औरत की जाति, वर्ग और उनके विकल्प

अक्सर, मुझे जीवन और विकल्पों के बारे में प्रेरणादायक उद्धरण देखने को मिलते हैं। ऐसा ही एक उद्धरण कहता है, “आज मैं जो हूँ वो उन विकल्पों की वजह से हूँ जो मैंने कल चुने थे।” लेकिन क्या यह वास्तव में उतना आसान है? क्या हमारे जीवन में विकल्प/चयन हमारे परिवेश, जेंडर, संस्कृति और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं से प्रभावित नहीं होते?

मैं पिछले कुछ समय से उन लड़कियों के साथ काम कर रही हूँ जिन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी। मेरे इस काम ने मुझे दिल्ली के शहरी गरीब समुदायों में रहने वाली लड़कियों को करीब से समझने और बातचीत करने का अवसर दिया है। लड़कियों के लिए सीखने के वैकल्पिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से, परवाज़ अडोलसेंट सेंटर फॉर एडुकेशन (पेस) नामक एक प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में, मैं निरंतर संस्था के साथ जुड़ी हुई हूँ। निरंतर संस्था दिल्ली और बरेली (उत्तर प्रदेश) में समुदाय आधारित संगठनों के साथ साझेदारी के तहत शहरी पुनर्वास बस्तियों और असंगठित बस्तियों की स्कूल ना जाने वाली (आउट-ऑफ-स्कूल) लड़कियों के साथ काम कर रही है।

ये केंद्र, लड़कियों के लिए उनके जीवन, भावनाओं और अनुभवों के बारे में बात करने और दोस्ती बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षित स्थान के रूप में उभरे हैं। पेस में लड़कियों के साथ हमारे नियमित सत्रों के दौरान, हमने प्यार, रिश्ते, पसंद और यौनिकता के बारे में बातचीत शुरू करने के लिए थिएटर सत्र आयोजित किए। अधिकांश लड़कियाँ सत्र के बारे में बहुत उत्साहित लग रही थीं और उन्होंने प्यार और रिश्तों के बारे में बात करने में रुचि दिखाई, लेकिन अक्सर जब मैंने उनसे उनके जीवन के पहले प्यार या क्रश के बारे में पूछा तो उन्होंने बातचीत का रुख बदल दिया। इसके बजाय, उन्होंने मुझसे मेरे जीवन के पहले क्रश के बारे में बात करने का अनुरोध किया और जब मैं उनके साथ अपने पहले क्रश के बारे में बात करती, तो उनमें से अधिकांश हँसती और उत्साह के साथ अपने अनुभवों के बारे में बात करना शुरू कर देतीं।

एक ऐसे ही सत्र में, जहाँ कुछ इसी तरह की बातचीत चल रही थी, कुछ लड़कियाँ बातचीत में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रही थीं। जब मैंने उनसे अपने अनुभव साझा करने के लिए कहा तो उनमें से एक ने कहा, “दीदी, मेरे पास साझा करने के लिए कुछ नहीं है। मेरी जाति में लड़कियों की शादी कम उम्र में हो जाती है। मैं बहुत छोटी थी, जब इसके बारे में कुछ भी समझे बिना मेरी शादी हो गयी। शादी के बाद, मैंने अपने पति के साथ प्यार हुए बिना ही यौन संबंध बनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे मुझे शादीशुदा जिंदगी की आदत हो गई और मुझे बहुत शिकायतें नहीं हैं। मुझे लगता है कि अगर इसे ही प्यार कहा जाता है, तो मेरे जीवन का पहला प्यार मेरे पति हैं।”

रुखसार (बदला हुआ नाम), एक और युवा लड़की, जो कुछ समय से चुप थी, बाद में अपने अनुभवों को साझा करने के लिए चर्चा में कूद पड़ी। जब रुखसार ने बोलना शुरू किया, तो दूसरी लड़कियाँ उन्हें करीब से देख रही थीं, क्योंकि उनकी शादी कम उम्र में हो गई थी और उन्होंने कुछ साल पहले ही अपने पति से तलाक के लिए अर्जी दी थी। उन्होंने समूह में पहले कभी भी अपने भावनात्मक अनुभवों के बारे में बात नहीं की थी और हमेशा शैक्षिक चर्चा पर अधिक ध्यान केंद्रित करती थीं।

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रुखसार ने मुस्कुराते हुए धीरे से कहा, “किशोरावस्था के दौरान, मुझे अपने गाँव का एक युवा लड़का बहुत पसंद था क्योंकि वह अपनी उम्र के अन्य लड़कों की तुलना में बहुत आकर्षक था। शुरुआत में, मैं उसे अपने मुहल्ले में देखने के मौकों की तलाश करती थी और उसके साथ बात करने के लिए बहाने बनाती थी। यह जानने के बावजूद कि वह भी मेरी तरह मुसलमान था, मैंने अपनी भावनाओं के बारे में उसे कभी नहीं बताया। गुजरते महीनों के दौरान उसका साथ पाने के मेरे सपने और इच्छाएँ परवान चढ़ते रहे लेकिन वे कभी पूरे नहीं हुए। धीरे-धीरे, मुझे उसके बारे में और पता चला और समझ आया कि उसे शराब की लत थी, और उसे अपने गुस्से पर कोई नियंत्रण नहीं था। उसे उन युवा लड़कों के बीच नेता माना जाता था जो आपराधिक गतिविधियों में शामिल थे। इन बातों को जानने पर मैं आश्चर्यचकित रह गई और मेरी भावनाएँ और इच्छाएँ धीरे-धीरे बदल गईं। फिर, मेरा जीवन मेरे गाँव की किसी भी अन्य मुस्लिम लड़की की तरह आगे बढ़ा और इससे पहले कि मैं समझ पाती कि जीवन में प्यार का क्या मतलब है मुझे कम उम्र में शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। शादी के बाद, मैंने एक बहू की भूमिका निभानी सीख ली जो बिना कुछ कहे आदेश का पालन करती है। मैंने परिवार के लिए बंधुआ मजदूर की तरह काम किया; मुझे घर का सारा काम करना पड़ता था, खेत में परिवार का साथ देना पड़ता था, जानवरों की देखभाल करनी पड़ती थी और रात में अपने पति के साथ जबरन यौन संबंध बनाने के साथ मेरा दिन ख़त्म होता था।

