दीदी की शादी

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निरंतर, शिक्षा और जेंडर पर काम करने वाले एक समूह के रूप में बाल विवाह या कम उम्र में शादी के मुद्दे से कई बार रूबरू हुआ लेकिन इसे महिलाओं के साथ जुड़ी जेंडर की हकीकतों के संदर्भ में ज़्यादा देखा गया, बाल विवाह के मुद्दे की तरह कम। आज बदलते सामाजिक व आर्थिक परिवेश में हमें लगा कि बाल विवाह अथवा कम उम्र में शादी के मुद्दे को नारीवादी नज़रिए से समझने और विश्लेषित करने की ज़रूरत है। इसके लिए निरंतर ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘अर्ली और चाइल्ड मैरिजः ए लैण्डस्केप एनालिसिस’, नाम से अध्ययन किया। 
अध्ययन करने के लिए हमने सात राज्यों और लगभग 19 संस्थाओं का दौरा किया। जिसके अंतर्गत इस मुद्दे से जुड़े विभिन्न लोगों जैसे, युवा लड़के-लड़कियाँ, माता-पिता, पंचायत सदस्य, प्रशासन अधिकारी, स्वयं सहायता समूहों इत्यादि से बातचीत की। इसके अलावा एक राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन भी आयोजित किया जिसमें 38 संस्थाओं से 42 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। साथ ही इस क्षेत्र में कार्य कर रहे विशेषज्ञों तथा अन्य क्षेत्र के विशेषज्ञों जिनका इस मुद्दे से जुड़ाव बनता है उनसे व्यक्तिगत साक्षात्कार किए व जानकारियाँ इकट्ठी कीं।
बाल विवाह या कम उम्र में शादी पर हमारी जो समझ बनी उसे कहानी के रूप में पिरोकर आपके सामने लाए ‘पंख होते तो उड़ जाती’ पुस्तिका में।  आइये पढ़ें इस पुस्तिका से एक अंश: 
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आज रूबी को मम्मी ने स्कूल नहीं जाने दिया, ‘‘मौसी के घर जाना है उनकी, बेटी की शादी है।’’ एक तो उसको गुस्सा आ रहा था कि मम्मी ने स्कूल नहीं जाने दिया, दूसरा रूही की शादी है ये जानकर तो जैसे उसके तन-बदन में आग लग गई। फट पड़ी एक दम मम्मी के ऊपर, ‘‘क्या ज़रूरत है इतनी जल्दी शादी की। अभी मुश्किल से 16 साल की ही तो हुई है।’’ रूही रूबी से एक साल ही बड़ी है। रूही के कारण ही उसका नाम रूबी पड़ा। दोनों बहनें एक साथ खेलकर बड़ी हुई हंै। अब उसकी शादी हो रही है और वो हमेशा के लिए ससुराल चली जाएगी। ये सोचकर अब उसे गुस्से के साथ-साथ दुख भी हो रहा है।
वो जाकर ज़रूर रूही से बात करेगी और पूछेगी कि उसने इन्कार क्यों नहीं किया शादी से। लेकिन अभी तो वो अपनी भड़ास मम्मी पर ही निकाल रही है। ‘‘क्यों उसकी पढ़ाई होने तक इंतज़ार नहीं कर सकते मौसी-मौसा?’’ उसने तीखे स्वर में मम्मी से पूछा। उन्होंने थोड़ा हँसते हुए कहा, ‘‘तुम क्यों इतनी परेशान हो! वो कोई दूध पीती बच्ची नहीं है, दो महीने में 16 की पूरी होकर 17वें में लग जाएगी। एक अच्छा लड़का मिल गया है रूही को भी कोई एतराज़ नहीं है।’’ रूबी बिल्कुल नहीं मान सकती थी कि इसमें रूही की भी इच्छा है। मौसा-मौसी अपना बोझ उतारने के लिए ऐसा कर रहे हैं, ये मानते हुए वो मम्मी से आगे बहस करने लगी। इतनी देर से दोनों की बातें सुन रहे पापा ने थोड़ा झिड़क कर कहा, ‘‘ये क्या तुम दोनों में बहस चल रही है? तबसे सुन रहा हूँ।’’ इतना सुनकर मम्मी तो सहम गईं लेकिन रूबी इतनी आसानी से मानने वाली नहीं थी। फुसफुसा कर मम्मी से बोली, ‘‘मैं तो ज़रूर मौसी से बात करूँगी और रूबी से भी। उसका क्या दिमाग खराब है जो कि इस तरह की बातें कर रही है।’’ मम्मी अब और इस बात को बढ़ाना नहीं चाहती थीं, सो जान छुड़ाने के लिए कह दिया, ‘‘जो मन में आए करना अभी तो जाओ, वरना हम दोनों की शामत आएगी।’’
मौसी के घर पहुँचते ही वो भागी रूबी से मिलने के लिए लेकिन मौसी ने बताया कि वो अपनी सहेली के घर गई हुई थी। रूबी के अन्दर तो भुकंप मचा हुआ था और वो अपनी बात कहे बिना अब रह नहीं सकती थी, अपने गुस्से को थोड़ा दबाते हुए लाड से बोली, ‘‘मौसी क्यों कर रही हो दीदी की शादी? अभी तो उनकी उम्र 18 से कम है।’’ मौसी उसकी बात सुनकर हँसते हुए बोलीं, ‘‘और अगर 18 की होती तो क्या होता? उसका शरीर मज़बूत हो जाता, बच्चे जनने के लिए, बच्चे स्वस्थ होते, ये ही बताएगी न तू मुझे। पिछले हफ्ते एक संस्था वाले भी आकर यही बताकर गए हैं।’’
रूबी का मुँह अब देखने लायक था, वह नहीं जानती थी कि मौसी को यह सब बातंे पता हंै। फिर भी रूही की शादी 18 से पहले कर रही हैं। रूबी ने इस पर कहा, ‘‘सब जानती हो तो ऐसा क्यों कर रही हो?’’ मौसी थोड़ा गंभीर होते हुए बोलीं, ‘‘देख बिटिया हमारे पास इतने पैसे नहीं है कि बेटी को घर बिठा कर बड़ी उम्र में ज़्यादा दहेज देकर शादी करें। और फिर लड़के कौन सा गली-गली मिलते हैं। किस्मत से अच्छा लड़का मिल गया है, उसे भी पसंद है तो फिर क्या फर्क पड़ता है एक दो साल से। लेकिन अगर इससे न किया तो फिर न जाने ऐसा अच्छा रिश्ता कब मिले। और फिर हम कौन सा उसकी शादी दस साल में कर रहे हैं जो तुम इतना परेशान हो।’’
अब तो रूबी का जैसे सब्र का बाँध टूट गया। गुस्से से बोली, ‘‘क्या मतलब है मौसी, 10 साल में नहीं कर रहीं? 15-16 साल भी कोई शादी की उम्र नहीं है। ये उम्र है पढ़ने की, अपनी ज़िंदगी बनाने की, अपने भविष्य की तैयारी करने की।’’ इस पर मौसी ने तुरंत नहले पे दहला मारा, ‘‘वो ही तो कर रही हूँ-भविष्य की तैयारी। शादी ही उसका भविष्य है।’’ रूही यह सुनकर अन्दर तक सिहर गई। उसने कभी नहीं सोचा कि शादी ही उसका भविष्य है लेकिन उसके मम्मी-पापा और आस-पास के सभी लोग शादी को ही एकमात्र भविष्य मानते हैं।
रूबी ने मन ही मन ठाना कि वो रूही से इस बारे में बात करेगी। वो तो नए ज़माने की है, वो ज़रूर समझेगी कि रूबी क्या कहना चाहती है। रात को आखिर दोनों बहनें साथ बैठीं तो रूबी को मौका मिल ही गया बात करने का।
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सिस्टम पास, बच्चे फेल

