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बदलाव की लहर

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निरंतर द्वारा चलाए जा रहे पेस (परवाज़ अडोलेसेंट सेंटर फॉर एजुकेशन) कार्यक्रम में खासकर उन लड़कियों के साथ शिक्षा साक्षरता का कार्यक्रम चल रहा है जो कभी स्कूल नहीं गयी हैं या जिनकी पढाई छूट चुकी है. इन सभी लड़कियों की उम्र 14 से 24 साल तक की है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत दिल्ली के अलग अलग हिस्सों में शिक्षा केंद्र चलाये गए हैं।  इन्हीं में से एकजनता मज़दूर कॉलोनीस्थित शिक्षा केंद्र में हुए कुछ अनुभव पेश हैं :

दिल्ली की चमक-धमक तो सभी ने देखी होगी और शायद महसूस भी की होगी।  न जाने कितने लोग दिल्ली की ख़ास इमारतों को देखने और यहां मिलने वाली खाने की चीज़ों का स्वाद लेने आते हैं। इस दिल्ली के कई रंग और बेशुमार रौनकें हैं।

लेकिन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। दिल्ली भी इससे अछूती नहीं है। एक तरफ अगर रंगीनी और मौज मस्ती है तो दूसरी तरफ आम लोगों की ज़िन्दगी है जिनमें से कई दो वक़्त की रोटी जुटाने में अपनी सारी ज़िंदगी निकाल देते हैं, जो ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां मूलभूत आवश्यकताएँ भी पूरी मुश्किल से ही होती हैं।

आज मैं दिल्ली के एक ऐसे ही इलाक़े की सैर आपको कराने जा रही हूँ। पूर्वी दिल्ली के इस इलाक़े को जनता मज़दूर कॉलोनी के नाम से जाना जाता है।

जनता मज़दूर कॉलोनी में, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, उन लोगों की आबादी ज़्यादा है जो मज़दूर तबके से हैं। यहाँ पर छोटे छोटे कमरों और घरों में लोग हस्तकला से जुड़े काम करते आसानी से दिख जाते हैं। यहाँ जीन्स के धागे काटने का काम ज्यादा होता है।  साथ ही घरों में लड़कियाँ कढ़ाई, नग-मोती चिपकाने और ज़ंजीर बनाने का काम भी करती हैं।  यहाँ पर ऐसी लड़कियां भी मिल जाएँगी जो अपने पिता और भाइयों के साथ मिठाई, नमकीन, मट्ठी और नमकपारे बनाती हैं। बड़ी बड़ी दुकानों में मिलने वाले माल की पूरी या शुरुआती तैयारी अक्सर यहीं होती है।

इस कॉलोनी में हमने लड़कियों के लिए शिक्षा केंद्र (एजुकेशन सेंटर) खोलने का निर्णय लिया था। इसके लिए सर्वेक्षण किया और ज़मीनी हकीकतों का अंदाज़ा लगा कर सेंटर की शुरुआत की।

जब लड़कियाँ सेंटर में जुड़ीं तो और परतें खुलीं कि रोज़गार और घर के कामकाज की जिम्मेदारियों ने कैसे उनको पढ़ाई से दूर रखा। सेंटर की सभी लड़कियों की अनकही कहानियाँ थीं। सभी लड़कियों में पढ़ने की जो उमंग और लगन थी वो बहुत ही सराहनीय थी। लड़कियाँ जल्दी जल्दी अपने घर के सब काम निपटा कर सेंटर समय से आतीं।

जब सेंटर में लड़कियाँ शुरू शुरू में आयी थीं तो सभी शांत, शर्मीली, कम बोलने वाली और डरी-सहमी सी थीं।

सेंटर खुलने के दो महीने बाद मीटिंग की गयी जिसमें सभी लड़कियों के माता-पिता को बुलाया था। ऐसी मीटिंगों का मकसद होता है कि माता-पिता अपनी बेटियों की प्रगति का अंदाज़ा लगा सकें कि सेंटर आने के बाद से उन्होंने क्या कुछ नया सीखा है। साथ ही अपने मुद्दों को भी वो बता सकें। कहने के लिए तो ये मीटिंगें माता पिता दोनों के लिए होती हैं मगर असल में अधिकतर माएँ ही इनमें दिखाई देती हैं।