मेरे पति के साथ मेरे यौन संबंध हिंसा से शुरू हुए और इसने मुझे बहुत दर्दनाक और भयानक अनुभव दिया, एक ऐसा सम्बन्ध जिसमें मेरी कोई भूमिका नहीं थी, सिवाय इसके कि मेरे पति अपने यौन सुख के लिए जो करने को कहें मैं वो करती रहूँ। हमारे जैसी कई महिलाओं के जीवन में सीमित विकल्प हैं जहाँ प्यार, इच्छा और आनंद का महिलाओं के जीवन में पूरी तरह से कोई अर्थ नहीं है।” उसके अनुभवों को सुनकर समूह में हर कोई चुप हो गया।

रुखसार ने आगे बताया, “अपने पति के साथ अपने रिश्ते के दौरान, मैंने अपने जीवन में कभी प्यार का अनुभव नहीं किया और मैंने यौन संबंधों को हिंसा से जोड़कर ही देखा जहाँ साथी के लिए आनंद, अन्वेषण और देखभाल के लिए कोई जगह नहीं थी। मेरे पति सेक्स करते समय हमेशा हिंसक रहते थे| मुझे छोटी-छोटी बातों पर मारते थे और परिवार के लोग एक शब्द कहे बिना, दर्शकों की तरह सब कुछ देखते रहते थे। कई अन्य प्रेम कहानियों को सुनने के बाद, मैं अपने जीवन में फिर से प्यार की भावना का अनुभव करना चाहती हूँ लेकिन मैं किसी से शादी नहीं करना चाहती। अन्य युवा लड़कियों की तरह, मैं एक ऐसे प्रेमी की चाहत रखती हूँ जो मेरी देखभाल करे और प्यार और स्नेह से रिश्ता बनाए, भले ही यह रिश्ता कम समय के लिए ही क्यों न हो।”

उनके अनुभव सुनकर मैं अपने विचारों में पूरी तरह खो गई। एक ओर जहाँ मैं यौन हिंसा के स्तर के बारे में जानकर दंग रह गई, जो महिलाओं को शादी में अनुभव करना पड़ता है, जहाँ लोग जोड़ों के बीच हिंसक रिश्तों पर शायद ही सवाल उठाते हैं, वहीं दूसरी ओर मुझे यह जानकर खुशी हुई कि रुखसार ने एक बार फिर से प्यार में पड़ने और अपने जीवन को अपने तरीके से खोजने में रुचि दिखाई। पूरी चर्चा ने मेरे दिमाग में एक और आंतरिक बातचीत शुरू कर दी। मुझे रुखसार समूह की सबसे शर्मीली लड़कियों में से एक के रूप में याद आई, जिसने हमेशा पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित किया और दूसरों के साथ अपनी व्यक्तिगत भावनाओं पर कभी चर्चा नहीं की। विवाह के बाद संबंध, आकर्षण और प्रेम ऐसे शब्द थे, जिनका उनके जीवन में ज़्यादा मायने नहीं थे क्योंकि उन्होंने यह आत्मसात कर लिया था कि केवल ‘खराब/बुरी’ औरतें ही शादी के बाद, चाहे वह कितनी भी हिंसात्मक क्यों न हो, किसी से प्यार करती हैं। एक बार, उन्होंने कहा था, “मैं सिर्फ़ अपनी बेटी के लिए जी रही हूँ और भविष्य में उसे अच्छी तरह से पढ़ाऊँगी। मेरी बेटी के अलावा मेरे जीवन में और कुछ नहीं है। मैं अपने माता-पिता के विश्वास को कभी नहीं तोड़ूँगी जो मेरे कठिन समय में मेरा ध्यान रख रहे हैं।”

उस सत्र के बाद, मैंने रुखसार के साथ अधिक बातचीत करना शुरू कर दिया और उन्होंने थिएटर के अधिकांश सत्रों का आनंद लिया। वह पास की कॉलोनी में एक घरेलू कामगार के रूप में काम करती थीं, और कभी-कभी समय निकालना और थियेटर सत्रों के लिए कुछ घंटों के लिए आना उनके लिए मुश्किल हो जाता था, लेकिन फिर भी वह नियमित रूप से आने में कामयाब रहीं। मुझे उस रुखसार में, जो पहले पेस केंद्र में शामिल हुई थीं और जिन्होंने अब थिएटर गतिविधियों में भाग लेना शुरू किया था, अंतर दिखाई देता था।

