“I Am Going Solo” – Women and Their Travel Stories

“The map was just an accessory. She knew exactly where she was.” ― Galt Niederhoffer

To step out of the house, travel to faraway places, explore the world or even loiter in the in the narrow alleys in one own city is a joy that women are most often kept away from. Famously, explorers in history and fables have always been and portrayed as male. It’s worth exploring why none of these words ever  bring to mind the image of a woman who steps out of her house, to have a nice time, travels to different places alone, or just loiter around?

Travelling has its own zest which fills people with excitement, anticipation, and thrill. Women have time and again spoken about their passion for adventure and traveling, though only some have managed to see these dreams to fruition. Why? The control of underlying structures of patriarchy on women’s bodies and their sexuality have set rigid norms to limit mobility, decision making, and financial independence of women. Travel often involves transgressing several of these norms and facing social reproach in its wake.

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मज़दूर दिवस और समान मज़दूरी कानून

समान मज़दूरी कानून होने के बावजूद भी हमारे देश में महिलाओं को पुरुषों  से कम मज़दूरी मिलती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पुरुषों को अगर 100 रुपए मिलते हैं तो महिलाओं को केवल 70 रूपए। गांवों में तो इससे भी कम मज़दूरी मिलती है।

काम की पूरी मज़दूरी मिलनी चाहिए। काम चाहे महिला करे या पुरुष। मज़दूरी दिए बिना कोर्इ भी किसी से काम नहीं करा सकता। आमतौर पर महिलाओं को पुरुषों से कम मज़दूरी दी जाती है। इसलिए सरकार ने समान मज़दूरी का कानून बनाया।

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स्कूल की लड़कियाँ

(ज़्ाफ़र जहाँ बेगम, ‘तहज़्ाीबे निस्वाँ’, 1927)
जो लड़कियाँ स्कूलों में तालीम पाती हंै, तालीमे निस्वाँ के मुख़ालिफ़ीन (विरोधियों) की निगाहें उनके तमाम हालात का मुआएना निहायत ग़्ाौर से करती रहती हैं। और ज़्ारा कोई बात खि़लाफ़े मामूल (दस्तूर के खि़लाफ) नज़्ार आई नहीं कि फ़ौरन इसकी गिरफ़्त हो जाती है। और तमाम इल्ज़्ााम स्कूल की तालीम पर थोप दिया जाता है। हालाँकि इसी कि़स्म के उयूब (बुराइयाँ) घर की लड़कियों में भी मौजूद हों तो कोई परवाह नहीं की जाती और किसी पर इल्ज़्ााम नहीं आता। मसलन आजकल लड़कियों में अमूमन फ़ैशन की वबा रोज़्ा बरोज़्ा तरक़्क़ी पर है। घर के ख़ास कर बावर्चीख़ाने के कामों को अपने हाथ से करना आर (शर्मिंदगी) समझती हैं। अब घर की लड़कियों पर ज़्यादा से ज़्यादा इन बातों पर बड़ी बूढि़याँ नाराज़्ा हो लेती हैं। लेकिन बेचारी स्कूल वालियों की तो वो शामत आती है कि कुछ न पूछिए।

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Kalam-e-Niswan — Anthology of Muslim Women’s writings

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To develop a deeper understanding of Muslim women’s education, we explored its history. The Jamia Milia Library in Delhi and the Khuda Baksh Library in Patna were scoured for women’s journals and magazines, and we came across important writing by Muslim women. From politics to education, they have covered a range of issues with their pens. We have compiled some of these writings from various Urdu publications in the form of a book, titled Kalam-e-Niswan. The pieces have not been translated from Urdu to Hindi, but transliterated, keeping the flavour of the writing intact. Meanings of difficult and unfamiliar words have been provided so the text is accessible for readers.

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ऐसा मज़ाक क्यों ?

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पति-पत्नी बैठे बात कर रहे थे। पति ने कहा: मैंने सुना है कि स्वर्ग में पति-पत्नी को एक-दूसरे से अलग कर दिया जाता है। पत्नी: ऐसा क्यों?  पति: इसलिए ही तो उसे स्वर्ग कहते हैं!
पत्नी या औरतों का आतंक, उनका पैसे-गहनों से लगाव और बातूनी होना या फिर उनका मोटा या पतला, खूबसूरत या बदसूरत होना मज़ाक के विषय हैं। जैसे ऊपर के चुटकुले का मतलब है कि पत्नी के साथ रहना नरक समान है। ऐसे चुटकुलों से पता चलता है कि समाज में औरतों से जुड़ी क्या धारणाएँ हैं।

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