” 
 
ऐसी स्थिति को देखकर लगता है कि सिर्फ कानून बनाने से लोगों की ज़िंदगी में, उनके रिश्तों में बदलाव नहीं आएगा। सवाल यह है कि क्या महिलाएँ इस लड़ाई को लड़ने के लिए तैयार हैं? और अगर तैयार भी हैं तो क्या सभी के पास आगे बढ़ने के अवसर हैं? क्या ऐसे रिश्तों को तोड़कर आगे जीने के अवसर नहीं मिल सकते? ऐसे ही और कई सवालों के बादे में सोचते हुए हम अनम से मिलकर वापस आ गए। अगले दिन सेंटर में अनम को देखकर हम बहुत खुश हुए।  
 
एक दिन हम सभी लड़कियों के साथ खेल से जुड़ी गतिविधि कर रहे थे, सभी लड़कियाँ अपने पसंद के खेल के बारे में बता रही थीं और अनम कुछ सोच रही थी। पूछने पर उसने बताया कि बचपन में उसे खेलना बहुत पसंद था लेकिन शादी के बाद, उसे खेलने का मौका नहीं मिला। फिर, हँसते हुए बोली कि कभी-कभी अपने बच्चों के साथ दरवाज़ा बंद करके खेल लेती है। सभी लड़कियाँ उसकी बातें सुनकर हँसने लगी। हम सोच रहे थे कि ऐसा खेल करवाया जाए जिसमें ज़्यादा भाग दौड़ नहीं हो क्योंकि अनम एक पाँव को सीधा करके खड़ी नहीं हो सकती थी।
 
लेकिन, अनम को देखकर हम सभी हैरान हो गए। अनम ने अपना दुपट्टा बाँधा और सभी से साथ दौड़ने लगी। जब तक सभी थके नहीं वह भी खेलती रही। अनम के चेहरे पर हँसी और खेल में बच्चों वाली शरारत को देखकर जैसे हमें भी ऊर्जा मिल रही थी। कुछ घंटो के लिए ही सही, सभी अपने बचपन में पहुँच गए थे और खेलने में मशगूल थे। खेल के बाद, अनम ने हँसकर बचपन की शरारत भरी कहानियाँ सुनाईं जिन पर सभी हँस-हँसकर लोटपोट हो रहे थे। उसकी मस्ती का आलम देखकर लग रहा था कि कुछ देर के लिए ही सही वह अपने घर की ज़िम्मेदारियों और परेशानियों को भूल चुकी थी। 
 
अनम सेंटर की सभी गतिविधियों में खुलकर भागीदारी करने लगी थी। एक सत्र में हम सभी, किशोरावस्था को लेकर चर्चा कर रहे थे। शुरुआत में कुछ लड़कियाँ अपनी बात कहने में झिझक रही थीं लेकिन जब अनम ने अपना अनुभव सबके साथ बाँटा, तो सभी उसकी बातों में रूचि लेने लगे। उसने बताया कि कैसे उसके गाँव में किशोरियों की छाती पर गरम लोहा बाँधा जाता है जिससे छाती का विकास कम हो जाए। बचपन में अनम की छाती पर भी गरम लोहा बाँधा गया था और इसकी वजह से काफी दिनों तक घाव भी रहा। चर्चा की गतिविधियों के दौरान वह सहज रूप से अपनी बातें बताने लगी थी। शरीर, किशोरावस्था और रिश्तों वाले सत्रों में अनम की अहम भूमिका दिखने लगी थी और नाज़ुक मुद्दों पर भी गहराई से चर्चा होने लगी थी। अब अनम खेल और गतिविधियों के दौरान अपने गम को भूलकर, खुलकर मस्ती करने लगी थी। 
 