ऐसे ही एक सत्र के दौरान,  वह लगातार हँस रही थी और दूसरी लड़कियों के साथ बॉलीवुड के हिंदी गाने गा रही थी। जब मैंने उनकी हँसी के पीछे का राज़ पूछा, तो वह मुस्कुराई और बोलीं, “दीदी, मैं इन दिनों बहुत खुश हूँ। मैं अपने जीवन का आनंद लेना चाहती हूँ और कुछ मज़ा करना चाहती हूँ। लोग अपने क्षेत्रों से अन्य महिलाओं और लड़कियों पर इतनी निगाह क्यों रखते हैं? तलाक के बाद भी महिलाएँ प्रेम संबंध क्यों नहीं बना सकती? ” पाठ्यक्रम की अवधि के दौरान, उन थिएटर सत्रों ने स्वयं के प्रति उनके दृष्टिकोण को बदल दिया था और वे खुद से ईमानदार हो सकीं,एक ‘अच्छी’ तलाकशुदा युवती की तरह प्रदर्शन करने के लिए मज़बूर महसूस किए बिना जिसे इस बारे में सोचना पड़ता कि लोग उसके द्वारा उठाए गए किसी भी कदम के बारे में क्या कहेंगे। धीरे-धीरे, उन्होंने अच्छे कपड़े पहनना और पेस सेंटर में आने के दौरान थोड़ा सजना संवरना शुरू कर दिया। दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में एक्सपोज़र विज़िट के दौरान, वह अच्छी तरह से कपड़े पहनती थीं, मेकअप लगाती थीं और सड़क पर घूमने वाले किसी भी युवा लड़के की ओर इशारा करके अन्य लड़कियों के साथ हंसी-मज़ाक करती थीं। उन्होंने अन्य लड़कियों से उनके जानने वाले कुछ लड़कों के फोन नंबर साझा करने का अनुरोध किया, ताकि वह उनसे दोस्ती कर सकें।

शुरुआत में, अन्य लड़कियों को उनके व्यवहार में बदलाव से वास्तव में आश्चर्य हुआ और उन्होंने हमारे समाज में विवाहित महिलाओं के लिए परिभाषित सामाजिक मानदंडों के अनुसार रुखसार को आँकने की कोशिश की। पितृसत्तात्मक समाज के हिस्से के रूप में, जब अविवाहित लड़कियाँ अच्छे कपड़े पहनना और कुछ मेकअप लगाना पसंद करती हैं, तो उन्हें ‘अच्छा‘ नहीं माना जाता है, लेकिन शादी के तुरंत बाद, अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के बावजूद, युवा लड़कियों को नव-विवाहित महिलाओं के रूप में तैयार होने के लिए मज़बूर किया जाता है। दूसरी ओर, युवा विधवाओं को उनकी यौनिकता को नियंत्रित करने के लिए चमकीले कपड़े पहनने या सजने सँवरने की अनुमति नहीं होती है। इसी तरह, रुखसार जैसी, विशेष रूप से एक वंचित वर्ग और जाति से संबंधित तलाकशुदा महिला, पर पितृसत्तात्मक मानदंडों को बनाए रखने के लिए अधिक प्रतिबंध होते हैं। जीवन के निर्णय, विकल्प और इच्छाएँ सभी इन मानदंडों द्वारा निर्धारित और निर्देशित होते हैं।

‘उच्च‘ वर्ग की एक तलाकशुदा महिला को ‘निम्न‘ वर्ग की महिलाओं की तुलना में प्रचलित मानदंडों को चुनौती देने के लिए अपनी पसंद और इच्छाओं का दावा करने का विशेषाधिकार है। लेकिन ‘निम्न‘ जाति की पृष्ठभूमि वाली महिलाओं के पास ‘उच्च‘ जाति की महिलाओं, जो केवल पवित्रता का प्रतीक बन जाती हैं, की तुलना में विकल्प और यौनिकता को खोजने-परखने के लिए अधिक गुंजाइश होती है। जब हम विकल्पों और यौनिकता का विश्लेषण करते हैं, तो यह पता लगाना महत्वपूर्ण है कि ये अलग-अलग जातियों और वर्गों में कैसे अलग-अलग तरीके से संचालित होते हैं।

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जब हमने प्यार, इच्छाओं और रिश्तों के बारे में बातचीत शुरू की, तो लड़कियों ने अपने अलग-अलग अनुभवों को साझा किया और इससे समूह के सदस्यों को एक-दूसरे को स्वीकार करने के लिए अधिक खुले रहने में मदद मिली। क्या हम युवा लड़कियों के ऐसे स्थान बनाने में सक्षम हैं जहाँ वे अपने जीवन में इच्छा, और रोमांटिक रिश्तों से जुड़ी इन जटिलताओं के बारे में इसे ‘सही’ या ’गलत’ के रूप में चिह्नित बॉक्स में डाले बिना बातचीत कर सकें?

