How would Digital Literacy and Adult Literacy programs be inclusive of each other?

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In a situation where 30 crore people are still illiterate in India, and the primary programme for adult literacy ‘Sakshar Bharat’ is approaching its closure in 2017 with limited results, the National digital literacy mission comes with a new route towards empowerment.

The objective of the National Digital Literacy Mission is to digitally literate at least one person, preferably women, in every family. The paradox of the situation, where literacy is not viewed as pre-requisite for digital literacy, goes to show how the government is working in silos and was echoed by all the participants of the two-day national Consultation on “Adult literacy and Digitalisation” organised by Nirantar.

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Experiences and Learnings from a Conference on Sustainable Development through Multilingual Education- Part 2

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This is the second part of this article where Prarthana shares her experiences and learnings at the 5th International Conference on Language and Education at UNESCO, Bangkok, where we presented a paper on ‘Breaking the Barriers of Languages in India’.

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Experiences and Learning from a Conference on Sustainable Development through Multilingual Education- Part 1

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Nirantar recently participated in the 5th International Conference on Language and Education at UNESCO, Bangkok, where we presented a paper on ‘Breaking the Barriers of Languages in India’. One of the participants from Nirantar, Prarthana, has described her experiences below of being a part of this platform and has shared her learning from this space.

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कल्पना की उड़ान

आज कल्पना चावला (मार्च 17, 1962 – फ़रवरी 1, 2003) की  14वीं बरसी है। वे कोलंबिया स्पेस शटल हादसे में मारे गए सात यात्री दल सदस्यों में से एक थीं। उनके काम और सफलता की चर्चा आज भी देश में ही नहीं, पूरे विश्व में होती है. लेकिन क्या थे उनके सपने और कैसे वो पहुंची अपने सपनों तक, आईये पढ़ते है उनके चाँद-तारों को छू लेने की चाहत और सपनों के बारे में।

pitara27-copyआसमान कितना सुंदर दिखता है। दिन में सूरज की चमक, तो रात में झिलमिलाते चाँद-तारे। मन करता है आसमान तक पहुँच जाएँ। क्या होगा बादलों के ऊपर? जाने चाँद-तारे पास से कैसे दिखते होंगे?

ऐसी ही बातें हरियाणा की एक लड़की सोचती थी। उसका नाम है – कल्पना चावला। बचपन में उसका कमरा चाँद-तारों की तस्वीरों से भरा रहता था। बड़ी होने पर वह सचमुच धरती से लाखों मील ऊपर तक घूम आई। इस लाखों मील ऊपर की जगह को अंतरिक्ष कहते हैं। वैसे तो दुनिया के कई आदमी-औरत वहां जा चुके हैं। पर कल्पना हिंदुस्तान की सबसे पहली औरत है जो अंतरिक्ष में गई।

अंतरिक्ष में धरती जैसे कई ग्रह हैं – जैसे शनि और मंगल, इसके अलावा वहाँ चाँद, तारे, और सूरज भी हैं। पर यह सब धरती से बहुत अलग हैं। हमारी धरती पर साँस लेने के लिए हवा होती है। पर जैसे-जैसे हम धरती से ऊपर जाते हैं, हवा कम होती जाती है। अंतरिक्ष में तो हवा होती ही नहीं है! साँस लेने के लिए लोग वहाँ सिलिंडर में हवा ले जाते हैं। और हैरानी की बात यह है कि वहाँ पहुँचते ही लोग उड़ने लगते हैं। धरती में हर चीज़ को अपनी ओर खींचने की ख़ास ताकत होती है। इसलिए पेड़ से फल हमेशा ज़मीन पर गिरता है। अंतरिक्ष में ऐसी कोई ताकत नहीं होती। इसलिए वहाँ ज़मीन पर टिकने के लिए ख़ास कपड़े पहनने पड़ते हैं।

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उन्नीसवीं सदी का महाराष्ट्र और सावित्रीबाई फुले

संपादक की ओर से: आज के महाराष्ट्र में महिलाओं की स्थिति और उन्नीसवीं सदी की महिलाओं की स्थिति में बहुत अंतर है और इस अंतर के लिए, आज के महाराष्ट्र के लिए, और महिलाओं की आज की बेहतर स्थिति के लिए सावित्रीबाई फुले जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं का योगदान अतुलनीय है। सावित्रीबाई फुले के जन्मदिवस (3 जनवरी) के अवसर पर उनके योगदान को याद करते हुए लेखक ने उन्नीसवीं सदी के महाराष्ट्र और उसकी महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डाला है।

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हम 21वीं शताब्दी में जी रहे हैं, आज भी हमारे यहाँ कन्या भ्रूण हत्या होती है, लड़कियों की पढ़ाई पर रोक लगा दी जाती है और बहुत से लोग लड़कियों को सिर्फ़ इस लिए पढ़ाते हैं कि पढ़ा-लिखा लड़का मिल जाएगा, लड़की घर को आर्थिक रूप से संभालने में सक्षम हो जाएगी और बच्चों को पढ़ा लेगी। हालांकि ये भी मानना होगा कि धीरे-धीरे भारतीय समाज में काफ़ी बदलाव आये हैं परन्तु आज भी समाज में महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे पर है। आज ये हालात हैं तो हम 186 साल पहले के समाज की कल्पना कर ही सकते हैं, जब सावित्री बाई फुले का जन्म हुआ था।

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