Anam warning her husbandकोर्स पूरा हुआ और इसके तीन-चार महीने बाद हम समुदाय की लड़कियों से एक बार फिर से मिलने गए। जब हम अमन के घर पहुँचे तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसने सबको गले से लगाया और अपना हाल बताया। उसने चहककर कहा, “बाजी मेरा पति फिर से मुझे मारने की कोशिश कर रहा था। फिर मैंने उसे धमकाया और कहा, “अगर तू नहीं मानेगा तो मैं दीदी से बोलकर महिला आयोग में शिकायत दर्ज करवा दूँगी और इस घर को छोड़कर किसी महिलाओं की संस्था में रहने चली जाऊँगी। मुझे अकेले मत समझना। उसे मेरी बातें सुनकर काफी हैरानी हुई। वो बिल्कुल चुप हो गया। उस दिन के बाद से, कभी उसने मेरे ऊपर हाथ उठाने की हिम्मत नहीं की।“ उसने यह भी बताया कि वह अपने बच्चों को एक संस्था द्वारा चलाए जा रहे सेंटर में पढ़ाई के लिए भेजती है और उनकी पढ़ाई पर ध्यान देती है। जब हम उसके घर से निकलने लगे तो उसने कहा, “बाजी, अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। आप सबके इतना समझाने के बाद, मैंने हिम्मत जुटाकर पुलिस को बुलाया और सास-ससुर के खिलाफ केस दर्ज करवाने की बात कही। अब सास ससुर कभी बुरा-भला नहीं कहते। मैं अपने पति के साथ अलग रहती हूँ।” वापस आते हुए हम सोचने लगे कि पढ़ाई और जेंडर पर हुई चर्चा का जो असर पूरे दस महीने तक उसपर नहीं दिखा, वह अब उसके जीवन की गहराइयों तक पहुँच चुका है।
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खोल दो

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सआदत हसन मंटो का जन्म पंजाब के लुधियाना ज़िले में हुआ था।  उन्होंने बहुत कुछ लिखा – कहानियां, नाटक, लेख।  देश के बटवारे ने मंटो को तोड़ और झकझोर कर रख दिया।  और इस पर उन्होंने कई कहानियां लिखीं।  उन्होंने अपनी आँखों से पंजाब में हो रहे दंगे देखे।  मार काट देखी। आम आदमी को शैतान बनते देखा।  ‘खोल दो’ आम आदमी में पैदा हुयी इसी हैवानियत का नमूना है।  यहाँ हम निरंतर द्वारा प्रकाशित किताब से इस कहानी को दे रही है, जिसमे इसको आसान भाषा में लिखा गया था, ताकि नवसाक्षर भी इसे पढ़ सकें, चित्रांकन ऑरिजीत सेन का है।  