रुखसार के व्यवहार और नज़रिए में धीरे-धीरे हुए बदलाव ने भी मुझे उनके संदर्भ और आसपड़ोस के बारे में सोचने के लिए उकसाया। जीवन, रिश्ते और इच्छाओं के बारे में विकल्प ये सभी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, जाति, वर्ग, जेंडर और यौनिकता के आधार पर निर्धारित किए गए हैं। जब इन युवा लड़कियों को एक सहज और सुरक्षित स्थान मिला, तो उन्होंने अपनी इच्छाओं और अनुभवों के बारे में और कैसे उन्होंने अपनी इच्छाओं को आगे बढ़ाने के लिए अपने मौजूदा परिवेश से समझौता किया, इन सब के बारे में खुलकर बातचीत की। जैसा कि उनकी कहानियों में वर्णित है, महिलाओं के पास बहुत ही सीमित विकल्प हैं कि वे अपने जीवन में जो करना चाहती हैं उसे जारी रखें और यह उन युवा महिलाओं के मामले में बदतर हो जाता है जो तलाकशुदा हैं, जिनके बच्चे हैं और जो अपने माता-पिता के साथ शहरी गरीब समुदायों में रहती हैं।

हमें इस तरह से ढाला गया है कि तथाकथित ‘विकल्प‘ जो हमारे संबंधों को परिभाषित करते हैं, वे भी हमारे लिए हुए विकल्प नहीं बल्कि समाज द्वारा सृजित हैं। हालाँकि, जैसा कि हमने देखा है, इन सभी चुनौतियों के बावजूद, महिलाएँ, जब वे खुद को व्यक्तियों के रूप में महत्वपूर्ण मानने लगती हैं, तो वे अपने परिवेश और परिवार के सदस्यों के साथ बातचीत करने की रणनीति तैयार करती हैं। इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं है कि कल के निर्णय हमारे आज को आकार देते हैं; हमें यह भी सवाल करना चाहिए कि उन विकल्पों को किस कारक ने निर्धारित किया गया।

यह लेख इससे पहले तारशी की डिजिटल मैगज़ीन इन प्लेनस्पीक मे प्रकाशित हो चुका है।

Musings of an Observer- the Yuva, Yaunikta aur Adhikar course

DSCN6598Gender. Sexuality. Masculinity. Patriarchy. Love. Sex. Desire. Fantasies. LGBTQIA. Youth. Policy. Marriage. Technology. Collectives. And the list goes on.

That was an extremely overwhelming and exciting week of my life, 15 to 21st April, 2019; the week I coordinated the Yuva, Yaunikta aur Adhikar course. I had never attended any such residential course in my limited work experience of one year, leave alone coordinate one. So you can only imagine the myriad of emotions running through my mind the entire time! One the one hand, I was extremely excited while on the other, I was feverishly hoping that nothing would go wrong.

15th April evening, the participants trickled in one by one into the hall for an introductory session, their experiences as vibrant as the spring blossoms outside the hall. Hailing from twelve different states, the participants worked on various issues that included curriculum development, grassroots community work, early marriage, sexual and reproductive health rights, mental health and issues related to transgender communities.

The use of photos for introduction gave us an initial insight into each of their lives, a little beyond the usual and mundane introduction of citing names and the organizations that they are from. While one narrated a story of how she fought and smiled through different ups and downs of her life, including standing up against her own early marriage; another narrated the experience of breaking all gender stereotypes in spite of constant mockery and taunt by those around them. Everyone had a story to tell. And more than that, they were so brave to tell their stories to a bunch of strangers that they had just met. Now that I think it, I guess it was in fact easier because we were all a bunch of strangers. It is interesting how sharing stories and emotions with strangers can be such a catharsis sometimes. You feel a real connection at that moment with the people around. It may last, it may not. However, in that moment, it’s all that matters- creation of a safe space.

DSCN6768The next few days were packed with sessions, readings, activities and energizers. Basic concepts on gender and sexuality were covered, with emphasis on intersectionality of gender, sexuality, patriarchy, masculinity, and so on. Because it was a first experience for me as well, I got to learn so much. It even triggered many moments of reflection on so many aspects on my life.

Growing up, I was always this tall and lanky kid with short hair, often bullied and ridiculed by being called names. I enjoyed sports and crafts, baggy t-shirts and dresses, all at the same time and never really identified any of it either as a boy or girl thing. I grew up feeling isolated and like I did not belong anywhere. While filling out the examination form, I always made sure no one saw me tick next to the OBC category. I had been conditioned to feel ashamed about it. Over time, I slowly understood about social norms, gender expressions and the expected markers to fit into a certain gender or any other category. Society conditions you in such a way to fit into set markers since the day you were born that even a slight deviation from it made you feel out of place. The names never really bothered me. These expectations bothered me. For a child who is not familiar yet with concepts of patriarchy, gender, sexuality and binaries, it is confusing. It can even be devastating. Because there are no conversations around these issues, so many people have it worse. And that is not fair.

I think one of the main objectives of this course itself is to make as many people possible, aware of these things; to approach different aspects of life with a lens of gender and sexuality; and to look at people beyond certain categories and in a non-judgmental manner. There were questions raised after the sessions on gender that since we have now understood gender and gendered roles, are we supposed to go fight with everyone for whatever they say? I may be completely wrong but from what I have understood so far, I think it is important to understand that learning about concepts of gender, sexuality and gendered roles does not necessarily mean we fight and strain our relations with everyone, or overthrow everything we have right now overnight. Instead, it also means that we should be constantly aware of the social structures we are embedded in, and be empowered enough to find spaces for contestations and negotiations. Every small amount of change is some amount of change. More importantly, and especially after listening to several experiences and narratives of the participants, I felt that we should become more conscious of the language and words we use; making sure it is not exclusionary, full of judgment or stereotyping someone.

