वे बेनाम लड़कियां

भारत में जातिगत भेदभाव आम बात है।  कई बार अनजाने में हम भी उसका हिस्सा बन जाते हैं।  ये भेदभाव हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ऐसे घुल मिल गया है कि इसका अहसास होने में भी समय लग जाता है।  कई बार कोई चर्चा अचानक इन यादों को ताज़ा कर देती है।  ऐसा ही कुछ हुआ निरंतर द्वारा आयोजित जाति पर प्रशिक्षण में।  आइये जानें।

बात उन दिनों की है जब मै बहुत छोटी थी, मुश्किल से 8-10 साल की। मेरे घर के पीछे चरवाहे और बाकि लोग जिन्हें निचली जाति के लोग कहा जाता है, उनके बच्चे अपनी भैस–बकरी चराते थे। वहां बड़ा सा खुला मैदान था I हम सभी बच्चे वहीं शाम को खेला करते थे। कभी–कभी, मैदान में घास चरते–चरते, बकरियां ख़ास तौर से बकरी के बच्चे, बांस की बाड़ को पार करके हमारी बाड़ी में आ जाते थे। जब भी ऐसा होता, हम सभी बच्चे खुश भी होते और गुस्सा भी आता। ख़ुशी इस बात की होती कि बकरी के बच्चे के साथ खेलेंगे और गुस्सा इस लिए आता क्योंकि बकरियां बाड़ी से सब्ज़ी चर जाती थीं।

काफी बचपन से ही, बड़ी जाति के होने का गहरा आभास था। इसका ज्यादा मतलब नहीं मालूम था, लेकिन किसी छोटी जाति के बच्चे या बड़े द्वारा हमारी चीज़ को ख़राब करने या इस्तेमाल करने पर रौब ज़माना हमें बखूबी आता था। उनके जानवरों को नुक्सान पहुँचाना, उन्हें डांटना, अपनी कोई चीज़ उन्हें न देना मुफ्त में नहीं देना ही हमारी जातिगत ताकत की पहचान थी।

एक दिन, दोपहर को हमारी बाड़ी में एक बकरी का बच्चा घुस आया। हमने उसे पकड़कर बाँध दिया और उनके मालिक के आने का इंतजार करने लगे। लेकिन ये सब कुछ पापा से छुप कर चलता था, जिससे उनकी डांट न लगे। हमने सोचा हमेशा की तरह इस बार भी बकरी के मालिक को खूब डांट लगाएंगे और धमकाएंगे। फिर माफ़ी मागने पर, बकरी वापस कर देंगे। बच्चो के सामने, बड़ों को ऐसे जी हुज़ूरी करते देखने में मज़ा आता था। ऐसे ही मौके पर, हम बच्चों को अपनी ताकत का एहसास होता था।

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पता नहीं क्यों, उस दिन, पूरे दिन कोई बकरी लेने नहीं आया। इधर घर के पीछे के कमरे की तरफ बंधी बकरी ने दोपहर से ही शोर मचाना शुरू किया था। गनीमत थी कि पापा उस दिन घर पर नहीं थे। बाल–बाल बचे थे हम सभी। शाम को पापा के आते ही हम सभी ने बकरी को और घास लाकर दी और पानी भी पिलाया। धीरे–धीरे बकरी थोड़ी शांत हुई। लेकिन , बीच–बीच में अपनी माँ को याद करके मिमियाती भी थी। शाम ढलने के करीब, दो लडकियां, जो करीब 9-10 साल की होंगी, शोर मचाती हुई घर के पीछे के बाड़ से अन्दर आ गईं। आकर कहने लगीं, ‘ हमर बकरी के बच्चा, तोहरा एह अलेउअ। हमर बकरी दे दे।’ हमने भी गुस्से में एक साथ कहा , ‘ किसी की बकरी नहीं आई है।’ लेकिन वे परेशान सी, बिना हमारी बातों पर ध्यान दिए इधर- उधर ढूंढने लगी।

