बाल और जल्द विवाह पर एक विश्लेषण

२०१३ -२०१४ में निरंतर ने बाल और जल्द विवाह पर एक अध्ययन किया। इसमें हमने इस मुद्दे का नारीवादी नज़रिए से विश्लेषण किया है। इस अध्ययन में हमें समझ आया कि जेंडर और यौनिकता संबंधी सामाजिक- सांस्कृतिक नियम-कायदे किस तरह कम उम्र में विवाह और बाल विवाह की वर्तमान प्रथा को पोषित करते हैं और लंबे समय से कायम सामाजिक असमानताओं और सत्ता सरंचनाओं को पुख्ता करती है।

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कम उम्र में शादी लड़कों और लड़कियों दोनों को ही अपनी ज़िंदगी के बारे में अहम फैसले लेने से रोकती है, उन्हें मूलभूत आज़ादी का उपयोग करने से रोकती है, उन्हें शिक्षा, आजीविका के साधन और यौन स्वास्थ्य व अधिकार आदि प्राप्त करने की संभावनाओं से वंचित कर देती है।

मोटे तौर पर इस प्रथा का गहरा जुड़ाव वर्ग, जाति, धर्म, जातिवाद आदि विभिन्न व्यवस्था से है जो अलग-अलग स्तर पर सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक असमानताओं को और पुख्ता करने का काम करती हैं।

इस जटिलता के बावजूद इस मुद्दे पर होने वाली चर्चाओं में शादी के उम्र तक ही? बात सीमित रहती है। केवल उम्र पर ध्यान देने की नीति पहली बार अंग्रेज़ों के द्वारा उपयोग में लाई गयी थी और तब से वर्तमान में होनी वाली चर्चा में काफ़ी समानता दिखती है। 100 साल पहले इस मुद्दे पर चल रही चर्चा और काम से हमें कुछ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक बिंदु विरासत में मिले है : स्वास्थ्य से जुड़े तर्क, और उम्र और कानून पर संकीर्ण फोकस। इस संदर्भ में महिलाओं के सशक्तिकरण, सहमति और इच्छा की अहमियत और चुनाव के सवाल से ध्यान हट जाता है। इस इतिहास का एक मुख्य सबक यह है कि हमें आज के विमर्श का विस्तार करना होगा और अतीत के मुकाबले एक अलग नज़र से देखना होगा ।

कम उम्र में विवाह और बाल विवाह एक बेहद विखंडित और असमान समाज का लक्षण है। जब भी यह पूछा गया कि लोग अपने बच्चों की कम उम्र में शादी क्यों करते हैं तो “दहेज़”, “गरीबी” और “यौन हिंसा का डर” आदि कारण सबसे ज़्यादा सुनाई दिए। मुमकिन है कि ये कारण शादी से जुड़े फ़ैसलों को निर्धारित करने में भूमिका निभाते हों, मगर यह इस प्रथा के असली कारण या मूल कारण नहीं हैं। हमारी राय में इस प्रथा पर इस लिहाज़ से नज़र डाली जाए कि वह अपने ढाँचागत मूल कारणों के साथ किस तरह जुड़ी है तो हमारे सामने कई नए सवाल उठ खड़े होंगे।

हमने कम उम्र में विवाह और बाल विवाह के साथ बुनियादी कारणों को चिंहित  किया है: शादी का अर्थशास्त्र; यौनिकता; जेंडर के कायदे-कानून और मर्दानगी, शैक्षिक एवं संस्थागत ढाँचे का अभाव; शादी की केन्द्रीयता; ज़ोखिम, असुरक्षा और अनिश्चितता, सत्ता की धुरी के रूप में उम्र की भूमिका।

समाजीकरण की प्रक्रिया में महिलाओं को इस बात का यकीन दिलाया जाता है कि समाज में उनकी मुख्य भूमिका औरों के प्रसंग में ही है – एक बेटी के रूप में, एक बहु के रूप में, एक माँ के रूप में ।

पुरषों के लिए जेंडर के कायदे-कानून मर्दानगी के इर्द-गिर्द  बंधे होते हैं और एक मर्द का गौरव औरतों, खासतौर से बेटियों को काबू कर पाने के उसके सामर्थ्य पर टिका होता है। जब तक बेटी की शादी नहीं होती, उसकी सुरक्षा और उसकी यौन पवित्रता बाप की मर्दानगी की निशानी बनी रहती है। अपनी बेटी पर काबू न रख पाना एक मर्द के लिए पूरी बिरादरी में शर्मिंदगी और बेदखली का सबक बन सकता है। इसके चलते भी वह अपनी लड़कियों को जल्दी से जल्दी ब्याह देना चाहते हैं।