imageबाल शिक्षा अधिकार 2009 के तहत इस देश के सभी बच्चों को यह गांरटी दी गई है कि उन्हें न्यूनतम स्तर की इमारत, किताबें, वर्दी, शिक्षक व शिक्षा मिलेगी और यह सब देने की ज़िम्मेदारी सरकार की होगी। इसके अतंर्गत शिक्षा को एक अच्छा जीवन जीने की मूलभूत आवश्यकता के रूप में देखा गया है।

इस अधिकार के बनने पर इसे पूरी तरह से देश के सभी हिस्सों में लागू करने के लिए सरकार को तीन साल का समय दिया गया था, लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी यह कानून पूरी तरह से लागू नहीं हो पाया है। पहली बार जीने के अधिकार को अन्य मूलभूत अधिकारों से जोड़ते हुए शिक्षा को इसके दायरे में लाया गया है। लेकिन सरकार चाहे कांग्रेस की हो या बी‐जे‐पी, की इस अधिकार को हकीकत बनाने के लिए जो इच्छाशक्ति और बजट चाहिए वह कभी नहीं मिला। पिछले तीन सालों में यह सिर्फ एक नाम बनकर रह गया है।

बाल शिक्षा अधिकार कानून की मौजूदा स्थिति को समझे और आंके बिना, शिक्षा के कार्यक्रम, जैसे- सर्व शिक्षा अभियान और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान मिलकर समग्र शिक्षा अभियान हो गए। समग्र शिक्षा अभियान में एक दो जगह बाल शिक्षा अधिकार का ज़िक्र है लेकिन इसे असली चोला पहनाने के लिए जिस रफ्तार और प्रतिवद्धता से काम होना था, नहीं हुआ है। बाल अधिकार के मुख्य बिन्दुओं में शिक्षकों की पर्याप्त उपस्थिति, पढाने के नियमित घंटे और सिखाने की ज़िम्मेदारी शिक्षक की होना शामिल हैं। कानून यह स्पष्ट तौर पर मानता है कि बच्चे एक भयमुक्त और दबावरहित वातावरण में बेहतर सीखते हैं इसलिए उनपर किसी तरह की शारीरिक मारपीट अथवा फेल होने का डर नही होना चाहिए।

इन सभी आयामों को यदि आज के संदर्भ में आंकलित करें तो आंकड़े बताते हैं कि अभी भी लगभग 40 प्रतिशत शिक्षकों की स्कूलों में कमी है, अभी भी शिक्षक शिक्षा से ज़्यादा अन्य कामों में व्यस्त रहते हैं। स्कूलों में कितने घंटे पढाई हो रही है और इसकी क्या गुणवत्ता है, इस बात की कोई मॉनिटरिंग नही होती है। और यहाँ हम इमारत, पानी व शौचालय की बात तो कर ही नहीं रहे हैं। शिक्षा के नाम पर गरीब और पिछड़े समुदाय के बच्चों (क्योंकि अब वे ही सरकारी स्कूलों में आते है) और लड़कियों को जो दिया जा रहा उसकी गुणवता जांचने और आंकने के लिए न कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है और न ही किसी की जबावदेही है। यदि स्कूलों में पढाई का स्तर अच्छा नहीं है तो व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक किसकी क्या जबावदेही है. इसपर न कोई बात करता है और न ही किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही होती है (भ्रष्टाचार के कारणों को छोड़कर)।

यही सिस्टम जो शिक्षा की गुणवत्ता की जबावदेही के दायरों से मीलो दूर है, अब बच्चों को जबावदेह बनाने के लिए कमर कस चुका है। शिक्षा व्यवस्था ने अपनी गुणवत्ता कितनी बेहतर की है, यह सवाल कोई नहीं पूछ रहा लेकिन शिक्षा व्यवस्था ने यह तय कर लिया है कि बच्चे ठीक परफॉर्म नही कर रहे इसलिए इन्हे फेल करना ज़रूरी है। हमारे शिखर पर बैठे शिक्षा की दिशा तय करनेवाले संस्थानों ने भी माना है कि शिक्षा व्यवस्था नहीं बच्चों की जबावदेही तय करना ज़रूरी है। अभी जबकि बाल शिक्षा अधिकार कानून पूरी तरह से लागू भी नहीं हो पाया है, इसके तहत एक नियम सबके लिए नासूर बन गया है जिसके अनुसार कोई भी स्कूल बच्चों को फेल नही कर सकता और न ही आगे की कक्षा में जाने से रोक सकता है। बिना किसी वैज्ञानिक सर्वे या अध्ययन या सबूत के सबने तय कर लिया है कि शिक्षा की गिरती गुणवत्ता का एक की कारण हैं ‘बच्चे’। बच्चों को फेल नहीं किया जा रहा है इसलिए उनपर पढने का काई दबाव नही है और इसलिए शिक्षा का स्तर गिर गया है। तो अब अगर भारत का सुनहरा भविष्य बनाना है तो फेल होने के डर और दबाव में जीना और खासतौर पर पढना-सीखना ज़रूरी है। शिक्षक पढाए न पढाए, किताबे मिलें न मिले, स्कूल जाने की व्यवस्था हो न हो, शिक्षक स्कूल आएं न आएं लेकिन बच्चों की ज़िम्मेदारी है कि वे पढे और पास हो जाएं।

सिस्टम तो फेल होता नहीं, न हो सकता है और न होगा। फेल होगें बच्चे ही। और उन्हें फेल करके क्या सिस्टम खुद को अव्वल दर्जे का साबित कर देगा?

