आनंदीबाई जोशी के पत्र

आनंदीबाई जोशी (31 मार्च, 1865 – 26 फरवरी, 1887) पहली हिंदुस्तानी महिला थीं जिन्होंने अमेरिका में डॉक्टरी की पढ़ाई की। नौ साल की उम्र में उनका विवाह गोपाल राव जोशी से हुआ जो उम्र में उनसे 20 साल बड़े थे और विधुर थे। गोपाल राव महिला शिक्षा के समर्थक थे और प्रगतिशील विचारों से प्रभावित थे। इसके तहत उन्होंने आनंदीबाई को पढ़ने और अंग्रेजी सीखने के लिए प्रोत्साहित किया। नीचे आनंदीबाई जोशी द्वारा अपने पति को लिखे गए पत्रों के कुछ अंश दिए गए हैं। ये उनके रिश्ते पर रोशनी डालते हैं।

“पुरानी यादों को कुरेद कर आपके हृदय को वेदना पहुँचाना या हमारे प्रेम में किसी तरह की दरार पैदा करना मेरा उद्देश्य नहीं है…। यह तय करना बहुत कठिन है कि मेरे प्रति आपका बर्ताव अच्छा था या बुरा। अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूँगी कि इसमें दोनों बातें थीं। अंतिम उद्देश्य की दृष्टि से आपका बर्ताव सही माना जा सकता है; लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि एक बच्चे के मस्तिष्क पर ऐसे बर्ताव के संभावित प्रभावों के लिहाज से यह बर्ताव गलत था। मुझे 10 साल की छोटी सी उम्र में टूटी हुई छड़ी से पीटना, जब मैं 12 साल की थी उस वक्त मुझ पर कुर्सी और किताबें फेंकना और मुझे छोड़कर चले जाने की धमकी देना तथा जब मैं 14 साल की थी तब इसी तरह की दूसरी अजीबोगरीब सज़ाएँ देना – यह मेरी उस उम्र, मेरे शरीर और मस्तिष्क के लिए बहुत गंभीर चीजें थीं। बचपन में दिमाग अपरिपक्व व शरीर अविकसित होता है। और आप जानते हैं कि मैंने ऐसे मौकों पर किस तरह का बर्ताव किया। अगर उस कच्ची उम्र में मैं आपको छोड़कर चली जाती जिसका आप लगातार संकेत करते रहे तो क्या होता? मैं कहीं गुम हो जाती (और न जाने कितनी ही लड़कियाँ अपनी सास और पतियों के हाथों इसी तरह के उत्पीड़न के कारण अपने घर-बार छोड़कर जाती रही हैं।) मैं ऐसा नहीं कर पाई क्योंकि मैं इस बात से भयभीत थी कि इस तरह का बिना आगा-पीछा सोचे उठाया गया कदम मेरे पिता की इज्जत को मिट्टी में मिला देगा…। और मैं आपके विनती करती रही कि मुझ पर रहम न करो, मुझे मार डालो। हमारे समाज में सदियों से पत्नियों और पतियों के बीच कोई कानूनी पाबंदी नहीं रही है, और अगर कोई है भी तो वह औरतों के खिलाफ ही जाती है! ऐसी सूरत में मेरे पास इसके अलावा कोई और चारा न था कि मैं आपको कुर्सियों से अपने को मारने दूँ और चुपचाप इस सब को बर्दाश्त करती रहूँ। एक हिंदू स्त्री के पास अपने पति के सामने मुँह खोलने या उसको सलाह देने का कोई हक नहीं होता। उसे केवल इस बात का अधिकार होता है कि वह चुपचाप अपने पति को वे सारी चीजें करने दे जो वह करना चाहता है। प्रत्येक हिंदू पति अपनी पत्नी से धैर्य का सबक सीख सकता है जिससे उसका बड़ा भला होगा। (मैं भली-भाँति जानती हूँ कि आपके बिना मैं कभी वो नहीं बन पाती जो आज मैं बनी हूँ और इसके लिए मैं सदा आपकी ऋणी रहूँगी; लेकिन आप इस बात को नकार नहीं सकते कि मैं हमेशा शांत रही।) मैं यही सब बर्दाश्त करने के लिए पैदा हुई थी। लेकिन अब मैं संतुष्ट हूँ।“