उसकी उम्र भी हम सभी के बराबर थी लेकिन आवाज़ बहुत कड़क थी। मेरी दीदी ने कहा, ‘उधर है तुम्हारी बकरी। हम नहीं देंगे। बुलालो अपनी माई को।’ वे नहीं मानी, फिर से बकरी मांगने लगी। उनमें से एक ने कहा,’ ज़रा सी बकरी अन्दर क्या आ गई, बकरी को पकड़ लिया।’ न जाने गुस्से में क्या–क्या बड़–बड़ किए जा रही थी। उसकी आधी बात समझ में आती और आधी नहीं। ये सब शोर सुनकर मां भी आ गईं। उन्होंने हमसे कहा, ‘ दे दो इसकी बकरी।’ और उससे, “अगली बार से ठीक से बांधना, इधर नहीं आए” कहती वहां से चली गई। हम सभी बच्चों को अन्दर ही अन्दर बहुत गुस्सा आ रहा था। बकरी देने का बिल्कुल मन नहीं था। उनमें से एक लड़की ने कहा, ‘ माई बाज़ार गेल हई। मुढ़ी बेचे। घरे न हई।’ मां की बात मान, बेमन से हमने उसकी बकरी दे दी। हम सभी को पहली बार किसी छोटी जाति की लड़की ने पलट कर जवाब दिया था। हमें अपना रौब दिखाने का ज्यादा मौका नहीं मिला। हमने सोचा अगली बार मज़ा चखाएंगे। उसके बाद अक्सर वो मुझे रस्ते में दिखाई देती मगर न कभी मैने उससे बात की, न उसने मुझसे।

मेरे घर के पास, हमारा आम, कटहल और जामुन का बड़ा बगीचा था । पूरे साल तो हमें वहां जाने का मौका नहीं मिलता था, लेकिन आम के मौसम में हम सभी जरुर जाते थे । गर्मी की छुट्टी में पूरे दिन बगीचे में खेलते, पढाई करते और आम की रखवाली भी करते थे । एक दिन वे दोनों बहनें, हमारे बगीचे में आईं । वे बगीचे से पत्ता बीनने आई थीं और बड़ी सी टोकरी लिए, बांस की झाड़ू से पत्ता बीन रही थीं। हमें देखकर रुक गईं । हमें लगा अब पुराना बदला लेने का मौक़ा आ गया है। हमनें उन्हें डांटते हुए कहा, ‘ हमारे बगीचे में पत्ता बीनने कभी मत आना । कहीं और जाओ । भागो यहाँ से ।’ दोनों ने बुरा सा मुंह बनाया और बड़–बड़ाती हुई चली गईं । हमें अपनी जीत पर बहुत ख़ुशी थी ।

कुछ साल बाद एक दिन मै बाज़ार जा रही थी तो रास्ते में उन्हें देखा । वे दोनों बहनें सरकारी तालाब के किनारे छोटी झोपड़ी बना रही थीं। उनकी माई टाटी ( घास-फूस की दीवार) लगा रही थी और दोनों उसकी मदद कर रहे थे। मैंने पहले कभी उनका घर नहीं देखा था। कहीं छोटी–छोटी गलियों के अंदर जाकर था। अब वे थोड़ा बाहर तालाब के पास झोपड़ी बना रही थीं । पहली बार उन्हें देखकर आज गुस्सा नहीं आया था । उन्हें इतनी मेहनत से वह छोटी सी झोपड़ी बनाते देख एक अलग सी अनुभूति हुई जिसके लिए आज कोई शब्द नहीं ढूंढ पा रही हूँ । मैंने घर जाकर मां से उनके बारे में पूछा । उन्होंने बताया कि वे चार बहनें हैं और सबसे छोटी बेटी के पैदा होने के कुछ दिनों बाद ही पिता गुजर गए । बहनों के बीच भी कुछ ख़ास उम्र का अंतर नहीं है । पता चला कि कि वे दोनों बहने ही घर का सारा काम करती हैं और माई का बाज़ार के काम में भी हाथ बटाती हैं। बकरी चराना, लकड़ी लाना, खाना बनाना और बाज़ार का काम करना, सभी कुछ करना पड़ता है दोनों को।