ऐन फ्रैंक की डायरी

anne-frank-1 copy 1933 में एडोल्फ हिटलर ने जर्मनी देश में नस्लवादी साम्राज्य की स्थापना की। उसने यहूदी समुदाय के लोगों को इन्सानी नस्ल का हिस्सा नहीं माना। 1939 में दूसरा विश्व युद्ध भड़काने के बाद हिटलर ने यहूदियों को जड़ से मिटाने के प्रयास शुरू कर दिए। युद्ध के 6 साल के दौरान नाज़ियों ने तकरीबन 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी। इस बीच यहूदी परिवारों को अकल्पनीय तकलीफों से गुज़रना पड़ा। गुप्त तहखानों में लंबे-लंबे अरसे तक छुपे रहना, गैस चेम्बर, भूख, बीमारी, शारीरिक और मानसिक यातना।
ऐसे ही दो यहूदी परिवारों ने एक गुप्त आवास में जुलाई 1942 से रहना शुरू किया और दो बरस से भी ज़्यादा अरसे तक छुपे रहे। ये थे फ्रैंक परिवार और वान दान परिवार। फ्रैंक परिवार की 13 वर्षीय ऐन डायरी लिखती थी। गुप्त आवास में बिताए गए दिनों को भी उसने डायरी के रूप में लिपिबद्ध किया। यह डायरी यहूदियों पर ढाए गए ज़ुल्मों का जीवंत दस्तावेज़ है। यह डायरी 2 जून 1942 से शुरू होकर 1 अगस्त 1944 तक लिखी गई। 4 अगस्त 1944 में किसी की सूचना पर दोनों परिवारों को पकड़ लिया गया। 1945 में ऐन की मृत्यु हो गई। इसके लगभग 2 साल बाद उसके पिता ओटो फ्रैंक ने डायरी को प्रकाशित कराया। पेश हैं इस डायरी से अंश। इनमें से पहला गुप्त आवास में जाने से पहले का है और दूसरा बाद का।

रविवार, 21 जून, 1942

मेरी अपने सभी अध्यापकों से खूब पटती है। हमारे कुल 9 अध्यापक हैं। मिस्टर कीसिंग, वे बूढ़े खड़ूस जो हमें गणित पढ़ाते हैं, मुझसे अरसे से नाराज़ चले आ रहे थे। कारण, मैं उनके हिसाब से बक-बक बहुत करती हूँ। उन्होंने मुझे चैटरबाॅक्स यानी गपोड़शंख जैसे विषय पर निबंध लिखने के लिए कह दिया।
उस शाम को मैं निबंध लिखने बैठी। कोई और होता तो ढेर सारा हाशिया और शब्दों के बीच में जगह छोड़ते हुए कुछ भी लिख देता। लेकिन बात तो तभी बनती जब मैं अपने ज़्यादा बोलने के बारे में संतुष्ट कर सकने लायक तर्क दे सकती। मैंने पूरे तीन पेज लिख डाले। अब मैं संतुष्ट थी। मैंने उसमें लिखा कि मैं अपने बोलने को काबू में रखने की कोशिश करूँगी। फिर भी मुझे नहीं लगता कि मैं अपनी इस आदत से पूरी तरह छुटकारा पा सकूँगी। कारण, मेरी माँ भी बहुत ज़्यादा बोलती हैं। आप जानते ही हैं, आनुवांशिक गुणों के बारे में ज़्यादा कुछ किया नहीं जा सकता।
मिस्टर कीसिंग मेरे तर्क पढ़कर खूब हँसे। जब अगले पाठ के दौरान भी मुझे बात करते पाया तो उन्होंने मुझे एक और निबंध लिखने का आदेश दे दिया। इस बार मुझे ‘लगातार बकबक करने वाली’ विषय पर लिखना था। मैंने इस विषय पर भी उन्हें लिखकर दे दिया। दो दिन तक तो मैंने उन्हें शिकायत का मौका नहीं दिया। तीसरे दिन मेरी बकबक करने की आदत से परेशान होकर उन्होंने मुझे फरमान सुना डाला, “मिस ऐन फ्रैंक तुम्हें एक निबंध लिखना होगा – क्वैक, क्वैक, क्वैक, करती है मिस चैटरबाॅक्स“
पूरी क्लास हँसते-हँसते दोहरी हो गई। मेरे सामने भी हँसने के अलावा और कोई चारा नहीं था। चैटरबाॅक्स पर मैं पहले ही दो निबंध लिख चुकी थी। अब वक्त आ गया था कि कुछ नया लिखा जाए। मैंने अपनी सहेली की मदद से एक कविता लिखी। इसमें एक कहानी थी – एक बत्तख थी, उसके तीन बच्चे थे। बच्चे क्वैक, क्वैक बहुत करते थे इसलिए उनके पिता ने उन्हें मार डाला। किस्मत से मिस्टर कीसिंग ने कविता में कही गई बात को सही भावना से स्वीकार किया। उन्होंने कक्षा में यह कविता पढ़कर सुनाई। अपनी टिप्पणियाँ भी दीं। उसके बाद से उन्होंने कक्षा में मेरे बोलने पर कभी टोका-टाकी नहीं की। इसके विपरीत आजकल मिस्टर कीसिंग खुद लतीफे सुनाने लगे हैं।