… जब मैं पुरुष और स्त्री के संबंधों के विषय पर विचार करती हूँ तो मैं तथाकथित रूढ़िवादी विचारों की तरफ खड़ी दिखाई देती हूँ। जब तक औरत पुरुष के बराबर हैसियत में नहीं आ जाएगी तब तक उसके लिए यही बेहतर है कि वह कुछ खास सामाजिक बंदिशों में रहे, जैसे कि ‘पुनर्विवाह न करना’, ‘पुरुष के अधीन रहना’, ‘अपने पति को परमेश्वर मानना।’ शास्त्रों में यही निर्देश दिए गए हैं। लेकिन जब मैं इस बात पर विचार करती हूँ कि तमाम युगों और कालों में स्त्रिायों को कैसी-कैसी पीड़ाओं का शिकार बनाया गया है तो मैं यह देखने के लिए अधीर हो जाती हूँ कि पश्चिमी प्रकाश कब हमारे जीवन में मुक्ति और कल्याण के पथप्रदर्शक के रूप में अवतरित होगा। यहाँ मैं अपने आप को पूरी तरह अभिव्यक्त कर पाने में अक्षम महसूस करती हूँ। मुझे यह विश्वास दिलाया जाता रहा है कि पुरुष और स्त्री आत्मरक्षक करने वाले हों और अपना गुजारा चलाने व जीवन की अन्य जरूरतों के लिए एक-दूसरे पर निर्भर न रहें। केवल ऐसी स्थिति में ही सारे पारिवारिक तनावों और सामाजिक अपमानों पर विराम लग सकता है। मुझे यह देखकर घोर दुख होता है कि भारत में यूरोपियनों के बीच बहुत सारी स्त्रियों को केवल विवाह के लिए शिक्षित और योग्य बनाया गया है। आह! किसी स्त्री के लिए यह कितनी वाहियात बात है कि वह कुँवारों को लुभाने के लिए घड़ी-घड़ी पोशाकें बदलती रहे और गहनों से सजती रहे।

… हमारे यहाँ बहुविवाह की प्रथा नहीं है…। हमारे लोग अगर एक से ज्यादा पत्नी रखते भी हैं तो इसलिए कि उन्हें अपनी पहली पत्नी या दूसरी पत्नी से कोई बेटा नहीं हो पाया है। यानी आप यह देख सकते हैं कि सामाजिक और धार्मिक रूप से हम बेटों की चाह में कितने लिप्त हैं। स्वर्ग का द्वार सिर्फ ऐसे पुरुष के लिए ही खुला है जिसका कोई बेटा है। औरों के लिए यह रास्ता बंद है।

हमारे पास सभी मौसमों के लिए एक-सी पोशाक होती है। हम कभी गर्म कपड़े नहीं पहनतीं क्योंकि इसे भद्दा माना जाता है और न ही हम कभी जूते या बूट पहनती हैं क्योंकि हमें विरले ही कभी घर की चहारदीवारी से बाहर जाने का मौका मिलता है। कहने का मतलब यह कि सारे ऐश्वर्य सिर्फ मर्दों के लिए हैं। जाड़ा, गर्मी और वसंत, सब उन्हीं को महसूस होता है – औरतों को ये सब महसूस नहीं होता। उनसे उम्मीद की जाती है कि मौसमों में आने वाले इन सारे बदलावों से बेपरवाह रहें। ऐसे में क्या हमें आपसे ईष्र्या न होनी चाहिए?

… हाल में मैं किसी न किसी वजह से बीमार रही हूँ। भारत में उँचे वर्गों की महिलाएँ आमतौर पर काफी दुर्बल होती हैं। मेरे ख़याल में इसके पीछे कम उम्र में विवाह की प्रथा का काफी हाथ है जो पूरे भारत में फैली हुई है, लेकिन क्योंकि आप भी कुछ ऐसी ही शिकायत कर रहे हैं इसलिए मुझे लगता है कि विवाह की व्यवस्था में ही कुछ खोट है।

पंडिता रमाबाई के जीवन पर आधारित निरंतर प्रकाशन ‘भय नाहीं, खेद नाहीं’ से एक अंश

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