DSCN6846These conversations always carried on beyond the planned sessions. Since it was a residential course and all the participants were staying at the venue, there was a lot of interaction in the evenings, even carrying on till the wee hours – games, dancing and singing, activities, discussions, and sharing of various experiences from the field. I believe this peer learning supported in further building a space for many to share their personal experiences, so much as to comfortably share with each other one’s wildest dreams and sexual fantasies during a session on love, sex and desire.

This edition of the course also focused a lot on young people and their rights. Reviewing different policies that were related to young people, we see the construction of the idea of an ideal youth. No lens of gender or sexuality. No desires. No messiness. No differentiation among the needs of young people coming from different classes, castes, religion, gender or sexual identities and so on. Who will look out for these youth? As activists, we work on a daily basis with young people and rarely do we go through policies that are related to them. This particular session was designed keeping these issues in mind.

DSCN6874The sessions on technology and pornography were well received by the participants, as it helped in broadening the understanding on their linkages with patriarchy, masculinity, markets and capitalism. Consent was also discussed in great details, and beyond the binaries of just yes and no. I think it is important to understand the messiness that comes along with consent, like the other kinds of messiness in our day to day lives, and acknowledging the need to have a conversation about that is so important.

The participants provided a sense of support to one another as non-judgmental listeners while personal stories and experiences were being shared. Acknowledging that importance and the need for it in everyone’s lives, the last session planned was on collectivization and the need for support groups at the grassroots level. While it was important for conceptual understanding of theories on gender, patriarchy, masculinity and so on, how this understanding is carried forward to the field is of utmost importance. Standing up against a set norm or issue can be difficult and isolating for many and this is where support groups come to aid. As we listened to one another, discussed and debated over the last few days of the course; it is important to have that support at the grassroots too- a support group- a safe space for anyone who needs it.

Thereafter, parting ways was emotional. We had all known each other only for 6 days. Yet, with all the vulnerable moments and rich experiences that were shared with one another, there was a sense of belongingness. It felt as if there was never a time when one of us did not know the other. I guess that is one of the many beauties of these residential courses.

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खोल दो

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सआदत हसन मंटो का जन्म पंजाब के लुधियाना ज़िले में हुआ था।  उन्होंने बहुत कुछ लिखा – कहानियां, नाटक, लेख।  देश के बटवारे ने मंटो को तोड़ और झकझोर कर रख दिया।  और इस पर उन्होंने कई कहानियां लिखीं।  उन्होंने अपनी आँखों से पंजाब में हो रहे दंगे देखे।  मार काट देखी। आम आदमी को शैतान बनते देखा।  ‘खोल दो’ आम आदमी में पैदा हुयी इसी हैवानियत का नमूना है।  यहाँ हम निरंतर द्वारा प्रकाशित किताब से इस कहानी को दे रही है, जिसमे इसको आसान भाषा में लिखा गया था, ताकि नवसाक्षर भी इसे पढ़ सकें, चित्रांकन ऑरिजीत सेन का है।  