तुम्हारी ऐन

रविवार, 2 मई, 1943

जब मैं यहाँ (गुप्त आवास में) अपने यानी हम लोगों के जीवन के बारे में सोचती हूँ तो अक्सर एक नतीजे पर पहुँचती हूँ। वह यह कि हम उन यहूदियों की तुलना में जो हमारी तरह छुपे नहीं हैं स्वर्ग में रह रहे हैं। मैं हैरान हूँ कि हम हमेशा सुविधाजनक परिस्थितियों में रहते हुए भी इतने असंतुष्ट क्यों रहे। अब यही देखो, जब से हम यहाँ आए हैं, खाने की मेज़ पर वही मेज़पोश पड़ा हुआ है। प्लेटें पोछने का कपड़ा भी यहाँ हमारे आने से पहले खरीदा गया था और इसमें इतने सुराख हैं कि गिनना मुश्किल है। वान दान परिवार पूरी सर्दियाँ एक ही चादर पर सोता रहा है। इसे धोया भी तो नहीं जा सकता। क्योंकि साबुन राशन में मिलता है और उसकी कमी हमेशा बनी रहती है। इसके अलावा साबुन इतना घटिया है कि पूछो मत। पापा बेचारे घिसी हुई पैंट पहने रहते हैं। माँ और मार्गोट (मेरी बड़ी बहन) वही तीन शमीजें पूरी सर्दियाँ मिल-बाँट कर पहनती रही हैं। मेरी शमीज इतनी छोटी है कि कमर तक भी नहीं पहुँचती। ये ऐसी चीजें हैं, जिनसे पार नहीं पाया जा सकता। हम सब कुछ फटा-पुराना, घिसा-पिटा इस्तेमाल कर रहे हैं। मेरी नेकर से लेकर पापा के शेविंग ब्रश तक। किस तरह हम उम्मीद करें कि हम युद्ध से पहले की सी स्थिति में आ जाएँगे?

तुम्हारी ऐन

annefrank

बरेली शहर: एक अनुभव

bareily 3मेरा नाम हुमा है. मैंने रूहेलखंड विश्वविद्यालय के बरेली कॉलेज से उर्दू में मास्टर्स किया है. पिछले दिनों जब निरंतर ने ‘परवाज़ अडोल्सेंट सेंटर फॉर एजुकेशन’ (PACE) प्रोजेक्ट के अंतर्गत बरेली में शिक्षा सेंटर खोलने का निर्णय लिया तो मुझे बेहद खुशी हुयी. लगा बरेली को सालों बाद एक बार फिर जानने का मौका मिलेगा. तब और आज की मुझमे ज़मीन-आसमान का फर्क है. अब मैं अपने आसपास की चीज़े शायद बिलकुल अलग ही नज़रिए से देखूंगी! क्या मेरी तरह बरेली भी बदल गया होगा? या बिलकुल वैसा ही होगा जैसा मै उसे छोड़ आयी थी. ऐसे ही कुछ सवाल और पुरानी यादें दिल में लिए मैं चल दी बरेली की ओर. ट्रेन में रास्ते भर मुझे ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में’ गाना याद आता रहा.