इस पहली मीटिंग में सभी माएँ अपनी बेटियों के साथ काफी तैयार होकर आयी थीं। लेकिन ज़्यादातर बहुत चुप चुप थीं। सभी से हमने अपना परिचय देने के लिए कहा। कुछ माएँ तो इतना शर्मा रहीं थीं कि उनसे कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था। मीटिंग की शुरुआत हुयी और माओं ने अपने अनुभव बाँटने शुरू किये। वे काफी खुश थीं कि उनकी बेटियां पढ़ना लिखना सीख रही हैं। साथ ही उनका यह भी कहना था कि उनकी बेटियों में काफी बदलाव भी दिखता है। कुछ माओं ने यह भी कहा कि अब उनकी लड़कियाँ न सिर्फ पढ़ना-लिखना सीख रही हैं बल्कि उनमें आत्मविश्वास और यकीन भी बड़ गया है। वे घर में भी जानकारियां बांटती हैं। एक माँ ने अपना अनुभव बताते हुए कहा, “जब मेरी बेटी ने अपना नाम और घर का पता लिखा तो मैं पड़ोस में चेक कराने ले गयी कि इसने सही लिखा है क्या? मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था जब मुझे पड़ोसियों ने बताया कि सब कुछ बिलकुल ठीक लिखा है।” इस तरह के और भी अनुभव हमारे सामने आये।  सभी लड़कियों ने अपनी माओं के सहयोग और विश्वास की सराहना की और यह भी सांझा किया कि जब वो सेंटर की कोई गतिविधि या वर्कशीट भरना घर पर करती हैं तो माओं को बहुत जिज्ञासा होती है और अक्सर वे जानना चाहती है कि उनकी बेटियां क्या कर रही हैं।

हमने सेंटर की पढ़ाई, वहां की जानकारी और गतिविधियों को माओं के साथ बांटा। उन्हें बताया कि हिंदी और गणित के अलावा विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और लड़कियों की ज़िन्दगी से जुड़े मुद्दों पर बात और चर्चा होती है। साथ ही किताबी ज्ञान को व्यावहारिक ज़िंदगी से जोड़ने के लिए ‘हिस्टोरिकल वाक’ करायी जाती है।

हमने यह भी बताया कि लड़कियाँ पढाई के साथ तरह तरह के खेल भी खेलती हैं और खेल खेल में हम सीखने और सिखाने की प्रक्रिया को बनाये रखते हैं। फिर हमने माओं से पूछा कि क्या वे खेलना चाहेंगी।  इस सवाल पर वे बहुत शरमाईं। मगर थोड़ा मनाने पर तैयार हो गयीं। खेलों की शुरुआत हुयी तो धीरे धीरे उनकी झिझक टूटी। वे खुश थीं। खेल रहीं थीं। थोड़ी देर के लिए वे मानो अपनी सारी परेशानियाँ भूल गई थीं।

इस सेंटर को खुले हुए दस महीने हो गए हैं और आज इसका समापन समारोह है। उस समय माँ-बेटियों में बदलाव की जो झलक दिखाई दी थी आज समापन समारोह में ये बदलाव पूरी तरह हमारे सामने है। खासकर सेंटर पढ़ने आने वाली लड़कियों का आत्मविश्वास देखते ही बनता है। अब वे सपने देखना सीख गयी हैं और अपनी ज़िंदगी में अपनी बात मनवाने के लिए संघर्ष भी कर रही हैं। उन्हीं शरमाई-सकुचाई लड़कियों को स्टेज पर बोलते देख, नाटक प्रस्तुत करते देख, नाचते गाते देख जिस संतुष्टि, गर्व और खुशी का अहसास हो रहा है उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

 

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Celebrating 125th Ambedkar Jayanti With #AmbedkarAnswers

Today is the 125th birth anniversary of Dr. Bheem Rao Ambedkar, marked across country as Ambedkar Jayanti. While the entire country has seen a number of socio-political issues rise up in past few months, various ideologies – rigid and evolved, have come to the surface of discourses everywhere. On this occasion, Nirantar- Center for Gender and Education decided to honour Babasaheb and his legacy in which we have found so many answers and forgotten words of wisdom. Looking back through some of his books and essays, we were able to locate the current problems of religion, caste system, nationalism, equal rights, and so much more, being addressed in his words.

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यौनिकता और हम

दंड संहिता:

इस चित्र में आप देखेंगे की यौनिक कायदे तोड़ने वालों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. चित्र में दिए गए गोलों में हैं, यौनिक कायदे तोड़ने वाले लोग और उनसे जुड़े चौकोर आकारों में है, कायदों को तोड़ने पर उनके साथ होने वाले भेदभाव और अन्याय I

यौनिकता और हम- भाग १ का अंश
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