अमृतसर से रेल रवाना हुई। लाहौर पहुंचते -पहुंचते आठ घंटे लेट हो गई। रास्ते में कई लोग मारे गए। कई घायल हुए और बहुत सारे लापता थे। देश के बंटवारे का समय था।
सिराज को होश आया तो सुबह हो गई थी। उसकी आंखों के सामने सब कुछ घूम गया। लूट… हमला… आग… भागना… स्टेशन… गोलियां… सकीना। हां… सकीना कहां गई ? सिराज एक दम उठ खड़ा हुआ। घंटों अपनी जवान बेटी को ढूंढा। पर सकीना नहीं मिली।
चारों ओर लोग अपनों को खोज रहे थे। आखि़र सिराज थक-हार कर बैठ गया। सोचने लगा- ‘सकीना और उसकी मां से कब और कहां बिछड़ा था?’ अचानक सकीना की मां का मरा शरीर आंखों के सामने आया। उसका चिरा हुआ पेट। ख़ून से लथ-पथ साड़ी। दम तोड़ते हुए उसकी आख़री आवाज़ सिराज आज भी सुन सकता था – ‘‘सकीना को लेकर भाग जाओ ! मुझे रहने दो। हमारी बच्ची को बचा लो।’’ सकीना की कलाई कस के पकड़, सिराज भागा। नंगे पांव, पागलों की तरह दोनों भागते गए। फिर सकीना का दुपट्टा गिर पड़ा। दुपट्टा उठाने सिराज पलभर को रूका था। भागती भीड़ के पांवों से बचाकर दुपट्टा उठाया था ….. अरे! दुपट्टा तो आज भी उसकी जेब में है। पर सकीना कहां गई?
सिराज ने अपने थके दिमाग़ पर बहुत ज़ोर दिया। सकीना कब बिछड़ी? वह रेलवे स्टेशन तक आई या नहीं? गाड़ी में बैठी या नहीं? दंगा करनेवाले उसे उठा तो नहीं ले गए? सिराज को कुछ याद नहीं आ रहा था। कई दिन, बेटी का दुपट्टा जेब में लिए, सिराज इसी तरह भटकता रहा।
फिर एक दिन कुछ आशा बंधी। सिराज को आठ नौजवान लड़के मिले। उनके पास लाठियां थीं। बंदूकें थीं। एक ट्रक भी था। लड़कों ने बताया कि वे दूसरी तरफ़ छूटी औरतों और बच्चों को वापस ला रहे हैं। सिराज ने बेटी का हुलिया बतासा, ‘‘गोरा रंग है। बड़ी-बड़ी आंखें। काले बाल। दाहिने गाल पर मोटा सा तिल। उम्र सत्रह साल। सकीना नाम है। मेरी बेटी को ढूंढ लाओं। खुदा दुआएं देगा।’’ नौजवानों ने कहा- ‘‘अगर आपकी बेटी ज़िंदा है तो हम उसे खोज निकालेंगे।’’
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वे अमृतसर की ओर रवाना हुए। वहां से लौट रहे थे कि एक लड़की सड़क पर दिखी। उसने नौजवान लड़कों को देखा, वह डर कर भागने लगी। लड़कों ने ट्रक रोका और उसके पीछे भागे। कुछ दूरी पर उसे रोक लिया। लड़कों ने दिलासा दिया, ‘‘घबराओ नहीं। क्या तुम सिराज की बेटी सकीना हो ?’’ अनजान होठों पर अपना नाम सुनकर लड़की चौंकी। पर उसने माना- ‘‘हां, मैं सकीना हूं।’’ लड़कों ने उसे सिराज तक पहुंचाने का वादा किया। और सकीना उनके साथ ट्रक में चल दी।
कई दिन गुज़रे। सिराज को सकीना की कोई ख़बर नहीं मिली। फिर एक दिन वही नौजवान लड़के दिखे। सिराज भागा-भागा उनके पास गया। पूछा- ‘‘बेटा, मेरी सकीना का पता चला?’’ लड़कों ने जवाब दिया- ‘‘अभी तक नहीं मिली।’’
उसी दिन शाम की बात है। चार आदमी एक बेहोश लड़की को अस्पताल ले जा रहे थे। सिराज उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। हिम्मत कर, वह अस्पताल के अंदर गया। वहा लड़की पलंग पर पड़ी थी। किसी ने बत्ती जलाई। कमरे में अचानक रोशनी हो गई। सिराज चीख़ा- ‘‘सकीना! यही है सकीना।’’ पास खड़े डाक्टर ने सिराज को घूर कर देखा। बड़ी मुश्किल से सिराज बोला- ‘‘जी मैं इसका बाप हूं।’’ डाक्टर ने सकीना की नब्ज़ देखी और खिड़की की ओर इशारा करके कहा- ‘‘खोल दो।’’
‘खोल दो’ सुन कर सकीना ज़रा सी हिली। यह देख सिराज ख़ुशी से चीख़ पड़ा- ‘‘मेरी बेटी ज़िंदा है! ज़िदा है।’’ सकीना की आंखें अब भी बंद थीं। पर उसके बेजान हाथ शलवार का नाड़ा टटोलने लगे। धीरे-धीरे नाड़ा खोला। शलवार नीचे सरककाई। और पैर चौड़े कर दिए। डॉक्टर ने शर्म से आंखें नीचे कर लीं। उसके माथे पर पसीने की बूंद चमक आई।
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फेरीवालों की आवाजें

