महिलाओं के खिलाफ हिंसा की यह भी है एक वजह

25 नवम्बर को अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस था। न जाने कितने ऐसे अंतर्राष्ट्रीय दिवस आए और चले गए। महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा कम होने के बजाए और अधिक बर्बर होती जा रही है।

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पिटारा पत्रिका

औरत की ‘न’ में ‘हाँ’ होती है, यह ज़्यादातर माना जाता है। मगर ये मान्यता कितनी सही है और इस मान्यता के कारण या मर्दों द्वारा ‘न’ ना सुन पाने के कारण कितनी औरतों को हिंसा सहनी पड़ती है या जान गँवानी पड़ती है क्या हम कभी ठहरकर ये सोचते हैं?

कुछ हफ्ते पहले गुड़गाँव के एक व्यस्त मेट्रो स्टेशन एम.जी. रोड पर सुबह के नौ बजे एक महिला पर आदमी ने सबके सामने चाकू से बर्बर हमला किया और मार डाला।

उस औरत का बस ये कुसूर था कि उसने ‘न’ बोला था, ऐसे आदमी को जो कई महीनों से उसका पीछा कर रहा था और उससे प्यार करने का दावा करता था।

‘न’  ना सुन पाने की और उसके बदले जानलेवा हमला करने की यह दूसरी घटना थी जो पिछले दो महीने में हुई। इससे पहले गाज़ियाबाद में भी एक लड़की को इसी तरह चाकू से गोद कर मार डाला गया  क्योंकि उसने अपने पुराने प्रेमी से शादी करने से इन्कार किया था।

क्यों आए दिन औरतों को अपने आज़ादी से जीने के मूलभूत अधिकार के लिए हिंसा  सहनी पड़ती है या कभी-कभी जान भी गंवानी पड़ जाती है?

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पी. सी. पब्लिक डोमेन पिक्चर

समाज में कौन ‘हाँ’ कह सकता है और कौन ‘न’ यह हमारी जेन्डर, यौनिकता, वर्ग और जाति की भूमिकाओं और पहचानों (जैसे औरत, मर्द, विषमलैंगिक, समलैंगिक, हिजड़ा, ट्रांसजेंडर, दलित, मुसलमान आदि) और इनके बीच सत्ता सम्बन्धों से निर्धारित होता है। कौन सत्ता की किस सीढ़ी पर खड़ा है उसी से तयहोता है कि उसकी ‘हाँ’ और ‘न’ के क्या मायने होगें – किसकी ‘न’ में ‘हाँ’ होगी, किसकी ‘न’ का मतलब न ही होगा और किसको ‘न’ कहने की सज़ा मिलेगी।

जो हिंसा की वारदातें हुईं वे ‘न’ कहने की चरम प्रतिक्रिया हैं। ‘न’ कहने से मानसिक व आर्थिक हिंसा से लेकर शारीरिक हिंसा तक कुछ भी हो सकता है ‘न’ कहने की आज़ादी औरत को कहीं भी नहीं है। न घर में और न ही बाहर और फिर हम कहते हैं अब तो औरतें आज़ाद हैं। लेकिन कितनी आज़ाद? और क्या इस सीमित आज़ादी की कीमत हिंसा है? तो फिर कैसी है ये आज़ादी और कब औरतों को मिलेगी हिंसा से आज़ादी?

– अर्चना द्विवेदी 

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