बरेली में जब कदम रखा तो पहले वहां के डॉक्टरों की दुकानों और अस्पतालों पर ध्यान गया. लोगों से बात की तो पता चला कि हर गली और मोहल्ले में डॉक्टर हैं मगर फिर भी अस्पतालों में कतार कोई कम नहीं थी। मुझे यह समझते भी देर न लगी कि चूँकि बरेली के आस पास जितने भी छोटे-छोटे कस्बे या शहर हैं वहाँ इतनी सुविधाएं नहीं है जितनी बरेली शहर में इसलिए यहाँ दूसरे शहरों-कस्बों से भी लोग आते हैं. बरेली में डॉक्टरों और अस्पतालों ने जितना आकर्षित किया, उतना ही आकर्षित मैं यहाँ की खानकाहों और दरगाहों को लेकर थी। जब तक मेरा समय बरेली कॉलेज में गुज़रा था तब तक आला हज़रत बरेलवी की दरगाह पर ही ज़्यादा जाते थे और वहां उर्स भी बहुत जोरो शोर से मनाया जाता था लेकिन इस बार लगा कि बरेली में दूसरे खानकाहों की दरगाहों को भी खासी एहमियत हासिल हो चुकी है उनके उर्स, जुमेरातें और न्याज-नजर पर काफी ज़ोर है। चूँकि बरेली का बाज़ार हर जुमेरात को बंद रहता है इसलिए लोंगों की भीड़ उस दिन दरगाहों पर काफी देखने को मिलती है। दरगाहों पर कव्वाली और आए दिन मुशायरों का आयोजन होता रहता है। जितनी दरगाहें उतनी ही तादाद में मंदिर भी देखे जा सकते हैं। छोटे-छोटे मंदिरों की कतारें देखने को मिलीं। दरगाहों और मंदिरों की संख्याएं गंगा-जमुनी तहजीब की निशानदेही हैं। बरेली की जनता दरगाह और मंदिरो को खूब अकीदत से मानती है। चुन्ने मियां का मंदिर हिंदू-मुस्लिम एकता का खूबसूरत उदाहरण है। लक्ष्मी नारायण का यह मंदिर उनके किसी भक्त ने नहीं बल्कि बरेली के सेठ फजरुल रहमान उर्फ़ चुन्ने मियां ने बनवाया था। यह मंदिर धर्म और मजहब को बांटने वालों के लिए एक नजीर से कम नहीं। इस मंदिर के प्रवेश पर अशोक की लाट लगी हुई है. जो आमतौर पर देश के किसी भी मंदिर में दिखाई नहीं देती। इस मंदिर के निर्माण की कई खासियतों में एक खासियत यह भी है कि इस मंदिर की आधारशिला देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने रखी थी।

बरेली के बाजार बेहद चर्चित है। ये सिर्फ झुमके और सुरमे के लिए ही मशहूर नहीं बल्कि वहां पर बेत और कारचोब (ज़रदोज़ी) के काम ने बरेली के मार्केट की शोहरत खासी दूर-दूर तक फैला रखी है। सबसे बड़ा काम ज़रदोज़ी का ही है। जो अब जी.एस.टी. के चलते काफी प्रभावित हुआ है लेकिन आज भी दस्तकार लोग इसको छोड़ नहीं पाए हैं। बरेली की दस्तकारी में आदमी ही नहीं बल्कि औरतें और किशोरियों की भी उतनी ही भूमिका रहती है। बड़े बूढ़े और बच्चे सभी ये काम करते दिखाई देते हैं।

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फूलों वाली गली, मनिहार वाली गली और कुतुब खाना बहुत पुराने बाज़ार हैं। गलियों में इन बाज़ारों की रौनक कुछ-कुछ पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक की रौनक से मिलती झुलती दिखाई देती है। बरेली के बड़े बाज़ार और थोक के बाज़ार अपने आप में एक अलग अहमियत रखते हैं। 15 अगस्त के आसपास पतंगों की भरमार और तरह-तरह की पतंगों और मांझे के कारखानों को देखना हो तो बरेली जाना ही होगा।

जब मैंने वहाँ लोगों से अपने मनपसंद गाने ‘झुमका गिरा रे बरेली के बाज़ार में’ का ज़िक्र किया तो एक अलग ही कहानी पता चली – बात आज़ादी से पहले की है. जब सिपाही अक्सर बाजारों में चक्कर लगाया करते थे. एक दिन बाज़ार में उनकी बटालियन पर किसी ने गोली चला दी और उनमे मौजूद एक झुमका नाम का सिपाही घायल होकर गिर पड़ा. इसी घटना से ये गाना बना. ये सुनकर मुझे बहुत हँसी आयी. और कहाँ मैं सोचती थी कि किसी लडकी का कान में पहना झुमका बाज़ार में गिरा होगा. किस्सा कितना सच है पता नहीं मगर मजेदार तो बहुत है. बरेली की इस पहली विजिट में मुझे इतना मज़ा आया कि अब मुझे दोबारा वहां जाने का इंतज़ार है. मैं वहां जाती रहूंगी और आपके लिए लाती रहूंगी उस शहर और वहां स्थित पेस शिक्षा केंद्र के नए-नए किस्से और अनुभव. फिलहाल अलविदा.