अमृतसर से रेल रवाना हुई। लाहौर पहुंचते -पहुंचते आठ घंटे लेट हो गई। रास्ते में कई लोग मारे गए। कई घायल हुए और बहुत सारे लापता थे। देश के बंटवारे का समय था।
सिराज को होश आया तो सुबह हो गई थी। उसकी आंखों के सामने सब कुछ घूम गया। लूट… हमला… आग… भागना… स्टेशन… गोलियां… सकीना। हां… सकीना कहां गई ? सिराज एक दम उठ खड़ा हुआ। घंटों अपनी जवान बेटी को ढूंढा। पर सकीना नहीं मिली।
चारों ओर लोग अपनों को खोज रहे थे। आखि़र सिराज थक-हार कर बैठ गया। सोचने लगा- ‘सकीना और उसकी मां से कब और कहां बिछड़ा था?’ अचानक सकीना की मां का मरा शरीर आंखों के सामने आया। उसका चिरा हुआ पेट। ख़ून से लथ-पथ साड़ी। दम तोड़ते हुए उसकी आख़री आवाज़ सिराज आज भी सुन सकता था – ‘‘सकीना को लेकर भाग जाओ ! मुझे रहने दो। हमारी बच्ची को बचा लो।’’ सकीना की कलाई कस के पकड़, सिराज भागा। नंगे पांव, पागलों की तरह दोनों भागते गए। फिर सकीना का दुपट्टा गिर पड़ा। दुपट्टा उठाने सिराज पलभर को रूका था। भागती भीड़ के पांवों से बचाकर दुपट्टा उठाया था ….. अरे! दुपट्टा तो आज भी उसकी जेब में है। पर सकीना कहां गई?
सिराज ने अपने थके दिमाग़ पर बहुत ज़ोर दिया। सकीना कब बिछड़ी? वह रेलवे स्टेशन तक आई या नहीं? गाड़ी में बैठी या नहीं? दंगा करनेवाले उसे उठा तो नहीं ले गए? सिराज को कुछ याद नहीं आ रहा था। कई दिन, बेटी का दुपट्टा जेब में लिए, सिराज इसी तरह भटकता रहा।
फिर एक दिन कुछ आशा बंधी। सिराज को आठ नौजवान लड़के मिले। उनके पास लाठियां थीं। बंदूकें थीं। एक ट्रक भी था। लड़कों ने बताया कि वे दूसरी तरफ़ छूटी औरतों और बच्चों को वापस ला रहे हैं। सिराज ने बेटी का हुलिया बतासा, ‘‘गोरा रंग है। बड़ी-बड़ी आंखें। काले बाल। दाहिने गाल पर मोटा सा तिल। उम्र सत्रह साल। सकीना नाम है। मेरी बेटी को ढूंढ लाओं। खुदा दुआएं देगा।’’ नौजवानों ने कहा- ‘‘अगर आपकी बेटी ज़िंदा है तो हम उसे खोज निकालेंगे।’’
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वे अमृतसर की ओर रवाना हुए। वहां से लौट रहे थे कि एक लड़की सड़क पर दिखी। उसने नौजवान लड़कों को देखा, वह डर कर भागने लगी। लड़कों ने ट्रक रोका और उसके पीछे भागे। कुछ दूरी पर उसे रोक लिया। लड़कों ने दिलासा दिया, ‘‘घबराओ नहीं। क्या तुम सिराज की बेटी सकीना हो ?’’ अनजान होठों पर अपना नाम सुनकर लड़की चौंकी। पर उसने माना- ‘‘हां, मैं सकीना हूं।’’ लड़कों ने उसे सिराज तक पहुंचाने का वादा किया। और सकीना उनके साथ ट्रक में चल दी।
कई दिन गुज़रे। सिराज को सकीना की कोई ख़बर नहीं मिली। फिर एक दिन वही नौजवान लड़के दिखे। सिराज भागा-भागा उनके पास गया। पूछा- ‘‘बेटा, मेरी सकीना का पता चला?’’ लड़कों ने जवाब दिया- ‘‘अभी तक नहीं मिली।’’
उसी दिन शाम की बात है। चार आदमी एक बेहोश लड़की को अस्पताल ले जा रहे थे। सिराज उनके पीछे-पीछे चल पड़ा। हिम्मत कर, वह अस्पताल के अंदर गया। वहा लड़की पलंग पर पड़ी थी। किसी ने बत्ती जलाई। कमरे में अचानक रोशनी हो गई। सिराज चीख़ा- ‘‘सकीना! यही है सकीना।’’ पास खड़े डाक्टर ने सिराज को घूर कर देखा। बड़ी मुश्किल से सिराज बोला- ‘‘जी मैं इसका बाप हूं।’’ डाक्टर ने सकीना की नब्ज़ देखी और खिड़की की ओर इशारा करके कहा- ‘‘खोल दो।’’
‘खोल दो’ सुन कर सकीना ज़रा सी हिली। यह देख सिराज ख़ुशी से चीख़ पड़ा- ‘‘मेरी बेटी ज़िंदा है! ज़िदा है।’’ सकीना की आंखें अब भी बंद थीं। पर उसके बेजान हाथ शलवार का नाड़ा टटोलने लगे। धीरे-धीरे नाड़ा खोला। शलवार नीचे सरककाई। और पैर चौड़े कर दिए। डॉक्टर ने शर्म से आंखें नीचे कर लीं। उसके माथे पर पसीने की बूंद चमक आई।
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“अच्छी लड़की”, “बुरी लड़की”

कार्यशाला के आखिरी दिन हमने लड़कियों को जोड़ों में बाँट दिया और उन्हें कहा कि वे अपनी जोड़ीदारों को लेकर “अच्छी लड़की” और “बुरी लड़की” की मूर्तियाँ बनाएँ (उन्हें खुद ये मूर्तियाँ बनकर खड़ा होना था)। इस एक्सरसाइज के माध्यम से हम ये दिखाना चाहते थे कि अच्छी और बुरी लड़की की सोच असल में जाति तथा औरतों के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों और मान्यताओं पर ही आधारित होती है। बतौर फेसिलिटेटर, हमें लग रहा था कि प्रत्येक प्रतिभागी अपनी जोड़ीदार के साथ जिस तरह काम करेगी, उससे यह समझने में मदद मिलेगी कि वह लड़की उन विचारों को किस तरह देखती है। इस गतिविधि से प्रतिभागियों को जाति के बारे में समाज की बजाय अपनी सोच पर ध्यान केंद्रित करने का मौका मिलता है। इस गतिविधि में कुछ प्रतिभागी बेचैन लग रही थीं मगर ज़्यादातर लड़कियों ने खुलकर हिस्सा लिया।

buriladkiजब “बुरी लड़कियों” की सारी मूर्तियाँ एक कतार में खड़ी कर दी गईं तो पता चला कि उनमें से ज़्यादातर के बाल अस्त-व्यस्त थे। वे आदमी की तरह टांग खोलकर बैठी दिखाई दे रही थीं। हाथ में शराब की बोतल थी। इस बहाने गुस्से, भूत-प्रेत के साए और शराबखोरी जैसी चीज़ों पर काफी बात भी हुई। “बुरी लड़कियों” की मूर्तियाँ एक बेबाक अंदाज़ का प्रदर्शन कर रही थीं। उनके हाव भाव से उनकी ख्वाहिशों और यौनिकता का इशारा मिल रहा था। उनके कपड़े जैसे दिख रहे थे, जैसे उनके बाल बना दिए गए थे, जिस मुद्रा में उनका शरीर तय किया गया था – उन सारी चीज़ों से निचली जाति और निम्न वर्ग के बारे में उस इलाके में प्रचलित स्टीरियोटाइप्स का साफ पता चल रहा था। सहभागियों के मुताबिक टांगें खोलकर या सटाकर बैठने का फर्क “बुरी लड़की” और “अच्छी लड़की” के फर्क को दर्शाता था।