उस दिन के बाद भी मैंने उनसे कभी बात नहीं की, लेकिन अब कभी लड़ाई भी नहीं करती थी। उन्हें अपने बगीचे से पत्ते बिनने देती और उनकी बकरी अन्दर आने पर भगा देती थी। जब मै आठवीं कक्षा में पहुची तो मेरा बाज़ार जाना कम हो गया। इसलिए, काफी दिनों से उसका घर नहीं देख पाई थी। वो आजकल बकरी चराने भी नहीं आती थीं। पहले बाज़ार आते-जाते उनके घर की तरफ देख लेती थी। कभी वो बकरी बांधती, कभी तालाब में बर्तन धोती तो कभी घर लीपती हुई नज़र आ जाती थीं। काफी महीनों बाद एक दिन उनमे से एक बहन को देख मैं चौक गई। उसने पीली साड़ी पहनी थी और लाल सिंदूर लगाया था। मुझे समझ अया गया कि उसकी शादी हो गई है। उसे तो ठीक से साड़ी पहनना भी नहीं आ रहा था। साड़ी लपेटे हुए, घर के बाहर गेहू समेट रही थी। उस वक्त उसकी उम्र मुश्किल से 13 -14 साल की रही होगी।

स्कूल की पढाई के बाद जब भी मै घर जाती वो मुझे कभी नहीं दिखी। इतने साल बीत गए, मैंने कॉलेज की पढाई खत्म करके, नौकरी भी शुरू कर दी। लेकिन वे दोनों बहनें उसके बाद नहीं दिखीं। निरंतर द्वारा आयोजित जाति पर प्रशिक्षण के दौरान चर्चा से कई पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। बचपन की वो बातें जो बहुत साधारण लगाती थीं, उन्हें गहराई से सोचने का मौका मिला। पढाई के साथ–साथ जातिगत भेदभाव को धीरे–धीरे समझने लगी थी। लेकिन इस प्रशिक्षण के दौरान अलग-अलग घटनाओं और सामाजिक ढांचे पर हुई चर्चा ने यादें ताज़ा कर दीं।  कैसे बचपन में हम उन्हें ‘झगरौनी ‘, यानी झगड़ा करने वाली कहकर आपस में बातें करते थे। उनका नाम न तो हमें  मालूम था नाहीं जानने की कभी कोशिश की थी। अब समझ में बात आती है कि वे इतना झगड़ा क्यों करती थीं? उनकी विधवा माई और दोनों बहनों को ही पूरे परिवार का खर्च चलाने के लिए मेहनत करनी पड़ती थी। दूसरों के बगीचे से पत्ते लाना, लकड़ी लाना, खेतो से चुरा कर साग–सब्जी लाना, लोगों की लालची नज़रो का सामना करना, इन हालातों में गुस्सा, गाली, लडाई और बोलने के सिवा और कोई गुंजाइश नहीं थी। बिना झगडे तो वे तालाब किनारे घर तक नहीं बना पाई थीं। तालाब किनारे जमीन तो सरकारी थी लेकिन, ऊँची जाति के लोग किसी गैर को वहां बसने नहीं देते थे। काफी लड़–झगड़कर उनलोगों ने अपनी झोपड़ी बनाई थी। अपनी रोज की रोटी के लिए लड़ना उन्होंने इस बेरहम समाज से ही सीखा था।

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Understanding Caste

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(This article is based on a conversation from the 4-day workshop on Understanding Caste, organized by Nirantar and conducted by DiptaBhog and Purnima Gupta, was initiated by this question. The workshop, which was attended by participants from 5 organizations -Vanangana, Sakar, Vikalp, SahajaniShiksha Kendra and Nirantar.)

“If a Dalit case-worker asks a savarna complainant to drink water offered by her, isn’t the case-worker perpetuating another kind of violence on the complainant?”

One of the most revealing conversations during the course of the workshop happened towards the end of the second day, when different organizations were sharing their experiences in the field. Vanangana, a UP based organization, shared the story of the Dalit Mahila Samiti, and their work with survivors of domestic violence and assault. The Samiti, run by Dalit women, in the area, they shared, had an important pre-condition before accepting someone’s case. They would help a woman and her family with their casework, if the survivor and the survivor’s family drank a glass of water from their hands.