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पुराने ज़माने में फेरीवाले दिल्ली की ज़िंदगी का एक हिस्सा थे। उनके बिना जीवन नीरस हो जाता। कोई रिहायशी या कारोबारी जगह ऐसी नहीं थी जहाँ फेरीवाले नहीं आते-जाते थे। गली-मुहल्ले, कूचे-बाज़ार, दफ्तर-मदरसे कोई चप्पा उनसे नहीं बचा था।
फेरीवाले अपने सौदे को बड़ी मज़ेदार भाषा में बेचते थे। भाषा ही नहीं उनकी आवाज़ भी लच्छेदार और बुलंद होती थी। आदमी को अगर चीज़ न भी लेनी हो तो ले ले। उनकी आवाज़ सुनकर खरीदने की इच्छा मन में पैदा हो जाती। गा-गाकर सौदे बेचने का यह रिवाज मुगलों के ज़माने में शाहजहाँ के काल से शुरू हुआ। उस समय से लेकर फेरीवालों की आवाज़ें हाल फिलहाल तक सुनाई पड़ती रही हैं।
दिल्ली की गलियों में फेरीवालों की भाषा और उनके बोलने का अंदाज़ देखिए। गंडेरीवाला आकर मुहल्ले के एक कोने में बैठ जाता है। उसके हाथ में एक सरौता है। वह गन्ने को छीलकर गंडेरियाँ एक कपड़े पर बिछाता है। और हाँक लगाता है, ”पेट का भोजन, हाथ की टेकन होंठों से छीलो, कटोरा भर शरबत पी लो।“ मूँगफली के रसिया सारे दिल्लीवाले थे। मूँगफलीवाले की तान सुनिए, “ले लो पिशावर की गरियाँ, चीना बादाम की गरियाँ।“
दिल्लीवालों में औरतों और मर्दों दोनों को पान खाने का बड़ा शौक था। अक्सर घरों में पानदान होता था। पानवाले गली-गली घूमकर पान बेचा करते, “हरियाला है, मतवाला है, अच्छे जोबन वाला है, मेरे पान का यह बीड़ा।“ दिल्ली में कई मुहल्लों में औरतें फेरी पर सौदा बेचती थीं। ज़रा दिन चढ़ता तो कोई अपना छीबा लिए पहुँच जाती। बड़े मजे़दार कचालू बेचती। दोने में वह बच्चों को कचालू पकड़ाती जाती। उसके मुँह से दुआएँ निकलती रहतीं, “अल्लाह उमर दें, नेक नसीबा हो।”
बारिश के छींटे दिल्ली में पड़ते और शहतूत और जामुन बिकने लगतीं। उधर से ऊदेे यानी बैंगनी रंग का फालसा बेचनेवाले की आवाज़ आती, “ऊदे ऊदे नोन के बतासे, शरबत को।“ मौसम के मुताबिक फेरीवाले हर फल लाते रहते थे। गर्मियों में आमवाला चिल्लाता, “लड्डू हैं पाल के, बासी पराँठे के संग खा लो।“ खरबूज़ेवाला लहक-लहककर गाता, “नन्हे के अब्बा चक्कू लाना चख के लेना, फीके या मीठे सच्ची कहना।“ बीच में कोई शकरकंदवाला बोल उठता, “बिन कढ़ाई का हलवा, शकरकंदी।“ ककड़ियोंवाला ककड़ियों को पानी से तर करता रहता, “लैला की उँगलियाँ, मजनूँ की पसलियाँ। तैर कर आई हैं बहते दरियाव में।“