जीवन के संघर्ष

rajni

सामाजिक कार्यकर्ता, स्त्रीवादी, अम्बेडकरवादी, कवियत्री, और दलित महिला लेखन की मज़बूत आवाज़ रजनी तिलक का 30 मार्च देर रात निधन हो गया। वह 60 वर्ष की थी। उनके द्वारा निरंतर द्वारा प्रकाशित की जाने वाली पत्रिका ‘आपका पिटारा’ के दलित विशेषांक के लिए लिखा गया ये लेख प्रस्तुत है : 

 

मेरा जन्म एक साधारण दलित परिवार में हुआ। मेरे माँ-बाप के बारह बच्चे थे, जिनमें हम सात ज़िन्दा रहे। मेरी माँ कोई साधारण औरत नहीं थी। बचपन से ही उसे पढ़ने-लिखने का षौक था। नाना ने उसे स्कूल तो नहीं भेजा। लेकिन माँने खुद किताबों से पढ़ना सीख लिया। जब से मैंने होश संभाला मुझे याद है कि मुहल्ले की औरतें गोबर थापने जाती थीं। वे साथ में अपनी लड़कियों को भी ले जातीं। मेरी माँ घर में कागज के लिफाफे बनाकर बेचा करती थी। हम भाई-बहन भी स्कूल से लौटकर उसका हाथ बंटाते। मुहल्ले की औरतों से माँ अक्सर कहती – “तुम अपनी लड़कियों से गोबर मत उठवाओ। उन्हें स्कूल भेजो, पढ़ाओ-लिखाओ।“ माँ के कहने पर धीरे-धीरे कुछ लड़कियां स्कूल जाने लगीं।
हमारे घर के बगल में एक बनिया परिवार रहता था। दलित होने का एहसास सबसे पहले उनकी वजह से मुझे हुआ। मैं छत में कपड़े सुखाने जाती तो उनकी बहू कहती – “कपड़े खूब निचोड़ देना। वरना हमारी तरफ छींटे पड़ते हैं।“ मैं अपने हाथों की पूरी ताकत लगाकर कपड़े निचोड़ती। उन्हें सुखाते वक्त मैं चिपटी भी लगा देती। पर कभी हवा से कोई कपड़ा उनके वहां पहुंच जाता तो वह खूब बड़बड़ाती।
आठवीं कक्षा के बाद पिताजी ने मेरी पढ़ाई बन्द करने का हुक्म दे दिया। पर माँ ने मुझे नौवीं में दाखिला दिला दिया। इसके बाद ही माँ बीमार पड़ गई। उसे मानसिक रोग हो गया। मेरी माँअब हर समय चीखती-चिल्लाती। न जानंे क्यों पढ़ाई-लिखाई से उसे नफरत हो गई थी। घर के हालात भी बदलने लगे। मेरे पिताजी दर्ज़ी थे। सिर्फ उनकी कमाई से घर चलाना मुश्किल था। इसलिए  मैं आगे नहीं पढ़ पाई। छोटे भाई-बहन की देखभाल की ज़िम्मेदारी भी अब मेरी थी।
पिता जी को मेरा घर से बाहर आना-जाना बिल्कुल पसंद नहीं था। एक बार की बात मुझे याद है। मेरे भाई का एक दोस्त शाम के वक्त मुझसे मिलने आया। पिताजी के डर से मैं उससे बात नहीं करना चाहती थी। पर वह ज़बरदस्ती मुझे राजनीति के बारे में कुछ बताने लगा। तभी पिताजी आ गए। मैंने जल्दी से उन्हें खाना परोसा और भाई के दोस्त से जाने को कहा। उसके जाते ही पिताजी ने मुझे दो तमाचे जड़ दिए। मुझे गाली देते हुए वे बोले – “क्या अड्डेबाज़ी लगाई है यहां? मुझे देखकर नौटंकी कर रही है। वरना उसे पहले ही न भगा देती।“
माँ की बीमारी, छोटे भाई-बहन की ज़िम्मेदारी, गरीबी और पिताजी की रोक-टोक और गुस्सा। इन सबके बावजूद मैंने बी.ए. प्राइवेट में दाखिला लिया। मैं टाइपिंग वगैरह सीखने भी जाने लगी।
घर के बाहर निकलकर मुझे कई लोगों से मिलने का मौका मिला। दलितों के खिलाफ समाज में जो नफरत थी उसे भी मैंने समझना शुरू किया। मैं कई दलित समूह और यूनियन की सदस्य बयनी। साथ ही मैं महिला आन्दोलन से भी जुड़ गई। दलित महिलाओं की स्थिति पर हमने ‘देवदासी’ नाम का नाटक भी तैयार किया।