The moment this was shared, another participant voiced a concern that by doing so – by asking the survivor (presumed here to be a savarna woman) to drink a glass of water offered by them, wasn’t the Samiti perpetuating another violence upon the already stricken woman? The articulation of that question – the concern that a Dalit woman asking an upper caste woman to drink a glass of water from her hands, is an act of violence – reveals the deep, insidious, and sordid nature of caste based discrimination in our societies. A system in which the institutionalization of violence towards certain communities and people is so normalized that it is not even viewed as violence any more but any move these communities make towards destabilizing the status quo is seen as an egregious act of violence. The expectation that a Dalit woman will help an upper caste woman in resolving her case, but will agree to be treated without dignity or basic courtesy without it being even remotely considered as problematic also reveals the historic entitlement upper-caste communities have over Dalit women’s bodies, their labour and their time. This expectation is seen as normal and even natural and any move to destabilize that – any assertion of equality is seen as violence. It also drove home the point that many of us constantly seek to invisibilize and was something that was constantly reiterated during the workshop – Caste is not a problem, external to upper-caste communities. Mr. Satish Deshpande, in his session described caste as a two-way relationship and also mentioned how historically certain processes have enabled upper caste communities to invisibilize their caste identities while visbilizing the caste identities of lower caste communities. This is an idea that most of us have internalised very deeply, because when we talk about caste, we only seem to talk about Dalit identities or OBC identities, seeing ourselves and our upper caste identities as above or in many ways, having transcended the caste system. A question like this brings to the fore the ways in which we are not only deeply embedded in the system and have reaped the privileges of the system but continue to reap those benefits by excluding others or committing violence against others. It is our privilege that we hold a sense of entitlement over certain bodies and our blinding privilege that we continue to not see it as an expression of our caste based violence.

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बदलाव की लहर

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निरंतर द्वारा चलाए जा रहे पेस (परवाज़ अडोलेसेंट सेंटर फॉर एजुकेशन) कार्यक्रम में खासकर उन लड़कियों के साथ शिक्षा साक्षरता का कार्यक्रम चल रहा है जो कभी स्कूल नहीं गयी हैं या जिनकी पढाई छूट चुकी है. इन सभी लड़कियों की उम्र 14 से 24 साल तक की है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत दिल्ली के अलग अलग हिस्सों में शिक्षा केंद्र चलाये गए हैं।  इन्हीं में से एकजनता मज़दूर कॉलोनीस्थित शिक्षा केंद्र में हुए कुछ अनुभव पेश हैं :

दिल्ली की चमक-धमक तो सभी ने देखी होगी और शायद महसूस भी की होगी।  न जाने कितने लोग दिल्ली की ख़ास इमारतों को देखने और यहां मिलने वाली खाने की चीज़ों का स्वाद लेने आते हैं। इस दिल्ली के कई रंग और बेशुमार रौनकें हैं।

लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। दिल्ली भी इससे अछूती नहीं है। एक तरफ अगर रंगीनी और मौज मस्ती है तो दूसरी तरफ आम लोगों की ज़िन्दगी है जिनमें से कई दो वक़्त की रोटी जुटाने में अपनी सारी ज़िंदगी निकाल देते हैं, जो ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां मूलभूत आवश्यकताएँ भी पूरी मुश्किल से ही होती हैं।

आज मैं दिल्ली के एक ऐसे ही इलाक़े की सैर आपको कराने जा रही हूँ। पूर्वी दिल्ली के इस इलाक़े को जनता मज़दूर कॉलोनी के नाम से जाना जाता है।

जनता मज़दूर कॉलोनी में, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, उन लोगों की आबादी ज़्यादा है जो मज़दूर तबके से हैं। यहाँ पर छोटे छोटे कमरों और घरों में लोग हस्तकला से जुड़े काम करते आसानी से दिख जाते हैं। यहाँ जीन्स के धागे काटने का काम ज्यादा होता है।  साथ ही घरों में लड़कियाँ कढ़ाई, नग-मोती चिपकाने और ज़ंजीर बनाने का काम भी करती हैं।  यहाँ पर ऐसी लड़कियां भी मिल जाएँगी जो अपने पिता और भाइयों के साथ मिठाई, नमकीन, मट्ठी और नमकपारे बनाती हैं। बड़ी बड़ी दुकानों में मिलने वाले माल की पूरी या शुरुआती तैयारी अक्सर यहीं होती है।

इस कॉलोनी में हमने लड़कियों के लिए शिक्षा केंद्र (एजुकेशन सेंटर) खोलने का निर्णय लिया था। इसके लिए सर्वेक्षण किया और ज़मीनी हकीकतों का अंदाज़ा लगा कर सेंटर की शुरुआत की।

जब लड़कियाँ सेंटर में जुड़ीं तो और परतें खुलीं कि रोज़गार और घर के कामकाज की जिम्मेदारियों ने कैसे उनको पढ़ाई से दूर रखा। सेंटर की सभी लड़कियों की अनकही कहानियाँ थीं। सभी लड़कियों में पढ़ने की जो उमंग और लगन थी वो बहुत ही सराहनीय थी। लड़कियाँ जल्दी जल्दी अपने घर के सब काम निपटा कर सेंटर समय से आतीं।