गली में अचानक आवाज़ आती, “चने की दाल में घुलाव, भाड़ में भुलभुलाओ।“ बेचनेवाला बैंगन का नाम नहीं लेता था। केवल इशारों में बता देता था कि क्या बेच रहा है। बेरवाला खनकता, “काँटा चुभ गया, बिखर गए बेर, घँूघटवाली ने भई तोड़े हैं बेर।“ खजूरवाला आमतौर पर शाम को आता था और दलील देता, “कलकत्ते से मँगाई है और रेल में आई है।“ दही के बड़े और पकौड़ेवाला आता तो उसके गिर्द एक भीड़ लग जाती थी। “दही के बड़े, मियाँ-बीबी से लड़े।“ और “खाओ पकौड़ी, बनो करोड़ी।“ पानी के बताशे यानी गोलगप्पेवाला किसी को देखता कि ज़ुकाम हो रहा है तो कहता, “पानी के बताशे खाओ, नज़ला भगाओ।“
कभी पटरी पर और कभी चैराहे पर दुकान जमाए बनियानवाला बोलता रहता “बड़े-बड़े बनियान, गरमियों की जान। मियाँ ले लो बनियान, बढ़ाओ अपनी शान।“ मद्रास की तरह दिल्ली में भी फूल जगह-जगह बिकते थे। फूलवाले की आवाज़ की महक लीजिए, “ये कटोरे हैं गुजराती मोतिया के। फूल लो जी चीनी के, कंठे अलबेली के।“ उधर एक संदूक बेचनेवाला आवाज़ लगाता, “हमसे मंदा कोई न बेचे, नौ रुपए के तीन, मियाँजी नौ रुपए के तीन।“ ज़रा टोपीवाले का आवाज़ लगाने का रंग देखिए, “सर की इज़्ज़त चार आने को। इज़्ज़तदारों के सौदे, सरदारों के सौदे। चार आने को, चार आने को।“ लकड़ी के तख्ते पर धड़ाधड़ जूता बजने की आवाज़ पर मुड़िए तो जूतेवाला नज़र आता। उसका ज़ोरदार दावा है, “टूटे न फूटे जान ले के छूटे और छह महीने कब्र पर धरा रहे।“
गली के मुहाने पर रेवड़ियाँ लिए एक खोमचेवाला खड़ा दिख जाता। वह पुकारता जाता, “दिल्ली शहर बड़ा गुलदस्ता, जिसमें बने रेवड़ी खस्ता। लिया स्कूल का सीधा रस्ता। आकर खावे रेवड़ी खस्ता, खाकर जाए मदरसा हँसता।“
आज भी फेरीवाले तो बहुत घूमते हैं मगर वह तुकबंदी और फड़कते वाक्य अब कहाँ हैं। वह माहौल एकदम बदल गया है। न वह दिल है, न मिज़ाज।