एक बार मैं दिल्ली में ही एक बहुत बड़े धरने में गई। बिहार में उस समय दलितों का नरसंहार हुआ था। यह धरना उसी के विरोध में था। धरने में एक बड़े नेता को भाषण देने के लिए बुलाया गया था। मगर भाषण में वे हत्यारों के खिलाफ बोलने की जगह सरकार की बढ़ाई करने लगे। उनसे हमें यह उम्मीद नहीं थी। मैंने फौरन बगल में खड़े एक आदमी से काला झंडा छीन लिया और ज़ोर-ज़ोर से उस नेता की मुर्दाबाद चिल्लाना शुरू किया। भीड़ में सभी साथी मेरे साथ मुर्दाबाद चिल्लाने लगे। नेता के आदमी मेरी ओर लपके। मैं झंडे का डंडा उल्टा करके उन्हें पीटने लगी। वहां खड़े लोगों ने मेरा साथ दिया। कई लोगों ने मुझे इतनी हिम्मत दिखाने के लिए बधाई दी। मगर घर पहुंचते ही पिताजी ने मुझसे कहा – “खबरदार जो घर से बाहर निकली। कल ही मैं तेरे लिए लड़का ढूंढता हूं।“
मैंने शादी तो की, लेकिन अपनी मर्ज़ी से। अपनेपति आनन्द से मैं देवदासी नाटक के दौरान मिली। हम हमेशा औरतों की स्थिति पर और अंबेडकर पर चर्चा करते। रोज मिलने के कारण हमारी दोस्ती पक्की हो गई और हमने शादी कर ली। मगर शादी के तुरंत बाद मुझे आनंद का एक नया रूप देखने को मिला। उसे मेरा महिला संगठन में आना-जाना अच्छा नहीं लगता था। वह कहता – “असली लड़ाई वर्ग की है। तुम भी इसी पर ध्यान दो।“ बाकी असलियत भी मुझे धीरे-धीरे पता चलने लगी।
वह मुझे और मेरी जाति को ताने मारता। मेरे दोस्तों को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करता। मेरे बारे में वह झूठी बातें फैलाने लगा। कुछ समय तो मैंने भी समझौता करने की कोशिश की। दलित समुदाय से मैंने मिलना-जुलना छोड़ दिया। मैंने महिला संगठन में भी जाना छोड़ दिया। मगर मेरी नारीवादी सोच और भूमिका मुझे लताड़ती रहती। मुझे लगा कि यह मेरी निजी समस्या नहीं है। इसलिए मैं अपनी सोच से समझौता क्यों करूं? एक बार मैंने आनंद कोउसके दोहरे व्यवहार को लेकर कुछ कहा। उसे इतना तेज़ गुस्सा आया कि उसने मेरी गर्दन दबा दी। मेरी जीभ और आंखें बाहर आ गईं। उसी दिन मैंने घर छोड़ दिया। एक हफ्ते बाद उसने बदचलन होने का इल्ज़ाम लगाकर मुझे तलाक दे दिया। सात साल तक मैंने अदालत में केस लड़ा। आखिरकार मैं केस जीत गई। उसे मुझे खर्चा और मकान देना पड़ा।
तलाक के बाद मैं अम्बेडकरवादी आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने लगी। मै। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के युनियन में भी खूब काम करती। मैंने कार्यकर्ताओं की तनख्वाह का मुद्दा उठाया। मगर कार्यकर्ताओं को मेरी सोच नहीं, मेरी जाति नज़र आने लगी। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करना चाहिए। मैं बीमार भी पड़ गई। जब ठीक हुई तो यूनियन की लड़कियां मुझसे मिलने आईं। उन्होंने मुझसे माफी मांगी। आज यूनियन में मैं नहीं हूं पर यूनियन अच्छी चल रही है, मैं खुश हूं।
आज मैं केंद्रीय सरकार में क्लर्क हूं। मेरी बेटी ज्योति बड़ी हो गई है। उसने बचपन से ही मुझे संघर्ष करते देखा है। इसलिए यवह अपनी उम्र से ज्यादा समझती है। मेरे अनुभवों ने मुझे भी कई सबक सिखाए। समस्याओं को देखने समझने का एक अलग नज़रिया भी दिया। आज मुझे लगने लगा है कि सामाजिक व्यवस्था को बदलने की लड़ाई लंबी है। इस लड़ाई में मैं छोटी सिपाही हूं और जीवन का संघर्ष जारी है …
(फोटो साभार : shethepeople.tv)