जब सेंटर में लड़कियाँ शुरू शुरू में आयी थीं तो सभी शांत, शर्मीली, कम बोलने वाली और डरी-सहमी सी थीं।

सेंटर खुलने के दो महीने बाद मीटिंग की गयी जिसमें सभी लड़कियों के माता-पिता को बुलाया था। ऐसी मीटिंगों का मकसद होता है कि माता-पिता अपनी बेटियों की प्रगति का अंदाज़ा लगा सकें कि सेंटर आने के बाद से उन्होंने क्या कुछ नया सीखा है। साथ ही अपने मुद्दों को भी वो बता सकें। कहने के लिए तो ये मीटिंगें माता पिता दोनों के लिए होती हैं मगर असल में अधिकतर माएँ ही इनमें दिखाई देती हैं।

इस पहली मीटिंग में सभी माएँ अपनी बेटियों के साथ काफी तैयार होकर आयी थीं। लेकिन ज़्यादातर बहुत चुप चुप थीं। सभी से हमने अपना परिचय देने के लिए कहा। कुछ माएँ तो इतना शर्मा रहीं थीं कि उनसे कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था। मीटिंग की शुरुआत हुयी और माओं ने अपने अनुभव बाँटने शुरू किये। वे काफी खुश थीं कि उनकी बेटियां पढ़ना लिखना सीख रही हैं। साथ ही उनका यह भी कहना था कि उनकी बेटियों में काफी बदलाव भी दिखता है। कुछ माओं ने यह भी कहा कि अब उनकी लड़कियाँ न सिर्फ पढ़ना-लिखना सीख रही हैं बल्कि उनमें आत्मविश्वास और यकीन भी बड़ गया है। वे घर में भी जानकारियां बांटती हैं। एक माँ ने अपना अनुभव बताते हुए कहा, “जब मेरी बेटी ने अपना नाम और घर का पता लिखा तो मैं पड़ोस में चेक कराने ले गयी कि इसने सही लिखा है क्या? मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था जब मुझे पड़ोसियों ने बताया कि सब कुछ बिलकुल ठीक लिखा है।” इस तरह के और भी अनुभव हमारे सामने आये।  सभी लड़कियों ने अपनी माओं के सहयोग और विश्वास की सराहना की और यह भी सांझा किया कि जब वो सेंटर की कोई गतिविधि या वर्कशीट भरना घर पर करती हैं तो माओं को बहुत जिज्ञासा होती है और अक्सर वे जानना चाहती है कि उनकी बेटियां क्या कर रही हैं।

हमने सेंटर की पढ़ाई, वहां की जानकारी और गतिविधियों को माओं के साथ बांटा। उन्हें बताया कि हिंदी और गणित के अलावा विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और लड़कियों की ज़िन्दगी से जुड़े मुद्दों पर बात और चर्चा होती है। साथ ही किताबी ज्ञान को व्यावहारिक ज़िंदगी से जोड़ने के लिए ‘हिस्टोरिकल वाक’ करायी जाती है।

हमने यह भी बताया कि लड़कियाँ पढाई के साथ तरह तरह के खेल भी खेलती हैं और खेल खेल में हम सीखने और सिखाने की प्रक्रिया को बनाये रखते हैं। फिर हमने माओं से पूछा कि क्या वे खेलना चाहेंगी।  इस सवाल पर वे बहुत शरमाईं। मगर थोड़ा मनाने पर तैयार हो गयीं। खेलों की शुरुआत हुयी तो धीरे धीरे उनकी झिझक टूटी। वे खुश थीं। खेल रहीं थीं। थोड़ी देर के लिए वे मानो अपनी सारी परेशानियाँ भूल गई थीं।

इस सेंटर को खुले हुए दस महीने हो गए हैं और आज इसका समापन समारोह है। उस समय माँ-बेटियों में बदलाव की जो झलक दिखाई दी थी आज समापन समारोह में ये बदलाव पूरी तरह हमारे सामने है। खासकर सेंटर पढ़ने आने वाली लड़कियों का आत्मविश्वास देखते ही बनता है। अब वे सपने देखना सीख गयी हैं और अपनी ज़िंदगी में अपनी बात मनवाने के लिए संघर्ष भी कर रही हैं। उन्हीं शरमाई-सकुचाई लड़कियों को स्टेज पर बोलते देख, नाटक प्रस्तुत करते देख, नाचते गाते देख जिस संतुष्टि, गर्व और खुशी का अहसास हो रहा है उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