स्रोत: युवा पिटारा श्रृंखला : भाषा के रंग ढंग, निरंतर

दीदी की शादी

COVER
निरंतर, शिक्षा और जेंडर पर काम करने वाले एक समूह के रूप में बाल विवाह या कम उम्र में शादी के मुद्दे से कई बार रूबरू हुआ लेकिन इसे महिलाओं के साथ जुड़ी जेंडर की हकीकतों के संदर्भ में ज़्यादा देखा गया, बाल विवाह के मुद्दे की तरह कम। आज बदलते सामाजिक व आर्थिक परिवेश में हमें लगा कि बाल विवाह अथवा कम उम्र में शादी के मुद्दे को नारीवादी नज़रिए से समझने और विश्लेषित करने की ज़रूरत है। इसके लिए निरंतर ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘अर्ली और चाइल्ड मैरिजः ए लैण्डस्केप एनालिसिस’, नाम से अध्ययन किया। 
अध्ययन करने के लिए हमने सात राज्यों और लगभग 19 संस्थाओं का दौरा किया। जिसके अंतर्गत इस मुद्दे से जुड़े विभिन्न लोगों जैसे, युवा लड़के-लड़कियाँ, माता-पिता, पंचायत सदस्य, प्रशासन अधिकारी, स्वयं सहायता समूहों इत्यादि से बातचीत की। इसके अलावा एक राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन भी आयोजित किया जिसमें 38 संस्थाओं से 42 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। साथ ही इस क्षेत्र में कार्य कर रहे विशेषज्ञों तथा अन्य क्षेत्र के विशेषज्ञों जिनका इस मुद्दे से जुड़ाव बनता है उनसे व्यक्तिगत साक्षात्कार किए व जानकारियाँ इकट्ठी कीं।
बाल विवाह या कम उम्र में शादी पर हमारी जो समझ बनी उसे कहानी के रूप में पिरोकर आपके सामने लाए ‘पंख होते तो उड़ जाती’ पुस्तिका में।  आइये पढ़ें इस पुस्तिका से एक अंश: 
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आज रूबी को मम्मी ने स्कूल नहीं जाने दिया, ‘‘मौसी के घर जाना है उनकी, बेटी की शादी है।’’ एक तो उसको गुस्सा आ रहा था कि मम्मी ने स्कूल नहीं जाने दिया, दूसरा रूही की शादी है ये जानकर तो जैसे उसके तन-बदन में आग लग गई। फट पड़ी एक दम मम्मी के ऊपर, ‘‘क्या ज़रूरत है इतनी जल्दी शादी की। अभी मुश्किल से 16 साल की ही तो हुई है।’’ रूही रूबी से एक साल ही बड़ी है। रूही के कारण ही उसका नाम रूबी पड़ा। दोनों बहनें एक साथ खेलकर बड़ी हुई हंै। अब उसकी शादी हो रही है और वो हमेशा के लिए ससुराल चली जाएगी। ये सोचकर अब उसे गुस्से के साथ-साथ दुख भी हो रहा है।
वो जाकर ज़रूर रूही से बात करेगी और पूछेगी कि उसने इन्कार क्यों नहीं किया शादी से। लेकिन अभी तो वो अपनी भड़ास मम्मी पर ही निकाल रही है। ‘‘क्यों उसकी पढ़ाई होने तक इंतज़ार नहीं कर सकते मौसी-मौसा?’’ उसने तीखे स्वर में मम्मी से पूछा। उन्होंने थोड़ा हँसते हुए कहा, ‘‘तुम क्यों इतनी परेशान हो! वो कोई दूध पीती बच्ची नहीं है, दो महीने में 16 की पूरी होकर 17वें में लग जाएगी। एक अच्छा लड़का मिल गया है रूही को भी कोई एतराज़ नहीं है।’’ रूबी बिल्कुल नहीं मान सकती थी कि इसमें रूही की भी इच्छा है। मौसा-मौसी अपना बोझ उतारने के लिए ऐसा कर रहे हैं, ये मानते हुए वो मम्मी से आगे बहस करने लगी। इतनी देर से दोनों की बातें सुन रहे पापा ने थोड़ा झिड़क कर कहा, ‘‘ये क्या तुम दोनों में बहस चल रही है? तबसे सुन रहा हूँ।’’ इतना सुनकर मम्मी तो सहम गईं लेकिन रूबी इतनी आसानी से मानने वाली नहीं थी। फुसफुसा कर मम्मी से बोली, ‘‘मैं तो ज़रूर मौसी से बात करूँगी और रूबी से भी। उसका क्या दिमाग खराब है जो कि इस तरह की बातें कर रही है।’’ मम्मी अब और इस बात को बढ़ाना नहीं चाहती थीं, सो जान छुड़ाने के लिए कह दिया, ‘‘जो मन में आए करना अभी तो जाओ, वरना हम दोनों की शामत आएगी।’’
मौसी के घर पहुँचते ही वो भागी रूबी से मिलने के लिए लेकिन मौसी ने बताया कि वो अपनी सहेली के घर गई हुई थी। रूबी के अन्दर तो भुकंप मचा हुआ था और वो अपनी बात कहे बिना अब रह नहीं सकती थी, अपने गुस्से को थोड़ा दबाते हुए लाड से बोली, ‘‘मौसी क्यों कर रही हो दीदी की शादी? अभी तो उनकी उम्र 18 से कम है।’’ मौसी उसकी बात सुनकर हँसते हुए बोलीं, ‘‘और अगर 18 की होती तो क्या होता? उसका शरीर मज़बूत हो जाता, बच्चे जनने के लिए, बच्चे स्वस्थ होते, ये ही बताएगी न तू मुझे। पिछले हफ्ते एक संस्था वाले भी आकर यही बताकर गए हैं।’’
रूबी का मुँह अब देखने लायक था, वह नहीं जानती थी कि मौसी को यह सब बातंे पता हंै। फिर भी रूही की शादी 18 से पहले कर रही हैं। रूबी ने इस पर कहा, ‘‘सब जानती हो तो ऐसा क्यों कर रही हो?’’ मौसी थोड़ा गंभीर होते हुए बोलीं, ‘‘देख बिटिया हमारे पास इतने पैसे नहीं है कि बेटी को घर बिठा कर बड़ी उम्र में ज़्यादा दहेज देकर शादी करें। और फिर लड़के कौन सा गली-गली मिलते हैं। किस्मत से अच्छा लड़का मिल गया है, उसे भी पसंद है तो फिर क्या फर्क पड़ता है एक दो साल से। लेकिन अगर इससे न किया तो फिर न जाने ऐसा अच्छा रिश्ता कब मिले। और फिर हम कौन सा उसकी शादी दस साल में कर रहे हैं जो तुम इतना परेशान हो।’’
अब तो रूबी का जैसे सब्र का बाँध टूट गया। गुस्से से बोली, ‘‘क्या मतलब है मौसी, 10 साल में नहीं कर रहीं? 15-16 साल भी कोई शादी की उम्र नहीं है। ये उम्र है पढ़ने की, अपनी ज़िंदगी बनाने की, अपने भविष्य की तैयारी करने की।’’ इस पर मौसी ने तुरंत नहले पे दहला मारा, ‘‘वो ही तो कर रही हूँ-भविष्य की तैयारी। शादी ही उसका भविष्य है।’’ रूही यह सुनकर अन्दर तक सिहर गई। उसने कभी नहीं सोचा कि शादी ही उसका भविष्य है लेकिन उसके मम्मी-पापा और आस-पास के सभी लोग शादी को ही एकमात्र भविष्य मानते हैं।
रूबी ने मन ही मन ठाना कि वो रूही से इस बारे में बात करेगी। वो तो नए ज़माने की है, वो ज़रूर समझेगी कि रूबी क्या कहना चाहती है। रात को आखिर दोनों बहनें साथ बैठीं तो रूबी को मौका मिल ही गया बात करने का।

