Experiences and Learning from a Conference on Sustainable Development through Multilingual Education- Part 1

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Nirantar recently participated in the 5th International Conference on Language and Education at UNESCO, Bangkok, where we presented a paper on ‘Breaking the Barriers of Languages in India’. One of the participants from Nirantar, Prarthana, has described her experiences below of being a part of this platform and has shared her learning from this space.

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कल्पना की उड़ान

आज कल्पना चावला (मार्च 17, 1962 – फ़रवरी 1, 2003) की  14वीं बरसी है। वे कोलंबिया स्पेस शटल हादसे में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं। उनके काम और सफलता की चर्चा आज भी देश में ही नहीं, पूरे विश्व में होती है. लेकिन क्या थे उनके सपने और कैसे वो पहुंची अपने सपनों तक, आईये पढ़ते है उनके चाँद-तारों को छू लेने की चाहत और सपनों के बारे में।

pitara27-copyआसमान कितना सुंदर दिखता है। दिन में सूरज की चमक, तो रात में झिलमिलाते चाँद-तारे। मन करता है आसमान तक पहुँच जाएँ। क्या होगा बादलों के ऊपर? जाने चाँद-तारे पास से कैसे दिखते होंगे?

ऐसी ही बातें हरियाणा की एक लड़की सोचती थी। उसका नाम है – कल्पना चावला। बचपन में उसका कमरा चाँद-तारों की तस्वीरों से भरा रहता था। बड़ी होने पर वह सचमुच धरती से लाखों मील ऊपर तक घूम आई। इस लाखों मील ऊपर की जगह को अंतरिक्ष कहते हैं। वैसे तो दुनिया के कई आदमी-औरत वहां जा चुके हैं। पर कल्पना हिंदुस्तान की सबसे पहली औरत है जो अंतरिक्ष में गई।

अंतरिक्ष में धरती जैसे कई ग्रह हैं – जैसे शनि और मंगल, इसके अलावा वहाँ चाँद, तारे, और सूरज भी हैं। पर यह सब धरती से बहुत अलग हैं। हमारी धरती पर साँस लेने के लिए हवा होती है। पर जैसे-जैसे हम धरती से ऊपर जाते हैं, हवा कम होती जाती है। अंतरिक्ष में तो हवा होती ही नहीं है! साँस लेने के लिए लोग वहाँ सिलिंडर में हवा ले जाते हैं। और हैरानी की बात यह है कि वहाँ पहुँचते ही लोग उड़ने लगते हैं। धरती में हर चीज़ को अपनी ओर खींचने की ख़ास ताकत होती है। इसलिए पेड़ से फल हमेशा ज़मीन पर गिरता है। अंतरिक्ष में ऐसी कोई ताकत नहीं होती। इसलिए वहाँ ज़मीन पर टिकने के लिए ख़ास कपड़े पहनने पड़ते हैं।

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जानिये सावित्रीबाई फुले के जीवन से जुड़ी 7 बातें

सावित्रीबाई फुले का नाम कितनी ही बार शिक्षा या फिर नारीवादी मुद्दों के बारे में बात करते हुए आता है। उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर लड़कियों की शिक्षा तक पहुँच बनाई, जाति प्रथा और जेंडर के आधार पर भेदभाव का विरोध किया, और अपने समय में प्रचलित कई पुराने कायदों को चुनौती दी। उनकी सोच सिर्फ उनके काम में नहीं, बल्कि उनकी पूरी ज़िन्दगी में झलकती है। आइये सुलझाते हैं उनके जीवन के बारे में कुछ पहेलियाँ और जानते हैं उन्हें और बेहतर तरीके से। Continue reading

शिक्षा और स्वतंत्रता की तलाश में

दिल्ली की अलग अलग पुनर्वासित कॉलोनियों में परवाज़ अडोलोसेंट सेंटर फॉर एजुकेशन (PACE) प्रोजेक्ट के तहत ड्रॉपआउट किशोरियों को साक्षर करने के लिए लर्निंग सेंटर खोले गए हैं. पढ़ाई के अलावा किशोरियों को यह भी मौक़ा दिया जाता है कि वो अपनी जानकारी, अपनी समस्याओं और ज्ञान को लिखित रूप दे सकें. इसके लिए सेंटर में सभी किशोरियां मिलकर ब्रॉडशीट तैयार करती हैं. समूह में किशोरियों को अपनी ज़िन्दगी के किसी मुद्दे या पहलू को लेकर ब्रॉडशीट बनानी होती है. उस मुद्दे पर किशोरियां आपस में चर्चा करती हैं. फिर सभी अपने अपने मनपसंद तरीकों और रंगों से अपने लेख लिखती हैं और सजाती हैं. कई किशोरियां अपने लेख से जुड़े चित्र भी बनाती हैं. ब्रॉडशीट के नाम से लेकर उसकी कलाकारी इत्यादि की ज़िम्मेदारी खुद वही निभातीं हैं.

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बेबी हालदार: अक्षरों से की ज़िन्दगी में रौशनी

समाज की दर्जाबंदी ने महिलाओं और पिछड़ी जाति के लोगों के साथ भेदभाव को बरक़रार रखा है और उनकी आवाज को दबाया है। महिला आन्दोलन में बाबा साहेब अम्बेडकर की भूमिका और जाति आधारित सामाजिक ढांचे पर उनके द्वारा उठाये गए सवाल आज भी मायने रखते हैं। उन्होंने जाति आधारित, सामाजिक ढांचे को महिलाओं के खिलाफ माना और महिलाओं को जन आन्दोलनों में शामिल होने के लिए उत्साहित किया। महिलाओं के ऊपर धर्म आधारित और धार्मिक ग्रंथो द्वारा उल्लेखित भेदभाव को उन्होंने बार–बार समाज के सामने उभारा।

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