 

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गाँधी की वस्त्र यात्रा

Gandhi Jacket Final copyमहात्मा गाँधी का नाम आते ही हमारी आँखों के सामने कौन सी तस्वीर आती है? एक ऐसे बूढे़ की जिसके बदन का ऊपरी हिस्सा बिल्कुल खुला है और जिसने एक छोटी सी धोती बाँध रखी है। लेकिन गाँधी हमेशा से ऐसे न थे। उन्नीस साल की उम्र में वकालत पढ़ने के लिए इंग्लैंड जाते समय उन्होंने अपनी टीक कटवा ली। अपने लिए ऐसा पहनावा बनवाया जिसमें वे इंग्लैंड देश में अलग-थलग न दिखाई पड़ें। कोट-पैंट के साथ छोटी जैकेट भी पहनी। अंग्रेज़ी ढंग की पोशाक को वे बेहतर मानते थे, सो जब वे हिंदुस्तान लौटे तो भी वही पहनते रहे।
1893 में गाँधी कुछ भारतीय व्यापारियों के बुलावे पर उनका मुकदमा लड़ने दक्षिण अफ्रीका पहुँचे। उन्हें लेने आए लोग उनके अंग्रेज़ी पहनावे को देख कर थोड़े निराश हो गए। उनकी पूरी पोशाक में सिर्फ बंगाली किस्म की पगड़ी ही एक भारतीय चीज़ थी। लेकिन दक्षिण अफ्रीका की अदालत में इसी पर ऐतराज़ किया गया। मुकदमे की बहस करने खड़े गाँधी को मैजिस्ट्रेट ने तुरंत पगड़ी सर से हटाने को कहा। भारत में पगड़ी उतारना बेइज़्ज़ती माना जाता है। इसलिए वे विरोध में फौरन अदालत से बाहर निकल आए। फिर सोचा कि बात बढ़ाने से कोई फायदा नहीं। आगे से वे अंग्रेज़ी हैट लगाया करेंगे। वह तो एक मुसलमान व्यापारी था जिसने उन्हें समझाया कि मैजिस्ट्रेट की बात चुपचाप मान नहीं लेनी चाहिए। पगड़ी पहनना तो भारतीय होने की पहचान है। फिर गाँधी ने खुलकर मैजिस्ट्रेट के इस कदम की आलोचना की। इस एक घटना ने कपड़ों और पहनावे को लेकर गाँधी का नज़रिया बदल दिया। 1913 में दक्षिण अफ्रीकी अधिकारियों ने भारतीय कोयला खान मज़दूरों पर गोली चलाई। उसकी विरोध सभा में गाँधी पहली बार अपना सर मुंडाकर एक लुंगी और कुर्ते में पहुँचे। उन्होंने कहा कि यह शोक की घड़ी है। दूसरे मौकों पर भी उन्होंने कहा कि शोक के समय कपड़े कम कर देने चाहिए। गुलामी को वे शोक की घड़ी ही मानते थे।
1915 में हिंदुस्तान लौटते वक्त गाँधी ने अपने लिए काठियावाड़ी किसान का धोती-कुर्ता मँगवाया। काठियावाड़ गुजरात राज्य में है। उनको एक मामूली गुजराती किसानवाली धज में देखकर स्वागत करनेवालों में से कइयों को बहुत अजीब लगा। कुछ ने इसे उनकी सनक माना। लेकिन इस तरह गाँधी ने भारतीय पोशाक को महत्त्व देने का अपना निर्णय ज़ाहिर किया। आगे अपने कपड़ों को लेकर वे काफी प्रयोग करते रहे। कभी वे कढ़ाईवाले किनारे की धोती पहनते, कभी ढीली-ढाली शर्ट और पाजामा। कभी शाल के साथ सादी लुंगी। इतना ज़रूर है कि उस वक्त की तस्वीर में गाँधी सर से पाँव तक ढँके हुए दिखाई देंगे।