सिस्टम पास, बच्चे फेल

imageबाल शिक्षा अधिकार 2009 के तहत इस देश के सभी बच्चों को यह गांरटी दी गई है कि उन्हें न्यूनतम स्तर की इमारत, किताबें, वर्दी, शिक्षक व शिक्षा मिलेगी और यह सब देने की ज़िम्मेदारी सरकार की होगी। इसके अतंर्गत शिक्षा को एक अच्छा जीवन जीने की मूलभूत आवश्यकता के रूप में देखा गया है।

इस अधिकार के बनने पर इसे पूरी तरह से देश के सभी हिस्सों में लागू करने के लिए सरकार को तीन साल का समय दिया गया था, लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी यह कानून पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया है। पहली बार जीने के अधिकार को अन्य मूलभूत अधिकारों से जोड़ते हुए शिक्षा को इसके दायरे में लाया गया है। लेकिन सरकार चाहे कांग्रेस की हो या बी‐जे‐पी, की इस अधिकार को हकीकत बनाने के लिए जो इच्छाशक्ति और बजट चाहिए वह कभी नहीं मिला। पिछले तीन सालों में यह सिर्फ एक नाम बनकर रह गया है।

बाल शिक्षा अधिकार कानून की मौजूदा स्थिति को समझे और आंके बिना, शिक्षा के कार्यक्रम, जैसे- सर्व शिक्षा अभियान और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान मिलकर समग्र शिक्षा अभियान हो गए। समग्र शिक्षा अभियान में एक दो जगह बाल शिक्षा अधिकार का ज़िक्र है लेकिन इसे असली चोला पहनाने के लिए जिस रफ्तार और प्रतिवद्धता से काम होना था, नहीं हुआ है। बाल अधिकार के मुख्य बिन्दुओं में शिक्षकों की पर्याप्त उपस्थिति, पढाने के नियमित घंटे और सिखाने की ज़िम्मेदारी शिक्षक की होना शामिल हैं। कानून यह स्पष्ट तौर पर मानता है कि बच्चे एक भयमुक्त और दबावरहित वातावरण में बेहतर सीखते हैं इसलिए उनपर किसी तरह की शारीरिक मारपीट अथवा फेल होने का डर नही होना चाहिए।

इन सभी आयामों को यदि आज के संदर्भ में आंकलित करें तो आंकड़े बताते हैं कि अभी भी लगभग 40 प्रतिशत शिक्षकों की स्कूलों में कमी है, अभी भी शिक्षक शिक्षा से ज़्यादा अन्य कामों में व्यस्त रहते हैं। स्कूलों में कितने घंटे पढाई हो रही है और इसकी क्या गुणवत्ता है, इस बात की कोई मॉनिटरिंग नही होती है। और यहाँ हम इमारत, पानी व शौचालय की बात तो कर ही नहीं रहे हैं। शिक्षा के नाम पर गरीब और पिछड़े समुदाय के बच्चों (क्योंकि अब वे ही सरकारी स्कूलों में आते है) और लड़कियों को जो दिया जा रहा उसकी गुणवता जांचने और आंकने के लिए न कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है और न ही किसी की जबावदेही है। यदि स्कूलों में पढाई का स्तर अच्छा नहीं है तो व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक किसकी क्या जबावदेही है. इसपर न कोई बात करता है और न ही किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही होती है (भ्रष्टाचार के कारणों को छोड़कर)।

यही सिस्टम जो शिक्षा की गुणवत्ता की जबावदेही के दायरों से मीलो दूर है, अब बच्चों को जबावदेह बनाने के लिए कमर कस चुका है। शिक्षा व्यवस्था ने अपनी गुणवत्ता कितनी बेहतर की है, यह सवाल कोई नहीं पूछ रहा लेकिन शिक्षा व्यवस्था ने यह तय कर लिया है कि बच्चे ठीक परफॉर्म नही कर रहे इसलिए इन्हे फेल करना ज़रूरी है। हमारे शिखर पर बैठे शिक्षा की दिशा तय करनेवाले संस्थानों ने भी माना है कि शिक्षा व्यवस्था नहीं बच्चों की जबावदेही तय करना ज़रूरी है। अभी जबकि बाल शिक्षा अधिकार कानून पूरी तरह से लागू भी नहीं हो पाया है, इसके तहत एक नियम सबके लिए नासूर बन गया है जिसके अनुसार कोई भी स्कूल बच्चों को फेल नही कर सकता और न ही आगे की कक्षा में जाने से रोक सकता है। बिना किसी वैज्ञानिक सर्वे या अध्ययन या सबूत के सबने तय कर लिया है कि शिक्षा की गिरती गुणवत्ता का एक की कारण हैं ‘बच्चे’। बच्चों को फेल नहीं किया जा रहा है इसलिए उनपर पढने का काई दबाव नही है और इसलिए शिक्षा का स्तर गिर गया है। तो अब अगर भारत का सुनहरा भविष्य बनाना है तो फेल होने के डर और दबाव में जीना और खासतौर पर पढना-सीखना ज़रूरी है। शिक्षक पढाए न पढाए, किताबे मिलें न मिले, स्कूल जाने की व्यवस्था हो न हो, शिक्षक स्कूल आएं न आएं लेकिन बच्चों की ज़िम्मेदारी है कि वे पढे और पास हो जाएं।

सिस्टम तो फेल होता नहीं, न हो सकता है और न होगा। फेल होगें बच्चे ही। और उन्हें फेल करके क्या सिस्टम खुद को अव्वल दर्जे का साबित कर देगा?