पितृसत्तात्मक भारतीय समाज औरतों को एक आर्थिक बोझ के रूप में देखता है। शादी के बहाने यह बोझ  ससुराल को सौंप दिया जाता है। ऐसे में इस बोझ को उठाने में सहारा देने के लिए लड़की के परिवार से दहेज की उम्मीद की जाती है। गरीबी से जूझ रहे परिवारों के लिए यह एकमुश्त खर्च बहुत भारी पड़ता है। इसलिए लड़की की शादी से जुड़े फैसले इस खर्च को कम से कम करने की इच्छा से तय होते हैं। परिवार के भीतर असमान श्रम विभाजन और लड़की की शादी के बारे में लिए गए फैसले में एक पहलु उसके श्रम की भूमिका भी है। पितृसत्ता सुनिशचित करती है कि आर्थिक लेन-देन में नवविवाहिता के श्रम का मूल्य कम से कम आँका जाए और लड़की व उसके परिवार की मोलभाव क्षमता छीन ली जाए ।

महिलओं की यौनिकता एक ऐसे समाज के लिए बहुत केंद्रीय सवाल है जो पितृसत्तात्मक भी है और वर्ग व जाति की रेखाओं पर भी बंटा हुआ है। संपदा के उत्तराधिकार को सीमित करने और “जातीय शुद्धता” को कायम रखने के लिए महिलाओं की यौनिकता और उनकी प्रजनन क्षमता पर अंकुश रख कर इन विभाजक रेखाओं को कायम रखा जाता है। यौनिकता के प्रति कुल मिलाकर रवैया नकारात्मक रहा है। शर्मिंदगी की आशंका के बिना किशोरों की यौनिकता और उनकी चाहतें, तमन्नाओं को मान्यता देने की कोई गुंजाईश नहीं है। इस सोच का नतीजा यह है कि किशोर किशोरियाँ खुद भी शादी से पहले यौन संभंध को एक विकल्प के रूप में नहीं देखते और कभी-कभी इन्हीं चाहतों को पूरा करने के लिए कम उम्र में शादी की इच्छा करने लगते हैं या शादी के लिए राज़ी हो जाते हैं। चूँकि ये कायदे- कानून एक बहुत सख्त माहौल पैदा कर देते हैं इसलिए जो माँ-बाप नियंत्रण चाहते हैं और जो युवा अपनी यौन इच्छाओं को पूरा करना चाहते हैं उनके पास शादी करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता ।

चूँकि सामाजिक कायदे-कानून सभी से उम्मीद रखते हैं और शादी बहुत सख्त नियमों से बंधी होती है, इसलिए परिवारों को इस बात का डर रहता है कि कहीं ऐसा न हो कि बाद में उनके बच्चों की “आदर्श” शादी न हो पाए या उन्हें “आदर्श” जोड़ीदार न मिल पाए। ऐसी स्थितियों में जल्दी से जल्दी शादी करके माँ-बाप अपने बच्चों का भविष्य? ‘सुनिश्चित कर देना चाहते हैं। शादी हमारे जीवन का इतना केंद्रीय हिस्सा मान ली गई है कि नववयस्क इसके लिए बहुत उत्सुक होतें हैं। बेशक कुछ युवा “प्रेम विवाह” के भी ख्वाब देखते हैं, मगर बहुत सारे दूसरों के लिए शादी अपनी यौन इच्छाओं को संतुष्ट करने या आने-जाने की और दूसरी आज़ादी पाने का ज़रिया होती है जो केवल वयस्कों को हासिल होती है ।

युवाओं, खासतौर से बच्चों को नादान और निर्दोष समझा जाता है जिनके पास अपना जिम्मा उठाने की क्षमता नहीं होती। यही वजह है कि समाज उन्हें किसी भी तरह के नुकसान से बचाने के तरीके ईजाद करता है। बहुत सारे मामलों में इसी आधार पर स्वेछा से कम उम्र में शादी करने वाले युवाओं को एक-दुसरे से अलग कर दिया जाता है जबकि यही स्थिति उस वक़्त समस्याप्रद नहीं रहती जब माँ-बाप की मर्ज़ी, सामाजिक कायदे कानूनों के मुताबिक और सामाजिक सीमाओं के भीतर ऐसा किया जाता है ।

