सीखेंगे और सिखाएंगे: साक्षरता केंद्र की टीचर्स की ज़िन्दगी

हमारी संस्था प्रौढ़ महिलाओं के साथ शिक्षा और साक्षरता का काम कई सालों से करती आ रही है, इस कार्यक्रम के तहत महिलाएँ अपने ही गाँव में खुले हुए साक्षरता केंद्र में रोज़ाना आकर अक्षर, मात्रा, गणित की क्षमताओं को सीखने के साथ साथ बहुत से मुद्दों पर समझ बनाने का काम करती हैं। इन महिलाओं को सिखाने का काम सेंटर की टीचरों का होता है, जो उसी गाँव से या पास के गाँव से आती हैं और हर रोज़ दो से तीन घंटे महिलाओं के साथ बिताती हैं।

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पढ़ना-लिखना सीखो: सफदर हाशमी

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सफदर हाशमी का जन्म साल 1954 में आज ही के दिन हुआ था। वे एक कम्युनिस्ट नाटककार, कलाकार, निर्देशक, गीतकार और कलाविद थे। उन्हे नुक्कड़ नाटक के साथ उनके जुड़ाव के लिए जाना जाता है। सफदर जन नाट्य मंच और दिल्ली में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के स्थापक-सदस्य थे। उनकी 2 जनवरी 1989 को साहिबाबाद में एक नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ खेलते हुए हत्या कर दी गई थी। उनका ये गीत अत्यंत लोकप्रिय हुआ।

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एक्टिविज़्म पर कुछ विचार

ऑल इंडिया विमेन्ज़ असोसिएशन  की कॉनफरेन्स (आई.ए.डब्ल्यू.एस.) एक ऐसी मंच है जहाँ देश भर से छात्र और अकादमिक अपने  रिसर्च पेपर प्रस्तुत करने आते हैं और देश भर में  जाने पहचाने शिक्षाविद, छात्र, अकादमिक और विकास क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं के कार्यकर्ताओं के साथ इनपर चर्चा करते हैं। इस कॉनफरेन्स में नारीवादी मुद्दों पर चर्चा होती है। इस साल आयोजित की गई कॉनफरेन्स के कुछ विषय थे – जेंडर और काम, विकलांगता, जेंडर और यौनिकता के सम्बन्ध, जेंडर और यौनिकता के सन्दर्भ  में नारीवादी सवाल इत्यादि।आई.ए.डब्ल्यू.एस. साल 1982 में एक सदस्यता आधारित  संस्था के रूप में शुरू हुआ था, और साल  2017 में उन्हें काम करते हुए 35 साल पूरे हो गए हैं।

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बेबी हालदार: अक्षरों से की ज़िन्दगी में रौशनी

समाज की दर्जाबंदी ने महिलाओं और पिछड़ी जाति के लोगों के साथ भेदभाव को बरक़रार रखा है और उनकी आवाज को दबाया है। महिला आन्दोलन में बाबा साहेब अम्बेडकर की भूमिका और जाति आधारित सामाजिक ढांचे पर उनके द्वारा उठाये गए सवाल आज भी मायने रखते हैं। उन्होंने जाति आधारित, सामाजिक ढांचे को महिलाओं के खिलाफ माना और महिलाओं को जन आन्दोलनों में शामिल होने के लिए उत्साहित किया। महिलाओं के ऊपर धर्म आधारित और धार्मिक ग्रंथो द्वारा उल्लेखित भेदभाव को उन्होंने बार–बार समाज के सामने उभारा।

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महिलाओं के खिलाफ हिंसा की यह भी है एक वजह

25 नवम्बर को अंतर्राष्ट्रीय महिला हिंसा उन्मूलन दिवस था। न जाने कितने ऐसे अंतर्राष्ट्रीय दिवस आए और चले गए। महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा कम होने के बजाए और अधिक बर्बर होती जा रही है।

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पिटारा पत्रिका

औरत की ‘न’ में ‘हाँ’ होती है, यह ज़्यादातर माना जाता है। मगर ये मान्यता कितनी सही है और इस मान्यता के कारण या मर्दों द्वारा ‘न’ ना सुन पाने के कारण कितनी औरतों को हिंसा सहनी पड़ती है या जान गँवानी पड़ती है क्या हम कभी ठहरकर ये सोचते हैं?

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