हिंदुस्तान के हाथ की कताई-बुनाई उद्योग को गाँधी वापस उसकी जगह दिलाना चाहते थे। इसलिए वे खादी के इस्तेमाल पर ज़ोर देते रहे। सन् 1919 में जाकर उन्होंने कहा कि हम सब सिर्फ स्वदेशी कपड़ा ही पहनें। भले ही इसके लिए सिर्फ लंगोट पर संतोष क्यों न करना पड़े। उस वक्त वे विदेशी कपड़ों की होली जलाने का आंदोलन भी चला रहे थे। उस समय उन्होंने अपनी शर्ट छोड़कर सिर्फ लंगोटनुमा धोती पहनने के बारे में सोचा। अपने मित्र मौलाना मोहम्मद अली की गिरफ्तारी के वक्त भी उन्होंने अपनी टोपी और गंजी उतार देने की सोची। दोस्तों से राय-मशविरा भी किया। 22 सितंबर, 1921 को उन्होंने अखबार के ज़रिए अपना निश्चय बताया। यह कि वे अपना सर मुंडा लेंगे और पाँच सप्ताह के लिए सिर्फ लंगोट पहनेंगे।
गाँधी ऐसे देश की कल्पना कर रहे थे जिसमें हरेक को पूरा खाना और तन ढँकने को कपड़ा मिल सके। लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता, वे खुद कैसे पूरा कपड़ा पहन सकते थे! लंगोट मजबूरी में पहनी जाती है। गाँधी भारत के सबसे गरीब आदमी जैसा ही रहना और दिखना चाहते थे। उन्होंने कहा कि अगर हम ढेर सारे कपड़े पहनेंगे तो गरीबों को कपड़े नहीं मिलेंगे। जबकि हमारा धर्म है कि पहले उन्हें पहनाएँ, फिर खुद पहनें। ‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ में उनकी आस्था नहीं थी। खुद कम से कम कपड़े पहनकर उन्होंने अपनी बात लोगों तक पहुँचाई। वे पूरी दुनिया को यह दिखाना चाहते थे कि अंग्रेज़ सरकार कितनी लुटेरी और क्रूर है। भारत के आम आदमी को पूरा खाने और पहनने को मयस्सर नहीं। खादी की लंगोटनुमा धोती धारण करना गाँधी का राजनीतिक निर्णय था। वे इसे धार्मिक संत की पहचान के रूप में नहीं देखते थे। इसे पहनने में उनको कोई शर्म नहीं थी। अंग्रेज़ सरकार से बातचीत करने गोलमेज़ सम्मेलन में वे इंग्लैंड गए। तब भी उन्होंने यही पहनावा रखा। वहाँ के राजा ने दावत दी थी। सवाल उठा कि गाँधी तो कायदे का कपड़ा ही नहीं पहने हुए हैं। गाँधी ने अपनी पोशाक बदलने से इन्कार कर दिया। हँसते हुए कहा कि राजा ने अकेले इतने कपड़े पहन रखे हैं कि दोनों के लिए काफी होंगे।
Gandhi Dhoti Final copyकपड़े के मामले में गाँधी हर घर को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। वे खुद चरखा चलाते थे। लोगों से वे कहते थे कि रोज़ाना कम से कम आधा घंटा चरखा चलाएँ। उनके विचारों से प्रभावित हो उनके काफी सहयोगियों ने खादी अपना ली। पर उन्होंने अपनी शैली और अपना डिज़ाइन अलग-अलग रखा। हाँ, खादी बहुत लोगों को गड़ती थी। लेकिन गाँधी महीन खादी के पक्ष में नहीं थे। महँगी होने के कारण भी खादी के इस्तेमाल से लोग हिचकते थे। एक बार महाराष्ट्र की एक स्त्री ने गाँधी से कहा कि वहाँ नौ हाथ की साड़ी पहनने का रिवाज है। मगर उनके पास इतनी लंबी खादी की साड़ी के लिए पूरा पैसा नहीं।
रहन-सहन के तरीकों पर गाँधी ने उतनी ही गंभीरता से विचार किया जितनी गंभीरता से वे आज़ादी के बारे में सोचते थे। उनकी फ्रिक थी कि कपड़े बनाने के ऐसे तरीके हों जो बहुत महँगे न हों। प्रकृति की चीज़ों को भी कम से कम खर्च करना पड़े। वही सबके लिए अच्छा है।