जब “अच्छी लड़की” की सारी मूर्तियों को कतार में खड़ा किया गया तो उनमें से ज़्यादातर प्रार्थना करती दिखाई दीं। उनके सिर दुपट्टे से ढंके हुए थे। उनमें से कुछ पढ़ने-लिखने वाली या स्कूल जाती लड़कियाँ भी बनाई गईं। मज़े की बात यह है कि उनमें से एक लड़की वीणा भी बजा रही थी। एक नज़र में ही पता चला रहा था कि वे ऊँची जातियों से और उच्च वर्गीय परिवारों से ताल्लुक रखती हैं। अच्छी लड़कियों को ज़्यादातर “पूजा” जैसे नाम दिए गए थे। इससे भी उनकी ऊँची जाति का एहसास मिलता था।

एक “अच्छी लड़की” ने मॉडल का भी रूप धारण किया था। उसके बाल लंबे थे और स्टाइलिश ढंग से बंधे हुए थे। उसकी पैंट घुटनों तक ऊपर मुड़ी हुई थी। जब हमने पूछा कि ये लड़की कौन हो सकती है और कहाँ की हो सकती है तो लड़कियों ने फटाफट बताया कि यह लड़की किसी रईस घर की होगी और उसने कभी घर के कामों को हाथ भी नहीं लगाया होगा। उनके इशारों से इस मान्यता का पता चलता था कि वह किसी सवर्ण परिवार की है क्योंकि बाकी घरों की लड़कियों को तो घर के काम करने ही होते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वह बहुत फैशनेबल लग रही है और उसने सारा समय सिर्फ सिंगार में ही लगाया होगा। कुछ लड़कियों का कहना था कि वह “शहरी” लड़की है। जब उनसे पूछा गया कि क्या यह लड़की उनके गाँव की भी हो सकती है तो उन्होंने फौरन पलटकर कहा कि उनके गाँव की कोई लड़की ऐसे कपड़े नहीं पहनेगी।

अचंभे की बात यह रही कि जब हमने उन मूर्तियों के बारे में और बारीकी से बात करना शुरू किया तो लड़कियाँ बताने लगीं कि यह लड़की किस तरह के खानदान की रही होगी। उन्होंने कहा कि ये लड़की जरूर “जनरल” (हिंदी में “सामान्य” श्रेणी) की है। हमने उनसे एक बार फिर पूछा कि क्या वे यकीन से कह सकती हैं कि यह लड़की वाकई ऊँची जाति से है। उन्होंने भी और ज़्यादा यकीन से अपनी बात दोहरा दी, “वह यकीनन ऊँची जाति से ही है। कोई भी उसे एक बार देखकर ही ये बता देगा!” लड़कियों ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि निचली जाति की लड़कियाँ अपने बाल ऐसे नहीं बनातीं और न ही गाँव में ऐसे कपड़े पहनती हैं।

लड़कियों ने जाति पर भी खुलकर चर्चा की हालाँकि हमने जाति के बारे में कोई खास सवाल उनसे नहीं पूछा था। इस चर्चा से ज़ाहिर हो गया था कि एक “अच्छी लड़की” और एक “बुरी लड़की” के विचार में जाति बहुत गहरे तौर पर पैबस्त है। साथ ही भले ही उनके लिए जाति के बारे में खुद अपने विचारों पर सोचना और उनको बेबाक ढंग से स्वीकार करना मुश्किल रहा हो, मगर जब उन्हें किसी दूसरी लड़की के शरीर पर अपने मूल्यों और सोच को अभिव्यक्त करने का मौका दिया गया तो जाति के बारे में उनकी सोच खुद-ब-खुद सामने आ गई थी। असल में हम सभी पर राजनीतिक रूप से स्वीकार्य (पोलिटिकली करेक्ट) बात कहने का दबाव हमेशा ही बहुत ज़्यादा रहता है। इसकी वजह से कभी-कभी हमारे पास खुलकर अपनी बात कहने की गुंजाइश नहीं होती। हम जाति के बारे में अपनी सोच, जाति आधारित ऊँच-नीच के बारे में अपनी मान्यताएँ और ऊँची जातियों को मिलने वाली सामाजिक सत्ता वगैरह के बारे में खुलकर बात नहीं कर पाते। मेरे खयाल में ये वो मुकाम है जहाँ फेसिलिटेटर के नाते हमें जाति के बारे में चर्चा के दौरान पैदा होने वाले टकरावों और मतभेदों को और सख्ती से संबोधित करना चाहिए, खासतौर से जब हम जेंडर और यौनिकता के बारे में बात करें। जेंडर और यौनिकता के बारे में समुदाय कैसे सोचता है, यह समझने की चेष्टा कर रही फेसिलिटेटर्स और शोधकर्ताओं के तौर पर हमारे लिए ज़रूरी हो जाता है कि हम जाति की अपनी समझदारी पर और गहराई से सोचें। इस बारे में सोचें कि जाति किस-किस ढंग से अपने आपको अभिव्यक्त करती है और समावेशन व बेदखली के हमारे दैनिक व्यवहारों को किस तरह प्रदर्शित करती है।

आखिर में, भारतीय समाज में जाति एक अतिनिर्धारक तत्व है। समूचे इतिहास में दलित बहुजन की ओर से हुए जाति विरोधी उभारों ने इन जटिलताओं को स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया है और जब भी हमने अपनी जातिगत लाभ की स्थिति को छिपाने के लिए जेंडर और यौनिकता जैसी क्षैतिज पहचानों को ज़्यादा प्राथमिकता देने की चेष्टा की है, इन घटनाओं ने हमारी इस चालबाजी को बेपर्द कर दिया है।