इन सामाजिक स्थिति के साथ ही लगातार बढ़ती और गहन अनिश्चितता, जिसके कई कारण होते है – जैसे आर्थिक संकट, प्राकृतिक आपदा, पलायन इत्यादि,  में जीवनयापन करने वाले बहुत सारे परिवारों के लिए भविष्य को लेकर एक बहुत गहरी बेचैनी रहती है कि “कौन जाने कल क्या होगा!” – गरीबी, कृषि संकट और प्रवसन जैसे संचारात्मक कारक बहुत गंभीर और ज़िन्दगी बदल डालने वाले हालात के प्रति परिवारों की असुरक्षा को और बढ़ा देते हैं। ऐसी स्थितयों में शादी एक बेहद अस्थिर माहौल में निश्चितता और आश्वासन का बोध देती है।

बाल और कम उम्र में शादी के इन मूल कारणों को पढ़ के यह सवाल उठ सकता है कि फिर इस मुद्दे पर काम कैसे किया जाए। हमारे पास जवाब नहीं है, लेकिन हमारा मनना है कि ऊपर लिखे गए कारकों के बारे में समाज में खुली चर्चा करने से ही उपाय अपनेआप समझ आने लगेगा।

(लेख मूल रूप से इन प्लेनस्पीक में प्रकाशित हुआ था)

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ड्रैग और क्रॉस ड्रेसिंग के कई रंग

यह बात लगभग दो हफ्ते पहले गाँव पठा, ललितपुर जिला, महरौनी ब्लॉक के सूचना केंद्र की है। निरंतर में काम कर रही नीलिमा वहाँ सहजनी शिक्षा केंद्र[1] टीम के साथ असाक्षर और नव-साक्षर औरतों के साथ भाषा के बारे में सत्र कर रहीं थी।

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Desire, Shame and Aspirations – Young Girls Tell Their Stories

Bringing out the voices and different facets of lives of young girls, the illustrated book ‘Beauty, Bebo and Friends Pick a Fight and Other Stories’ was launched last month in Delhi.

Dipta Bhog who is associated with Sadbhavana Trust and Disha Mullick who is associated with Khabar Lahariya, collated the data for the book which features three illustrated stories. These stories were based on the adventures of different girls across various villages in India. It portrays groups of women who support each other across generations.

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छेड़खानी समझने के लिए समझें चाहत, प्यार, और इच्छाओं को

निरंतर में पिछले एक साल से हम एक कार्य-शोध कर रहे हैं। इस कार्य-शोध की कल्पना 2014 में हुई थी जब हमने कम उम्र में विवाह और बाल विवाह पर एक अध्ययन किया था और यह पाया था कि युवाओं की ज़िंदगी से जुड़े इस मुद्दे की चर्चाओं और काम में युवाओं का आवाज़ ग़ायब हैं। युवा जेंडर, यौनिकता, और शादी के बारे में क्या सोचते हैं और इनका जुड़ाव जाति, वर्ग, पितृसत्ता, धर्म की व्यवस्था से कैसे समझते हैं यह व्यक्त करने के लिए हम एक मंच तैयार करना चाहते थे। हमने थिएटर, खास कर “थिएटर ऑफ़ द ओप्प्रेस्सेड” की तकनीकों का इस्तेमाल करने का प्रयास किया है। रिसर्च के दरमियान हमने राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में युवाओ के साथ कार्यशालाएं की हैं। यह ब्लॉग पोस्ट ऐसी एक कार्यशाला में बताई गई घटना और उससे शुरू हुई चर्चा के बारे में है।
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Chedkhani: The Blurry Lines of Consent and Youth

Chedkhani, for me, was always a form of sexual harassment with terrible consequences on young women’s mobility where they might be forced to discontinue their education, be married off at an early age or face severe violence. But my idea of chedkhani got challenged during an interaction with the girls of our learning centre at Khanpur. While waiting at the centre for other girls to arrive, Roshni (name changed) came and said “Didi yesterday I was going to the park and at the entrance of the park a few boys were sitting. They asked for my name and address but I aggressively retorted and shooed them away”. Hearing this, other girls also jumped to share their experiences and joined the conversation. The most interesting part was that everyone had different ways of looking at such incidents. For some it is scary, but for some it is simultaneously a way of getting attention as is exemplified by Anjali (name changed), “when someone comments I start running hurriedly to avoid the boys but I also feel that I am looking good and at least somebody has noticed me”.

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