अंतरिक्ष में बढ़ते कदम

sunita
हमने ब्रह्मांड के बारे में कितना कुछ पढ़ा और जाना। मगर हम तो धरती पर हैं और आकाश को सिर उठाकर देखें तो छोटे-छोटे टिमटिमाते तारों, चाँद और सूरज के अलावा कुछ ज़्यादा दिखाई नहीं देता। फिर इतनी सारी बातें ब्रह्मांड के बारे में हम जानते कैसे हैं? इसके तीन मुख्य तरीके हैं।
आकाश के छिपे भेद देखने का सबसे पुराना तरीका है दूरबीन या ‘टेलीस्कोप’। जी हाँ, वही दूरबीन जिसमें बदलाव करके गैलीलियो ने पहली बार आकाश में झाँका था। आज की दूरबीनों से दूर-दूर के तारों को देख सकते हैं। उनकी तस्वीरें खींच सकते हैं। दूरबीनें अंतरिक्ष में भी कृत्रिम उपग्रहों (इंसान के बनाए उपग्रह) के रूप में भेजी गई हैं। धरती से आकाश को देखने में कई बाधाएँ आती हैं। कोहरा, बारिश, बादल बीच में आ जाते हैं। मगर अंतरिक्ष में भेजी ये दूरबीनें इन सब से परे हैं।
दूसरा तरीका है स्वचालित यानों द्वारा अंतरिक्ष अन्वेषण। इन्हें धरती से नियंत्रित किया जाता है। ये ग्रहों, उपग्रहों आदि की जानकारी के लिए भेजे जाते हैं। इनको अंतरिक्ष में काफी लंबी दूरियाँ तय करनी पड़ती हैं। इनके सफर में लगने वाला वक्त कई सालों का होता है।
तीसरा तरीका है इंसानों द्वारा अंतरिक्ष में जाकर अध्ययन करना। अंतरिक्ष में जाने वाले ‘अंतरिक्ष यात्री’ कहलाते हैं। पहला अंतरिक्ष यात्री यूरी गगारिन रूसी था। उसने अप्रैल 1961 में धरती का चक्कर लगाया था। साल 1963 में अंतरिक्ष में जाने वाली पहली औरत वालेंतिना तेरेश्कोवा भी रूसी ही थी। साल 2012 तक लगभग 525 यात्री अंतरिक्ष में जा चुके हैं। इनमें से सिर्फ 56 ही औरतें है। इनमें अमरीका में रही भारतीय मूल की कल्पना चावला व सुनीता विलियम्स शामिल हैं।
अंतरिक्ष में जानेवाली औरतों की कम संख्या उनके साथ किए जाने वाले भेदभाव का परिणाम है। अव्वल तो लड़कियों की शिक्षा और काम करने पर ही पाबंदी है। फिर विज्ञान को दिमागी काम मानकर ऊपर का दर्जा दे दिया जाता है और लड़कियों के बस का नहीं माना जाता। अपने आप को साबित करने के लिए उन्हें पुरुषों से कहीं ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती है। फिर भी कई बार उन्हें मौके नहीं मिलते। अंतरिक्ष में सबसे अधिक अमरीकी लोग गए हैं। मई 1961 में पहला अमरीकी अंतरिक्ष में गया। इसी दशक में अमरीका में अंतरिक्ष यात्रिय®ं की जाँच करनेवाले चिकित्सकों के दल द्वारा एक निजी अंतरिक्ष यात्री जाँच कार्यक्रम चलाया गया। इस कार्यक्रम का मकसद था यह देखना कि औरतें अंतरिक्ष में आने वाली परेशानियों को झेल सकती हैं या नहीं। इसमें 25 औरतों से हर वह काम करवाया गया जो पुरुषों से करवाया जाता है। उनके स्वास्थ्य की जाँच हुई। बर्फीला पानी उनके कानों में डाला गया। उन्होंने कई घंटे ठंडे पानी से भरे बंद अंधेरे टैंक में गुज़ारे। और भी कई तरह की कठिन परीक्षाओं को पार किया। उनमें से 13 औरतें इनमें सफल रहीं। फिर भी अंतरिक्ष में जाने का मौका उन्हें नहीं दिया गया। हाँ, उन्होंने अमरीका में औरतों के अंतरिक्ष में जाने का रास्ता खोल दिया। पहले अमरीकी पुरुष के 22 साल बाद वर्ष 1983 में सैली राइड अंतरिक्ष में जाने वाली पहली अमरीकी औरत थीं।
स्रोत : युवा पिटारा श्रृंखला बुकलेट ‘रोशनी के द्वीप’