जाति संबंधी हमारी वार्ताएँ अकसर सत्ता की बाहरी संरचनाओं पर चर्चा और उनको संबोधित करने पर केंद्रित रहती हैं मगर यह बात अकसर नज़रंदाज़ हो जाती है कि ये संरचनाएँ हमारी परफॉर्मटिविटी में कितनी गहरे तौर पर एम्बाॅडीड हैं, कैसे वे हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा हैं और यौनिकता से कितने गहरे तौर पर जुड़ी होती हैं।

 

स्रोत : एक्शन रिसर्च रिपोर्ट “दायरों और दास्तान के दरमियान” से अंश

Talking Gender: Boy in the Ghaghra

It’s late November, but we don’t need our sweaters when we board the bus for a two hour ride to the village (Hardauli) in Uttar Pradesh to conduct our theatre session. Driving past green fields fenced in by dry broken branches and a thick mesh of cobwebs, the bus drops us at the highway. From there we walk half an hour to the village under a scorching noon sun. We wait outside our workshop space and hope at least some girls will show up. Slowly girls trickle in. 10 -12 girls have showed up and we don’t expect more will come.

We start with warm up games but everyone’s imagination is consumed by the festivities of weddings. Even those who don’t have to attend a gathering are restless with the ambient excitement. One facilitator brings this excitement into the session. She suggests that everyone break into pairs and describe to each other one time they went for a wedding, and the outfit they wore on this occasion. Their favourite outfit. The time they enjoyed getting dressed the most.

The facilitator then asks them share each other’s story with the wider group. We hear about outfits of all colours, shapes and styles, bought from the town nearby (Banda) all the way to Bombay, and hairstyles to accompany. Each outfit holds within it a story – of separation, migration, travel, aspiration, desire, flirtation! They tell us about the compliments they received, the intimacies built with other girls when dressing up.

Then, one girl shares how her father doesn’t encourage her wearing clothes that are too revealing, something sleeveless for instance. She speaks about her struggle to wear what she wishes, and her desire to wear jeans. “My father says jeans won’t suit you”, she says. “But I fought with my father and bought a pair of jeans. I wore them once”, she adds, gleaming!

“Would you wear jeans to a wedding?”, one facilitator inquires. The girls respond with a resounding “no!”.

“Why not?”

“Well, because Ghaghras are pretty! And we’ll feel so left out if we’re not wearing such pretty things”

Then one girl says “At least its good for us, we can wear both, boys can’t wear Ghagras”

“Why not? Maybe they feel like it? Just like we want to wear what they’re wearing?”, one of us asks.

“No it shouldn’t happen… We have enough rules on us, so this one they can deal with”. The girls are indignant!

There’s giggles breaking out here and there, and then one girl bursts out “We have a boy in our area, who wears Ghaghras”

All the girls seem to know or at least know of this person, so one after the other they add snippets of information, building up an image in our minds.

“He recently started wearing ghaghras”

“He changed his name too”

“He’s our age”

“He lives by himself, and this other boy has recently moved in with him”

nandini 1

“He dances”

“He dances at weddings”

“He’s weird”

“He’s actually really nice, this one time when we met on the street, he called out to me and started talking to me… its really difficult to be awkward around him because he talks so nicely”

“He’s a friend of my mom’s”

Silence.

The fact that one of the elders is accepting of the boy strikes some girls as unusual. They expect elders, the custodians of tradition, to be opposed to this act of transgression.

“He talks to my mother”, the girl continues.

“My mother is nice to him too. She says he’s a human being like all of us. He comes and hangs out at my house often. He even dances with us. I have videos.”

Phrased this way, the rule-breaker as a human being, all other girls get on board. The initial disgust and giggle-fest subsides as if they have tacitly started being okay with him. “He’s nice” they collectively agree.

One of the facilitator asks, “What if we were to include him in this theatre group?” Maybe she was trying to test this new found acceptance.

“Yes! That’s a great idea!” A lot of the girls are game.

Another facilitator teases this out more. “Are you sure?”, she says, “I mean, just a minute ago we were playing games where we were literally on top of each other and touching each other in many ways, will you be comfortable doing that with him?”

This question has context. The community does not allow this group to include boys in their activities. It being an all girls group is the foundational agreement upon which they make this space possible.

“It’ll be weird at first but eventually we’ll get used to it”, one girl said confidently

“And what about parents, will they allow?”, a facilitator asks.

“No they won’t, if we told them. So we just won’t tell them”, another girl replies.

Just like that, the excitement around this topic fizzles out and we’re back to elaborate descriptions about Anarkali suits and evening gowns.

nandini 2As facilitators we were stunned by what we had witnessed. How did a random conversation lead up to such a moment and quite casually back to random conversation? It felt like a kind of rupture in the status quo articulation of the group around this ‘gender queer’ person. It’s possible that the same conversation could have happened in the same set of girls if they met somewhere else, but that it happened in an NGO space and in front of akaryakarta felt significant. The ease of the conversation, uninterrupted by jargon, stood out for us. The girls rather than the facilitators set and owned the language and terms of the conversation.

Source : ‘Between spaces and conversation: a book of stories’, Nirantar Trust.